प्रदीप सिंह।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने उद्धव ठाकरे ही नहीं भारत के पूरे विपक्ष को बड़ा निराश किया है। उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला देगा ठाकरे सहित पूरे विपक्ष को शायद उससे मतलब नहीं था, बल्कि मतलब इससे था कि फैसले का नतीजा क्या होता है, उसका प्रभाव क्या होता है। उनको लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा उसका नतीजा यह होगा कि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की सरकार को जाना पड़ेगा। मगर अदालत के फैसले ने यह तय कर दिया है कि जब तक मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल है (अक्टूबर 2024 तक) तब तक यह सरकार बनी रहेगी। उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के बीच जो कुछ हुआ था उससे सरकार के जीवनकाल पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।
मैंने पहले भी बताने की कोशिश की थी कि सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं। उनमें से एक विकल्प यह था कि शिवसेना के शिंदे गुट के जिन 16 विधायकों को अयोग्य घोषित करवाने की कोशिश ठाकरे गुट ने की थी उनके बारे में हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट फैसला विधानसभा स्पीकर पर छोड़ दे। कोर्ट ने ठीक वही किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर हम यह मान लें की डिप्टी स्पीकर के खिलाफ (उस समय स्पीकर नहीं थे) जो अविश्वास प्रस्ताव आया था वह गलत था, हम यह भी मान लें कि एकनाथ शिंदे गुट की ओर से भरत गोदावले को जो चीफ व्हिप नियुक्त किया गया वह भी गलत था, तब भी हमें यह अधिकार नहीं है कि हम यह तय करें कि वे 16 विधायक अयोग्य हैं या नहीं हैं। यह अधिकार सिर्फ और सिर्फ स्पीकर के पास है। स्पीकर से जुड़ी शक्तियों को लेकर नाबाम रेबिया केस में सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्धारित किया था संविधान पीठ के उस फैसले का हवाला देते हुए शिंदे गुट ने कहा था कि उस केस में स्पष्ट रूप से सुप्रीम कोर्ट ने कहा था अगर स्पीकर या डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है तो वह विधायकों के अयोग्यता के मुद्दे पर तब तक फैसला नहीं कर सकता है जब तक कि उसके अविश्वास प्रस्ताव का फैसला नहीं हो जाता।

बड़ी पीठ को भेजा मामला
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने यह माना कि यह बात न्याय संगत नहीं है क्योंकि जो विद्रोही विधायक हैं वह इस प्रावधान का इस्तेमाल अपनी अयोग्यता से बचने के लिए और स्पीकर या डिप्टी स्पीकर को कोई फैसला लेने से रोक सकते हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पीकर की शक्तियों के मामले में नाबाम रेबिया केस का जो फैसला है उसके प्रकाश में हम यह मुद्दा बड़ी संवैधानिक पीठ को भेजते हैं यानी अब सात जजों की संविधान पीठ इसकी सुनवाई करेगी लेकिन उसका इस मामले से कोई मतलब नहीं है। उसका इस मामले पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वह भविष्य के लिए है। भविष्य में अगर कोई ऐसा मुद्दा उठता है तो सात सदस्यीय पीठ जो फैसला देगी उसके अनुसार तय होगा। दूसरी बात, सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑब्जर्वेशन में जो बात कही थी वह अपने फैसले में भी लिखी है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जो ऑब्जर्वेशन थे, खासकर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का कहना था कि क्योंकि उद्धव ठाकरे ने अपनी मर्जी से इस्तीफा दे दिया, सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि गवर्नर के पास इस बात के पर्याप्त आधार नहीं थे कि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उद्धव ठाकरे की सरकार अल्पमत में आ गई है।
