किस नेता ने प्रधानमंत्री बनने से मना कर दिया था और कैसे बने राव प्रधानमंत्री

apka akhbarप्रदीप सिंह । भारत के प्रधानमंत्री का पद बहुत बड़ा होता है। क्या कोई ऐसा राजनीतिक व्यक्ति हो सकता है जिसे प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया जाय और वह मना कर दे।
  हालांकि इस बात की कल्पना थोड़ी कठिन है लेकिन ऐसा हो चुका है। जी हां, बात साल 1991 की है। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसकी सरकार बनी। प्रधानमंत्री बने पीवी नरसिंहराव। पर एक शख्स के इनकार करने के बाद। Sonia Gandhi, Narasimha Rao had strained relations, says Congress minister | India News – India TV

कांग्रेस पार्टी ने नहीं किया था प्रधानमंत्री पद का फैसला

इस बात से जाहिर है कि प्रधानमंत्री के रूप में नरसिंहराव कांग्रेस पार्टी की पहली पसंद नहीं थे। पर ऐसा कहना पूरी तरह से ठीक नहीं होगा। क्योंकि उस समय कांग्रेस अध्यक्ष और फिर प्रधानमंत्री पद किसे मिलेगा इसका फैसला कांग्रेस पार्टी ने नहीं किया था। कांग्रेस पार्टी को तो फैसले की सूचना दी गई थी। उस समय पार्टी में दिग्गज नेताओं की कमी नहीं थी जो प्रधानमंत्री बनने का दावा कर सकें। शरद पवार,  नारायण दत्त तिवारी, माधव राव सिंधिया और अर्जुन सिंह प्रबल दावेदार थे। पर इसे भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना कहें या कुछ और कि देश के प्रधानमंत्री के पद का फैसला एक गैर राजनीतिक व्यक्ति की सलाह से एक गैर राजनीतिक व्यक्ति ने किया।
पीवी नरसिंहराव दिल्ली से अपना बोरिया बिस्तर बांध कर हैदराबाद जा चुके थे। वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़े थे। राजीव गांधी ने उन्हें राज्यसभा में भेजने से मना कर दिया था। वे नाराज होकर एक तरह से सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। पर कहते हैं न कि भावी को कौन रोक सकता है। पार्टी और वरिष्ठ नेताओं को इसकी सूचना दी गई कि पीवी नरसिंहराव भारत के अगले प्रधानमंत्री होंगे। शरद पवार अध्यक्ष पद के लिए, अर्जुन सिंह प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव लड़ना चाहते थे। एक समझौता हुआ जिसके तहत शरद पवार मैदान से हट गए और अर्जुन सिंह को पार्टी अध्यक्ष बनाने का आश्वासन दिया गया। राव इसके लिए मान गए। पर प्रधानमंत्री बनने के बाद वे इस वादे से मुकर गए। उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई और उसमें पीवी नरसिंहराव को कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया।
जी हां, आपने ठीक सुना। चुनाव नतीजे आने के बाद नटवर सिंह ने सोनिया गांधी से कहा कि समय आ गया है कि वे इशारा करें कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा। फिर नटवर ने उन्हें सलाह दी कि वे पीएन हक्सर से बात करें। सोनिया ने कहा वे बताएंगी। उसके बाद उन्होंने कई कांग्रेस नेताओं से मशविरा किया। फिर नटवर सिंह से कहा कि वे पीएन हक्सर को लेकर दस जनपथ आएं।  पीएन हक्सर को दस जनपथ बुलाया गया। उन्होंने कहा कि इस पद के लिए वर्तमान उप राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा सबसे उपयुक्त होंगे। सोनिया ने मान लिया। उसके बाद नटवर सिंह और अरुणा आसफ अली को शंकर दयाल शर्मा के पास भेजा गया। अरुणा आसफ अली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं और शंकर दयाल शर्मा को अच्छी तरह जानती थीं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अपनी भूमिका के कारण देश में उनका बड़ा सम्मान था।

जो कहा वह अप्रत्याशित था

दोनों नेता डा. शंकर दयाल शर्मा के यहां पहुंचे। अरुणा आसफ अली ने उन्हें सोनिया गांधी के प्रस्ताव की जानकारी दी। डा. शर्मा ने दोनों की बात ध्यान से सुनी। पर उसके बाद उन्होंने जो कहा वह सामने बैठे दोनों नेताओं के लिए अप्रत्याशित था। उन्होंने कहा कि सोनिया जी का बहुत आभार कि उन्होंने मुझपर इतना भरोसा किया। उन्होंने कहा कि  भारत के प्रधानमंत्री का पद पूर्णकालिक काम है। मेरी उम्र और स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि मैं पूरा समय दे सकूं। इसलिए मैं इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने में असमर्थ हूं। दोनों नेता सुन्न से हो गए। लौटते समय रास्ते में भी उनकी यही स्थिति रही। नटवर सिंह अपनी किताब ‘वन लाइफ इज़ नॉट एनफ’ में इस पूरी घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि हम दोनों उपराष्ट्रपति का जवाब सुनकर स्तब्ध रह गए। P V Narasimha Rao: An undermined and unsung reformer

प्रधानमंत्री बनने के बाद वादे से मुकर गए

नटवर सिंह और अरुणा आसफ अली ने लौटकर पूरी बात सोनिया गांधी को बताई। तो एक बार फिर हक्सर को बुलाया गया। इस बार उन्होंने पीवी नरसिंहराव का नाम सुझाया। पीवी नरसिंहराव दिल्ली से अपना बोरिया बिस्तर बांध कर हैदराबाद जा चुके थे। वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़े थे। राजीव गांधी ने उन्हें राज्यसभा में भेजने से मना कर दिया था। वे नाराज होकर एक तरह से सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। पर कहते हैं न कि भावी को कौन रोक सकता है। पार्टी और वरिष्ठ नेताओं को इसकी सूचना दी गई कि पीवी नरसिंहराव भारत के अगले प्रधानमंत्री होंगे। शरद पवार अध्यक्ष पद के लिए, अर्जुन सिंह प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव लड़ना चाहते थे। एक समझौता हुआ जिसके तहत शरद पवार मैदान से हट गए और अर्जुन सिंह को पार्टी अध्यक्ष बनाने का आश्वासन दिया गया। राव इसके लिए मान गए। पर प्रधानमंत्री बनने के बाद वे इस वादे से मुकर गए। उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई और उसमें पीवी नरसिंहराव को कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया। याद दिला दें कि मृत्यु से पहले तक राजीव गांधी ही संसदीय दल के नेता के साथ साथ कांग्रेस अध्यक्ष भी थे।

‘सोनिया के व्यवहार का मेरे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है’

सोनिया गांधी ने नरसिंहराव को प्रधानमंत्री तो बना दिया लेकिन उन पर कभी विश्वास नहीं किया। इस बात से राव काफी परेशान रहते थे। परेशानी जब हद से ज्यादा हो गई तो उन्होंने दिसम्बर 1994 में नटवर सिंह को बुलाकर अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने कहा कि वे चाहें तो सोनिया से निपट सकते हैं पर वे ऐसा करना नहीं चाहते। नटवर सिंह लिखते हैं कि प्रधानमंत्री ने कहा कि सोनिया के व्यवहार के कारण मेरे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। तुम पता करो कि सोनिया गांधी मुझसे क्यों नाराज हैं।

राव ने सोनिया की हर इच्छा पूरी की पर…

Narasimha Rao felt 'insulted' by Sonia, says Natwar Singh - India News नटवर सिंह लिखते हैं कि उन्हें इतना पता था कि राजीव गांधी हत्या की जांच की धीमी रफ्तार से सोनिया नाराज थीं। राव ने जांच से सम्बन्धित कागजों के साथ पी चिदम्बरम को उनके पास भेजा। फिर गृहमंत्री एसबी चह्वाण को जांच की प्रगति के बारे में बताने के लिए भेजा। उसके बाद खुद सारी फाइलें लेकर गए और बताया कि क्या कानूनी अड़चनें आ रही हैं। सोनिया गांधी सुनती रहीं, बोलीं कुछ नहीं। नटवर ने सुझाव दिया वे मोहम्मद युनुस से बात करें। उनसे  गांधी परिवार के करीबी रिश्ते हैं। राव तैयार हो गए। एक दिन रात नौ बजे सारी सुरक्षा छोड़कर राव मोहम्मद युनुस के घर पहुंचे। नटवर सिंह भी वहां थे। राव ने अपनी समस्या बताई। पर बात बनी नहीं। मोहम्मद युनुस ने क्या बात की यह तो पता नहीं लेकिन सोनिया गांधी और चिढ़ गईं। राव और सोनिया के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हो पाए। राव के मुताबिक उन्होंने सोनिया की हर इच्छा पूरी की। वे जो कहती थीं वे करते थे। पर सोनिया पर कोई असर नहीं पड़ा। सोनिया गांधी की इस बेरुखी का स्वाद तिवारी कांग्रेस के नेताओं को भी चखना पड़ा। पर उसका और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने का किस्सा फिर कभी।
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कब तक चलेगा अमीर के न्याय पर शोर और गरीब के अन्याय पर खामोशी का सिलसिला

apka akhbarप्रदीप सिंह । अपना देश भी गजब है। यहां माथा देखकर तिलक लगाने की परम्परा है। व्यक्ति के रसूख से उसके अपराधी होने या न होने का आकलन होता है। सेलिब्रिटी हो तो आरोपी होने पर भी सहानुभूति उसी के साथ हो जाती है, पीड़ित के साथ नहीं।
  जी हां, यहां बात फिल्म अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती की हो रही है। उन्हें बाम्बे हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। उनके समर्थकों और मीडिया के एक धड़े की प्रतिक्रिया ऐसी है मानो उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया है। इतनी ही नहीं अदालत का फैसला आने से पहले ही इतने दिन रिया को जेल में रखना अपराध माना जा रहा है।

