प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) लगातार घोटाले और हेराफेरी करने वाले अफसरों पर कार्रवाई कर रही है। इस बार ईडी ने अपने ही पूर्व अफसर को करोड़ों की हेराफेरी के मामले में गिरफ्तार किया है। दरअसल, ईडी ने पूर्व डिप्टी डायरेक्टर सचिन सावंत के लखनऊ स्थित आवास पर बुधवार को छापेमारी की। उनके अपार्टमेंट से टीम ने कई दस्तावेज, बैंक खाते से जुड़ी डिटेल और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को कब्जे में लिया है। ईडी की टीम सावंत गिरफ्तार कर मुंबई ले गई है। बताया जा रहा है कि उन्हें कोर्ट में पेश करना है।
आईआरएस अधिकारी सचिन सावंत वर्तमान में लखनऊ में ही तैनात हैं। वह सीमा शुल्क और जीएसटी के लिए काम कर रहे हैं। सावंत काफी समय से ईडी के रडार पर थे। जब वह मुंबई में ईडी में थे तब डायमंड कंपनी की 500 करोड़ रुपए की हेराफेरी में संदिग्ध पाया गया था। सावंत के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतें हुई थीं। इसी को लेकर ईडी टीम मुंबई से लखनऊ पहुंची। ईडी टीम ने शालीमार वन वर्ल्ड स्थित सावंत के आवास पर छापेमारी की। देर तक चले अभियान में ईडी टीम ने कई दस्तावेज अपने कब्जे में लिए।
इसके साथ ही बैंक से जुड़ी डिटेल भी जुटाई। ईडी ने सावंत के घर से बरामद सभी चीजों को अपने कब्जे में लेकर साथ ले गई है। टीम ने सचिन सावंत को भी गिरफ्तार कर लिया है और मुंबई के लिए रवाना हो गई है। ईडी की टीम ने उनके मुंबई स्थित आवास पर भी छापेमारी कर चुकी है।(एएमएपी)
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को चुनावों से पहले मुफ्त उपहारों की घोषणा करने वाली सरकारों और राजनीतिक दलों को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि इससे लोग काम करने से बच रहे हैं और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में श्रम शक्ति सूख रही है।
न्यायमूर्ति बीआर गवई और एजी मसीह का पीठ बेघरों के लिए आश्रय गृहों के बारे में एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस दौरान वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि नीतियाँ केवल अमीरों के लिए बनाई गई हैं। वकील ने कहा, “असली पीड़ित गरीब और बेघर लोग हैं। दुर्भाग्य से, बेघर होने के कारणों की बात नहीं की जाती है। इस देश में यह सबसे कम प्राथमिकता है। मुझे यह कहते हुए खेद है कि करुणा केवल अमीरों के लिए है, गरीबों के लिए नहीं।”
न्यायमूर्ति गवई ने वकील के यह कहने पर आपत्ति जताई कि करुणा केवल अमीरों के लिए है, और कहा कि राजनीतिक भाषण न दें। न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “इस अदालत में वैसा भाषण न दें, जैसा रामलीला मैदान में दिया जाता है। अदालत में, अपने आप को तर्क तक सीमित रखें। यदि आप किसी के पक्ष में बोल रहे हैं, तो उसे (वहीं तक) सीमित रखें। अनावश्यक आरोप न लगाएं। यहाँ कोई राजनीतिक भाषण न दें। हम अपने न्यायालय कक्ष को राजनीतिक मंच में बदलने की अनुमति नहीं देंगे।”
अधिवक्ता ने कहा, “मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मेरा यह मतलब नहीं था।” फिर जस्टिस गवई ने वकील से पूछा, “आप कैसे कह सकते हैं कि करुणा सिर्फ़ अमीरों के लिए ही दिखाई जाती है?”
अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि उन्होंने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि इलाके के सौंदर्यीकरण के लिए कुछ आश्रय स्थलों को हटा दिया गया।
न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि दिल्ली सरकार के वकील ने जानकारी दी है कि आश्रय गृहों की हालत खस्ता है। मामले में दायर हलफनामे में दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में बताया गया है। साथ ही न्यायमूर्ति गवई ने टिप्पणी की, “तो, देश के विकास में योगदान देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के बजाय, क्या हम परजीवियों का एक वर्ग तैयार नहीं कर रहे हैं?”
न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “दुर्भाग्य से, चुनाव के समय घोषित इन मुफ्त सुविधाओं के कारण… कुछ लाडली बहन और कुछ अन्य योजनाओं के कारण लोग काम करने को तैयार नहीं हैं। उन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है, बिना किसी काम के पैसे मिल रहे हैं, तो वे काम क्यों करें!”
जैसे ही प्रशांत भूषण ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “हम उनके लिए आपकी चिंता की सराहना करते हैं, लेकिन क्या उन्हें समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाने और राष्ट्र के विकास में योगदान देने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता? मैं आपको व्यावहारिक अनुभव बता रहा हूँ, इन मुफ्त सुविधाओं के कारण, कुछ राज्य मुफ्त राशन देते हैं… इसलिए लोग काम नहीं करना चाहते हैं।”
भूषण ने कहा, ‘इस देश में शायद ही कोई ऐसा होगा जो काम मिलने पर काम नहीं करना चाहेगा।’ उन्होंने कहा कि लोग शहरों की ओर इसलिए आते हैं क्योंकि उनके गाँवों में उनके पास कोई काम नहीं होता।
जस्टिस गवई ने कहा, “आपको सिर्फ़ एकतरफ़ा जानकारी होगी। मैं एक किसान परिवार से आता हूँ। महाराष्ट्र में चुनाव से ठीक पहले घोषित की गई मुफ़्त सुविधाओं की वजह से किसानों को मज़दूर नहीं मिल रहे हैं। जब सभी को घर पर मुफ़्त सुविधाएँ मिल रही हैं, तो वे काम क्यों करना चाहेंगे?
महाराष्ट्र की सरकार में एक नया समीकरण देखने को मिलने लगा है। दोनों ही उपमुख्यमंत्रियों- देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार की जोड़ी जमने लगी है। इस तिकड़ी में शामिल मुख्मयंत्री एकनाथ शिंदे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। मंगलवार को इसकी बानगी भी देखने को मिली। कैबिनेट बैठक के तुरंत बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने दोनों डिप्टी सीएम के साथ अलग से अक बैठक की। हालांकि, विभागों के वितरण पर मतभेदों के कारण बैठक बेनतीजा रही और तीनों को निर्णय टालने के लिए मजबूर होना पड़ा। सूत्रों ने बताया कि कैबिनेट बैठक के दौरान बमुश्किल बोलने वाले सीएम शिंदे की नाराजगी साफ झलक रही थी।एक अधिकारी ने कहा, ”उनकी और उनके मंत्रियों की शारीरिक भाषा संयमित थी, जबकि अजित पवार खेमा आक्रामक दिख रहा था। इसके अलावा अजित पवार और देवेंद्र फड़णवीस की दोस्ती अधिक मित्रतापूर्ण देखी गई। इससे यह आभास हुआ कि शिंदे अलग-थलग पड़ गए हैं।”
विभागों के बंटवारे पर नहीं बन रही बात
विभागों के बंटवारे पर चर्चा के लिए बैठकों का दौर जारी है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ”अजित पवार खेमा वित्त, ऊर्जा, खाद्य और नागरिक आपूर्ति, ग्रामीण विकास, जल संसाधन और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की मांग कर रहा है। वहीं, शिंदे गुट अजित पवार को वित्त विभाग देने का कड़ा विरोध कर रहा है। ऐसा माना जाता है कि पिछवी एमवीए की सरकार में अजित पावर के वित्त मंत्री रहते हुए फंड के असंगत वितरण के कारण शिंदे ने विद्रोह किया था। सीएम ने अपनी पार्टी के मंत्रियों के विभागों में फेरबदल के विचार का भी विरोध किया है, जिसका प्रस्ताव भाजपा ने दिया था।”
एनसीपी को सरकार में शामिल करने पर शिंदे गुट परेशान
शिंदे खेमा काफी परेशान है। विधायक संजय शिरसाट, भरत गोगावले और मंत्री दीपक केसरकर ने बीजेपी द्वारा नया सहयोगी जोड़ने पर सवाल उठाया है। ऐसा कहा जा रहा है कि अजित पवार को सरकार में शामिल करने से पहले एकनाथ शिंदे से नहीं पूछा गया था। शिंदे खेमे के एक विधायक ने कहा, ”हमारे पास पूर्ण बहुमत था तो ऐसा करने की आवश्यकता कहां थी?”
