अमेरिका ने भारत-चीन की सीमा विवाद सुलझाने को लेकर अपने समर्थन की बात दोहराई है। अमेरिका का कहना है कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत होनी चाहिए। बता दें कि पूर्वी लद्दाख में कुछ पॉइंट्स पर भारत और चीन की सेना के बीच पिछले 3 साल के टकराव जारी है। भारत का इस मुद्दे पर क्लीयर स्टैंड है कि जब तक सीमा पर शांति स्थापित नहीं हो जाती, चीन के साथ द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते हैं।
LAC पर उकसावे वाली एक्टिविटी कर रहा चीन
स्टेट फॉर साउथ एंड सेंट्र एशिया के असिस्टेंट सेक्रेट्री डोनाल्ड लू ने एजेंसी से बातचीत के दौरान कहा,’चीन के साथ जारी सीमा विवाद पर हमारा रुख स्पष्ट है। दोनों देशों को बातचीत के जरिए इसे हल करना चाहिए। हालांकि इसके आसार बेहद कम दिखाई दे रहे हैं। क्योंकि चीन इस बातचीत को गंभीरता से नहीं ले रहा है। इसके विपरीत हम वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर उकसावे वाली एक्टिविटी को नियमित देख रहे हैं।’
भारत के समर्थन की बात पर अमेरिका कायम

अमेरिकी अधिकारी ने यह भी कहा कि चीन की चुनौती का सामना करते हुए भारत, अमेरिका के साथ खड़े होने पर भरोसा कर सकता है। गलवान संकट के दौरान 2020 में भी अमेरिका अपनी इस बात को लेकर संकल्पित था। इससे पहले एक शीर्ष अमेरिकी थिंक-टैंक सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी ने पिछले महीने एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत-चीन सीमा विवाद की बढ़ती संभावना का अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति पर प्रभाव पड़ेगा।
US की दखलअंदाजी से चिढ़ता है चीन
बता दें कि इससे पहले जब कभी अमेरिका ने भारत-चीन के सीमा विवाद पर अपनी रुचि दिखाई है। चीन ने हमेशा यूएस को इस विवाद से दूर रहने की सलाह दी है। इससे पहले नवंबर 2022 में एक अमेरिकी रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि जब भारत और चीन के बीच सीमा विवाद चल रहा था, उस दौरान ड्रैगन ने चेतावनी दी थी कि अमेरिका दोनों देशों के बीच संबंधों में दखलअंदाजी न करे। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन ने यह रिपोर्ट यूएस कांग्रेस को भेजी थी।
चीन ने अमेरिकी अधिकारियों को दी थी चेतावनी
पेंटागन की रिपोर्ट में कहा गया था कि चीनी सेना भारत को अमेरिका के नजदीक जाने से रोकना चाहती है और इसके लिए वह सीमा (LAC) पर तनाव कम करने की हर संभव कोशिश कर रही है, लेकिन इस बीच अमेरिका की दखलअंदाजी उसे पसंद नहीं आई। उसने अमेरिकी अधिकारियों को इसको लेकर चेतावनी भी दी कि वे भारत के साथ पीआरसी के संबंधों में हस्तक्षेप न करें।
चीन के साथ क्या है सीमा विवाद?
चीन के साथ सीमा विवाद को समझने से पहले थोड़ा भूगोल समझना जरूरी है। चीन के साथ भारत की 3,488 किमी लंबी सीमा लगती है। ये सीमा तीन सेक्टर्स- ईस्टर्न, मिडिल और वेस्टर्न में बंटी हुई है।
ईस्टर्न सेक्टर में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा चीन से लगती है, जो 1346 किमी लंबी है। मिडिल सेक्टर में हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा है, जिसकी लंबाई 545 किमी है। वहीं, वेस्टर्न सेक्टर में लद्दाख आता है, जिसके साथ चीन की 1,597 किमी लंबी सीमा लगती है।
चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी के हिस्से पर अपना दावा करता है। जबकि, लद्दाख का करीब 38 हजार वर्ग किमी का हिस्सा चीन के कब्जे में है। इसके अलावा 2 मार्च 1963 को हुए एक समझौते में पाकिस्तान ने पीओके की 5,180 वर्ग किमी जमीन चीन को दे दी थी।
1956-57 में चीन ने शिन्जियांग से लेकर तिब्बत तक एक हाईवे बनाया था। इस हाईवे की सड़क उसने अक्साई चिन से गुजार दी। उस समय अक्साई चिन भारत के पास ही था। सड़क गुजारने पर तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीनी राष्ट्रपति झोऊ इन लाई को पत्र लिखा। झोऊ ने जवाब देते हुए सीमा विवाद का मुद्दा उठाया और दावा किया कि उसके 13 हजार वर्ग किमी इलाके पर भारत का कब्जा है। झोऊ ने ये भी कहा कि उनका देश 1914 में तय हुई मैकमोहन लाइन को नहीं मानता।
भारत के किन-किन हिस्सों पर चीन के साथ विवाद है?
1. पैंगोंग त्सो झील (लद्दाख)
ये झील 134 किलोमीटर लंबी है, जो हिमालय में करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस झील का 44 किमी क्षेत्र भारत और करीब 90 किमी क्षेत्र चीन में पड़ता है। LAC भी इसी झील से गुजरती है। इस वजह से यहां कन्फ्यूजन बना रहता है और दोनों देशों के बीच यहां विवाद है।
2. गलवान घाटी (लद्दाख)
गलवान घाटी लद्दाख और अक्साई चीन के बीच स्थित है। यहां पर LAC अक्साई चीन को भारत से अलग करती है। ये घाटी चीन के दक्षिणी शिन्जियांग और भारत के लद्दाख तक फैली हुई है। जून 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई थी।
3. डोकलाम (भूटान)
वैसे तो डोकलाम भूटान और चीन का विवाद है, लेकिन ये सिक्किम सीमा के पास पड़ता है। ये एक तरह से ट्राई-जंक्शन है, जहां से चीन, भूटान और भारत नजदीक है। भूटान और चीन दोनों इस इलाके पर अपना दावा करते हैं। भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है। 2017 में करीब ढाई महीने तक डोकलाम पर भारत-चीन के बीच तनाव था।
4. तवांग (अरुणाचल प्रदेश)
अरुणाचल प्रदेश में पड़ने वाले तवांग पर चीन की नजरें हमेशा से रही हैं। तवांग बौद्धों का प्रमुख धर्मस्थल है। इसे एशिया का सबसे बड़ा बौद्ध मठ भी कहा जाता है। चीन तवांग को तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है। 1914 में जो समझौता हुआ था, उसमें तवांग को अरुणाचल का हिस्सा बताया गया था। 1962 की जंग में चीन ने तवांग पर कब्जा कर लिया था, लेकिन युद्धविराम के तहत उसे अपना कब्जा छोड़ना पड़ा था।
5. नाथू ला (सिक्किम)
नाथू ला हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है। ये भारत के सिक्किम और दक्षिणी तिब्बत की चुम्बी घाटी को जोड़ता है। ये 14,200 फीट की ऊंचाई पर है। भारत के लिए ये इसलिए अहम है क्योंकि यहीं से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तीर्थयात्री गुजरते हैं। नाथू ला को लेकर भारत-चीन में कोई विवाद नहीं है। लेकिन यहां भी कभी-कभी भारत-चीन की सेनाओं में झड़पों की खबरें आती रही हैं।(एएमएपी)



