सरस मेला के जरिए परंपरागत एम्ब्रॉयडरी कला को विदेशों तक पहुंचाया
मात्र 400 रुपये में गोमतीबेन ने स्वरोजगार शुरू किया था। आज इनके हाथ के बने कुर्ते, चणिया-चोली, वॉलपीस, कुशन कवर, रजाई, पर्स, पीलो कवर समेत अन्य चीजों की देश-विदेश में मांग है।

कच्छी हस्तकला के दीवानों की कमी नहीं
सूरत के अडाजण स्थित हनीपार्क ग्राउंड के एसएमसी पार्टी प्लॉट में इन दिनों सरस मेला का आयोजन किया गया है। मेला में कच्छी एम्ब्रॉयडरी वर्क से बनी वस्तुओं का गोमतीबेन ने एक स्टॉल लगाया है। इस स्टॉल पर लोगों की भीड़ उमड़ रही है, कच्छी हस्तकला के दीवानों की यहां कोई कमी नहीं है।
कच्छ जिले के अंतिम छोर भुज तहसील के जिकडी गांव की रहने वाली गोमतीबेन आहिर करीब 15 साल पूर्व स्थानीय परंपरागत कला के व्यवसाय से जुड़ी थीं। पिछड़े क्षेत्र में पहले महिलाओं की शिक्षा को लेकर जो स्थिति थी, उसकी वजह से गोमतीबेन शिक्षा से वंचित रह गईं। इसके बावजूद उनमें कुछ कर गुजरने की दिली तमन्नना थी। इसे लेकर उन्होंने कच्छ की हस्तकला को अपने व्यवसाय का माध्यम बनाया। कच्छ की हस्तकला एम्ब्रॉयडरी का काम शुरू किया।
शुरुआती संघर्षों से नहीं हारी हिम्मत

गोमतीबेन बताती हैं कि कच्छी भरतकाम ने उनके जैसे अन्य सैकड़ों महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराया और वे स्वावलंबी हो गईं। आसपास के 400 महिलाओं को उन्होंने जिले की इस परंपरागत काम से जोड़ा। महिलाओं को इसका प्रशिक्षण भी दिए। महिला कारीगरों को उनके परिश्रम के आधार पर 6 से 7 हजार रुपए महीने की कमाई शुरू हो गईं।
हस्तकला के जरिए रंग-बिरंगे धागे से कपड़े पर सुंदर कारीगरी की कद्र देश-विदेश में होने लगी। विदेशों में बसे भारतीय उनकी कला के दीवाने हैं। वे जब भी स्वदेश आते हैं, गांव आकर उनसे कपड़े आदि की खरीदारी करते हैं।
गोमतीबेन बताती हैं कि उन्होंने व्यवसाय की शुरुआत 10 महिलाओं के साथ की थी। कई तरह की शुरुआती मुश्किलों से उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे जरूरतमंद महिलाएं उनके साथ जुड़ने लगी। व्यवसाय के साथ ही महिलाओं की संख्या बढ़ते-बढ़ते 400 के करीब जा पहुंची।
राज्य सरकार ने ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूह बनाया और आत्मनिर्भर महिला, आत्मनिर्भर ग्राम अंतर्गत योजना से विभिन्न मेला, प्रदर्शनी आदि में स्टॉल उपलब्ध कराया। इससे उनके बनाए सामान के लिए बाजार उपलब्ध हुआ है।(एएमएपी)



