बुरा न मानो होली है।
प्रदीप सिंह।
फागुन का महीना है, होली का रंग है, आप भंग के रंग में न हों तो भी होली का रंग और मौसम ऐसा होता है कि अपने आप थोड़ा सुरूर तो हो ही जाता है। यह मौसम ऐसा है तो इसमें कुछ बात भी ऐसी होनी चाहिए। वैसे तो मैंने अपने पूरे जीवन में भांग दो बार खाई है, एक बार बचपन में और एक बार 35-40 साल पहले। दोनों अनुभव इतने खराब रहे कि कान पकड़ लिया और फिर कभी नहीं खाई। जब दूसरी बार खाई थी तो उसका अनुभव अब तक याद है कि किस-किस तरह के ख्याल आते हैं, ज्यादातर काल्पनिक दृश्य ही होते हैं। उसी अनुभव से एक कल्पना मेरे मन मस्तिष्क में आई है जिसे मैं आपसे साझा करना चाहता हूं।
मुझे दिखाई दिया कि एक बड़ा राजनीतिक सम्मेलन हो रहा है और उसमें कई पार्टियों के नेता शामिल होने के लिए आ रहे हैं। मैंने पता किया तो पता चला कि यह सम्मेलन उन लोगों का है जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। इस सम्मेलन के लिए रजिस्ट्रेशन वही करा सकते हैं जिनके खिलाफ सीबीआई, ईडी या इनकम टैक्स का मामला चल रहा है। बाकी लोग निकम्मे हैं। अगर आपके खिलाफ सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स का केस नहीं है तो आपने राजनीति में कुछ नहीं किया है। उन लोगों की इस सम्मेलन में कोई जरूरत नहीं है जिनके खिलाफ जांच नहीं चल रही है, जो भ्रष्टाचार के आरोप में न फंसे हैं। आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं कि यह होली का रंग है। बुरा ना मानो होली है… यह एक तरह का कबीरा सा रा रा रा है और भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं के लिए समर्पित है। किसी के खिलाफ व्यक्तिगत विद्वेष की भावना से इसमें कुछ नहीं कहा जा रहा है। होली का मौसम है तो होली का मजा लीजिए।
भ्रष्टाचारियों की एकता जरूरी

मुझे दिखाई दिया कि सम्मेलन में तमाम पार्टियों के नेता कह रहे हैं कि अगर हमारे बीच एकता नहीं हुई तो फिर हमारे लिए सर्वाइव करना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। भ्रष्टाचारियों की एकता की बहुत जरूरत है। एक तो भ्रष्टाचारियों की एकता, बेईमानों में सबसे ज्यादा ईमानदारी होती है उसका गुण, ऊपर से राजनीति का सबसे बड़ा गुण है निष्ठुरता, इनके मिश्रण से जो नशा तैयार होता है उसका कोई जवाब नहीं होता। जिसने उसको चखा है वही इसका स्वाद जानता है, बाकी कोई समझ नहीं सकता है। इन नेताओं के मन में क्या चलता है, वे क्या महसूस करते हैं हम आप केवल इसका अंदाजा लगा सकते हैं, उसे समझ नहीं सकते क्योंकि इन सबके मन में है कि जिसने भ्रष्टाचार नहीं किया उसने राजनीति में कुछ नहीं किया। भारतीय जनता पार्टी के एक बड़े नेता का एक किस्सा सुनाता हूं। उनके पास एक वरिष्ठ मंत्री दो मंत्रियों की शिकायत लेकर गए कि ये लोग पैसा बना रहे हैं और उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लग रहा है। उनका जवाब था कि आज की राजनीति ऐसी हो गई है कि राजनीति में आए और पैसा नहीं बनाया तो फिर क्या किया। जो मंत्री शिकायत करने गए थे वह बहुत ईमानदार थे और भाजपा के जिन बड़े नेता से शिकायत करने गए थे वह भी अपने पूरे राजनीतिक जीवन में शुरू से आखिर तक बहुत ईमानदार रहे हैं। एक ईमानदार नेता दूसरे ईमानदार नेता से इस तरह की बात कहे तो उसके लिए इससे बड़ा झटका और कोई हो नहीं सकता। उनकी बात सुनकर मंत्री महोदय को भी बड़ा धक्का लगा। उन्होंने जब यह किस्सा सुनाया तो बहुत दुखी होकर सुनाया।
बनाई नई पार्टी