सुशांत नशेड़ी …रिया विदुषी

Do you remember, Mother..." - TheLeaflet यह सही है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता एक क्षण के लिए भी नहीं छिननी चाहिए। पर हम उस देश की न्याय और कानून व्यवस्था की बात कर रहे हैं जहां लोग दशकों तक जेल में सिर्फ इसलिए रहते हैं कि उनका मुकदमा शुरू नहीं हुआ या उनके पास जमानत के पैसे नहीं हैं। दो मामलों के जिक्र से बात और साफ हो जाएगी। साल 1996 में दिल्ली पुलिस ने अट्ठाइस वर्षीय मोहम्मद अली भट को नेपाल की राजधानी काठमांडू से उठाया। यह कश्मीरी युवक वहां शाल बेचने का काम करता था। उसे दिल्ली लाकर लाजपतनगर बम धमाके में आरोपी बना दिया। उसके बाद उसे राजस्थान के समलेठी बम विस्फोट कांड का आरोपी बनाया गया। चौबीस साल बाद बाइस जुलाई, 2020 को राजस्थान हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष बताया। दूसरा मामला उत्तर प्रदेश के बिजनौर का है। साल 2007 में बाला सिंह नाम के युवक को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया। साल 2017 में पुलिस को पता चला कि हत्या उसके भाई ने की है। पर दस साल पहले उसकी मां की यही बात पुलिस मानने को तैयार नहीं थी। इनकी चर्चा आपने कहीं सुनी है। मुझे पता नहीं रिया चक्रवर्ती दोषी हैं या निर्दोष। यह तय करना मेरा काम भी नहीं है। उसके लिए देश में अदालतें हैं। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की जांच ने बता दिया है कि सुशांत बहुत बड़े नशेड़ी थे। यह भी कि रिया सहित बॉलीवुड की तमाम अभिनेत्रियां उनके लिए नशीले पदार्थ का प्रबंध करने में निष्काम भाव से जुटी हुई थीं। रिया ने तो अपने भाई को भी इस पुण्य के काम में लगा दिया। पर डाक्टरों ने बड़ी नाइंसाफी की। मुंबई के कूपर अस्पताल के डाक्टरों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा ही नहीं कि सुशांत सिंह राजपूत नशे के आदी थे। वही गलती एम्स, दिल्ली की फारेंसिक टीम ने की। और तो और सुशांत का इलाज करने वाले किसी डाक्टर ने यह नहीं कहा कि सुशांत नशे के आदी थे। पर इससे क्या होता है, रिया कह रही हैं तो मान लेना चाहिए कि ऐसा ही होगा। इन डाक्टरों की अक्षमता की सजा रिया को तो नहीं दी जा सकती। बेचारी एक तो सुशांत के लिए इतना कष्ट उठा रही थी और उल्टे उसे ही जेल भेज दिया। Fear for my life in jail, says Rhea Chakraborty; Files for bail in sessions court
मुझे पता नहीं रिया चक्रवर्ती दोषी हैं या निर्दोष। यह तय करना मेरा काम भी नहीं है। उसके लिए देश में अदालतें हैं। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की जांच ने बता दिया है कि सुशांत बहुत बड़े नशेड़ी थे। यह भी कि रिया सहित बॉलीवुड की तमाम अभिनेत्रियां उनके लिए नशीले पदार्थ का प्रबंध करने में निष्काम भाव से जुटी हुई थीं। रिया ने तो अपने भाई को भी इस पुण्य के काम में लगा दिया। पर डाक्टरों ने बड़ी नाइंसाफी की।

बड़े लोगों को ही जमानत  का अधिकार

रिया को जमानत मिलने से भी उस वर्ग की नाराजगी कम नहीं हुई है। भला एक सेक्युलर सरकार की पुलिस जांच पर सवाल कैसे उठा दिया। जिस परिवार का बेटा मरा वही परिवार बिना किसी अपराध के कटघरे में खड़ा है। जैसे कि जांच की मांग करके उन्होंने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। इस वर्ग ने मृतक ( सुशांत) को ही खलनायक बना दिया है। उसके आसपास के सब लोग धर्मात्मा हैं और इतने सालों से सुशांत के सितम चुपचाप सह रहे थे। मान लीजिए कि सुशांत ने आत्महत्या की। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि अदालत का फैसला तो दूर सीबीआई ने अभी तक चार्जशीट भी फाइल नहीं की है। रिया को जमानत मिलना देश में आजादी के बाद से बनी संस्कृति कि- बेल का अधिकार बड़े लोगों को ही है- के अनुरूप है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक देश में ज्यादातर विचाराधीन कैदी युवक-युवतियां हैं। इनमें से दो तिहाई दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के लोग हैं। वकील रखना तो दूर इनके पास जमानत के पैसे भी नहीं होते हैं। देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने चालीस साल पहले कहा था कि ‘इतनी बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदियों का होना न्याय व्यवस्था के लिए शर्म की बात है।’ तब से विचाराधीन कैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और साथ ही शायद न्याय व्यवस्था की शर्म भी। सुप्रीम कोर्ट ने इन विचाराधीन कैदियों के बारे में एक और बात कही कि ‘ये मानवता की दुर्भाग्यशाली प्रजाति हैं।’

ताकतवर लोगों को आसानी से जमानत

सुप्रीम कोर्ट बार बार कहता है कि बेल यानी जमानत नियम है और जेल अपवाद। पर यह बात केवल रसूख वालों पर ही लागू होती है। देश के गरीब तबके के लिए आज भी जेल ही नियम है और बेल अपवाद। लॉ कमीशन ने इससे भी आगे बढ़कर बात कही। अपनी 268वी रिपोर्ट में आयोग ने कहा कि ‘भारत में यह कायदा बन गया है कि रसूख वाले, धनाढ़्य और ताकतवर लोगों को आसानी से जमानत मिल जाती है। जबकि गरीब व्यक्ति जेल में सड़ता रहता है।’ अदालतों का हाल यह है कि 14 नवम्बर, 2019 तक निचली अदालतों में 18 लाख, 46 हजार 741 मामले दस साल से ज्यादा समय से लम्बित हैं। इसके अलावा दो लाख 45 हजार 657 मामले विभिन्न हाईकोर्ट में लम्बित हैं। ऐसी न्याय व्यवस्था में मामला दर्ज होते ही मुकदमा शुरू हो जाना और गिरफ्तारी के एक महीने में जमानत मिल जाने को यदि अन्याय मानें तो बेचारे उन लाखों विचाराधीन कैदियों के बारे में क्या कहें। मुझे रिया चक्रवर्ती के प्रति कोई राग द्वेष नहीं है। मुझे कानून बनाना हो तो मैं किसी बेटी को कुसूरवार होने पर भी सजा न दूं। पर यहां बात देश के संविधान से बने कानून की हो रही है। आजादी के इतने दशकों बाद भी अमीर को मिलने वाले न्याय को अन्याय बताने का शोर मचाने और गरीब के साथ होने वाले अन्याय पर खामोशी का सिलसिला कब तक चलता रहेगा।    

चिराग पासवानः बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना या शिखंडी

apka akhbarप्रदीप सिंह । बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टियों के गठबंधन और आपसी संबंध के बारे में इतना कुहासा पहले शायद ही रहा हो। जो साथ हैं वे कनखी से दूसरे साथी पर नजर रखे हुए हैं। जो विरोध में खड़े दिखाई दे रहे हैं वे सचमुच में विरोध में हैं या विरोध में होने का स्वांग कर रहे हैं कहना कठिन है।
  ऐसा भी कहा जा रहा है कि जो सचमुच विरोध में हैं वे समय आने पर साथ होने को अभी से तैयार हैं। इस समय एक ही बात तय लग रही है कि ये कुहासा नतीजे आने से पहले  छंटने वाला नहीं है। कारण यह है कि सबके दिल में कुछ है और जबान पर कुछ और। Bihar assembly election

बातचीत का नाटक

वैसे तो विधानसभा चुनाव में स्पष्ट रूप से दो गठबंधन हैं। एक, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन। जिसमें जनता दल (एकी), भारतीय जनता पार्टी, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) है। हम और वीआईपी, जनता दल (एकी) और भाजपा की पुछल्ला पार्टियां हैं। दोनों दल चुनाव की घोषणा से पहले तक राष्ट्रीय जनता दल के साथ टिकटों की सौदेबाजी करते हुए नजर आ रहे थे। दोनों के नेता जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी का जद एकी और भाजपा से सौदा तय हो गया था। राजद नेता तेजस्वी यादव से उनकी बातचीत का नाटक सिर्फ इसलिए चल रहा था कि धोखा देने का आरोप लगाकर गठबंधन से निकल सकें और वही हुआ। उन्हें जो सीटें मिली हैं उनमें से कितनों पर उनके उम्मीदवार हैं और कितने सहयोगी पार्टी के दिए हुए कहना कठिन है। राजग में भाजपा और जद एकी ऐसे युगल हैं जिन्हें विवाहेतर संबंधों से परहेज नहीं है। दोनों नफे नुक्सान का आकलन कर रहे हैं कि शादी बनाए रखना अच्छा है कि नये प्रेमी के साथ चले जाना। दरअसल दोनों को पता नहीं है कि शादी से बाहर जाने का अंजाम क्या होगा। इसमें जद एकी की बैचैनी ज्यादा है। दरअसल उसे बराबरी का रिश्ता रास नहीं आ रहा है। जब से संबंध जुड़ा है उसे दबंगई की आदत रही है। दूसरी ओर भाजपा लम्बे समय तक दबे रहने के बाद बराबरी का हक मांग रही है। समय और परिस्थिति अनुकूल होने पर वह अपनी क्षमता के अनुसार अधिकार लेने को तैयार है। हुआ यह है कि दूसरी ओर जो लोग शीर्ष पर हैं उन्हें दबंगों को रोए दिए बिना उनकी असली जगह दिखाने का हुनर आता है। उनका फंडा साफ है, जिसकी जितनी ताकत उसकी उतनी हिस्सेदारी। अब ये लोग मायके चले जाने की धमकी में भी नहीं आते। क्योंकि उन्हें मायके के जन्नत की हकीकत पता है।

गठबंधनों में आपसी संबंध

उधर राजद, कांग्रेस और वामदल चुनाव तो साथ लड़ रहे हैं। पर कांग्रेस और वामदलों की नजर राजद के यादव मुसलिम वोट बैंक पर है। इसलिए यह तात्कालिक सुभीते का सौदा है। चुनाव के बाद भी साथ रहने की गारंटी नहीं है। चुनाव नतीजे आने के बाद अगर कांग्रेस, वामदलों और जनता दल एकी मिलकर एक सौ बाइस सीटों का आंकड़ा पार कर जाते हैं तो इन्हें अपने बड़े सहयोगी दल राजद और भाजपा को छोड़ने में एक पल भी नहीं लगेगा। लेकिन आज की परिस्थिति में यह दूर की कौड़ी लगती है। यह बात सिर्फ इसलिए कही कि इससे पता चलता है कि विभिन्न गठबंधनों में आपसी संबंध कितने ‘मजबूत’ हैं।

