कथित विकास और पर्यटन हब बनाने के चक्कर में मरणासन्न कर दिया पहाड़ों को।
व्योमेश चन्द्र जुगरान।जोशीमठ की जख्मदेही को समझने के लिए किसी लम्बी चौड़ी वैज्ञानिक मीमांसा की जरूरत नहीं है। हरिद्वार से करीब 295 किलोमीटर के फासले और समुद्र तल से करीब छह हजार फुट से कुछ ऊंचाई पर स्थित इस जगह का भूगोल सब कुछ बयां कर देता है। यहां से 24 किलोमीटर के फासले पर जब बदरीनाथ जाने के लिए वाहन नीचे अलकनंदा घाटी में उतरते हैं तो घुमावदार सड़क पर ऊपर हुए निर्माण के अक्स साफ देखे और महसूस किए जा सकते है। जैसे-जैसे नीचे गोविंदघाट और फिर जेपी की विष्णुप्रयाग से सामना होता है, बड़े-बडे और डरावने बोल्डरों से पटी घाटी का मंजर उस दंतकथा की याद दिलाने लगता है कि जोशीमठ के नृसिंह मंदिर की प्रतिमा का निरंतर कमजोर होता एक हाथ जिस दिन गिर जाएगा, उस दिन बदरीनाथ उपत्यका के नर-नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे। तब बदरीनाथ का मार्ग हमेशा के लिए अवरुद्ध हो जाएगा और भगवान बदरी विशाल की पूजा भविष्य बदरी में होगी जो कि जोशीमठ से 17 किलोमीटर दूर लाता गांव के पास है और जहां सड़क मार्ग से तीन किलोमीटर के पथारोहण से पहुंचा जा सकता है।
वन कटान और मशीनीकरण के दंश

जोशीमठ के प्राचीन नृसिंह मंदिर की अहमियत श्रद्धालुओं के लिए यहां आठवी शताब्दी में आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिष्पीठ से कहीं अधिक है। शीतकाल के बाद जब भगवान बदरीनाथ के कपाट खुलते हैं तो टिहरी राजदरबार से चली पारंपरिक तेल कलश यात्रा का पड़ाव नृसिंह मंदिर ही होता है। मंदिर में पूजापाठ के भव्य विधान के बाद यहीं से शंकराचार्य की गद्दी के साथ मुख्य पुजारी रावलजी बदरीनाथ के लिए प्रस्थान करते हैं। यह परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है और इसी धार्मिक थाती के चलते जोशीमठ का महात्म्य बदरीनाथ के समक्ष समझा गया। करीब डेढ़ सौ साल पहले जोशीमठ की आबादी मुश्किल से 400 के आसपास थी जो साठ के दशक तक आते-आते 3000 से अधिक हो गई। आज यह करीब 30 हजार के पार पहुंच चुकी है। आसपास के गांवों से यहां बड़े पैमाने पर अंतरवर्ती पलायन हुआ है। सन 1959 में इस क्षेत्र में पहली सड़क बनी थी जिसे कि अगले चार वर्षों में सीमावर्ती नीति घाटी और बदरीनाथ तक ले जाया गया। चीनी सीमा यानी तिब्बत से सटा होने के कारण सामरीकरण और शहरीकरण ने जोशीमठ को विस्तार के साथ-साथ वन कटान और भारी-भरकम मशीनीकरण के दंश भी दिए। शहर के सिरमौर हिमाच्छादित औली आज पर्यटन हब होने के कारण भारी-भरकम निर्माण का शिकार है। यहां की जमीनों की रजिस्टरियां खंगाली जाएं तो नौकरशाहों से लेकर नेताओं और उद्योगपतियों के चेहरे लाल-काले हो जाएंगे।
200 करोड़ की शाही शादी
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ज्यादा दूर की बात नहीं, अभी जून 2019 में उत्तराखंड के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने दक्षिण अफ्रीका के विवादित और भगोड़े साबित हुए कारोबारी गुप्ता बंधुओं के बच्चों की शादी के लिए औली में डेस्टिनेशन मैरेज की न सिर्फ इजाजत दी, बल्कि इंतजामात में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। करीब 200 करोड़ की इस शाही शादी में कैटरीना कैफ ने बॉलीवुड के अपने दोस्तो के साथ ‘शीला की जवानी’ पर खूब ठुमके लगाए थे। कटरीना के अलावा उर्वशी रौतेला, पंजाबी रैंप गायक बादशाह, अभिजीत सावंत, कनिका कपूर, श्रद्धा कपूर, कैलाश खेर और सुरभि ज्योति भी औली पहुंचीं थीं। शादी में अनेक नामी-गिरामी हस्तियों ने शिरकत की थी जिनमें पातंजलि योगपीठ के आचार्य बालकृष्ण, परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानंद और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इत्यादि शामिल थे।