शिवसेना के साथ न्याय करेगी भाजपा
उन्होंने कहा, ”गुस्सा करके हमें क्या हासिल होगा? हम स्थिति को स्वीकार करेंगे और आगे बढ़ेंगे। जिन लोगों को एक भाकरी (रोटी) मिलनी थी उन्हें अब आधी मिलेगी और जिन्हें आधी मिलनी थी उन्हें अब चौथाई मिलेगी।” यह पूछे जाने पर कि क्या शिवसेना विधायक अजित पवार को वित्त विभाग मिलने को लेकर आशंकित हैं, गोगावले ने कहा कि उनका मानना है कि भाजपा, शिवसेना के साथ न्याय करेगी।
शिवसेना नेता गजानन कीर्तिकर ने भी कहा कि अगर शिवसेना को कम विभाग मिले तो ठीक है। उन्होंने कहा, ”लोकसभा चुनाव जीतने और शरद पवार को खत्म करने के लिए एनसीपी को शामिल किया गया है। हमारे कुछ विधायक जो मंत्री पद चाहते थे वे नाराज हैं लेकिन यह कोई बड़ी समस्या नहीं है।”
मंत्री पद की आस में बैठे विधायकों को झटका
इस बीच, सूत्रों ने दावा किया है कि मंत्री पद चाहने वाले कुछ विधायकों ने शिंदे से खुले तौर पर कहा था कि वह उनसे की गई प्रतिबद्धताओं से मुकर गए हैं। मंगलवार शाम को पार्टी के मंत्रियों ने इस मुद्दे के समाधान और सरकार में एनसीपी के शामिल होने के प्रभाव पर चर्चा करने के लिए शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर के आवास पर बैठक की।
भाजपा नेता भी एनसीपी में विभाजन पर लोगों की प्रतिक्रियाओं से परेशान थे। भाजपा नेता ने कहा, ”जिस पार्टी के खिलाफ हमने इतने सारे आरोप लगाए, उससे हाथ मिलाने से मतदाता खुश नहीं हैं। कुछ नेता भी निराश हैं, क्योंकि पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं को सत्ता-साझाकरण से बाहर रखा गया है। लेकिन पार्टी नेतृत्व आश्वस्त था कि लोकसभा चुनाव के लिए यह कदम जरूरी था।”
एक अन्य भाजपा नेता ने कहा कि अजित पवार और एकनाथ शिंदे खेमे को लगभग 13-13 मंत्री पद मिलने की उम्मीद है, जबकि भाजपा लगभग 16 मंत्री पद बरकरार रखेगी। उन्होंने कहा, “शिंदे खेमा भले ही शोर मचा रहा हो, लेकिन अजित पवार गुट के शामिल होने के बाद उसने सौदेबाजी की अपनी शक्ति खो दी है। उसे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के आदेशों का पालन करना होगा।”(एएमएपी)
पाकिस्तान के हाथों भारत की क्रिकेट में हार का मुद्दा।
प्रमोद जोशी।
भारतीय टीम की हार मुझे भी अच्छी नहीं लगी। मैं भी चाहता हूँ कि हमारी टीम जीते। खेल के साथ राष्ट्रीय भावना भी जुड़ती है, पर मैं अच्छा खेलने वालों का भी प्रशंसक हूँ, भले ही वे हमारी टीम के खिलाड़ी हों या किसी और टीम के। खराब खेलकर हमारी टीम जीते, ऐसा मैं नहीं चाहता। पर टी-20 विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में रविवार 24 अक्तूबर को भारत की हार के बाद मिली प्रतिक्रियाओं को देखने-सुनने के बाद चिंता हो रही है कि खेल को अब हम खेल के बजाय किसी और नजरिए से देखने लगे हैं।
यह विषयांतर है, पर मैं उसे यहाँ उठाना चाहूँगा। बहुत से लोगों के मन में सवाल आता है कि भारत में जनता पार्टी के उभार के पीछे वजह क्या है? क्या वजह है कि हम जिस गंगा-जमुनी संस्कृति और समरसता की बातें सुनते थे, वह लापता होती जा रही है? जो बीजेपी के राजनीतिक उभार को पसंद नहीं करते उनके जवाब घूम-फिरकर हिन्दू-साम्प्रदायिकता पर केन्द्रित होते हैं। उस साम्प्रदायिकता को पुष्टाहार कहाँ से मिलता है, इस पर वे ज्यादा ध्यान नहीं देते। वे भारतीय इतिहास, मुस्लिम और अंग्रेजी राज तथा राष्ट्रीय आंदोलन वगैरह को लेकर लगभग एक जैसी बातें बोलते हैं। दूसरी तरफ बीजेपी-समर्थकों के तर्क हैं, जो घूम-फिरकर दोहराए जाते हैं, पर नई घटनाएं उनके क्षेपक बनकर जुड़ी जाती हैं।
मुझे तमाम बातें अर्ध-सत्य लगती हैं। खेल के मैदान, साहित्य, संस्कृति, संगीत समेत जीवन के हर क्षेत्र में निष्कर्ष एकतरफा हैं। इतिहास के पन्ने खुल भी रहे हैं, तो इन एकतरफा निष्कर्षों को समर्थन मिल रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान की विजय और उसके बाद भारत सरकार की नीतियों, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के फैसले, नागरिकता कानून, शाहीनबाग आंदोलन, किसान आंदोलन, लखीमपुर खीरी की हिंसा, डाबर का विज्ञापन और शाहरुख खान के बेटे की गिरफ्तारी सब कुछ इसी नजर से देखा जा रहा है। मीडिया की कवरेज और उनमें होने वाली बहसों की भाषा और तथ्यों की तोड़मरोड़ से बातें कहीं से कहीं पहुँच जाती हैं। टी-20 क्रिकेट भी इसी नजरिए का शिकार हो रहा है।
बहरहाल आप क्रिकेट देखें और इस घटनाक्रम पर विचार करें। सम्भव हुआ, तो इस चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करूँगा। फिलहाल क्रिकेट के इस घटनाक्रम पर मैं कुछ बातें स्पष्ट करना चाहूँगा:
एक मैच हारे, टूर्नामेंट से बाहर नहीं हुए
1.हमारी टीम एक मैच हारी है, टूर्नामेंट से बाहर नहीं हुई है। हो सकता है कि हमें पाकिस्तान के साथ फिर खेलने का मौका मिले। हो सकता है कि दोनों देश फाइनल में हों। हम यह प्रतियोगिता नहीं भी जीते, तब भी भविष्य की प्रतियोगिताएं जीतने का मौका है। इस हार से टीम ने कुछ सीखा हो, तभी अच्छा है।
2.टीम के कप्तान या किसी भी खिलाड़ी को कोसना गलत है। टीम जीत जाए, तो जमीन-आसमान एक करना और हार जाए, तो रोना नासमझी है। खासतौर से उनका विलाप कोई मायने नहीं रखता, जिन्हें खेल की समझ नहीं है।
3.इसके विपरीत जो लोग भारतीय टीम को भारतीय जनता पार्टी की टीम मानकर चल रहे हैं, वे भी गलत हैं। यह दृष्टि-दोष है। मीडिया की अतिशय कवरेज और कुछ खेल के साथ जुड़े देश-प्रेम के कारण ऐसा हुआ है। पर इस हार पर खुशी मनाने का भी कोई मतलब नहीं है।
4.हो सकता है लोग कहें, हम खुशी नहीं मना रहे हैं, केवल भक्तों का मजाक बना रहे हैं, उनकी प्रतिक्रिया भी मुझे समझ में नहीं आती। ऐसे वीडियो सोशल मीडिया में आए हैं, खासतौर से कश्मीर और पंजाब के शिक्षा-संस्थानों के जिनमें पाकिस्तानी टीम की विजय के क्षणों पर खुशी का माहौल नजर आता है। पर क्या यह राजद्रोह है? इस किस्म की प्रतिक्रियाओं की विपरीत प्रतिक्रिया होती है, जो ‘अतिशय या आक्रामक-राष्ट्रवाद’ को जन्म देती हैं।