उधार का सिंदूर

बिहार विधानसभा के इस चुनाव की बात चिराग पासवान के बिना पूरी नहीं हो सकती। अभी तक किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि चिराग पासवान मिसगाइडेड मिसाइल हैं, शिखंडी या फिर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की भूमिका में। भाजपा मानती है कि वे बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बन रहे हैं। राजग से अलग हो गए हैं पर अपने को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हनुमान बता रहे हैं। लेकिन ‘प्रभु श्रीराम’ ने अभी तक उनकी ओर तिरछी नजर से भी नहीं देखा है। दरअसल चिराग पासवान के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। सीटों के बंटवारे में अपने दिवंगत पिता की तरह उन्होंने भी बहुत बड़ा मुंह खोला पर मुंह खुला ही रह गया। उसके बाद उनके पास गंवाने के लिए कुछ नहीं रह गया है। उन्हें पता है कि पिता के जीवित रहते ही पार्टी का जनाधार भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के सहयोग से बड़ा नजर आ रहा है। इसलिए वे अपने पिता की विरासत के बूते चुनाव लड़ने की बात नहीं कर रहे हैं। पासवान को पता है कि नीतीश कुमार पंद्रह साल मुख्यमंत्री रहने के बाद अब पहले जैसे लोकप्रिय नहीं हैं। राजग में उनकी दबंगई भी नहीं रह गई है। वे भाजपा, राजद और कांग्रेस सबके साथ रह लिए हैं। उनकी इसी कमजोरी का चिराग फायदा उठाना चाहते हैं। दूसरे उन्हें यह भी पता है कि जो लोग नीतीश कुमार से नाराज हैं वे भी प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर नरम पड़ जाते हैं। तो एक नकारात्मक और एक सकारात्मक कारक को अपने चुनावी लाभ में बदलना चाहते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे नीतीश कुमार को चिढ़ाने और भाजपा को असहज करने के अलावा कुछ ज्यादा कर नहीं पा रहे। चुनाव अपनी ताकत पर लड़े और जीते जाते हैं। चिराग पासवान उधार के सिंदूर से अपनी मांग भरना चाहते हैं।

नीतीश के डर

भाजपा के अभी तक के रवैए से साफ नजर आता है कि वह अपनी ताकत तो बढ़ाना चाहती है लेकिन गठबंधन को खतरे में नहीं डालना चाहती। क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव में वह एकमात्र राष्ट्रीय दल (कांग्रेस अब मल्टी स्टेट पार्टी रह गई है) है। उसकी राजनीतिक सोच का दायरा बिहार तक सीमित होने की बजाय राष्ट्रीय है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा का चिराग पासवान के खिलाफ खुलकर बोलना इसी सोच का परिणाम है। पर कहते हैं न कि वहम का इलाज हकीम लुक्मान के पास भी नहीं था। नीतीश कुमार उसी व्याधि से ग्रस्त हैं। उनकी पार्टी को लग रहा है कि चिराग भाजपा के शिखंडी हैं। पर नीतीश कुमार भीष्म पितामह नहीं हैं। नीतीश कुमार का दूसरा डर वास्तविक है। गठबंधन में भाजपा का स्ट्राइक रेट अपने सहयोगी दल से ज्यादा होता है। साल 2010 के विधानसभा चुनाव में उसका स्ट्राइक रेट नब्बे फीसदी था। इस बार भी उसका स्ट्राइक रेट यही रहा तो पार्टी की सीटों का आंकड़ा सौ के पास पहुंच सकता है। जिसकी संभावना बहुत प्रबल है। दूसरी ओर नीतीश कुमार की पार्टी का स्ट्राइक रेट सत्तर फीसदी के आसपास रहा है। भाजपा के साथ भी और राजद के साथ भी। ऐसे में भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरने की संभावना वास्तविकता के करीब नजर आती है।
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फिर नीतीशे कुमार, क्या बिहार में आएगी बहार

apka akhbarप्रदीप सिंह ।
नीतीश कुमार सोमवार को सातवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का नेता चुने जाने के बाद मीडिया से बात करते हुए उनके चेहरे पर न तो खुशी थी और न ही आवाज में उत्साह।

वे जानते हैं कि राजग में उनका पहले वाला रुतबा नहीं रहा। उनकी पार्टी भाजपा से छोटी पार्टी हो गई है। फिर यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि यह उनका आखिरी कार्यकाल है।

मजबूरी का अहसास

विधायक दल के नेता के चुनाव से राजग के दो बड़े घटक दलों भाजपा और जद-एकी ने दो अलग अलग संदेश दिए हैं। जद-एकी ने नीतीश कुमार को नेता चुनकर यथास्थिति बरकरार रखने का संदेश दिया है तो भाजपा ने नया नेता चुनकर बदलाव और भविष्य का तैयारी का। भाजपा ने सामाजिक समीकरण का भी ध्यान रखा है। नीतीश कुमार ने कहा कि वे चाहते थे कि भाजपा का मुख्यमंत्री बने पर भाजपा के कहने पर मुख्यमंत्री बन रहे हैं। जाहिर है कि यह बयान उनकी ताकत का नहीं मजबूरी का अहसास कराता है।
भाजपा ने बदलाव की ओर पहला कदम बढ़ाते हुए सुशील मोदी की बजाय तारकिशोर प्रसाद को विधानमंडल दल का नेता और रेणु कुमारी को उपनेता बनाया है। पार्टी चाहती तो इन दोनों नेताओं को विधायक दल का नेता और उपनेता बना देती और सुशील मोदी को विधानमंडल दल का नेता बने रहने देती। पर ऐसा न करने का मतलब है कि पार्टी उन्हें राज्य की राजनीति से हटाना चाहती है। सुशील मोदी का हटना नीतीश कुमार के लिए भी संदेश है कि गठबंधन में उनके एकाधिकार का युग समाप्त हो गया है। सुशील मोदी को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के युग में पक्के तौर कुछ नहीं कहा जा सकता।

चमक फीकी पड़ी

नीतीश कुमार भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे पढ़े लिखे हैं, पिछड़ा वर्ग से आते हैं और पंद्रह साल मुख्यमंत्री और उससे पहले केंद्रीय मंत्री रहते हुए उन पर कभी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। यह आज की राजनीति में कोई सामान्य बात नहीं है। उन्होंने एक बहुत अच्छे प्रशासक के रूप में अपनी छवि बनाई है। इसी कारण उन्हें सुशासन बाबू का खिताब जनता से मिला। पर पिछले पांच साल के कार्यकाल में उनके सुशासन की चमक फीकी पड़ गई।
पंद्रह सालों के शासन में ग्यारह साल वे भाजपा के साथ रहे। सरकार उन्होंने ऐसी चलाई जैसे उनके अपने अकेले दल की हो। राज्य सरकार में शामिल भाजपा के मंत्री और बिहार भाजपा उनकी अनुगामिनी रही। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने बार बार इस व्यवस्था पर मुहर लगाई। यही कारण है कि सुशील मोदी के बारे में पूरे बिहार में यह धारणा बन गई कि वे नीतीश कुमार के पिछलग्गू हैं और भाजपा के लिए बोझ बन गए हैं। नतीजा यह हुआ कि सुशील मोदी पार्टी की राज्य इकाई के एक खेमे की आंख की किरकिरी बने रहे। नीतीश कुमार के साथ ताल बिठाने के चक्कर में उनकी अपनी ताल और चाल बिगड़ गई।

मोदी-शाह की भाजपा

ऐसा कहने वालों की तादाद अच्छी खासी है कि यह अटल-आडवाणी की नहीं मोदी-शाह की भाजपा है। यह मानने वाले गलत नहीं हैं। दोनों में बुनियादी फर्क यह है कि अटल-आडवाणी के दौर में पार्टी की राजनीति में भावना का पुट ज्यादा था और व्यावहारिक राजनीति का पुट कम। अब यह अनुपात उलट गया है।
आंध्र में चंद्रबाबू नायडू, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और पंजाब में बादलों का राजग से जाना इसी बदलाव का परिणाम है। साल 2017 में नीतीश कुमार की वापसी भी इसी वजह से हो सकी। नीतीश ने जब वापस लौटने की इच्छा जाहिर की तो मोदी ने बदले की भावना में न आकर व्यावहारिक दृष्टि से सोचा और फैसला लिया। नीतीश कुमार को राजग में लेना विपक्षी खेमे से एक राष्ट्रीय नेता का विकल्प छीनना, राजद से गठबंधन तुड़वाना और पिछड़ों में एक संदेश भेजना था। इसलिए मोदी नीतीश कुमार द्वारा किए गए निजी अपमान को भी भूल गए।
नीतीश कुमार मोदी के नेतृत्व के मुद्दे पर राजग छोड़कर गए थे। वे चाहते थे कि भाजपा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार किसे बनाए यह वे तय करें। लौटकर आए तो मोदी के नेतृत्व में ही। लौटने के बाद से नीतीश कुमार असहज हैं। जिस घर में वे 1995 से 2013 तक रहे वह उन्हें बदला हुआ नजर आ रहा है। यह असहजता दो तरफा है। साल 2013 में वे जिस तरह नाता तोड़कर गए उसके बाद से भाजपा को बराबर यह आशंका बना रहती है कि वे फिर जा सकते हैं।

नीतीश कुमार की सांसतः रहा भी न जाए और सहा भी न जाए

नीतीश के विकल्प
अब सवाल है कि नीतीश कुमार ने छोटी पार्टी होने के बावजूद मुख्यमंत्री का पद क्यों स्वीकार किया। उनके सामने एक रास्ता था कि वे भाजपा से कहते कि अब वे राज्य की राजनीति से निकलना चाहते हैं। भाजपा इसके लिए तैयार भी हो जाती। नीतीश के करीबियों की मानें तो  2017 के बाद से उनकी सबसे बड़ी इच्छा अपनी विरासत (लीगेसी) छोड़कर जाने की है। पर बिहार के मतादाताओं ने उनका कद घटा दिया है। इशारा साफ है कि उन पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा।
फिर उन्हें पता है कि अब उनके सामने विकल्प है नहीं। अकेले चलने का साहस वे कभी जुटा नहीं पाए। जिस अपमान से त्राहिमाम करके उन्होंने 2017 में लालू का साथ छोड़ा, अब तेजस्वी के नेतृत्व में उसके साथ जाना शायद ही संभव हो। इसलिए भाजपा के साथ उनका संबंध तुम्हीं से मुहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई वाला ही रहने वाला है। ऐसे में वे कौन सी राजनीतिक विरासत छोड़कर जाते हैं यह तो समय ही बताएगा। पर इस पनघट की डगर कठिन तो बहुत है।

कांग्रेस में नहीं रहा भाजपा का विकल्प बनने का माद्दा

apka akhbarप्रदीप सिंह । 
कांग्रेस आजकल आपको चौंकाती रहती है। जब लगता है कि अब बस पार्टी इससे नीचे कहां जाएगी?  तो कांग्रेस बताती है कि अभी नीचे जाने की और जगह है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद कह रहे हैं कि फाइव स्टार होटलों में बैठकर नहीं जीते जाते हैं चुनाव। तो सलमान खुर्शीद कह रहे हैं कि जिन्हें सोनिया और राहुल गांधी के लिए समर्थन नहीं दिखता वे अंधे हैं।