जलधाराएं नीचे आकर कहां मार्ग तलाशें

इस शादी के लिए औली से लेकर बदरीनाथ तक जिस प्रकार शासन ने लाल जाजिम बिछा दी, वह हैरतअंगेज था। लेकिन शादी में स्थानीय मांगलगीत के लिए न्योती गई महिलाओं को किसी ने पूछा तक नहीं। ईवेंट के बाद इन दौलतमंदों के बिखराए कचरे को साफ करने के लाले पड़ गए। बाद में उत्तराखंड की सरकार यह कहते सुनी गई कि उसने औली को मैरेज डेस्टेनेशन के लिए चुन कर सूबे के पर्यटन की संभावना को चौगुना कर दिया है। लेकिन सरकार यह भूल गई कि औली से ऊपर गोरसों है जो लगभग साल भर बर्फ से ढका रहता है और यहां से फूटती जलधाराएं नीचे आकर कहां मार्ग तलाशें। औली की कुदरती संरचना को तो मानवीय हस्तेक्ष के कारण बिला गई है। अब यहां की ढलानों पर बर्फ के लिए भी कृत्रिम उपायों का सहारा लेना पड़ रहा है। जलधाराएं रास्ता भटकर गुम हो गई हैं। जाहिर है वे जमीन के अंदर समाकर जोशीमठ की कच्ची मिट्टी वाली भू-संरचना को कमजोर करती रही हैं। अब इस मिट्टी में शहर के बोझ को संभालने की शक्ति नहीं रही।
जब डाकबंगला धंस गया
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करीब 46 साल पहले मार्च 1976 में जमीन खिसकने से यहां का डाकबंगला धंस गया था। उसी साल अगस्त के एक अन्य घटनाक्रम में ‘मैसर्स त्रिवेणी स्ट्रक्चरल्स लिमिटेड, नैनी’ को जोशीमठ के ऊपर औली में तीन किलोमीटर लंबे जोशीमठ-गोरसौ एरियल रोपवे बनाने का ठेका सौंपा गया। डाकबंगला धंसने और दरारें उभरने के बाद स्थानीय संस्थाओं के आग्रह पर सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति गठित की और समिति की सिफारिश के अनुरूप शहर के निचले हिस्से में बड़े पैमाने वृक्षारोपण अभियान छेड़ा गया। यह महसूस किया गया था कि शहर के निचला हिस्सा जो कि शहरीकरण के दबाव में वृक्षविहीन हो चला है और जहां कभी बांज व अन्य प्रजाति के पेड़ों की बहुतायत थी, वहां वनीकरण कर शहर की जड़ों को सुदृढ़ किया जा सकता है। इसी सोच के तहत वन विभाग के सहयोग से छात्रों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने दो हफ्ते में सैकड़ों गड्ढे, इन गड्ढों में रोपे जाने वाले पौधों के लिए सुरक्षा दीवार और शहर के पानी की निकासी के लिए खडंचों वाली पक्की नाली बनाने का कारनामा कर डाला।
नदियों और पर्वतों से छेड़छाड़ का अंजाम

इधर, शहर को बचाने के लिए वनीकरण का अभियान चल रहा था, उधर औली में प्रस्तावित रोपवे के लिए सरकार 1.25 हेक्टेयर वनभूमि के अधिग्रहण को मंजूरी दे रही थी। इस मंजूरी के साथ ही दर्जनों ऐसे पेड़ों के सफाए का रास्ता खुल गया जो रोपवे की राह में आड़े आ रहे थे। यह घटनाक्रम बताता है कि मध्य हिमालय के इस अति संवेदनशील क्षेत्र में प्रारंभ से ही विकास के जिस मॉडल की ओर बढ़ा गया, उसमें विकास के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की बात तो की गई, पर दोनों के बीच स्थायी संतुलन की किसी ठोस कार्ययोजना का खाका नहीं खींचा जा सका। यही कारण था कि हिमालयी क्षेत्र में सरपट भागती बहुद्देश्यीय परियोजनाओं के आगे संसाधनों के संरक्षण व विकास की अवधारणा पीछे छूटती गई और फिर विकास को ही संरक्षण पर्याय मान लिया गया। मसलन, खाली जमीनों को दरकने से बचाने के लिए पर्यावरणीय उपायों की जगह कंक्रीट के पक्के निर्माण को आसान विकल्प मान लिया गया। नदियों के नैसर्गिक बहाव को जल की बर्बादी मानकर उसके दोहन के तरीके ढूंढे जाने लगे और सबसे कारगर तरीका नदी घाटियों में एक के बाद एक डैमों की मंजूरी के रूप में सामने आया। खासकर बांध परियोजनाएं अवैज्ञानिक सोच के साथ मनचाहा आकार ग्रहण करती चली गईं। संसाधनों के दोहन की यह मान्यता योजनाकारों के दिमाग में इस कदर पैठ गई कि हिमालय में आए दिन होने वाली हलचलें और विभीषिकाएं भी विकास के इस मॉडल से उन्हें डिगा नहीं सकीं। यहां तक कि 2013 में