सांप्रदायिक टिप्पणियां चिंताजनक
5.इस परिणाम पर हर्ष या विषाद के बजाय जिस तरह से साम्प्रदायिक टिप्पणियाँ हुईं, वे चिंताजनक हैं। मोहम्मद शमी को निशाना बनाने वाले ट्रोल नहीं जानते कि वे इतनी गलत बात क्यों बोल रहे हैं। अच्छा हुआ कि शमी के पीछे देश के तकरीबन ज्यादातर सीनियर खिलाड़ियों ने ट्वीट जारी किए।
6.क्या वास्तव में शमी को ट्रोल किया गया? चर्चा इस बात की भी है कि सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे हैंडलों ने इस ट्रोलिंग को शुरू किया, जो पाकिस्तान से संचालित होते हैं। ऐसा क्यों किया होगा? ताकि भारत में हिन्दू-मुस्लिम विभाजन बढ़े।
7.पाकिस्तान की जीत हर लिहाज से बड़ी थी। इसका वहां के क्रिकेट प्रेमियों को पिछले 29 सालों से इंतजार था। जीत का जश्न तो मने तो इसमें हैरत की बात नहीं है। कुछ लोग इसे पाकिस्तान के स्वाभिमान और इस्लाम से भी जोड़ें, तो विस्मय नहीं, क्योंकि पाकिस्तान की पहचान वही है, पर पाकिस्तान के गृहमंत्री शेख रशीद ने बहुत खराब तरीके से खेल को देखा है।
8.शेख रशीद की अनदेखी की जा सकती है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि वैसी ही है, जैसी भारत में गिरिराज सिंह की। वकार युनुस को विस्फोटक पारी के बजाय रिज़वान का हिंदुओं के बीच नमाज पढ़ना सबसे अच्छी बात लगी थी। एक टीवी न्यूज चैनल पर युनुस ने कहा, ‘सबसे अच्छी बात जो रिज़वान ने की कि माशाल्लाह… उसने ग्राउंड में खड़े होकर नमाज पढ़ी जो कि हिंदुओं के बीच में खड़े होकर… तो वह बहुत स्पेशल था।’ अच्छी बात यह है कि उन्होंने इस बात के लिए माफी माँग ली है। शायद उनका इरादा वही नहीं था, जो समझ लिया गया।
9.शेख रशीद के बयान के बाद मैंने सोशल मीडिया पर अनेक भारतीय मुसलमानों की प्रतिक्रिया देखी जिसमें उनकी जबर्दस्त आलोचना की गई है।
संतुलित, शालीन बर्ताव
10.मुझे भारतीय टीम के खेल को लेकर शिकायत है, पर विराट कोहली और टीम के सदस्यों का बर्ताव संतुलित और शालीन रहा है। भारत की हार के बाद मोहम्मद रिज़वान के गले लगते विराट कोहली तस्वीर अच्छा संदेश देती है। यों भी पाकिस्तान की टीम अच्छा खेलकर जीती थी। खेल में जीतने वाले को बधाई दी ही जाती है।
गेंद-बल्ले, धर्म-संप्रदाय की जंग
इस सिलसिले में बीबीसी हिन्दी की एक रिपोर्ट पढ़ने को मिली, जिसमें कहा गया है कि क्रिकेट के जुनून को ज़ाहिर करने के लिए अक्सर भारतीय उपमहाद्वीप में कहा जाता है कि क्रिकेट धर्म है, लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच मैच होता है तो यह धर्म कई बार अफ़ीम की तरह आता है। पाकिस्तान के मंत्री शेख़ रशीद के अलावा असद उमर का बयान और भारत में मोहम्मद शमी के ख़िलाफ़ ऑनलाइन टिप्पणियों से यही ज़ाहिर होता है। शेख़ रशीद ने यहाँ तक कह दिया था, ”दुनिया के मुसलमान समेत हिन्दुस्तान के मुसलमानों के जज़्बात पाकिस्तान के साथ हैं। इस्लाम को फ़तह मुबारक हो। पाकिस्तान ज़िंदाबाद।”
पाकिस्तान की ओर से इस तरह का बयान पहली बार नहीं आया है। 2007 के टी-20 विश्व कप फाइनल में भारत से हारने के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन कप्तान शोएब मलिक ने मुस्लिम दुनिया से माफ़ी मांगी थी। तब शोएब मलिक की भारत की टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा से शादी नहीं हुई थी और भारत में बीजेपी की सरकार भी नहीं थी। हार के बाद शोएब मलिक ने कहा था, ”मैं अपने मुल्क पाकिस्तान और दुनिया भर के मुसलमानों को समर्थन के लिए धन्यवाद देता हूँ। बहुत शुक्रिया और मैं वर्ल्ड कप नहीं जीत पाने के लिए माफ़ी मांगता हूँ।” संयोग देखिए कि उस मैच में भारत के इरफान पठान मैन ऑफ़ द मैच बने थे। शोएब मलिक को आउट इरफान पठान ने ही किया था। तब शोएब मलिक के बयान की भारत के मुस्लिम नेताओं और खिलाड़ियों ने भी कड़ी निंदा की थी।
सांप्रदायिक संदर्भ की खबरें
हो सकता है कि शोएब मलिक ने जल्दबाजी में ऐसी बात कह दी हो, पर इन बातों के व्यापक निहितार्थ होते हैं। संयोग है कि इस समय हम मोहम्मद शमी के बारे में बात कर रहे हैं, जिन्हें लेकर शोएब मलिक की एक और टिप्पणी 2017 में चर्चा का विषय बनी थी। खेल हो या राजनीति जैसे ही संदर्भ साम्प्रदायिक होते हैं, खबरों का मतलब बदल जाता है और उन्हें लोग गौर से पढ़ते हैं।
अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद की बात है, गत 5 अक्तूबर को तालिबानी नेता अनस हक्कानी ने महमूद गज़नवी की कब्र का दौरा किया और उसके बाद एक ट्वीट किया, ‘आज, हमने 10वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध मुस्लिम योद्धा और मुजाहिद सुल्तान महमूद गज़नवी की दरगाह का दौरा किया। गज़नवी ने (अल्लाह की रहमत उस पर हो) गजनी से क्षेत्र में एक मजबूत मुस्लिम शासन स्थापित किया और सोमनाथ की मूर्ति को तोड़ा था।’
भारत का विभाजन ऐसी परिघटना है, जो इस इलाके के जीवन और समाज को गहराई से प्रभावित कर रही है। उसके आगे-पीछे की बातों को समझने की जरूरत है।
सार्वजनिक क्षेत्र में देश के प्रमुख बैंक, पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) ने सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में अपनी टाउनहॉल बैठक का आयोजन किया, जिसमें बैंक की रणनीतिक दिशा, विकास पहलों और ग्राहक-केंद्रित बैंकिंग के प्रति प्रतिबद्धता पर चर्चा करने के लिए नेतृत्व, कर्मचारियों और प्रमुख हितधारकों को एक साथ लाया गया।
पीएनबी के एमडी एवं सीईओ श्री अशोक चंद्र, ईडी – श्री एम. परमशिवम और श्री बिभू प्रसाद महापात्र, मुख्य सतर्कता अधिकारी श्री राघवेंद्र कुमार, मुख्य महाप्रबंधक-एचआर सुरेश कुमार राणा, और दिल्ली अंचल प्रबंधक श्री प्रवीन गोयल ने टाउनहॉल का नेतृत्व किया, जिसमें बैंक के डिजिटल परिवर्तन, परिचालन उत्कृष्टता और ग्राहक सेवा वृद्धि के प्रति प्रतिबद्धता पर जोर दिया गया। टाउनहॉल ने खुले संवाद के लिए एक मंच के रूप में भी काम किया, जिससे बैंकिंग क्षेत्र में नवाचार और लचीलापन को बढ़ावा देने के पीएनबी के दृष्टिकोण को बल मिला।