अंधे-बहरों की सभा

कुल मिलाकर कांग्रेस पार्टी अंधे-बहरों की सभा में तब्दील होती जा रही है। पार्टियां आगे तभी बढ़ती हैं जब वे मतदाता की मुनादी सुनती हैं और जमीनी हकीकत को खुली आंखों से देखती हैं। कांग्रेस पार्टी यह दोनों काम नहीं कर रही। अगर वह देखती तो उसे दिखता कि डेढ़ साल में मध्य प्रदेश में जीती हुई सीटें क्यों हार गई। उसे दिखता कि राजनीति प्रियंका गांधी वाड्रा के बस की बात नहीं है। उनकी राजनीति से उनके दो करीबी साथी जेल की हवा खाकर आ गए और उपचुनाव की सात सीटों में से चार पर कांग्रेस की जमानत जब्त हो गई। चुनाव में हार जीत संसदीय जनतंत्र के जीवन का हिस्सा है। पर जमानत जब्त की यह संख्या बताती है कि इस जीवन के सांसों की डोर टूट रही है।
Congress couldn't analyse poll defeat because Rahul walked away: Salman Khurshid | India News,The Indian Express

बड़े प्रदेशों में कांग्रेस

देश के बड़े प्रदेशों में कांग्रेस की हालत देखिए। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में वह चौथे नम्बर की पार्टी है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, त्रिपुरा और ओडीशा में वह हाशिए पर चली गई है। इन प्रदेशों में लोकसभा की 311 सीटें हैं। अगले लोकसभा चुनाव में इनमें से कांग्रेस दहाई के आंकड़े तक पहुंच जाय तो गनीमत समझिए। असम को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर में उसकी स्थिति दयनीय है। जिन राज्यों में उसका संगठन और जनाधार बचा है उनमें गुजरात, राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड से उसे पिछले लोकसभा चुनाव में कुल 113 सीटों में से दस सीटें मिली थीं। उनमें भी नौ सीटें अकेले पंजाब से आई थीं।

गांधी परिवार की वोट दिलाने की क्षमता

After farmers, government targeting workers: Rahul Gandhi on labour bills- The New Indian Express
इन आंकड़ों की जानकारी तो आपके पास पहले से होगी। इन्हें बताने का मकसद सिर्फ फिर से याद दिलाना है। क्योंकि इन आंकड़ों को कांग्रेसियों को रोज सुबह शाम याद करना चाहिए। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता या वोट दिलाने की क्षमता की परीक्षा लोकसभा चुनाव में ही होती है। लोकसभा चुनाव के नतीजे चीख चीख कर कह रहे हैं कि कांग्रेस नेतृत्व या गांधी परिवार की वोट दिलाने की क्षमता पेंदी में पहुंच गई है। कांग्रेस और कांग्रेसियों के लिए यह चिंता की बात है।

इससे भी ज्यादा चिंता की बात सलमान खुर्शीद जैसे सावन के अंधों के बयान हैं। जिन्हें देश में सोनिया और राहुल के लिए समर्थन नजर आ रहा है। ऐसे नेताओं की दूर की ही नहीं पास की दृष्टि भी कमजोर है। उन्हें दिख ही नहीं रहा कि कांग्रेस के प्रथम राजनीतिक परिवार के प्रति मतदाताओं में ही नहीं कांग्रेस के अंदर भी समर्थन घटता जा रहा है। पिछले एक साल से सोनिया गांधी राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाने की कोशिश कर रही हैं लेकिन बना नहीं पा रहीं।

बीच चुनाव प्रचार छुट्टी मनाने चले

कांग्रेस की हालत यह है कि मतदाताओं के बाद अब उसके साथी दल उसे अविश्वास की नजर से देख रहे हैं। बिहार में महागठबंधन की हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल के नेता शिवानंद तिवारी ने राहुल गांधी के बारे में जो कहा वह कांग्रेस को बुरा भले लगा हो लेकिन गलत नहीं है। मैंने अपने करीब चार दशक के पत्रकारीय जीवन में कभी देखा न सुना कि चुनाव प्रचार के बीच में पार्टी का शीर्ष नेता छुट्टी मनाने चला जाय। यह कमाल राहुल गांधी ही कर सकते हैं। ऐसा नेता मतदाता तो छोड़िए पार्टी कार्यकर्ता को भी कैसे प्रोत्साहित कर सकता है। पार्टी की हालत देखिए कि बिहार चुनाव के लिए स्टार कैम्पेनर की सूची में प्रियंका का नाम तीसरे नम्बर था लेकिन वे एक दिन के लिए भी बिहार नहीं गईं। सोनिया गांधी तो खैर स्वास्थ्य की वजह से नहीं गईं। बाकी वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के निशाने पर हैं और जो राहुल के साथ हैं उनकी जनता में कोई पूछ नहीं है।

भाजपा की मेहनत

इसके बरक्स दूसरे राष्ट्रीय दल भारतीय जनता पार्टी को देखिए। बिहार चुनाव खत्म नहीं हुआ कि अमित शाह पश्चिम बंगाल के दौर पर पहुंच गए। फिर तमिलनाडु चले गए और अन्ना द्रमुक से विधानसभा चुनाव साथ लड़ने का समझौता कर लिया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा चार महीने के लिए पूरे देश के दौरे पर जा रहे हैं। मालूम है क्यों? साल 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए। नड्डा का उन इलाकों पर खास ध्यान होगा जहां पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव को छोड़िए चार पांच महीने में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बारे में भी सोचती हुई नहीं दिखती। दोनों दलों की कार्य संस्कृति ही एक को ऊपर ले जा रही है और दूसरे को चुनाव दर चुनाव नीचे। सत्तर साल के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिहार चुनाव में एक दिन में चार रैलियां करते हैं और उनसे बीस साल छोटे राहुल गांधी पूरे चुनाव में चार छह रैलियां करते हैं। देश का युवा मोदी का साथ छोड़ने को तैयार नहीं और राहुल के साथ आने को राजी नहीं है।

अनारकली जैसी हो गई कांग्रेस की हालत

कांग्रेस के लोगों का एक ही रोना रहता है कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस नहीं चल सकती। अब देश का मतदाता बता रहा है कि गांधी परिवार के साथ कांग्रेस को हम नहीं चलने देंगे। कांग्रेसी गांधी परिवार को छोड़ नहीं पा रहे हैं। और गांधी परिवार मतदाता को पकड़ नहीं पा रहा। इसलिए कांग्रेस की हालत अनारकली जैसी हो गई है। सलीम मरने नहीं देता और जिल्ले सुभानी जीने नहीं देते। भाजपा को चुनौती देने वाले एक राष्ट्रीय विकल्प का होना संसदीय जनतंत्र के लिए जरूरी है। कांग्रेस उस जिम्मेदारी को निभाने में असमर्थ है। वह राष्ट्रीय पार्टी से मल्टी स्टेट पार्टी रह गई है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं के अपने ईगो हैं, जो उन्हें साथ आने नहीं देते। इसलिए वे विधानसभा चुनाव में तो भाजपा को चुनौती दे सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर उनके हाथ नाकामी ही लगती है।
इसलिए जो मानते हैं कि भाजपा का विकल्प होना चाहिए उन्हें कांग्रेस से उम्मीद छोड़ देना चाहिए और किसी नये विकल्प के बारे में विचार करना चाहिए। पुराने जनता दल को पुनर्जीवित करना एक आइडिया हो सकता है। लेकिन यह काम मेंढ़क तौलने से कम नहीं होगा। फिर भी विचार करने में क्या हर्ज है। इस पर अगले सप्ताह बात करेंगे।

तेजस्वी की राजनीतिक अग्नि परीक्षा का समय होंगे अगले पांच साल

apka akhbarप्रदीप सिंह। 
राष्ट्रीय जनता दल के युवा नेता तेजस्वी यादव पर पूरे विपक्ष की निगाहें थीं। बिहार विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल के नतीजे के बाद बहुत से लोगों की बांछें खिली हुई थीं। इकत्तीस साल के एक लड़के ने मोदी को मात दे दी। रातों रात तेजस्वी को मोदी का विकल्प घोषित करने की तैयारी थी। 

जी हां, सही सुना आपने। बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार मोदी की हार होती और जीत तो जाहिर है कि नीतीश कुमार की है। अपने देश में पिछले सात सालों से कुछ ऐसा ही विमर्श चल रहा है।

मोदी सतत विलेन

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तेजस्वी यादव का भाग्य अच्छा है कि वे चने के झाड़ पर चढ़ने से बच गए। हिंदी सिनेमा में जैसे हीरो के हाथों विलेन को पिटते देख दर्शक खुश होते हैं। वैसे ही बहुत से लोगों की नजर में मोदी सतत विलेन हैं। उन्हें जो भी मात दे दे वह उनका हीरो। वह कौन है, कैसा है, उसकी राजनीतिक हैसियत क्या है, इससे कोई मतलब नहीं। एक समय अरविंद केजरीवाल जो किसी नगर निगम के भी सदस्य नहीं थे, मोदी के चैलेंजर बताए जाने लगे। कन्हैया कुमार ने जेएनयू में एक भाषण दिया और मुनादी हो गई कि मोदी का विकल्प आ गया। वही कन्हैया आजकल मोदी का गुणगान कर रहे हैं। राहुल गांधी तो खैर चौबीस घंटे और तीन सौ पैंसठ दिन मोदी के चैलेंजर हैं। यह अलग बात है कि उन्हें अपनी ही पार्टी में चैलेन्ज किया जा रहा है।

कमजोर नस

Exit polls predict Tejashwi Yadav as CM, Mahagathbandhan government in Bihar | Bihar News | Zee News
पर बात तेजस्वी यादव की है। पिछले कुछ सालों  में हमने दो तेजस्वी यादव देखे। एक नामी गिरामी और अमीर पिता का बिगड़ैल बेटा। जिसे विरासत में पिता का राजनीतिक जनाधार मिल गया है। और उसे लग रहा है कि सारी दुनिया उसकी मुट्ठी में है। जो कहीं भी किसी को भी अपमानित कर सकता है। जिसे पता नहीं है कि संयम किस चिड़िया का नाम है। जिसके लिए राजनीति शौक भर है। दूसरा तेजस्वी हमने देखा करीब दो महीने के चुनाव प्रचार के दौरान। गंभीर, तहजीब से पेश आने वाला, मुद्दों को समझने और उन पर टिकने वाला। जो राजनीति के प्रति संजीदा है और जिसे मालूम है कि उसकी कमजोरी और ताकत क्या है। इस तेजस्वी ने सबको चौंकाया। सबसे ज्यादा उनके राजनीतिक विरोधियों को। यह तेजस्वी अपने पिता की छाया से बाहर निकल आया है। इतना ही नहीं वह अपने पिता की राजनीतिक संस्कृति की विरासत (जनाधार नहीं) से दूर जाने को तैयार है। राजद के प्रचार पोस्टर से लालू यादव की फोटो हटाने का फैसला आसान नहीं रहा होगा। आखिर लालू के बिना राजद है क्या। तेजस्वी ने यह भी संकेत दिया कि वह अपनी पार्टी की कार्य संस्कृति बदलना चाहते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि उनको इस बात का एहसास है कि यह कार्य संस्कृति जो कभी पार्टी की ताकत थी अब कमजोरी बन गई है। तेजस्वी की हार के आप सौ कारण गिना सकते हैं। पर मेरी नजर में इस कार्य संस्कृति का भूत भागने का नाम नहीं ले रहा।  उनका वोटर जैसे ही हुंकार भरता है बाकी लोग दूर भाग जाते हैं। उनके राजनीतिक विरोधियों ने इसी कमजोर नस को दबाया।