अब फिर से सम्मेलन पर आते हैं। सम्मेलन में यह सवाल उठा कि एकता तो हो जाएगी, एक पार्टी बन जाएगी लेकिन पार्टी का अध्यक्ष कौन होगा, प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा। अब इस पर बहस चल रही है कि नेता चुनने का आधार क्या होना चाहिए। अरविंद केजरीवाल की ओर से एक सुझाव आया कि जिस पर भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा आरोप हो वह नेता हो या फिर जिसने कम समय में भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके ईजाद किए हैं वह हो। इनोवेशन का जमाना है, स्टार्टअप का जमाना है, स्टार्टअप से हम यूनिकॉर्न बन गए हैं तो हमें नेतृत्व करने का मौका मिलना चाहिए। तभी खड़गे साहब खड़े हुए, उन्होंने कहा कि गांधी परिवार को देख रहे हैं आप, इनके पूरे खानदान में कभी किसी ने नौकरी नहीं की लेकिन हैसियत देखिए, सुल्तानों जैसी है। इनके जीवन में कोई कमी नहीं है। हम तो सबसे लंबे समय से भ्रष्टाचार कर रहे हैं हमारा दावा कैसे कम हो सकता है। हमने ही बाकी दलों को सिखाया है कि कैसे भ्रष्टाचार करते हैं। हमसे सीख कर आप यहां पहुंचे हैं और हमें ही बता रहे हैं कि आप हमसे आगे हैं, यह दावा तो नहीं चलेगा। उनकी बात सुनकर बाकी दलों में भी खुसफुसाहट शुरू हो गई कि भाई हम लोग तो नए हैं। यह बात तो सही है कि ये सबसे पुराने हैं और सबसे बाद में जो आया वो सबसे आगे निकल गया। तो रेस कौन जीतेगा, जो मैराथन में लंबे समय से दौड़ रहा है वह या फिर 100 मीटर की दौड़ में जो सबसे आगे निकल गया वह।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

फिर तय हुआ कि इस तरह से फैसला नहीं होगा, यह सामाजिक न्याय नहीं है। सामाजिक न्याय में सबको समान अवसर मिलना चाहिए। हमारा संविधान भी यही कहता है। जैसे ही संविधान शब्द आया बहुत से लोग खड़े हो गए और कहने लगे बिल्कुल सही… बिल्कुल सही… संविधान के अनुसार ही चुनाव होना चाहिए कि भ्रष्टों का नेता कौन होगा, पीएम पद का उम्मीदवार कौन होगा। यह फैसला केवल और केवल सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है क्योंकि संविधान की व्याख्या करने का अधिकार संविधान ने ही सुप्रीम कोर्ट को ही दिया है। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम या संविधान पीठ से बात नहीं बनेगी बल्कि सारे 34 जजों की पीठ बैठनी चाहिए। उसके सामने दो मुद्दे होने चाहिए, पहला यह कि भ्रष्टाचार मौलिक अधिकारों में आता है या नहीं और दूसरा यह संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में है या नहीं। फिर यह तय हुआ कि यह बात सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही तय कर सकता है। भ्रष्टाचार मौलिक अधिकार और संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में नहीं आता है तो हमें संविधान बदल देना चाहिए। इसके लिए संसद की जरूरत नहीं है। संसद में तो मोदी बैठा है, मोदी कुछ होने नहीं देगा। भ्रष्टाचार के समर्थन में कोई काम मोदी सरकार के रहते तो हो नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट तो अब कानून भी बनाने लगा है तो क्या हर्ज है कि हमारे लिए भी कानून बना देगा। इतनी पार्टियां एक साथ हैं, जनतंत्र में संख्या का महत्व होता है। एक तरफ एक पार्टी है तो दूसरी तरफ इतनी पार्टियां हैं तो सुप्रीम कोर्ट को तो इस पर विचार करना चाहिए कि अगर इतनी पार्टियां कह रही है कि गलत हो रहा है तो इसका मतलब गलत हो रहा है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया देवतुल्य
