प्रदीप सिंह।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के एक फैसले ने विपक्षी दलों के हाथ से 2024 के लिए एक बड़ा हथियार छीन लिया है। वैसे तो यह हथियार 2019 में भी आजमाया जा चुका है लेकिन विपक्ष इसे फिर से आजमाने के लिए तैयार था। पिछले छह साल से इसके विरुद्ध लगातार अभियान चलाया जा रहा था, सरकार पर हमला हो रहा था, उसकी नीयत पर सवाल उठाया जा रहा था। कहा जा रहा था कि यह नरेंद्र मोदी की मनमानी और तानाशाही है। उन्हें आर्थिक विषयों की समझ नहीं है इसकी वजह से यह कदम उठाया गया। साथ ही कहा जा रहा था कि अपने कुछ मित्रों और विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए यह किया गया, जो घोषित लक्ष्य था उनमें से कुछ भी पूरा नहीं हुआ। यानी इस कदम में सिर्फ खराबी ही खराबी थी जिससे लाखों लोगों की नौकरी गई, रोजगार छिन गया, लाखों लोगों सड़क पर आ गए। आप समझ गए होंगे कि मैं नोटबंदी की बात कर रहा हूं।
नोटबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 58 याचिकाएं दाखिल की गई थी जिसमें इसे असंवैधानिक मानते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने सबकी बातें सुनने के बाद 7 दिसंबर, 2022 को यह फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने आरबीआई एवं सरकार से हलफनामा मांगा था और कहा था कि वो सारे दस्तावेज पेश कीजिए जो नोटबंदी के फैसले के दौरान लिए गए थे। सरकार पर आरोप यह भी लग रहा था कि उसने रिजर्व बैंक को अंधेरे में रखा, आरबीआई गवर्नर को इसकी सूचना घोषणा होने से कुछ मिनट पहले दी गई। आरबीआई इसके खिलाफ था इसके बावजूद यह फैसला लिया गया। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला 2 जनवरी, 2023 को 4-1 के बहुमत से आया। एक जज ने इस फैसले से असहमति जताई है। उनकी दो बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि इस फैसले के पीछे सरकार की नीयत बिल्कुल ठीक थी। दूसरी बात उन्होंने जो कही वह यह कि आरबीआई के 1934 के कानून की 26(2) की धारा के तहत सरकार को यह फैसला नहीं लेना चाहिए था। उनका कहना था कि इसके तहत सरकार केवल नोट के कुछ सीरीज पर प्रतिबंध लगा सकती है, सारे पर प्रतिबंध लगाने का उसे अधिकार नहीं है। उनका सुझाव यह था कि सरकार को या तो अध्यादेश लाना चाहिए था या संसद में प्रस्ताव लाकर उस पर बहस करा कर फैसला होना चाहिए था। पहला सवाल यह है कि अगर अध्यादेश या संसद में प्रस्ताव आता तो नोटबंदी का जो सरप्राइज इफेक्ट था जिसकी वजह से उसकी कामयाबी निर्भर थी उसका कोई मतलब नहीं रह जाता। इससे देश में इतनी अफरा-तफरी मचती जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। संसद के प्रस्ताव या अध्यादेश के जरिये तो यह हो ही नहीं सकता था। पता नहीं जज महोदय ने क्या सोचकर यह बात कही।
बहुमत से फैसला

जस्टिस अब्दुल नजीर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने बहुमत से सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है और कहा है कि आरबीआई के 1934 के कानून की धारा 26(2) के तहत आरबीआई और केंद्र सरकार को नोट के सारे सीरीज वापस लेने या प्रतिबंधित करने का अधिकार है। यह फैसला ऐसा है जिसे बदला नहीं जा सकता। यह आर्थिक फैसला है, इस तरह का फैसला लेने का केंद्र सरकार और आरबीआई को अधिकार है। दूसरी बात, यह जो आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरबीआई और आरबीआई गवर्नर को अंधेरे में रखा, उससे कोई परामर्श नहीं लिया, मनमाने तरीके से इसे लागू किया, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं है। 