सोचने का समय

तेजस्वी ने इस चुनाव में जो हासिल किया है वह पिता की विरासत की राजनीति से और अपने बदले स्वरूप से। अब उन्हें आरोप प्रत्यारोप के जंजाल से निकल कर सोचना चाहिए कि पंद्रह साल की सरकार विरोधी लहर और मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की निजी अलोकप्रियता और चिराग पासवान की परोक्ष मदद के बावजूद वे क्यों पिछड़ गए। किसी राजनीति दल के लिए, जिसके पास इतना बड़ा कोर वोट हो, यह परिस्थिति टेलर मेड थी। फिर भी वे विजय रेखा पार नहीं कर पाए। बहुत सी बातें उनके वश में नहीं हैं। जैसे कांग्रेस का प्रदर्शन और असदुद्दीन की पार्टी के प्रति मुसलिम मतदाताओं को बढ़ता रुझान। इसलिए उस पर उनको समय नहीं गंवाना चाहिए। जो कर सकते हैं वह करना चाहिए।

व्यावहारिकता जरूरी

जो लोग उनकी प्रशंसा के गीत गा रहे हैं कि एक इकत्तीस साल का लड़का पचहत्तर सीटें ले आया। वे दरअसल उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं। राजनीति बहुत निष्ठुर होती है। उसमें भावना की जगह नहीं होती। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की बात को मैंने कई बार उद्धृत किया है। एक बार फिर कर रहा हूं। दिनकर ने लिखा है- ‘निष्ठुरता की सीपी में राजनीति का मोती पलता है।‘ राजनीति फैसलों में भावना की बजाय व्यावहारिकता होनी चाहिए। अपनी ताकत को समझिए और अपने विरोधी की ताकत को कभी कम मत आंकिए।

मुसलिम जनाधार

Tejashwi Yadav greeting Muslims
तेजस्वी की ताकत क्या है? उनके पिता का बनाया यादव मुसलिम जनाधार। यादवों को तेजस्वी में अपना राजनीतिक भविष्य नजर आ रहा है। मुसलमानों को अब बिहार में राजद को वोट देने की आदत सी हो गई है। पर ओवैसी की पांच सीटें खतरे की घंटी हैं। बात पांच सीटों की नहीं है। बात यह है कि राजद के उम्मीदवार के होते हुए मुसलमानों ने ओवेसी की पार्टी को चुना। इसका संकेत साफ है कि बिहार के मुसलमान मतदाता को राजद के विकल्प से गुरेज नहीं है। उनकी संख्या भले ही अभी कम हो। उसकी एक ही वजह है, वह ऐसी पार्टी के साथ रहना और वोट देना चाहता है जो भाजपा को हराए, न कि उससे हारे। सीटों और वोट का अंतर कुछ भी हो नतीजा तो यही है कि महागठबंधन उस राजग से हार गया जिसमें भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है। मुसलमान वोट के थोड़ा भी खिसकने का नतीजा क्या होता है यह राजद के लोग 2010 में देख चुके हैं।
जब मुसलमानों के एक वर्ग ने भाजपा के साथ होने के बावजूद नीतीश कुमार को वोट दिया। राजद बाइस सीटों पर सिमट गया।

इसी गम्भीरता से पांच साल डटना होगा

तो तेजस्वी की असली राजनीतिक अग्नि परीक्षा अगले पांच साल में होनी है। उन्हें चुनाव प्रचार जैसी गंभीरता और समर्पण भाव से पांच साल तक मैदान में डटे रहना है। अपने कोर वोट को बचाकर रखना है। इसके बाद जीतने के लिए जरूरी है कि मुसलिम-यादव में कुछ जुड़े। उनके पास केक तो है पर आइंसिंग नहीं है। इसके बिना मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे दूर ही रहेगी। न केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी दूर रहेगी बल्कि पचहत्तर सीटों की कमाई भी अकारथ चली जाएगी। क्योंकि पूंजी बढ़ाने के लिए जरूरी है कि पहले से जमा पूंजी को बचाकर रखा जाय। कैसी विडम्बना है कि जब नीतीश कुमार की राजनीतिक पारी का आखिरी दौर शुरू हुआ है उसी समय तेजस्वी यादव की वास्तविक पहली पारी शुरू हो रही है। वे इस आग में तपकर कुंदन भी बन सकते हैं और राख भी। चुनाव तेजस्वी को ही करना है।

अधिकतर लेखक ढ़ोंगी होते हैं

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डॉ. संतोष कुमार तिवारी । यह सवाल आपके मन में कभी न  कभी  अवश्य उठा होगा कि ये लेखक लिखते क्यों हैं।
  समाज के अन्य वर्गों की तरह अधिकतर लेखक भी ढ़ोंगी होते हैं । उनकी कथनी और करनी में बड़ा फर्क होता है। कोई अपने अहंकार की तुष्टि के लिए लिख रहा होता है,  तो  कोई पैसे के लिए । लगभग हर स्थापित लेखक को पता होता है कि वह क्यों लिख रहा है, परन्तु वह यह बात बड़ी सफाई के साथ बताता नहीं है। वर्ष 1946 में इंग्लैंड की एक मैगजीन ‘गैंगरेल’ में प्रख्यात उपन्यासकार जार्ज ऑरवेल (1903-1950) का एक लेख छपा था- ‘मैं क्यों लिखता हूं’।
प्रख्यात उपन्यासकार जार्ज ऑरवेल

लेखक के चार बड़े उद्देश्य

‘मैं क्यों लिखता हूं’ में जार्ज ऑरवेल कहता है कि लेखन के पीछे हर लेखक के चार बड़े उद्देश्य होते हैं। ये चारों बातें हर लेखक में किसी न किसी अनुपात में अवश्य पाई जाती हैं-
  1. शुद्ध अहंकार- इसमें लेखक की यह इच्छा होती है कि उसके बारे में दूसरे लोग बात करें और वह ज्यादा चतुर समझा जाए। मृत्यु के बाद भी उसको याद किया जाए, आदि।
  2. सौंदर्यवर्धक उत्साह- इसमें लेखक चाहता है कि उसने दुनिया की जो सुंदरता देखी है, वह दूसरों को बताए, ताकि दूसरे भी उसका अनुभव कर सकें।
  3. ऐतिहासिक कारण- इसमें लेखक चाहता है कि सच्चे तथ्य लोगों के सामने रखे जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनका इस्तेमाल कर सकें।
  4. राजनैतिक उद्देश्य- इसमें लेखक की इच्छा होती है कि वह दुनिया के लोगों के विचार को बदल दे और उन्हें अपने बताए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करे।
ऑरवेल ने कहा कि उसके लेखन के कारणों में प्रथम तीन उद्देश्य ज्यादा रहे हैं और चौथा उद्देश्य कम।

लेखक के दो और उद्देश्य

आरवेल द्वारा बताए चार उद्देश्यों के अलावा मैं समझता हूं कि लेखन के दो और कारण भी होते हैं। एक तो यह कि कुछ लोग सिर्फ पैसा कमाने के लिए लिखते हैं और दूसरा यह कि शिक्षण जगत से जुड़े लोग अक्सर अपने कैरियर में आगे बढ़ने के लिए भी लिखते हैं।
अमृत लाल नागरजी (1916-1990)
अमृत लाल नागरजी (1916-1990) के लिए कहानी, उपन्यास लिखना उनकी रोजी-रोटी थी। उसकी कमाई से उनका घर चलता था। मुंशी प्रेमचंद का भी यही हाल था।  उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो (1912-1955) ने एक जगह कहा है कि मैं जीने के लिए लिखता हूं और पीने के लिए लिखता हूं। नोबेल पुरस्कार विजेता उपन्यासकर  अर्नेस्ट हेमिंग्वे (1899 –1961) ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यदि लेखन आपकी सबसे बड़ी लत हो जाए और सबसे बड़ा सुख हो जाए, तो सिर्फ मृत्यु ही आपको लिखने से रोक सकती है। जार्ज ऑरवेल ने लेखन के जो उद्देश्य बताए वह  प्रधानत: उनका पश्चिमी दर्शन पर आधारित विश्लेषण था। हमारे भारत में अनेकानेक संत ऐसे हुए जो ऑरवेल के विश्लेषण में फिट नहीं बैठते। गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, नरसिंह मेहता, आदि संतों ने जो कुछ लिखा वह स्वांत: सुखाय था और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण था। बंगाली में ‘श्रीरामकृष्ण वचनामृत’ लिखी गई, तो लेखक ने अपना नाम सिर्फ ‘एम’ लिखा, जब कि उनका पूरा नाम महेन्द्रनाथ गुप्त (1854-1932) था। गीता प्रबोधनी के लेखक स्वामी राम सुखदास (1904-2005) भी ऐसे ही उच्च कोटि के विरले वीतरागी संन्यासी थे। इन सब के लेखन का उद्देश्य लोकहित के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। (लेखक झारखण्ड केंद्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)  

लंदन में पुरुष-वेश्याओं से सामना

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डॉ. संतोष कुमार तिवारी । महिला-वेश्याएं होती हैं –  यह तो सभी जानते हैं; परंतु पुरुष भी वेश्यावृत्ति करते हैं – ऐसा अनुभव मुझे वर्ष 1982 में इंग्लैंड में हुआ। 
  मेरा वहां की संसद भवन के पास चेरिंग क्रॉस नामक एक ट्यूब स्टेशन (मेट्रो स्टेशन) से लगभग रोज ही गुजरना होता था। कभी-कभी मुझे लौटने में शाम को देर  हो जाती थी। तब उस भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर सन्नाटा सा हो जाता था। उस सन्नाटे में मैं देखता था कि दो चार लड़के वहाँ प्लेटफार्म पर बैठे रहते थे। उनके बाल लाल नीले और पीले रंग से रंगे  होते थे। एक दिन मैं देर शाम वहां ट्रेन का इंतजार कर रहा था। तभी उनमें से एक लड़का मेरे पास आया और बोला “वुड यू लाइक टु फ*** मी?” अर्थात क्या आप मेरे साथ सेक्स करेंगे? उसकी बात सुनकर मैं तो कांप ही गया था और समझ में नहीं आ रहा था कि भाग कर कहां जाऊं? तभी मेरी ट्रेन आ गई और मैं उस पर चढ़ गया। उस समय मेरी उम्र कम थी।
लंदन में चेरिंग क्रास ट्यूब स्टेशन पर लेखक