अगर हम मिलकर आरोप लगाते हैं कि चुनाव आयोग गलत कर रहा है, बेईमानी कर रहा है, सरकार के पक्ष में है तो सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया कि जनतंत्र खतरे में है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे तो उसका उसने रास्ता निकाला कि चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की कमेटी में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को होना चाहिए। जहां चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया होंगे वहां कहां से अत्याचार होगा, कहां से बेईमानी होगी, कहां से पक्षपात होगा। इन सबसे परे हैं चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया। उनको आप देव रूप में स्वीकार कीजिए, उनका कहा हुआ अंतिम सत्य होता है। संविधान में भी तो यही लिखा है, नहीं लिखा है तो सुप्रीम कोर्ट लिखवा देगा। सुप्रीम कोर्ट ने तय कर दिया है कि यह मुद्दे बेसिक स्ट्रक्चर में आते हैं जिसे देश ने मान लिया और संसद चुपचाप देखती रही। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की नियुक्ति हम खुद करेंगे, देश ने मान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का होना बहुत जरूरी है वरना सीबीआई डायरेक्टर कोई बेईमान आ जाएगा, कोई मोदी भक्त आ जाएगा। सीबीआई का डायरेक्टर हम चुनेंगे तो कोई ईमानदार आएगा। ईमानदार तभी आता है जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया उस सेलेक्शन कमेटी में होते हैं। यह तो एक स्थापित सत्य हो गया है। उस सम्मेलन में सबने इस पर सहमति जताई।
सुप्रीम कोर्ट के सभी 34 जजों की बने पीठ
दूसरा मुद्दा यह है कि पीएम पद का उम्मीदवार और पार्टी अध्यक्ष चुनने के लिए हम एक ऐसी कमेटी बनाएं जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी सदस्य हों तो उसको ज्यादा मान्यता मिलेगी। देश की सर्वोच्च अदालत का मुख्य न्यायाधीश अगर इसमें शामिल होगा तो फिर सबको मानना ही पड़ेगा। जो मानने से इन्कार करेगा उसको संविधान विरोधी, जनतंत्र विरोधी, न्याय प्रणाली का विरोधी, न्यायपालिका का विरोधी यह सब साबित कर देंगे। इस तरह से ये दो मुद्दे तय हुए कि सुप्रीम कोर्ट के सारे 34 जज मिलकर यह तय करके बताएं कि भ्रष्टाचार मौलिक अधिकार में आता है कि नहीं, मौलिक अधिकार में आता है तो यह संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में है या नहीं। अगर ये दोनों बातें हैं तो सुप्रीम कोर्ट यह निर्देश दे कि खबरदार सरकार और संसद दोनों ध्यान से सुन लो, कभी भ्रष्टाचार के विरोध में कानून मत बनाना। कानून बनाया तो हम रद्द कर देंगे। जब रद्द कर देंगे तो हमारे फैसले के समर्थन में कितनी पार्टियां होंगी। सत्तारूढ़ पार्टी के विरोध से क्या होता है। ठीक है लोगों ने चुना है तो कोई बात नहीं, हमको तो किसी ने नहीं चुना फिर भी हमारी ताकत देखिए। आप चुने गए हैं लेकिन हमारे मातहत हैं। आप इस गलतफहमी में मत रहिये कि आपको जनता ने चुना है, आपको इतना बड़ा जनादेश मिला है। जो संसद चुनी गई है उसको वही अधिकार प्राप्त होंगे जो सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया कहेगा।
पाकिस्तान से मदद की अपील
सम्मेलन में इस बात पर सहमति बन गई कि सर्वोच्च ताकत सुप्रीम कोर्ट है। जनता जनार्दन, जनादेश, संसद, चुनी हुई सरकार ये सब बेमतलब के शब्द हैं। इनको संविधान में नहीं होना चाहिए। इनको तो असंसदीय घोषित कर देना चाहिए। सम्मेलन में एक स्वर में यह जयघोष हुआ कि बिल्कुल सही… बिल्कुल सही… इन सब शब्दों को असंसदीय घोषित कर दीजिए और संविधान में कहीं इनका जिक्र नहीं होना चाहिए। भ्रष्टाचारियों में फिर चर्चा होने लगी कि अगर मान लीजिए कि सुप्रीम कोर्ट पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का फैसला कर दे तो यह जरूरी नहीं है कि वह सबको पसंद आ जाए तो फिर क्या होगा। फिर हम सुप्रीम कोर्ट पर आरोप लगाएंगे कि वह सरकार से मिल गया है, जरूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कहने पर चल रहा है। फैसला करना था हमारे बारे में और ऐसा फैसला कर रहे हैं जो हमारे ही पक्ष में नहीं है, हमें मंजूर नहीं है। इतना बोलते-बोलते उनमें से अचानक मणिशंकर अय्यर कू दकर मंच पर आ गए। उन्होंने कहा कि हम तो पहले से कह रहे हैं कि पाकिस्तान को बुलाना चाहिए। हम तो गए भी थे पाकिस्तान और पाकिस्तानियों से कहा कि आओ मदद करो। हमारी सरकार एक बार और बनने दीजिए फिर देखिए कि कैसे संविधान को बदल देते हैं। उधर से फिर एक बड़ा काफिला आया सुरक्षाकर्मियों से घिरा हुआ, गाड़ी खुली और उसमें से निकले राहुल गांधी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानियों को आपने बुलाया था तो वह आए क्या। मुझे देखिए कितनी मेहनत कर रहा हूं। विदेश जाना पड़ता है, इच्छा नहीं होती है, मुझे तो पदयात्रा में ही मजा आता है।