अपने मुख्य भाषण में, पीएनबी केएमडी एवं सीईओ श्री अशोक चंद्र ने कहा: “पीएनबी में, हम केवल बैंकिंग नहीं कर रहे हैं – हम नवाचार, ग्राहक-केंद्रित समाधानों और देश भर में वित्तीय समावेशन के विस्तार से प्रेरित एक भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारे लोग हैं और यह टाउनहॉल एक साझा लक्ष्य की दिशा में हमारे सामूहिक प्रयासों को संरेखित करने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है। सहयोग, लचीलापन और एक एकीकृत दृष्टिकोण के माध्यम से, हमें बैंकिंग उद्योग में सीमाओं को आगे बढ़ाने और नए बेंचमार्क स्थापित करने की आवश्यकता है। साथ मिलकर, हमें एक मजबूत, अधिक डिजिटल और ग्राहक-केंद्रित पीएनबी का निर्माण करना चाहिए।”
टाउनहॉल की मुख्य विशेषताओं में बैंक की नवीनतम तकनीकी प्रगति, ग्राहक-फर्स्ट पहल और प्रदर्शन मील के पत्थर पर अंतर्दृष्टि शामिल थी। कर्मचारियों ने सक्रिय रूप से एक संवादात्मक प्रश्नोत्तर सत्र में भाग लिया, जिसमें बैंक की निरंतर सफलता में योगदान करने के लिए विचारों और प्रतिक्रिया को साझा किया। टाउनहॉल ने संगठन के भीतर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को भी सम्मानित किया, पीएनबी के विकास और उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता में उनके योगदान का जश्न मनाया।
पीएनबी के डिप्टी जोनल प्रबंधक श्री अजय कुमार सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन दिया गया, जिन्होंने सभी हितधारकों को उनके बहुमूल्य योगदान के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि पीएनबी अपने कार्यबल और हितधारकों के साथ पारदर्शी संचार बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे सतत विकास प्राप्त करने के लिए एक सहयोगात्मक दृष्टिकोण सुनिश्चित हो सके।
नीम करोली बाबा के परलोकगमन के बाद 1974 में एप्पल के संस्थापक स्टीव जाब्स Steve Jobs (1955-2011) उनके कैंची आश्रम (उत्तराखण्ड) आए थे। बाद में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) भी उनके आश्रम आए थे। स्टीव जाब्स और मार्क जुकरबर्ग जब वहाँ आए थे, तब उनके जीवन के बुरे दिन चल रहे थे। वे दोनों हताश और निराश थे। वास्तव में स्टीव जाब्स की प्रेरणा से ही जुकरबर्ग कैंची आश्रम आए थे। इन दोनों के जीवन पर बाबा का बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इसके अतिरिक्त गूगल के लैरी पेज (Larry Page), लैरी ब्रिलिअंट (Larry Brilliant), हालीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स (Julia Roberts), आदि तमाम विदेशी हस्तियाँ बाबा से प्रभावित हुई हैं। डॉ. लैरी ब्रिलिअंट ने बाबा के सुझाव पर ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ज्वाइन किया और दुनिया में चेचक उन्मूलन कार्यक्रम में भाग लिया।
इन सबके जीवन पर बाबा का बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इस बारे में तमाम जानकारियाँ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।
अलौकिक प्रसंग
नीम करोली बाबा के भक्त आज भारत सहित विश्व के अनेक देशों में हैं। ऐसे ही एक अमेरिकी भक्त थे रिचर्ड अल्पर्ट Richard Alpert (1931-2019)। वह बाबा के संग बहुत समय रहे। बाद में उनका नाम राम दास (Ram Dass) हो गया था। उन्होंने राम दास नाम से बाबा पर अंग्रेज़ी में एक पुस्तक लिखी: ‘द मिरकेल ऑफ लव: स्टोरीज़ एबाउट नीम करोली बाबा’ (The Miracle of Love: Stories About Neem Karoli Baba)। बाबा ने कभी यह नहीं कहा कि वह कोई चमत्कार करते हैं। रिचर्ड अल्पर्ट ने अपनी पुस्तक में बाबा को ‘महाराजजी’ कह कर संबोधित किया है। उनकी अंग्रेजी पुस्तक का प्रकाशन अमेरिका में ई.पी. डट्टन, न्यूयार्क (E.P. Dutton, New York) ने किया। उनकी अंग्रेजी पुस्तक के 1979 संस्करण में चार सौ से अधिक पृष्ठ हैं। उनमें बाबा के बारे में असंख्य अद्भुत जानकारियाँ दी गई हैं। उनमें से आठ-दस की यहाँ संक्षेप में चर्चा की जा रही है:
एक
मैं एक बार लन्दन में बस में सफर कर रहा था। तभी एक वृद्ध व्यक्ति कम्बल ओढ़े हुए बस में चढ़ा। वह मेरे बगल वाली विंडो सीट पर बैठना चाहता था। मुझे अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन मैं खड़ा हो गया ताकि वह विंडो सीट पर जाकर बैठ सके। उसे विंडो सीट पर जगह देने के लिए मुझे थोड़ा खड़ा होना पड़ा। यह मुझे अच्छा नहीं लगा। विंडो सीट पर बैठने के बाद उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में एक अद्भुत प्रेम और स्नेह टपक रहा था। उससे मेरी सारी नाराजगी तुरन्त खत्म हो गई। थोड़ी देर बाद मैंने फिर उसकी ओर देखना चाहा, तो वह उस सीट पर नहीं था। इस बीच बस कहीं रुकी भी नहीं थी। वह बस से कहीं गायब हो गया था। मैं आश्चर्य में पड़ गया।
बाद में जब मैं भारत यात्रा पर आया, तो एक जगह पहली बार महाराजजी का फोटो देखा। मैं तुरंत पहचान गया कि यह वही व्यक्ति है, जो मेरे बगल वाली विंडो सीट पर बैठा था और फिर गायब हो गया था। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 10 से)
दो
यदि कोई बहुत चालाक-चंठ और कपटी व्यक्ति महाराजजी के पास आता था, तो वे उसकी अनदेखी कर देते थे। लेकिन जब कोई सीधा सादा व्यक्ति आता था, तो वे उसकी मदद करते थे। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 61 से)
तीन
एक बार मैं एक परीक्षा देने जा रहा था, तो मैंने महाराजजी को पत्र लिख कर उनका आशीर्वाद मांगा। मैंने पूछा कि क्या मैं पास हो जाऊंगा? परन्तु उनका कोई जवाब नहीं आया। मैं इम्तहान में फेल हो गया। मैंने फिर उनको लिखा कि आपका कोई जवाब क्यों नहीं दिया। तब उनका पत्र आया कि अब तुम उस परीक्षा में फिर बैठना। बाद में मैं फिर परीक्षा में बैठा और पास हो गया। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 205 से)