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा होने से 6 महीने पहले से सरकार और आरबीआई के बीच सलाह मशविरा चल रहा था कि इसे कैसे करना है, कब करना है, इसका स्वरूप क्या हो, इसके उद्देश्य क्या हों और इससे क्या हासिल होगा। इसके अचीवमेंट को लेकर सरकार और आरबीआई में कुछ मतभेद जरूर थे। आरबीआई का कहना था कि कालाधन जितना नगदी में है उससे कई गुना ज्यादा रियल स्टेट में है। नोटबंदी के बाद रियल स्टेट में कालाधन लगभग खत्म हो गया है। यह इतना बड़ा अचीवमेंट है जो पूरे सिस्टम में कालाधन की बाढ़ लेकर आता था। आज आप मकान या जमीन खरीदने जाएं तो कालाधन या नगदी लेने वाले आपको बड़ी मुश्किल से मिलेंगे, तो रियल स्टेट से ब्लैकमनी चला गया। इसी तरह आतंकवाद को लेकर हंगामा हुआ कि आतंकवाद कहां खत्म हो गया, कैसे आतंकवाद की रीढ़ तोड़ दी। आतंकवाद की रीढ़ तब टूटती है जब उसकी फंडिंग पर बैन लगता है। आप देख लीजिए छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश में जहां-जहां नक्सल आंदोलन था आज वह अंतिम सांसें गिन रहा है। जम्मू-कश्मीर को देख लीजिए, कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की फंडिंग बंद हो गई। इसके अलावा पत्थरबाजी बंद हो गई। पिछले चार-पांच साल में आपने कहीं सुना कि पत्थरबाजी हुई हो, क्यों नहीं हो रही है, उसके लिए बाहर से पैसा आता था। नोटबंदी के बाद वह पैसा आना बंद हो गया, यह अचीवमेंट है।
ईमानदारी की पुनर्स्थापना
हालांकि, मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि इन सबसे बहुत बड़ा अचीवमेंट है ईमानदारी की पुनर्स्थापना। गरीब आदमी के मन में यह बात बैठ चुकी थी कि अमीर के खिलाफ कोई सरकार कुछ नहीं करेगी। नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकसान गरीब आदमी को हुआ लेकिन सबसे ज्यादा वही खुश था। उसे लगा कि ईमानदारी की प्रतिष्ठा हो रही है, उसे लगा कि अमीर आदमी पर चोट पड़ रही है। वह इससे खुश हुआ कि हम जो नहीं कर पा रहे थे वह हमारी सरकार ने किया। इस वजह से मोदी पर उनका भरोसा और ज्यादा बढ़ गया। मोदी की जो राजनीतिक पूंजी थी वह और ज्यादा बढ़ गई, विश्वसनीयता और ज्यादा बढ़ गई, लोगों के भरोसे ने मोदी को बहुत बड़ी ताकत दी। नोटबंदी के कुछ ही महीने बाद मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें बीजेपी को अप्रत्याशित सफलता मिली, 403 में से 325 सीटें मिली। यहां दो बातें और कहना जरूरी है। एक यह कि नोटबंदी को लेकर आरोप लगाया गया कि असंगठित क्षेत्र की कमर टूट गई। आज छह साल बाद आप देखिए की स्थिति क्या है। वित्त वर्ष 2016-17 में यह फैसला हुआ और वित्त वर्ष 2017-18 में सरकार का टैक्स कलेक्शन बढ़ गया यानी लोग ईमानदारी से टैक्स देने लगे। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि पूरी तरह से ईमानदारी आ गई है लेकिन ईमानदारी बहुत हद तक टैक्स सिस्टम में आ गई है। दूसरी बात, असंगठित क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था का 52 फीसदी था जो आज घटकर 22 फीसदी पर आ गया है। असंगठित क्षेत्र के 30 फीसदी लोग संगठित क्षेत्र में आ गए हैं, मतलब उनकी तनख्वाह उनके बैंक अकाउंट में मिलने लगी है। पीएफ कटना या दूसरी जो सरकारी सुविधाएं हैं वह उन्हें मिलने लगी है। उनका जीवन स्तर बेहतर हुआ है, अनिश्चितता कम हुई है। मालिक पहले उन्हें वेतन के रूप में जो नगद देता था उसका कोई हिसाब-किताब नहीं था। खर्च करने के अलावा उसे बैंक में उस तरह से रख नहीं सकते थे। उसके आधार पर उन्हें कभी लोन नहीं मिल सकता था। अब यह सब स्थितियां बदल गई है। इकोनॉमी में लगातार बदलाव आ रहा है।
डिजिटल ट्रांजैक्शन को बढ़ावा

इसके अलावा नोटबंदी ने डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा दिया है। डिजिटल ट्रांजैक्शन के मामले में भारत दुनिया में नंबर एक पर पहुंच गया है। भारत ने पूरी दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश किया है कि इतने कम समय में कैसे डिजिटल ट्रांजैक्शन के मामले में एक रिकॉर्ड स्थापित किया है। लाखों-अरबों का ट्रांजैक्शन डिजिटली हो रहा है। आज सब्जी वाला भी अपने ठेले पर डिजिटल ट्रांजैक्शन के जरिये पेमेंट ले रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज च्वहाण ने नोटबंदी के बाद इंडियन एक्सप्रेस में बड़ा लंबा-चौड़ा लेख लिखा जिसका लब्बो-लुआब यह था कि मोदी सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया कि अमेरिका की दो कंपनियों वीजा और मास्टर कार्ड को इसका फायदा मिल सके, उनका बिजनेस बढ़ सके। नगदी जितनी कम होगी इनका डिजिटल ट्रांजैक्शन डेबिट और क्रेडिट कार्ड के जरिये बढ़ेगा। ये दोनों डेबिट और क्रेडिट कार्ड जारी करने वाली कंपनियां हैं। जबकि सच यह है कि डोनाल्ड ट्रंप जब राष्ट्रपति के रूप में आखिरी बार भारत आए थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध कर रहे थे कि दोनों कंपनियां अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति के सामने रो रही हैं कि भारत उनके धंधे को बंद करा रहा है। आज जिस तरह से भारत का अपना रूपे कार्ड आ गया है, अगर आप नया डेबिट या क्रेडिट कार्ड लेंगे तो रूपे कार्ड मिलेगा, नोटबंदी के बाद वीजा और मास्टर कार्ड का धंधा बहुत बुरी हालत में है। सबसे बड़ी बात, राहुल गांधी सहित पूरा विपक्ष पिछले छह साल से जो अभियान चला रहा था, जो झूठा प्रचार कर रहा था, सरकार की जो आलोचना कर रहा था उन सबको सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है।
विपक्ष माफी मांगेगा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से कांग्रेस के नेता और वरिष्ठ वकील पी चिदंबरम सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे। इसका एक किस्सा सुनाया रविशंकर प्रसाद ने जो कानून मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने राम जन्म-भूमि का मुकदमा लड़ना शुरू किया तो इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बोलना बंद कर दिया था। फिर उन्होंने मशहूर कानूनविद फली एस नरीमन का उदाहरण दिया। नरीमन राज्यसभा सदस्य थे और उन्होंने एक सवाल पूछा था। सवाल का जवाब देने के लिए जब रविशंकर प्रसाद खड़े हुए तो नरीमन भी खड़े हुए और उन्होंने सभापति से कहा कि सभापति महोदय मैं इस मुद्दे पर कोर्ट में बहस करने वाला हूं इसलिए सवाल नहीं पूछूंगा। लीगल प्रोफेशन में एक नैतिकता, एक परंपरा है कि जिस मुद्दे पर आप अदालत में पेश होने वाले हैं, बहस करने वाले हैं उस पर फैसला आने तक आप सार्वजनिक रूप से बोलना बंद कर देते हैं। चिदंबरम संसद में भी बोलते रहे, संसद के बाहर भी बोलते रहे और अदालत में भी पेश हुए। नैतिकता का यह हाल है। कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने की हर नैतिक-अनैतिक कोशिश की और सारी हदें तोड़ दी। फैसला आने के बाद भी वे बहुमत के फैसले की बात नहीं कर रहे हैं, उस पांचवें जज के फैसले को लेकर सरकार पर हमलावर हैं जिन्होंने चार जजों के फैसले से असहमति जताई है। सवाल यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष के मुद्दों में एक मुद्दा यह भी था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दिया है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि देश को गुमराह करने, सरकार पर झूठा आरोप लगाने के लिए क्या विपक्षी दल के नेता माफी मांगेंगे? क्या राहुल गांधी इस पर माफी मांगेंगे? उनका जो ट्रैक रिकॉर्ड है उससे लगता नहीं है। राफेल मामले को भी ऐसे ही मुद्दा बनाया था, ऐसे ही अभियान चलाया था, ऐसे ही झूठे आरोप लगाए थे, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो चुप्पी साध ली। उसके बाद भी माफी नहीं मांगी। इसलिए नोटबंदी पर गलती मान लेंगे यह मुझे लगता नहीं है। वह उनके स्वभाव में नहीं है।
इन सबके बावजूद सरकार की यह बहुत बड़ी जीत है। इसके बाद भी कोई नासमझी दिखाए, कोई ढिठाई दिखाए तो वह अलग बात है। नोटबंदी का मुद्दा हमेशा के लिए दफन हो गया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है जिससे सरकार को संतोष हुआ होगा कि उसका फैसला न केवल आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर, न केवल लोगों की भावना के स्तर पर बल्कि संवैधानिक रूप से भी सही था।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ न्यूज पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल के संपादक हैं)