अमेरिका-यूरोप बताएंगा सही रास्ता
मैंने अमेरिका और यूरोप से कहा है कि आओ भाई हमको जिताओ। पाकिस्तान तो छोटा सा देश है, छोड़ दीजिए उसे, वह तो वैसे भी लड़ता रहता है। अमेरिका और यूरोप तो विकसित देश हैं। उनके सामने भारत की क्या हैसियत है। ठीक है, मोदी की प्रशंसा हो रही है, होने दीजिए लेकिन इनको आकर भारत में तय करना चाहिए कि डेमोक्रेसी कैसे चलेगी। इनको आकर तय करना चाहिए कि चुनाव में कौन जीतेगा। जनता, मतदाता, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, बैलेट पेपर इन सबका कोई मतलब नहीं है। असली मैंडेट वह है जो अमेरिका और यूरोप तय करेंगे। अमेरिका और यूरोप बताएंगे तो वह सही रास्ता होगा। राहुल गांधी ने कहा कि देखिए, हमारे पिताजी के नाना जवाहरलाल नेहरू जी तो शुरू से मानते थे कि जो कुछ यूरोपियन है वही असल में प्रगतिशील है। वही मॉडर्न है, वही अपनाए जाने लायक है लेकिन हमने क्या किया। उनके जाने के बाद उनकी बात को ध्यान से सुना नहीं, उनकी बात से हट गए। आज नतीजा देखिए क्या हो रहा है, मोदी प्रधानमंत्री बन गया है, 9 साल हो गए हैं। बाहर कुछ भी कहते रहें लेकिन हमलोगों को तो पता है कि 2024 में भी मोदी ही आएगा। रोक तो पाएंगे नहीं तो अब 2029 की तैयारी करते हैं।
29 की तैयारी अभी से
2029 तक हमलोग सुप्रीम कोर्ट और संविधान को ठीक कर लें और आपस में एक हो जाएं तो संसद तो अपने आप बदल जाएगी। संसद क्या है, मैं तो संसद में ज्यादा जाता भी नहीं हूं और जब जाता हूं तो बोल कर आता हूं और बाहर आकर कहता हूं कि बोलने नहीं दिया। हिंदुस्तान में संसद में विपक्ष को बोलने नहीं दिया जाता है। ठीक है, यह अलग बात कि सच्चाई कुछ और है। हम तो प्रधानमंत्री को भी बोलने नहीं देते हैं लेकिन बात तो वही मानी जाएगी जो विपक्ष कह रहा है। सत्तारूढ़ दल का तो निहित स्वार्थ है। विपक्ष तो सारे स्वार्थ से ऊपर उठा हुआ है। जो हालत बना दी है मोदी ने अगर हमने यह बदलाव नहीं किया तो सत्ता में आने का सपना देखना छोड़ दीजिए। तो इस बात पर सहमति बन गई कि 29 की तैयारी अभी से शुरू कर देनी है, 24 के लिए दबाव बनाना है और कहना है कि मोदी नहीं आएगा। हम कहते रहेंगे कि मोदी नहीं आएगा और अगर आ गया तो यह कहेंगे कि बेईमानी हुई है, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के कारण मोदी आया है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन हटा दो, मोदी गायब हो जाएगा। हमको अपनी तैयारी करनी है। एक तो सुप्रीम कोर्ट को साथ लेकर चलना है जिसके लिए वह तैयार भी हो जाता है। हम रात में 12-1 बजे भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवा देते हैं। सरकार खुलवा सकती है क्या, मोदी की इतनी हैसियत है कि रात के 1 बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवा दे। कभी हुआ है, देखा है आपने।
यह सम्मेलन देखकर मेरे मन में बड़ी उत्सुकता हो रही थी कि आखिर आगे क्या होगा लेकिन उसी समय होली के रंग का जो नशा था वह टूट गया। अब अगले साल बताऊंगा कि उसके बाद क्या हुआ। तब तक आप इंतजार कीजिए और होली का मजा लीजिए। बुरा न मानो होली है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ न्यूज पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल के संपादक हैं)