चार
एक बार मेरे पास एक भिखारी लड़का आया। मैंने उसको खाना दे दिया। परन्तु वह खिलौना मांगने लगा, तो मैंने उसे भागा दिया। बाद में महाराजजी ने मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे पास आया था और तुमने मुझे भगा दिया था। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 175 से)
पाँच
एक वृद्ध भक्त महाराजजी के पास आए, उन्होंने पूछा – मैं ईश्वर की साधना करने के लिए क्या करूँ? महाराजजी ने कहा ज्यादा चक्कर में न पड़ो। वही करो जो हनुमान जी करते रहे – राम नाम जपो। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 361 से)
छह
एक बार एक भक्त ने महाराजजी से पूछा कि मेरी एक बेबी है, मैं कैसे आसक्ति छोड़ सकती हूँ? बाबा ने कहा कि ईश्वर पर भरोसा रखो। ईश्वर का नाम जपो। आसक्ति धीरे-धीरे छूट जाएगी। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 197 से)
सात
एक बार एक अत्यन्त गरीब स्थानीय महिला महाराजजी के पास आई। उसने अपनी धोती के पल्लू में एक गांठ बांध रखी थी। उसने उस गांठ को खोल कर मुड़ा-मुड़ाया एक रुपए का एक नोट निकाला और महाराजजी को अर्पित कर दिया। महाराजजी ने उस नोट को वापस उसकी ओर खिसका दिया। तो उस महिला ने उस नोट को फिर पल्लू में बांध लिया।
तब महाराजजी ने उससे कहा – माँ वह नोट मुझे दे दो। उस महिला ने पल्लू की गांठ खोली तो उसमें एक-एक रुपये के दो नोट निकले। उसने वे महाराजजी को अर्पित कर दिए। परन्तु महाराजजी ने वे दोनों उस गरीब महिला को वापस कर दिए।
महाराजजी का मानना था कि यदि तुम्हें ईश्वर में विश्वास है, तो तुम अपना धन-जायदाद सब छोड़ सकते हो। ईश्वर तुम्हारे आध्यात्मिक विकास के लिए तुम्हारी सभी अवश्यकताएं पूरी करेगा। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 208-209 से)
आठ
एक बार नेपाल की महारानी महाराजजी के पास आईं। उनके पति महाराजजी के भक्त थे। महारानी ने महाराजजी को कई उपहार देना चाहा। तब महाराजजी ने कहा कि इन्हें गरीबों में बाँट दो। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 222 से)
नौ
एक बार एक भक्त ने मुझे बताया कि वृन्दावन में जब महाराजजी हनुमानजी की मूर्ति के सामने खड़े होते हैं, तो उनका साइज अर्थात आकार छोटा हो जाता है। इस बात पर मुझे भी कौतूहल हुआ। तो एक दिन क्या हुआ कि मैं हनुमानजी के दर्शन के लिए वहाँ मन्दिर में गया हुआ था, तभी महाराजजी भी आ गए। हम दोनों मूर्ति के सामने रेलिंग पर सिर रखे हुए थे। मैंने देखा कि वहाँ महाराजजी के शरीर का आकार छोटा होता जा रहा था। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 184 से)
दस
महाराजजी कोई लेक्चर नहीं देते थे। वे किसी से यह नहीं कहते थे कि तुम सिगरेट पीना या कोई नशा करना छोड़ दो। परन्तु वह ऐसी स्थितियाँ पैदा कर देते थे कि व्यक्ति इन बुरी आदतों को छोड़ देता था। (अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 189 से)
यहाँ यह बता देना भी जरूरी है कि इस अंग्रेजी पुस्तक के लेखक रिचर्ड अल्पर्ट स्वयं नशा करते थे। इसी कारण उन्हें अमेरिका में हावर्ड यूनिवर्सिटी से निकाला गया था। परन्तु नीम करोली बाबा के प्रभाव में आकार उन्होंने नशा छोड़ दिया था।
बाबा की प्रिय पुस्तकें रामचरितमानस और हनुमानचालीसा
पुस्तक के पृष्ठ संख्या 364 पर रिचर्ड अल्पर्ट ने लिखा कि हमारे लिए महाराजजी ही हनुमानजी हैं। लेखक ने रामचरितमानस (अंग्रेजी संस्करण, 1968, गीता प्रेस, गोरखपुर) से उद्धृत करके हनुमानजी के गुण गिनाए हैं। उन्होंने विलियम बक (William Buck) की अंग्रेजी पुस्तक ‘रामायण’ के माध्यम से भी हनुमानजी के गुण गिनाए। विलियम बक की ‘रामायण’ का प्रकाशन अमेरिका में यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया प्रेस, बरक्ले (University of California Press, Berkely) ने सन् 1976 में किया था।
रिचर्ड अल्पर्ट ने अपनी पुस्तक में लिखा कि रामचरितमानस और हनुमानचालीसा नीम करोली बाबा की प्रिय पुस्तकें थीं। सुन्दरकाण्ड पढ़ते-पढ़ते उनकी आंखों में आँसू आ जाए थे।
परलोकगमन के बाद भी वादा निभाया
सितम्बर 1973 को नीम करोली बाबा ने अपना भौतिक शरीर छोड़ दिया था। अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 400 पर रिचर्ड अल्पर्ट ने लिखा कि परलोकगमन से दो-तीन वर्ष पूर्व महाराजजी ने मुझे तीन चीजें देने का वादा किया था – पशुपतिनाथ से रुद्राक्ष की माला, नर्मदा से शिवलिंगम और एक विशेष शंख। परन्तु अपने जीवन काल में महाराजजी ने ये चीजें मुझे कभी नहीं दीं। मैंने भी कभी उन्हें याद नहीं दिलाया। परन्तु उनके परलोकगमन के बाद एक युवा साधू मेरे पास आया और उसने ये तीनों वस्तुएँ मुझे दीं और कहा कि ये मेरे लिए भिजवाई गईं हैं। उस साधू को उससे पहले मैंने कभी नहीं देखा था। वह कुल मिला कर तीन बार मेरे पास आया और फिर कभी नहीं आया। उसका व्यवहार महाराजजी जैसा ही था। मैंने उससे कहा कि आपका व्यवहार महाराजजी जैसा है। तो उसने सिर झुका लिया और मुस्करा दिया। और वह कुछ नहीं बोला।
रिचर्ड अल्पर्ट के अतिरिक्त भी कई अन्य लोगों ने नीम करोली बाबा पर हिन्दी और अंग्रेजी में पुस्तकें लिखीं हैं। उनमें से एक थे प्रोफेसर सुधीर मुखर्जी। बाबाजी उनको दादा कहते थे। उनको बाबाजी के साथ रहने का कई बार अवसर मिला। बाबाजी प्रयागराज में उनके घर पर हर जाड़े में रुकते थे। दादा मुखर्जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। बाबाजी का शरीर शान्त होने के बाद दादा ने उनके बारे में दो पुस्तकें लिखीं – By His Grace: A Devotee’s Story और The Near and the Dear: Stories of Neem Karoli Baba and His Devotees.