चेरिंग  क्रास से क्यों गुजरता था

वर्ष 1982 में ब्रिटेन की टॉमसन फाउंडेशन ने पत्रकारिता में प्रशिक्षण के लिए मुझे एक फेलोशिप दी थी। वहां अपने हॉस्टल से कॉलेज आने जाने के लिए चेरिंग क्रॉस ट्यूब स्टेशन से मुझे गुजरना होता था।

दूसरी घटना

कुछ दिन बाद उस चेरिंग क्रास ट्यूब स्टेशन एक शाम मैंने देखा कि उसी तरह के रंग बिरंगे  बालों वाला एक लड़का वहाँ खड़ी एक संभ्रांत उम्रदार महिला के पास आया। उसने उस महिला से धीरे से कुछ कहा। क्या कहा – यह मैं सुन नहीं  पाया।  पर महिला ने क्या कहा यह मुझे सुनाई दिया। महिला बोली: “कम आन विद मी।  आई नीड यू।“ अर्थात मेरे साथ चलो, मुझे तुम्हारी जरूरत है। और फिर वे दोनों एक साथ चले गए।

चेरिंग क्रॉस है लंदन का मुख्य स्थान

लंदन में  स्फिंक्स
देर शाम को हो रही इस वेश्यावृत्ति को छोड़ दें, तो चेरिंग क्रॉस ट्यूब स्टेशन की सबसे खास बात यह है कि लंदन के तमाम दर्शनीय स्थान यहाँ से पैदल जाने में मात्र दस से बीस मिनट लगते हैं। चेरिंग क्रॉस ट्यूब स्टेशन के ठीक सामने ट्राफेलगर स्क्वायर है। जहां सारे दिन सैलानियों की भीड़ लगी रहती है। वहाँ लोग कबूतरों को दाना डाला करते हैं। ट्राफेलगर स्क्वायर से दाईं  ओर जाएँ तो इंडिया हाउस है, जहां भारतीय उच्चायोग है। चेरिंग क्रॉस ट्यूब स्टेशन से अगर बाईं ओर जाएँ, तो ब्रिटिश संसद है और दुनिया भर में मशहूर घड़ी ‘बिग बेन’ है। 170 वर्षों से अधिक पुरानी इस घड़ी की  पिछले तीन सालों से मरम्मत चल रही है और इस पर कई लाख पौंड खर्च आ रहा है।

टेम्स नदी के किनारे स्फिंक्स की मूर्ति

चेरिंग क्रॉस ट्यूब स्टेशन के अगर पीछे जाएँ तो टेम्स नदी बहती है। नदी के किनारे एक स्फिंक्स की मूर्ति लगी है जिसका मुंह और धड़ एक औरत जैसा है और बाकी शरीर शेर जैसा है। लगभग 70 फीट ऊंची और सवा दो सौ टन वजन वाली यह मूर्ति कांसे की धातु से बनी है। मिस्र की सरकार ने इसे वर्ष 1819 में ब्रिटिश गवर्नमेंट को भेंट की थी। इतनी वजनदर मूर्ति को लाने में ट्रांसपोर्ट की लागत इतनी अधिक थी कि यह कई वर्षों तक मिस्र में ही पड़ी रही। फिर वर्ष 1877 में एक ब्रिटिश डाक्टर ने इसके ट्रांसपोर्ट का खर्च उठाया, तो यह लंदन लायी गई। मैं वर्ष 1982 में जब टेम्स के किनारे टहलने जाता था, तो इस स्फिंक्स को देखता था। इसके सामने मैंने फोटो भी खिंचवायी। कुछ वर्षों बाद मुझे ब्रिटिश सरकार की एक फ़ेलोशिप मिली, वहाँ के कार्डिफ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएच. डी. करने के लिए। तब मेरा वहाँ लम्बे समय तक रहना हुआ। अक्तूबर 1989 से फरवरी 1993 तक। इस दौरान मैं फिर टेम्स के किनारे उस स्फिंक्स को देखने गया, तो मैंने देखा कि उस पर कुछ बहुत छोटे-छोटे से छेद हो गए हैं। पहले तो मैं यह समझा कि समय के साथ-साथ इस विशालकाय मूर्ति का भी क्षरण हो रहा है।
लंदन में स्फिंक्स के नीचे लगी वह पट्टीका जिसमें लिखा हुआ है कि 4 सितंबर 1917 को जर्मन हवाई हमले में यह क्षतिग्रस्त हुई थी
परन्तु बात ऐसी न थी। मैंने देखा कि मूर्ति की आधार चौकी पर एक छोटी सी पट्टिका लगी हुई है, जिस पर लिखा था कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन हवाई जहाजों से हुई बम वर्ष में 4 सितम्बर 1917 की मध्य रात्रि से कुछ पहले एक बम इस मूर्ति के पास गिरा था जिसकी चिंगारियां मूर्ति पर भी गिरीं और उसे नुकसान पहुंचा था। मूर्ति का दायाँ हाथ भी क्षतिग्रस्त हुआ था। उस दौरान चेरिंग क्रास ट्यूब स्टेशन फिर जाना होता था। परन्तु अब वहाँ प्लेटफार्म पर पहले जैसी सफाई नहीं थी। कुछ कागज के टुकड़े प्लेटफार्म पर इधर उधर पड़े हुए थे। मुझे पता चल कि अब वहाँ से कूड़ा फेंकने की बड़ी टोकरियाँ हटा दी गईं हैं। कारण यह था कि आयरिश रिपब्लिकन आर्मी के आतंकवादी उसमें बम रख सकते थे। चेरिंग क्रास पर वेश्यावृत्ति असंगठित है और ज्यादा नहीं है, जबकि लंदन के सोहो और पिकैडिली के इलाके संगठित वेश्यावृत्ति के लिए मशहूर हैं। ब्रिटेन में वेश्यालय खोलना एक अपराध है, जबकि स्वीडेन, सिंगापुर, आदि कुछ देशों में इस धन्धे को कानूनी तौर से मान्यता मिली हुई है। ( लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर हैं)

पं. जसराज ने भी गाये पोद्दार जी के पद

आश्विन कृष्ण द्वादशी संवत् 2077 तदनुसार 14 सितंबर 2020 को गीता प्रेस की हिन्दी मासिक ‘कल्याण’ के आदि सम्पादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी की 128वीं जयंती है डॉ. संतोष कुमार तिवारी । बहुतों को यह नहीं मालूम होगा कि श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार (1892-1971) एक भावुक कवि भी थे। उनके लिखे काव्य को पंडित जसराज आदि अनेक जाने-माने गायकों ने गाया है। पोद्दारजी को लोग भाईजी कहते थे। उन्होंने भक्ति काव्य भी लिखा और समसामयिक काव्य भी लिखा। कुछ में अपना नाम लिखा। कुछ में नाम नहीं दिया। उनके परलोक गमन के बाद गीता प्रेस ने इधर उधर-स्फुट रूप से पड़े उनके पदों का संग्रह करके ‘पद-रत्नाकर’ नाम से प्रकाशित किया है। यह सात बार पुनर्मुद्रित हो चुका है। इसमें डेढ़ हजार से अधिक पद हैं।
  उनका यह पद ईश्वर के सामने उनकी दैन्यता को दर्शाता है: बना दो बुद्धिहीन भगवान। तर्क शक्ति सारी ही हर लो, हरो ज्ञान-विज्ञान। हरो सभ्यता, शिक्षा, संस्कृति, नए जगत की शान।। विद्या-धन-मद हरो, हरो हे हरे! सभी अभिमान। नीति-भीतिसे पिंड छुड़ा कर करो सरलता दान।। नहीं चाहिए भोग-योग कुछ, नहीं मान-सम्मान। ग्राम्य, गंवार बना दो, तृण-सम दीन, निपट निर्मान।। भर दो हृदय भक्ति श्रद्धा से, करो प्रेम का दान। प्रेमसिंधु! निज मध्य डुबाकर मेटो नाम-निशान।। (पद-रत्नाकर, पद संख्या 143)

‘पत्र-पुष्प’ का प्रकाशन

श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी
पोद्दारजीकी प्रारम्भिक पद्यात्मक रचनाओं का पहला संग्रह सुप्रसिद्ध संगीताचार्य रामभक्त श्री विष्णु दिगम्बरजी पलुस्कर (1872-1931) ने आग्रह करके अपने प्रेस से सन् 1923 में प्रकाशित किया था। ‘पत्र-पुष्प’ नामक इस संग्रह के पद पलुस्करजी को अत्यन्त प्रिय थे। और उन पर राग ताल आदि भी उन्होंने ही बैठाये थे। (पद-रत्नाकर, पृष्ठ 2)

नाम-जप सर्वोत्कृष्ट

सन 1926 में ‘कल्याण’ का प्रकाशन आरम्भ होने के पश्चात भाईजी द्वारा रचित भजन, पद, स्तुतियाँ, आदि ‘कल्याण’ के अंकों में प्रकाशित होती थीं। ‘कल्याण’ में नाम-जप पर सदैव ज़ोर दिया गया है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस के बालकाण्ड में नाम को भगवान से बढ़ कर बताया है: राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।। भावार्थ: श्री राम ने तो एक तपस्वी स्त्री अहिल्या का ही उद्धार किया था, लेकिन नाम ने तो करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि को सुधार दिया। कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुण गाई।। भावार्थ:-नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्री हरि के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, राम भी नाम के गुणों को नहीं गा सकते। नाम की महिमा पर पोद्दारजी लिखते हैं: नाम की महिमा अमित, को सकै करि गुन-गान। राम तें बड़ नाम, जेहि बल बिकत श्रीभगवान।। (पद-रत्नाकर, पद संख्या 1006) गोस्वामी तुलसीदास की ‘विनय पत्रिका’ पोद्दारजी की कविताओं में तुलसी की ‘विनय पत्रिका’ की भांति पूर्ण दैन्यता की झलक दिखाई देती है। तुलसीदासजी ‘विनय पत्रिका’ में कहते हैं: जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे।।1।। कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि-हठि अधम उधारे। खग, मृग, ब्याध, पषान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे।।2।। देव, दनुज मुनि, नाग, मनुज सब, माया बिबस बेचारे। तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे।।3।। भावार्थ- हे नाथ! आपके चरणों को छोड़कर और कहां जाऊं? संसार में ‘पतित-पावन’ नाम और किसका है? आपकी भांति दीन-दुखियारे किसे बहुत प्यारे हैं।।1।। आज तक किस देवता ने अपने बाने को रखने के लिए हठपूर्वक चुन चुन-कर नीचों का उद्धार किया है? किस देवता ने पक्षी (जटायु), पशु ऋक्ष-वानर आदि) व्याध (वाल्मीकि) पत्थर (अहिल्या), जड़ वृक्ष यमलार्जुन और यवनों का उद्धार किया है?।।2।। देवता, दैत्य, मुनि, नाग, मनुष्य आदि सभी बेचारे माया के वश में हैं। (स्वयं बंधा हुआ दूसरों के बंधन को कैसे खोल सकता है इसलिए) हे प्रभो! यह तुलसीदास अपने को उन लोगों के हाथों में सौंप कर क्या करे?।।3।।

