केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सिख यात्रियों को माघी मेले पर विशेष तोहफा दिया है। रेल विभाग श्री मुक्तसर साहिब में लगने वाले माघी मेले पर विशेष रेल चलाएगा। फिरोजपुर रेलवे मंडल माघी मेले पर विशेष तौर रेल चलाने जा रहा है। इसका नाम ही मेला स्पेशल ट्रेन है। पूरे जनरल डिब्बों के साथ यह ट्रेन तीन दिन 14 जनवरी से लेकर 16 जनवरी तक चलने वाले मेले के दौरान बठिंडा से फाजिल्का और फाजिल्का से बठिंडा के बीच दौड़ेगी।रेल मंत्रालय द्वारा बताया गया है कि यह गाड़ी दिन में दो चक्कर लगाएगी। 14, 15 और 16 जनवरी को स्पेशल रेलगाड़ी सुबह सुबह 8: 05 बजे बठिंडा स्टेशन से चलेगी और सुबह 11:50 बजे फाजिल्का पहुंचेगी। वापसी में फाजिल्का से बठिंडा के लिए शाम 5 बजे प्रस्थान करेगी और रात को 8:55 बजे बठिंडा पहुंचेगी।
माघ माह के पहले दिन सिख इतिहास के दो महत्वपूर्ण प्रसंग जुड़े हैं। एक तो यह श्री हरिमंदिर साहिब का स्थापना दिवस है और साथ ही श्री मुक्तसर साहिब में चालीस मुक्तों की याद में माघी का मेला लगता है। श्रद्धालु यहां पवित्र सरोवर में माघी स्नान कर मुक्तों को नमन करते हैं।मुक्तसर में 14 जनवरी को मकर संक्रांति यानी माघी पर लगने वाले मेले का खास महत्व है। पुराने समय में यह मेला 21 वैसाख को मनाया जाता था, लेकिन उस दौरान पानी की कमी होती है, इसी कारण इसे सर्दी में मनाया जाने लगा। अब लंबे समय से इसे 14 जनवरी (पहली माघ) को ही मनाया जाता है। इसी कारण इसका नाम ही ‘माघी मेला’ पड़ गया है।

चालीस मुक्ते वे सिख हैं जो आनन्दपुर साहिब की लड़ाई के बाद गुरु गोबिन्द सिंह जी का साथ छोड़ गए थे परन्तु जब घर पहुंचने पर उनकी महिलाओं ने उन्हें इस बात के लिए धिक्कारा तो वे दोबारा गुरुजी से मिलने निकल पड़े। उस समय मुगल सेना गुरु गोबिन्द सिंह जी का पीछा कर रही थी और यह सिख खिदराना की ढाब के पास आकर उनके साथ मिले थे।
यह चालीस सिख मुगल सेना से बड़ी बहादुरी से लड़े और शहीद हो गए। इनकी शहादत व बहादुरी को देख कर गुरु गोबिन्द सिंह जी बहुत खुश हुए और अपने हाथों से इनका अन्तिम संस्कार किया। मरते हुए देह त्यागते हुए महा सिंह नामक सिख ने गुरु जी से वह बेदावा (त्यागपत्र) फाडऩे को कहा जो वे गुरु जी को दे आए थे। गुरुजी ने वह बेदावा फाड़ दिया और इन चालीस मुक्तों को आवागमन के चक्करों से मुक्त किया। इन्हीं चालीस मुक्तों के नाम पर यह स्थान आज श्री मुक्तसर साहिब के नाम से जाना जाता है।
श्री हरिमंदिर साहिब की स्थापना का पर्व भी है माघी
तीसरे पातशाह श्री गुरु अमरदास जी की इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार चौथे पातशाह श्री गुरु रामदास जी ने सन 1573 ई में अमृतसर के सरोवर को पक्का करवाया और इसे ‘राम सर’, ‘रामदास सर’ या ‘अमृतसर’ पुकारा। पंचम पातशाह की अभिलाषा थी कि अमृत सरोवर के मध्य में अकालपुरख के निवास सचखंड के प्रतिरूप के रूप में एक मंदिर की स्थापना की जाए। सिख-परंपरा के अनुसार एक माघ संवत् 1645 वि. मुताबिक सन् 1589 ई को निर्माण कार्य शुरू करवाया गया और पंचम पातशाह के परम मित्र साई मीआं मीर ने इसकी नींव रखी। निर्माण कार्य संवत् 1661 वि. अर्थात 1604 ई. में संपूर्ण हुआ। पंचम पातशाह ने इसे ‘हरिमंदिर’ अर्थात हरि का मंदिर कहा। एक सितंबर 1604 ई. को यहां गुरु ग्रंथ साहिब का प्रथम प्रकाश किया गया। यहां साध-संगत गोबिंद के गुण गाती है और पूर्ण ब्रह्म-ज्ञान को प्राप्त करती है। (एएमएपी)