रिचर्ड अल्पर्ट ने अपनी पुस्तक में दादाजी की कई स्थानों पर चर्चा की है।
अमेरिका में हनुमान फाउंडेशन
रिचर्ड अल्पर्ट ने सन् 1974 में अमेरिका में हनुमान फाउंडेशन (Hanuman Foundation) की स्थापना की। इसी प्रकार अभी हाल में वर्ष 2014 में जाने-माने गायक कृष्ण दास ने अमेरिका में कीर्तन वाला फाउंडेशन (Keertan Wallah Foundation) की स्थापना की। इसका उद्देश्य है भजन-कीर्तन करके और हनुमानचालीसा का पाठ करके बाबा के सन्देश को जन-जन तक पहुंचाना। कृष्ण दास के तमाम भजन और हनुमानचालीसा पाठ इंटरनेट में यूट्यूब पर उपलब्ध हैं। कृष्ण दास एक अमेरिकी हैं। पहले उनका नाम जेफ्री कागेल (Jeffrey Kagel) था। बाबा के प्रभाव में आकर उनका नाम बादल कर कृष्ण दास हो गया।
बाबा का वास्तविक नाम
नीम/ नीब करोली बाबा का भी वास्तविक नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उन्होंने फर्रुखाबाद के पास एक स्थान है नीब करोरी। वहाँ बाबा ने साधना की थी। तब से वह नीम/ नीब करोली बाबा या नीब करोरी बाबा के नाम से जाने जाने लगे। वह एक गृहस्थ सन्त थे।
फर्रुखाबाद के पास एक नीबकरोरी (Nibkarori) रेलवे स्टेशन भी है।
हर व्यक्ति की चेतना का स्तर अलग-अलग
ऐसा नहीं है कि बाबा के जीवन काल में उनसे जितने भी लोग मिले, या आज भी जो उनके कैंची आश्रम या उनके आशीर्वाद से स्थापित हनुमान मंदिरों में जाते हैं, उन सबको अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव हुए हों। इसका कारण शायद यह है कि प्रत्येक व्यक्ति की आध्यात्मिक चेतना का स्तर अलग-अलग होता है। जाने-अनजाने में आध्यात्मिकता की राह में हम सभी चल रहे हैं। कोई बहुत आगे है। कोई पीछे है। कोई बीच में है। और अपनी-अपनी जीवन यात्रा में जब जो जहां है, उसके उसी प्रकार के अनुभव हैं।
(लेखक झारखण्ड केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर हैं।)
संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने 25 मार्च, 2025 को एक विशेष और अनूठी प्रदर्शनी ‘Ad Art Exhibition : Four Decades of Indian Advertising’ (ऐड आर्ट एक्जीबिशन : भारतीय विज्ञापन के चार दशक) का आयोजन किया। इस प्रदर्शनी में भारतीय विज्ञापन के चार दशकों (1950-1990) की अनमोल धरोहर को प्रदर्शित किया गया है। इस अवसर पर एक चर्चा का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे मार्केटिंग एक्सपर्ट, लेखक, अभिनेता और कॉलमिस्ट श्री सुहेल सेठ, विशिष्ट अतिथि थे हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ श्री सुकुमार रंगनाथन और अध्यक्षता की पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने। कार्यक्रम का संचालन और स्वागत भाषण श्री अनुराग पुनेठा ने किया। इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर हैं श्री इक़बाल रिज़वी। यह अनूठी प्रदर्शनी आईजीएनसीए की दर्शनम् गैलरी में 28 मार्च तक चलेगी।
इस अवसर पर सुहेल सेठ ने कहा, “विज्ञापन किसी देश की सांस्कृतिक प्रवृत्ति का बैरोमीटर हैं। यह मानना गलत है कि ये केवल उपभोक्ता प्रवृत्ति का प्रतिबिंब हैं। उपभोक्तावाद अक्सर संस्कृति से उपजा होता है और भारतीय त्योहारों के दौरान, दिवाली, होली, ईद, क्रिसमस के दौरान सबसे अधिक पैसा खर्च करते हैं। इसलिए बहुत सारा खर्च संस्कृति से जुड़ा हुआ है।” उन्होंने कहा कि लोग जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह है कि वे मानते हैं कि विज्ञापन का मतलब ब्रांड बेचना है। लेकिन ऐसा नहीं है। विज्ञापन का मकसद लोगों से जुड़ाव स्थापित करना है। हो सकता है कि आप आज मेरा ब्रांड न खरीदें, लेकिन क्या आप कल इसे खरीदने के लिए तैयार होंगे? तो यह लगभग बीज बोने जैसा है। हाल ही में संपन्न हुए महाकुंभ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “आपने अभी-अभी सबसे बड़ा मार्केटिंग उत्सव देखा, जो तीन नदियों के संगम पर संपन्न हुआ। उस उत्सव की आध्यात्मिकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, लेकिन आपको यह भी देखना चाहिए कि कुम्भ के इर्द-गिर्द क्या हो रहा था। उस राज्य के मुख्यमंत्री ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि महाकुम्भ से उस राज्य में पर्यटन को बढ़ावा मिला है।” अपने सम्बोधन के अंत में सुहेल सेठ ने कहा, “मुझे सबसे बड़ा अफ़सोस है कि आज भारतीय विज्ञापन से हास्य गायब हो गया है।” उन्होंने युवाओं से व्यापक रूप से पढ़ने का आग्रह किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि विज्ञापनों को सीखने के स्रोत के रूप में गहरी दिलचस्पी के साथ देखा जाना चाहिए।
सुकुमार रंगनाथन ने वेंस पैकार्ड की किताब ‘द हिडन पर्सुएडर्स’ का हवाला देते हुए बताया कि आप कैसे लोगों की राय को आकार दे सकते हैं और उनसे वह करवा सकते हैं, जो आप करना चाहते हैं। लेकिन पिछले दशक में इंटरनेट ने इस गतिशीलता को बदल दिया है। पिछले दशक में इंटरनेट की बदौलत यह हुआ है कि कंपनियां, व्यक्ति, राजनीतिक दल, संगठन सभी अपने नैरेटिव के मास्टर बन गए हैं। पहले ऐसा नहीं था। पहले, आपको एक मीडिया की आवश्यकता होती थी, जो एक समाचार पत्र या पत्रिका या एक टीवी चैनल होता था। फिर आपको कुछ ऐसे लोगों की आवश्यकता होती थी, जो आपके लिए संदेश तैयार करते थे यानी विज्ञापन एजेंसियां की आवश्यकता होती थी। लेकिन इंटरनेट ने इन सभी बातों को समीकरण से हटा दिया है। इसलिए आप सीधे ग्राहक या उपभोक्ता के पास जाते हैं और अपना नैरेटिव खुद गढ़ सकते हैं।
आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि विज्ञापन भी एक कला है। लेकिन विज्ञापनों का डॉक्यूमेंटेशन नहीं होता, आर्काइविंग नहीं होती। उन्होंने विज्ञापनों पर शोध और उनके अध्ययन पर जोर देते हुए कहा कि एडवर्टाइजिंग के माध्यम से हमारे समाज की मानसिकता में जो बदलाव आता है, उसके बारे में भी हम बात कर सकते हैं। विज्ञापन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिवर्तन को प्रतिबिंबित करते हैं। ये पूरा जगत एडवर्टाइजिंग के माध्यम से आगे बढ़ता है। ये जो मार्केटिंग की दुनिया है, बाजारीकरण की दुनिया है, वो विज्ञापनों के जरिये आगे बढ़ती है। अपने संदेश में उन्होंने विचार के लिए एक सूत्र भी दिया कि जब इतनी सारी विविधता किसी एक रूप (विज्ञापन) में है, तो क्या उसे कला रूप की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए! विज्ञापन फिल्म नहीं है, बल्कि उससे इतर अपने आप में एक पूरा विकसित कला शास्त्र है।
श्री हितेश शंकर ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में कहा कि विज्ञापनों में समाज, संस्कृति, राजनीतिक व्यवस्था, सब झलकती है। उन्होंने एक विज्ञापन का उद्धरण देते हुए यह कहा कि विज्ञापनों में सामाजिक आयाम भी दिखाई देते हैं। विज्ञापनों के जरिये पता चलता है कि केवल उत्पाद नहीं बदल रहे, बल्कि एक समाज के तौर पर हम भी बदल रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञापन केवल उत्पाद के बारे में नहीं हैं, बल्कि नैरेटिव भी गढ़ते हैं। हमें विज्ञापन जगत के डायनेमिक्स को और समझना पड़ेगा। विज्ञापन तरह-तरह की अपील का भी खेल है। आपकी जेब से पैसा कैसे निकालना है, इस तरह के काम, इस तरह के कमाल विज्ञापन करता है।
यह अनूठी प्रदर्शनी न केवल पुराने विज्ञापनों का संग्रह है, बल्कि यह भारतीय समाज, संस्कृति और उपभोक्तावाद में हुए बदलावों का एक दर्पण भी है। विज्ञापनों ने भारत के बाजार, भावनाओं और पहचान को गहराई से प्रभावित किया है। दरअसल, यह प्रदर्शनी विज्ञापनों की कला, लेखन शैली और तत्कालीन सामाजिक संदर्भ को समझने की कोशिश है और यह भी कि विज्ञापनों ने समाज पर क्या प्रभाव डाला। इस प्रदर्शनी में शामिल विज्ञापनों ने दशकों तक भारत के हर घर में अपनी छाप छोड़ी।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने मध्यम वर्ग के लोगों को कई कर लाभ दिये हैं। इसमें 7.27 लाख सालाना आय वाले लोगों को आयकर से छूट शामिल है। सीतारमण ने कहा कि सरकार समाज के हर व्यक्ति को साथ लेकर चल रही है। जब 2023-24 के केंद्रीय बजट में सात लाख रुपये तक की कमाई वालों के लिए आयकर छूट प्रदान करने का फैसला किया गया था, तब कुछ तबकों में इसको लेकर संदेह जताया गया था। संदेह इस बात को लेकर था कि सात लाख रुपये से कुछ अधिक की कमाई वाले का क्या होगा।
वित्त मंत्री ने कहा कि इसलिए, हमने यह पता लगाने के लिये कि आप प्रत्येक अतिरिक्त एक रुपये के लिये किस स्तर पर कर का भुगतान करते हैं, एक टीम के रूप में बैठकर विचार किया… उदाहरण के लिये 7.27 लाख रुपये के लिये, अब आप कोई कर नहीं देते हैं। आप तभी कर देते हैं, जब कमाई इससे ऊपर होती है। उन्होंने कहा, ”आपके पास 50,000 रुपये की मानक कटौती भी है। नई योजना के तहत, शिकायत यह थी कि कोई मानक कटौती नहीं थी। यह अब दी गई है।
सरकार की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) का कुल बजट 2013-14 में 3,185 करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 22,138 करोड़ रुपये हो गया है। सीतारमण ने कहा कि यह नौ साल में बजटीय आवंटन में लगभग सात गुना बढ़ोतरी है। यह छोटे उद्यमों को सशक्त बनाने के लिये सरकार की प्रतिबद्धता को बताता है। उन्होंने कहा कि सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिये सार्वजनिक खरीद नीति के तहत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के 158 उद्यमों ने कुल खरीद का 33 प्रतिशत एमएसएमई से किया है और यह अब तक का सबसे अधिक है।(एएमएपी)
वाराणसी के बहुचर्चित ज्ञानवापी परिसर में वजूस्थल को छोड़कर परिसर के सर्वे वाली याचिका पर आदेश आ गया है। जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत ने मां श्रृंगार गौरी मूल वाद में ज्ञानवापी के सील वजूखाने को छोड़कर बैरिकेडिंग वाले क्षेत्र का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से रडार तकनीक से सर्वे कराने के आवेदन को मंजूर कर लिया है। आदेश के मुताबिक, सील परिसर को छोड़कर बाकी सभी स्थानों का सर्वे होगा।बिना कोई क्षति पहुंचाए हो सर्वेक्षण अदालत ने एएसआई के निदेशक को सर्वेक्षण के लिए आदेशित किया है। अदालत ने कहा कि बिना कोई क्षति पहुंचाए वे वैज्ञानिक तरीके से सर्वेक्षण कराएं। कोर्ट ने एएसआई के निदेशक को 4 अगस्त तक सर्वेक्षण के लिए टीम गठित करने का आदेश दिया है। अदालत के फैसले को हिन्दू पक्ष अपनी बड़ी जीत बता रहा है। अदालत ने हिन्दू पक्ष की दलीलों को मान लिया है। मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया गया है।
हिंदू पक्ष ने जताई खुशी
जिला जज की अदालत में आवेदन मंजूर होने पर हिंदू पक्ष ने खुशी जताते हुए इसे बड़ी जीत बताया है। हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं की दलील है कि सर्वे से यह स्पष्ट हो जाएगा कि ज्ञानवापी की वास्तविकता क्या है। सर्वे में बिना क्षति पहुचाएं पत्थरों, देव विग्रहों, दीवारों सहित अन्य निर्माण की उम्र का पता लग जाएगा। वहीं, विपक्षी अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने सर्वे कराने के आवेदन का विरोध किया है।
अगली सुनवाई चार अगस्त को
चार अगस्त को मामले पर अगली सुनवाई होगी। उस दिन तय होगा कि सर्वे किस तरह से होगा। सर्वे रोजाना होगा तो उसका समय क्या रखा जाएगा। इस जीत के साथ ही हिन्दू पक्ष हाईकोर्ट में कैविएट भी दाखिल करेगा। इससे अगर मुस्लिम पक्ष आज के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाता है तो बिना हिन्दू पक्ष को सुने हुए अदालत स्टे या कोई आदेश नहीं दे सके।
यह है पूरा मामला