चिम्मनलालजी गोस्वामी का कथन

मानस मर्मज्ञ चिम्मनलालजी गोस्वामी (1900-1974) कहते हैं कि भगवान की ओर बढ़ने के लिए यह परमावश्यक है कि मनुष्य उन्हें दीन होकर पुकारे। अपनी दुर्बलताओं को रो-रोकर उनके सामने रखे। अपनी अपात्रता को हृदयंगम करते हुए उनसे कृपा की याचन करे। उनकी कृपा पर विश्वास रखे। उनकी दयालुता को समझे। कभी निराश न हो। संसार की असारता पर विचार करे। अपने आचरण को भगवान के अनुकूल बनाने का अथक प्रयत्न करे। तथा अपने अन्दर दैवी सम्पदा का अर्जन करे और अपने पवित्र जीवन के शुद्ध कल्याणमय आचार-विचार के द्वारा जन समूह के सामने ऐसा आदर्श रखे, जिससे अधिक से अधिक नर-नारी भगवान की ओर अग्रसर हो सकें। चिम्मनलालजी कहते हैं कि पोद्दारजी के ‘पद-रत्नाकर’ संग्रह का बार-बार मनन करने पर पाठकों को इन सभी दिशाओं में प्रचुर प्रकाश प्राप्त होगा और अपने जीवन को भगवन्मुखी बनाने में पर्याप्त सहायता मिलेगी। (पद-रत्नाकर, पृष्ठ 7) पोद्दारजी की एक और कविता है, जोकि यह दर्शाती है कि गांधीजी की भांति उनका भी दृष्टिकोण सब में ईश्वर का दर्शन करना था। पोद्दारजी अपनी एक कविता में कहते हैं: सबमें सब देखें निज आत्मा, सबमें सब देखें भगवान। सब ही सबका सुख-हित देखें, सबका सब चाहें कल्यान।। एक दूसरेके हितमें सब करें परस्पर निज-हित त्याग। रक्षा करें पराधिकार की, छोड़ें स्वाधिकार की मांग।। निकल संकुचित सीमा से ‘स्व’। करे विश्व में निज विस्तार। अखिल विश्वके हितमें ही हो ‘स्वार्थ’ शब्द का शुभ संचार।। द्वेष-वैर-हिंसा विनष्ट हों, मिटें सभी मिथ्या अभिमान। त्याग-भूमिपर शुद्ध प्रेम का करें सभी आदान-प्रदान।। आधि-व्याधि से सभी मुक्त हों, पाएँ सभी परम सुख-शान्ति। भगवद्भाव उदय हो सबमें, मिटे भोग-सुख की विभ्रांति।। परम दयामय! परम प्रेममय! यही प्रार्थना बारंबार। पायें सभी तुम्हारा दुर्लभ चरणाश्रय, हे परम उदार! (पद-रत्नाकर, पद संख्या 67)

पोद्दारजी के समसामयिक पद

कुछ पद समसामयिक परिस्थितियों पर भी लिखे गए। सन् 1962 में जब चीन ने हमला किया था, तो पोद्दारजी ने ‘कल्याण’ के दिसम्बर 1962 के अंक में दो लम्बी कविताएं लिखीं। उनमें से एक के अंश हैं: कर विश्वासघात वह आया, दस्यु भयानक का धार वेश। उसके इस दु:साहस, दुष्टवृत्तिका है कर देना शेष।। दांत न खट्टे करने हैं, करना है विष-दन्तों का भंग। जिससे हो जाए विष-वर्जित निर्मल उसके सारे अंग।। हो उत्पन्न सुबुद्धि जागे फिर उसके उर में पश्चाताप। धर्म ईश को माने, छोड़े नास्तिकता का सारा पाप।। (पद-रत्नाकर, पद संख्या 1547) (‘कल्याण’ के दिसम्बर 1962 के अंक में ही पोद्दारजी का लगभग ढाई पृष्ठों का एक लेख भी छपा है। शीर्षक है: ‘चीन पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक साधन भी किए जाएँ’। इस अंक में पोद्दारजी ने एक अपील भी की कि चीन को भारतीय सीमा से निकालने के लिए लोग तन-मन-धन से भारत सरकार की सहायता करें।)

बच्चनजी के विचार

Harivansh Rai Bachchan Birth Anniversary popular poems Harivansh Rai  Bachchan - हरिवंश राय बच्चन जन्मदिन - News Nation अमिताभ बच्चन के पिताजी डॉ हरिवंशराय बच्चन (1907-2003) ने कहा “मेरे विचार में लाखों में कोई एक ही श्री राधा-माधव भक्ति रहस्य को समझने का अधिकारी होता है। श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार का कवि संग्रह ‘पद-रत्नाकर’ श्री राधा-माधव की भक्ति पर लिखने वाले लेखकों तथा कवियोंको एक नई –नया दृष्टिकोण प्रदान करेगा, जिसका हिन्दी साहित्य में अभाव था। … श्रीपोद्दारजीके इस ग्रन्थसे जैसा मैं लाभान्वित हुआ हूँ, वैसे ही और सहस्त्र लोग होंगे।“ (पद-रत्नाकर-एक अध्ययन, पृष्ठ 176, लेखक: श्याम सुन्दरजी दुजारी, द्वितीय संस्करण 2012, गीता वाटिका प्रकाशन, गोरखपुर) ब्रज के एक रसिक विद्वान ने कहा कि हमारी श्री राधा का स्वरूप तो ऐसा हो गया था की उसे शिक्षितवर्ग एवं जनसाधारण के सामने रखने में कई बार संकोच होता, पर श्री पोद्दारजी ने श्री राधा का ऐसा स्वरूप रखा की स्वदेश में किसी के समक्ष रखने की तो बात ही क्या, विदेश में भी किसीके समक्ष रखने में गौरव का बोध होता है। (पद-रत्नाकर, पृष्ठ 9) श्री राधा के प्रेमोद्गार पर पोद्दारजी ने लिखा: मेरे इस विनीत विनती को सुनलों, हे व्रजराजकुमार! युग-युग, जन्म-जन्म में मेरे तुम ही बनो जीवन धार।। रूप-शील-गुण-हीन समझकर कितना ही दुतकारो तुम। चरणधूलि मैं, चरणों में ही लगी रहूँगी बस हरदम।। (पद-रत्नाकर, पद संख्या 609) सदा सोचती रहती हूँ मैं – क्या दूँ तुमको, जीवनधन! जो धन देना तुम्हें चाहती, तुम ही ओ वह मेरा धन।। (पद-रत्नाकर, पद संख्या 611)

वह पत्रों मे कविता लिख देते थे

पोद्दारजी कभी-कभी अपने पत्रों में भी अपनी कविता लिख देते थे। श्री श्याम सुन्दरजी दुजारी अपनी पुस्तक ‘पद-रत्नाकर-एक अध्ययन’, पृष्ठ 5, पर चर्चा करते हैं कि पोद्दारजी जी ने 16 जून 1961 को उन्हें लिखे गए एक पत्र में आठ पंक्तियों की एक कविता लिखी थी। उसके अंश हैं: मेरे प्रभु हैं कितने सहज सुहृद, हैं कितने परम उदार। कितने वे वदान्य हैं, भृत्याधीन, अमित करुणा-आगार।। (पद-रत्नाकर, पद संख्या 930) ‘पद-रत्नाकर’ के पहले संस्करण में 1510 पद थे। यह पोद्दारजी के बृह्मलीन होने के सात वर्ष बाद सन् 1978 में प्रकाशित हुआ। दूसरे संस्करण में उनके 47 पद और जुड़ गए। तीसरे में आठ पद और बढ़ गए। अब भी यह नहीं कहा जा सकता कि इसमें उनके सारे पद आ गए हैं।

गीता प्रेस में की जाने वाली दैनिक प्रार्थना

गीता प्रेस में दैनिक कार्य प्रारम्भ होने से पूर्व कर्मचारियों द्वारा भगवद्गीता के कुछ श्लोकों का सामूहिक पाठ होता है और फिर पोद्दारजी द्वारा रचित यह प्रार्थना की जाती है: कर प्रणाम तेरे चरणों में लगता हूँ अब तेरे काज। पालन करने को आज्ञा तव मैं नियुक्त होता हूँ आज।। अन्तर में स्थित रह कर मेरे बागडोर पकड़े रहना। निपट निरंकुश चंचल मन को सावधान करते रहना। अंतर्यामी को अंत:स्थित देख सशंकित होवे मन। पाप-वासना उठते ही हो नाश लाज से वह जल-भुन।। जीवों का कलरव जो दिनभर सुनने में मेरे आवे। तेरा ही गुण-गान जान मन प्रमुदित हो अति सुख पावे।। तू ही है सर्वत्र व्याप्त हरि! तुझमें यह सारा संसार। इसी भावना से अन्तरभर मिलूँ सभी से तुझे निहार।। प्रतिफल निज इंद्रिय-समूहसे जो कुछ भी आचार करूँ। केवल तुझे रिझाने को, बस, तेरा ही व्यवहार करूँ।। (पद-रत्नाकर, पद संख्या 127) (लेखक झारखण्ड केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। )

