डॉ. संतोष कुमार तिवारी।
झारखंड में ऐसे अनेक आदिवासी हैं, जो कि निरक्षर हैं। वे न हिंदी जानते हैं और न अंग्रेजी। उनकी बोलियां हैं: मंडारी, खड़िया, कुड़ुक, आदि। इन लोगों को कुछ पता नहीं है कि गणतंत्र का मतलब क्या है, संविधान का मतलब क्या है, आदि। ये लोग झूठ बोलना भी नहीं जानते हैं। दूध में पानी नहीं मिलाते हैं। इनके चेहरे और शरीर का रंग काला होता है। Z-Black।
मैं इनके इलाके में रहा हूं। इन भोले-भाले लोगों को मिशनरी लोग क्रिश्चियन बना रहे हैं। कोई इनको मुसलमान बना रहे हैं। सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाने वाले लोग इनको और इनकी स्त्रियों को शराब पिला-पिला कर, इनको कर्ज देकर, और इसी तरह के अन्य हथकंडे अपना कर इनकी जमीनों पर कब्जा कर लेते हैं। सभी पार्टियां इनको वोट बैंक समझती हैं और ऐसा माहौल बनाती हैं कि इनकी जमीनें इनको वापस मिलेंगी।
ये लोग मूर्ति पूजा नहीं करते हैं। ये लोग वृक्षों और पहाड़ों की पूजा करते हैं। आज झारखंड में वृक्ष कटते जा रहे हैं। पहाड़ों का अवैध खनन हो रहा है। इस अवैध खनन में मुख्यमंत्री के नजदीकी लोगों समेत तमाम राजनीतिक लोग और धनाड्य वर्ग शामिल हैं।

तमाम NGO इन आदिवासियों की मदद के लिए सरकारी पैसे के बल पर चलते हैं। मैं जब झारखंड में था तब उस तीन सदस्यीय कमेटी का चेयरमैन था जिसकी सिफारिश पर केंद्र सरकार को कई करोड़ रुपए का अनुदान देना था। यह सन् 2014 से पहले की बात है। कमेटी के अन्य सदस्य थे – प्रोफेसर बीपी सिन्हा और डॉ. अरिंदम चक्रवर्ती। हमारी कमेटी ने काफी मेहनत करके एक ऐसी ईमानदार संस्था को चुना जिसकी पूरे झारखंड के हर जिले में पहुंच थी। हमारी कमेटी ने यह सुझाव दिया कि केंद्र सरकार इस संस्था को अर्थात इस NGO को अनुदान दे सकती है। बाद में मुझे पता चला कि हमारे सुझाव को नहीं माना गया। और एक ऐसी संस्था को केंद्र सरकार ने अनुदान दिया जिसका दफ्तर रांची के पॉश इलाके में एक किराए के मकान में था।

हम लोगों ने किस संस्था को चुना था, उसका उसका नाम था विकास भारती। उसको चलाने वाले थे अशोक भगत जी। जब सब मामला खत्म हो गया तो एक दिन एक समारोह में मेरी अशोक भगत जी से मुलाकात हो गई। वह शरीर में कपड़ों के स्थान पर सिर्फ एक धोती ही पहनते थे। मैंने उनको बताया कि हमने आपकी संस्था को चुना था परंतु केंद्र सरकार ने हमारे सुझाव को नहीं माना और वह करोड़ों रुपए की धनराशि किसी और संस्था को दे दी। अशोक भगत जी मेरी बात सुनकर कुछ बोले नहीं। एक शब्द भी कुछ नहीं बोला। बस धीरे से मुस्कुरा दिए।

बाद में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई, तब अशोक भगत जी को पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
इस लेख का शीर्षक है किसकी जनवरी और किसका अगस्त। शायद यह बाबा नागार्जुन की एक कविता का शीर्षक है।
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)