केदारनाथ के ठीक ऊपर चोराबाड़ी ग्लेशियर के रूप में टूटे कुदरती कहर को भी भुलाने में देर नहीं लगी। इस विनाशलीला से पूरा देश दहल उठा था क्योंकि ऐसे मृतकों की संख्या भी सैकड़ों में थी जो अलग-अलग प्रदेशों से बदरी-केदार की यात्रा को आए थे। प्रारंभ में हिमालय की संवेदनशीलता बहस के केंद्र में जरूर रही और नदियों, पर्वतों, घाटियों, जंगलों और धार्मिक स्थलों के लिए सुरक्षा कवच पर भी खूब बातें हुईं। सरकारों ने भी तमाम तरह के आश्वासन दिए। प्रदेश सरकार ने नदियों के किनारे निर्माण कार्य पर रोक का फरमान सुनाया, आपदा सलाहकार समिति बनाई और पुनर्निर्माण-पुनर्वास प्राधिकरण के गठन का निर्णय लिया। मगर केदारनाथ मंदिर में पूजा की बहाली और मंदिर के पुनर्निर्माण की उपलब्धि को छोड़कर सरकार हिमालय के पारिस्थितिक-तंत्र से जुड़ा कोई बड़ा फैसला अपने खाते में नहीं जोड़ सकी। जल्द ही सबकुछ पुराने ढर्रे पर लौट आया। यहां तक कि सर्वोच्च अदालत की उन टिप्पणियों को भी अनदेखा कर दिया गया जिनमें पहाड़ की इस हालत के लिए यहां की नदियों और पर्वतों से की जा रही छेड़छाड़ और जल विद्युत परियोजनाओं के जाल को जिम्मेदार ठहराया गया था।
भूगर्भीय हलचल और सरकारों का रुख
सरकारें चाहतीं तो हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी चिन्ताओं पर ध्यान देते हुए हिमालय के अवैध शोषण और लूट-खसोट के खिलाफ एक बड़ा विमर्श खड़ा कर सकती थीं। ऐसा हो पाता तो शायद 2021 में जोशीमठ की रैणी घाटी में उफनाई ऋषिगंगा और धौली गंगा के कोप को कम किया जा सकता था। तब ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट और तपोवन पावर प्रोजेक्ट की सुरंगों का मुंह मलबे भर गया और वहां दर्जनों लोग जिंदा दफन हो गए थे। धंस रहे जोशीमठ की भूगर्भीय हलचल के लिए धौली गंगा की बाढ़ से उत्पन्न मलबे को भी बड़ा कारण माना जा रहा है क्योंकि रैणी की बाढ़ के बाद से ही जोशीमठ में धंसाव की प्रक्रिया तेज हुई है। बाढ़ से निकले मलबे ने कहीं न कहीं उस गाद में इजाफा किया है जो जोशीमठ को अंदर ही अंदर खाए जा रही है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जोशीमठ जिस जमीन पर बसा है, असल में वह आज से सैकड़ों साल पहले इस क्षेत्र में किसी भूकंप अथवा बड़े भूस्खलन का मलबा है। सैंडस्टोन और लाइमस्टोन की बहुलता के कारण इसकी मिट्टी का स्वभाव गलनशील है और जब भी इस क्षेत्र में बाढ़ या भूकम्प आएगा, जोशीमठ के धंसने का खतरा उतना ही बढ़ता जाएगा।
किसी को याद है गौरा देवी की ललकार

यह क्षेत्र 1970 में भी अलकनंदा की विभीषिका का सामना कर चुका है। जानमाल के नुकसान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सड़कों, दर्जनों पुलों और वाहनों को ले उड़ी इस बाढ़ के कारण हरिद्वार की गंग नहर करीब दस किलोमीटर तक बालू से पट गई थी और फसलों को भारी नुकसान हुआ था। उस वक्त सरकार और उसके अधिकारी इसे प्राकृतिक प्रकोप कहकर मुंह मोड़ते नजर आए, पर प्राकृतिक संसाधनों के बीच अपनी आजीविका कमा रहे लोगों को अपने पारंपरिक ज्ञान के आधार पर समझ में आने लगा था कि हर साल बड़े पैमाने पर नीलाम हो रहे जंगलों की कटाई ने उनकी जमीन को कमजोर कर डाला है। तब चिपको आंदोलन ने इसी घाटी में अंगड़ाई ली थी और रैणी गांव की एक गरीब और अनपढ़ महिला गौरादेवी गांव का जंगल काटने आए मजदूरों और ठेकेदारों के बंदूक के आगे सीना फुलाकर गरज उठी थीं- लो मारे बंदूक और काट ले जाओ हमारा मायका….। मातृशक्ति की इस ललकार के आगे तब न सिर्फ मजदूरों के पांव उखड़े थे, सरकारों की भी नींद टूटी थी। यह साल यानी 2023 चिपको आंदोलन का स्वर्णजयंती वर्ष भी है। जमींदोज होता जोशीमठ शायद चिपको के गुम होते सरोकारों के प्रति सरकारों को फिर से नींद से जगा सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