गौरतलब है कि श्रृंगार गौरी के पूजा का अधिकार मांग रही चार महिलाओं लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास व रेखा पाठक ने 16 मई को जिला जज की अदालत में अर्जी देकर गुहार लगाई थी कि वुजूखाना को छोड़ शेष सभी हिस्सों का वैज्ञानिक तरीके से सर्वे कराया जाए। उनकी तरफ से अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने इस दौरान पिछले साल वुजू खाने में हुए कोर्ट कमीशन की रिपोर्ट पेश करते हुए कहा था कि उस दौरान शिवलिंग जैसी आकृति मिली थी। आकृति की एएसआई जांच का मामला सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। वुजूखाने को सील किया गया है। ऐसे में उसके आसपास के क्षेत्र का एएसआई सर्वे किया जा सकता है।
विष्णु जैन ने अदालत से कहा कि ज्ञानवापी परिसर का सर्वे हो तो एक और शिवलिंग मिल सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ज्ञानवापी परिसर के पश्चिमी दीवार के पास खंडहरनुमा अवशेष, तीन गुम्बदों और व्यास जी के तहखाने की जांच भारतीय पुरातत्विक सर्वेक्षण, जीपीआर, वैज्ञानिक व डेटिंग पद्धति से कराई जाए। विष्णु जैन ने सर्वे व हिंदू मंदिर के समर्थन में कई सुबूत व तथ्य भी अदालत में रखे हैं। अदालत ने 22 मई, 12 व 14 जुलाई को भी सुनवाई की। वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि पहले श्रृंगार गौरी के पूजा का अधिकार मांगा गया और अब ज्ञानवापी के सर्वे की मांग केवल केस को उलझाने के लिए की जा रही है।(एएमएपी)
भारत सरकार ने बीते दिनों चावल के निर्यात को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। इसके तहत केंद्र ने बासमती चावल को छोड़कर सभी तरह के कच्चे चावल के निर्यात पर बैन लगा दिया। ये फैसला आगामी त्योहारी सीजन के दौरान घरेलू डिमांड में बढ़ोतरी और खुदरा कीमतों पर नियंत्रण को ध्यान में रखकर लिया गया है। इस बैन का बड़ा असर अमेरिकी बाजारों में देखने को मिल रहा है और यहां सुपरमार्केट में चावल खरीदने के लिए लोगों में होड़ सी मची है।चावल खरीदने के लिए बाजारों में उमड़ी भीड़
खाद्य मंत्रालय की ओर से बीते सप्ताह जारी बयान में कहा गया था कि बासमती चावल और सभी तरह के उसना चावल के निर्यात नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यानी केवल गैर-बासमती कच्चा चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि भारत से बड़े पैमाने पर बासमती चावल का निर्यात किया जाता है। सरकार ने गैर बासमती चावल के घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी को देखते हुए निर्यात पर बैन लगाने का फैसला किया है। इसके बाद अमेरिका में चावल खरीदने के लिए मची अफरा-तफरी के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
सोशल मीडिया पर खरीदारी के जो वीडियो और तस्वीरें वायरल हो रही हैं, उन्हें देख चावल के निर्यात पर भारत द्वारा लगाए गए बैन से पड़ रहे असर का अंदाजा लगाया जा सकता है। स्थानीय लोग ट्विटर पर वहां के स्टोर्स का वीडियो शेयर कर रहे हैं। इससे संबंधित रिपोर्ट्स में तो यहां तक कहा जा रहा है कि लोग छुट्टियां लेकर चावल खरीदने के लिए लाइन में लग रहे हैं। स्टोर्ट के अंदर एक-एक आदमी 10-10 चावल के पैकेट खरीदता हुआ नजर आ रहा है। यही रहीं 9 किलो चावल का एक पैकेट 27 डॉलर (2215 रुपये) में बिक रहा है।
लंबी कतारों में खड़े नजर आ रहे लोग
हालांकि, सोशल मीडिया पर जो वीडियो और तस्वीरें वायरल हो रही हैं, हम उनकी पुष्टि नहीं कर रहे है। लेकिन इनमें बताया जा रहा है कि सुपर मार्केट के बाहर लोग चावल खरीदने के लिए लंबी कतारों में लगने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि अमेरिका में बड़े पैमाने पर भारतीय मूल के लोग रहते हैं और चावल इनके रोजमर्रा के खाने का अहम हिस्सा है।
अमेरिका में भारत से एक्सपोर्ट होने वाले चावल की बड़ी खपत है और भारत के चावल पर प्रतिबंध के फैसले के चलते वहां इस तरह के हालात पैदा हो गए हैं। बताया तो ये भी जा रहा है कि स्टोर्स पर उमड़ रही इस भीड़ को देखते कई जगह चावल ऊंची और मनमानी कीमतों पर बेचा जा रहा है।
भारत से इन 5 देशों में सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट
देश से निर्यात होने वाले कुल चावल में गैर-बासमती सफेद चावल की हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी है। भारत से गैर-बासमती सफेद चावल का कुल निर्यात 2022-23 में 4.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जबकि पिछले वित्त वर्ष यानी 2021-22 में यह 2.62 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था। भारत सबसे ज्यादा गैर-बासमती सफेद चावल थाईलैंड, इटली, स्पेन, श्रीलंका और संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात करता है।
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में लगभग 15.54 लाख टन सफेद चावल का निर्यात किया गया है, जो कि एक साल पहले की अवधि में केवल 11.55 लाख टन ही था, यानी सालाना आधार पर चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में निर्यात में 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
इस वजह से सरकार ने लगाया है बैन
सिर्फ इन पांच देशों में ही नहीं भारत दुनिया के 100 से अधिक देशों में चावल का निर्यात करता है। भारत 2012 से चावल का सबसे बड़ा निर्यातक रहा है। अब अचानक भारत सरकार की ओर से निर्यात पर बैन लगाने के फैसलों से अमेरिका के अलावा अन्य देशों में भी इस तरह के हालात देखने को मिल सकते हैं। यहां बता दें कि सरकार ने गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर बैन लगाकार घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने का फैसला किया है।
पिछले कुछ दिनों में चावल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखी जा रही है, इस महीने चावल के दाम में 10 से 20 फीसदी तक का उछाल आया है। हालांकि कुछ शर्तों के साथ चावल के निर्यात को अनुमति दी जाएगी। अगर नोटिफिकेशन से पहले जहाजों में चावल की लोडिंग शुरू हो गई है तो उसके निर्यात की अनुमति होगी। (एएमएपी)