गांधीजी के सच्चे वैचारिक उत्तराधिकारी थे लोहिया

डॉ. राममनोहर लोहिया की 53वीं पुण्यतिथि पर विशेष अभिषेक रंजन सिंह ।  डॉ. राममनोहर लोहिया (23-03-1910 से 12-10-1967) महज सत्तावन साल की आयु में वे अठारह बार जेल गए, लेकिन 9 अगस्त,1965 यानी गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन की 23वीं वर्षगाँठ के दिन डॉ. लोहिया को जिस प्रकार गिरफ्तार किया गया, उसकी निंदा देश भर में हुई थी।
9 अगस्त, 1965 को पटना स्थित गांधी मैदान में डॉ. लोहिया ने एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। इसमें उन्होंने बिहार की तत्कालीन कांग्रेस सरकार की जनविरोधी नीतियों की कटु आलोचना की थी। कृष्ण बल्लभ सहाय बिहार के मुख्यमंत्री थे। कहने को गांधीजी के अनुयायी थे। आज़ादी की लड़ाई में जेल जा चुके थे, लेकिन विरोध का स्वर बर्दाश्त नहीं हो सका। मुख्यमंत्री ने पटना के जिलाधिकारी जे.एन. साहू को कहा कि कुछ भी करके इस आदमी को जेल भेजो। डॉ. लोहिया लोकसभा के सदस्य थे और सर्किट हाउस में ठहरे थे। पुलिस वहां चोर की तरह रात के 12 बजे पहुंची, लेकिन अनैतिक कार्य करने में घिग्घी तो बंध ही जाती है। इसलिए झूठ ही कहा कि आगजनी एवं उपद्रव के आरोप में आपको गिरफ्तार किया जाता है। मुख्यमंत्री और ज़िलाधिकारी भी शायद तब तक जाग रहे होंगे! उनका मन बदल गया और कहा होगा आगजनी का आरोप हटा दो। केवल डिटेन करके बाँकीपुर जेल भेज दो। Jagran Special on Dr Ram Manohar Lohia role in Goa Liberation movement  

सत्ता हासिल कर लेने से नहीं जाता कायरता का रोग

जिलाधिकारी द्वारा आदेश टाइप करवाया गया कि ‘डिफेन्स ऑफ इंडिया रूल्स, 1962’ के नियम-30 के तहत डॉ. राममनोहर लोहिया जहां कहीं भी पाए जाएं, उन्हें हिरासत में लेकर बाँकीपुर जेल भेज दिया जाए। गांधीजी के असली वारिसों के आत्मबल से जालिमबुद्धि बहुत घबराते हैं। केवल सत्ता हासिल कर लेने से कायरता का रोग जाता नहीं है। मुख्यमंत्री फिर डर गए। सोचा होगा कि डॉ. लोहिया को पटना के बाँकीपुर जेल में रखेंगे तो यहां ही लाखों लोग आंदोलन पर उतर आएंगे। जिलाधिकारी से कहा कि ऐसा करो, बाँकीपुर जेल की जगह इनको हज़ारीबाग सेंट्रल जेल ले जाओ। हज़ारीबाग मुख्यमंत्री सहाय का अपना गृहजिला था, लेकिन तब तक तो बाँकीपुर जेल के जिक्र वाली नोटिस डॉ. लोहिया को दिखाई जा चुकी थी और लोहिया जी ने उसे पढ़ भी लिया था। जिलाधिकारी ने धृष्टतापूर्वक उस नोटिस को वापस मंगाया। ‘बाँकीपुर जेल’ को काटकर उसी पर ‘हज़ारीबाग सेंट्रल जेल’ लिखकर फिर से उसे जारी कर दिया। शासन के खिलाफ लड़ने वाला जब स्वयं शासक बन जाता है, तो वह पूर्ववर्ती सरकार की उन्हीं दमनकारी नीतियों पर चलने लगता है जिसके खिलाफ उसने जंग छेड़ी थी। चाहे वह गुलाम भारत में अंग्रेजी सरकार हो या फिर आज़ाद भारत की सरकार। स्वतंत्रता संग्राम के अनथक योद्धा डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ बिहार के मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय ने यही किया। आज़ादी के बाद कई मौकों पर कांग्रेस ने ऐसी गलतियां की। जिन स्वाधीनता सेनानियों ने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया, उनकी इज़्ज़त भी कांग्रेसी सरकारों ने नहीं की वरना आजादी के अठारह वर्ष बाद वह भी भारत छोड़ो आंदोलन के स्मरण दिवस पर डॉ. लोहिया को गलत तरीके से गिरफ्तार करने की भूल बिहार सरकार नहीं करती।

Kumar vishwas tweet on asutosh resignation | आशुतोष के इस्तीफे पर कुमार  विश्वास का ट्वीट, 'आत्मसमर्पित कुर्बानी मुबारक हो'पार्टी ही परिवार इस देश का दुर्भाग्य ही तो है कि जिन आजन्म अविवाहित लोहिया जी ने सदा अपनी पार्टी को ही परिवार माना कालांतर में उनके राजनैतिक वंशधरों ने अपने-अपने परिवारों को ही अपनी-अपनी पार्टी बना लिया! लोहिया जी, आपने अपने उद्घोष के अनुसार पंडित नेहरू की नीतियों के हिमालय में तो सोच-विचार की दरार डाल दी पर आपको, अपनी वैचारिकी में यह देश वह स्थान नहीं दे पा रहा जिसके आप और आपका विचार सदा से हक़दार है ! पुण्यतिथि पर प्रणाम नीतिऋषि डॉ कुमार विश्वास

 

कैसा हो लोकतंत्र का स्वरूप

लोकतंत्र में तो पार्टियां आती-जाती रहती हैं और जनता ही स्थायी प्रतिपक्ष होती है। भारत में लोकतंत्र का स्वरूप कैसा होना चाहिए, इसकी सदैव चिंता डॉ. लोहिया को रहती थी। 9 अगस्त, 1965 के अपने भाषण में डॉ. लोहिया ने उसी साल आए अकाल का भी जिक्र किया था। वहीं मुख्यमंत्री सहाय इंदिरा गांधी के स्वागत में हज़ारीबाग में ‘महावन’ भोज का आनंद उठा रहे थे। उन्होंने मुख्यमंत्री के दायित्व पर कई तरह के प्रश्न उठाए। डॉ. लोहिया ने कहा कि राज्य की भूखी जनता को अन्न की बजाय भाषण खिलाया जाता है। यह अकाल प्राकृतिक हो या कृत्रिम, लेकिन भूख नकली नहीं है? बिहार की जनता को अब भी भरोसा है कि उनके मुख्यमंत्री भूखों को भरपेट अनाज देंगे, लाठी-गोली नहीं! इस जनसभा के बाद मुख्यमंत्री के. बी. सहाय को लगा कि अगर डॉ. लोहिया को गिरफ्तार नहीं किया गया तो उनकी सरकार और कांग्रेस के खिलाफ वे और अधिक जहर उगलेंगे। मुख्यमंत्री के भय की एक और बड़ी वजह थी देश भर में डॉ. लोहिया एवं उनकी पार्टी की स्वीकार्यता का बढ़ना। खासकर उत्तर भारत में कांग्रेस विरोधी विपक्षी एकता के बड़े नायक के रूप में डॉ. राममनोहर लोहिया का उभार हो चुका था जबकि लोहिया सत्ता के नशे को लोकतंत्र का बड़ा शत्रु मानते थे। इसलिए वे बार-बार सत्ता से टकराते थे और जनता के मानस को जगाने का प्रयास करते थे।
एडवोकेट बैकुंठनाथ डे
डॉ. लोहिया के क़रीबी रहे 93 वर्षीय एडवोकेट बैकुंठनाथ डे बताते हैं कि 10 अगस्त,1965 को दोपहर साढ़े तीन बजे डॉ. लोहिया को पटना से हज़ारीबाग सेंट्रल जेल लाया गया। जेल में दाखिल होते ही उन्होंने हिंदी में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जी.बी. गजेंद्र गडकर और लोकसभा के अध्यक्ष हुकुम सिंह को रजिस्टर्ड डाक से एक चिट्ठी लिखी। पत्र मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से इसका संज्ञान लिया और उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर 23 अगस्त,1965 को सुनवाई की तिथि मुकर्रर की।  

बाइज्जत बरी

समाजवादी विचारक प्रो. राजकुमार जैन बताते हैं, “20 अगस्त को डॉ. साहब को हज़ारीबाग जेल से दिल्ली लाया गया। जब वे विदा होने लगे तो राजनीतिक कैदियों से पहले साधारण कैदियों से मिले,उनका कुशलक्षेम पूछा। जेल के रसोइया योगी हरि को डॉ. लोहिया ने छाती से लगाया और कहने लगे- जा रहा हूँ, पता नहीं अब हमारी भेंट कभी होगी या नहीं। योगी हरि भी डॉ. लोहिया के आलिंगन में खड़ा अविरल रो रहा था।” दिल्ली पहुंचने पर डॉ. लोहिया ने अपने मुकदमे की पैरवी खुद करने की मांग की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने हिंदी में जिरह करना शुरू किया। जजों ने उनसे अंग्रेजी में दलील करने को कहा। इस पर डॉ. लोहिया ने कहा कि, अंग्रेजी भाषा पर निर्भरता के लिए कांग्रेस सरकार दोषी है, जो अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के बाद भी भारत को अंग्रेजी भाषा का गुलाम बनाए रखना चाहती है। Lohia dreamt of an inclusive, innovative and free India | Forward Press जस्टिस ए. के. सरकार, एम. हिदायतुल्ला, दयाल रघुबर, जे. आर. मुढोलकर और आर. एस. बछावत समेत पाँच जजों की बेंच बैठी। डॉ. लोहिया ने संविधान के मूल अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद 21 और 22 का हवाला दिया और अपने तर्कपूर्ण बहस से सरकार और उसके अधिकारियों की पूर्वाग्रहयुक्त मंशा को साबित कर दिया। कोर्ट ने 7 सितंबर, 1965 को डॉ. राममनोहर लोहिया को बाइज्जत बरी करने का आदेश तो दिया ही, साथ ही साथ पटना के जिलाधिकारी जे.एन.साहू को कड़ी फटकार भी लगाई।

ऐतिहासिक हज़ारीबाग सेंट्रल जेल

भारत छोड़ो आंदोलन के समय जयप्रकाश नारायण, शालिग्राम सिंह और सूरज नारायण सिंह हज़ारीबाग सेंट्रल जेल से फ़रार हुए थे। यह जेल इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यहां सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान, पंडित रामनन्दन मिश्र, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और राहुल सांकृत्यायन जैसे कई महान सेनानी बंद रहे। यहां उनकी स्मृति में स्मारक भी हैं। इस जेल में डॉ. राममनोहर लोहिया का भी एक स्मारक बनना चाहिए। इस बाबत हजारीबाग जेल के सुपरिटेंडेंट से मेरी मुलाक़ात हुई। उनके आत्मीय सहयोग से डॉ. लोहिया का ‘बंदी प्रमाण पत्र’ और ‘बंदी प्रवेश पंजी’ जल्द ही प्राप्त होने की उम्मीद है। मौजूदा राजनीतिक विद्रूपताओं को देखते हुए डॉ. लोहिया जैसी जुझारू और नैतिक आवाज़ की कमी खलती है। वे गांधीजी के सच्चे वैचारिक उत्तराधिकारी थे। समाज जब-जब अपनी विभूतियों को भूलता है, तब-तब वह भटकाव का शिकार होता है। क्या इस डरावनी वैचारिक शून्यता में हम डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों को फिर से समझने की कोशिश करेंगे? (लेखक डॉ. राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक हैं)