गवर्नर का फैसला असंवैधानिक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पार्टी के अंदर के झगड़ों को निपटाने के लिए विश्वास मत का सहारा नहीं लिया जा सकता। जिन विधायकों ने बगावत की उन्होंने कहीं भी गवर्नर को यह लिखकर नहीं दिया कि हम सरकार से अपना समर्थन वापस लेते हैं। उन्होंने सिर्फ यह कहा कि उनके बीच आपस में मतभेद हैं और वे उद्धव ठाकरे पर विश्वास नहीं करते लेकिन सरकार के प्रति अविश्वास कहीं से नहीं था। इसलिए गवर्नर का उद्धव ठाकरे को विश्वास मत हासिल करने के लिए कहना गैर-संवैधानिक था। साथ ही यह भी कहा कि एकनाथ शिंदे गुट ने जो नया चीफ व्हिप नियुक्त किया वह भी संविधान सम्मत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चीफ व्हिप नियुक्त करने का अधिकार पार्टी को है विधायक दल को नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में विस्तार से कहा है कि कोई भी विधायक चुना जाता है जब पार्टी का सिंबल मिलता है, पार्टी टिकट देती है। पार्टी की नीतियों, विचारधारा और पार्टी के नाम पर वह चुनकर आता है। चुने जाने के बाद वह यह नहीं कह सकता है कि अब हमारा पार्टी से कोई ताल्लुक नहीं है, अब हम केवल विधायक दल के सदस्य हैं। पार्टी का हम पर कोई अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पार्टी ही तय करेगी कि चीफ व्हिप कौन होगा। ऐसे नियुक्तियां पार्टी ही कर सकती है।

चुनाव आयोग को फैसला लेने से नहीं रोक सकते
मगर संविधान की दसवीं सूची में जो बात कही गई है जो दल-बदल कानून से संबंधित है उसमें कहीं भी स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि चीफ व्हिप नियुक्त करने का अधिकार पार्टी को है या फिर विधायक दल को। इसमें स्पष्टता नहीं है इसलिए स्पीकर की यह जिम्मेदारी है कि वह किसके द्वारा नियुक्त चीफ व्हिप को स्वीकार करे। इस मामले में स्पीकर ने उस व्यक्ति को चीफ व्हिप के रूप में स्वीकार किया जिसको विधायक दल ने नियुक्त किया था। इसलिए उसका भी कोई असर इस सरकार के स्थायित्व पर नहीं पड़ेगा। दूसरा, चुनाव आयोग के मामले में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से यह दलील दी गई थी कि जब तक विधायकों की अयोग्यता के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता तब तक चुनाव आयोग को सिंबल और पार्टी के नाम पर सुनवाई का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, उसे सुनवाई से कोई रोक नहीं सकता। उसको इसलिए नहीं रोका जा सकता है कि एक दूसरी संवैधानिक संस्था उसी से संबंधित मामले पर सुनवाई कर रही है जिसका किसी दूसरे मामले पर असर पड़ सकता है। सिंबल और पार्टी के नाम पर फैसला करने का अधिकार चुनाव आयोग का है, उसमें सुप्रीम कोर्ट कोई दखल नहीं देगा। हालांकि, चुनाव आयोग के फैसले को उद्धव ठाकरे गुट ने चुनौती दी और एक अलग याचिका दायर की है जिसकी सुनवाई अभी होनी है।
लागू रहेगा चुनाव आयोग का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि यह भी कहा है कि चुनाव आयोग को पार्टी का सिंबल और पार्टी का नाम तय करते समय फैसला केवल विधायकों-सांसदों की संख्या के आधार पर ही नहीं, पार्टी संगठन में किसका बहुमत है, किसके साथ ज्यादा लोग हैं इस पर भी विचार करना चाहिए था। शिवसेना के मामले में चुनाव आयोग का फैसला सही है या गलत इसके बारे में अदालत ने कुछ नहीं कहा। इसका मतलब है कि फिलहाल जो परिस्थिति है उसमें चुनाव आयोग का फैसला लागू रहेगा यानी एकनाथ शिंदे का गुट ही वास्तविक शिवसेना है, उसी को तीर धनुष का चुनाव चिन्ह मिलेगा जब तक कि इसके उलट सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं सुना देता है। इसके अलावा उद्धव ठाकरे के वकीलों ने यह दलील दी थी कि राज्यपाल का एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने का न्योता देना संविधान सम्मत नहीं था, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एकनाथ शिंदे ने विधानसभा में अपना बहुमत साबित किया इसलिए गवर्नर का उनको सरकार बनाने के लिए बुलाने का फैसला बिल्कुल संविधान सम्मत था। इसमें गवर्नर की कोई गलती नहीं थी। अब उद्धव ठाकरे कह रहे हैं कि उनकी नैतिक जीत हुई है क्योंकि उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर उन्होंने इस्तीफा न दिया होता तो हम सरकार की फिर से बहाली के बारे में विचार कर सकते थे लेकिन उद्धव ठाकरे ने बिना फ्लोर टेस्ट का सामना किए अपनी मर्जी से इस्तीफा दिया था इसलिए उनकी सरकार को बहाल नहीं किया जा सकता।
नैतिकता की दुहाई
अब इसी को उद्धव ठाकरे बता रहे हैं कि उन्होंने नैतिकता का सहारा लिया और उसी नैतिकता के सहारे अब एकनाथ शिंदे को इस्तीफा दे देना चाहिए। सवाल यह है कि उस समय आपने किसी नैतिकता के कारण इस्तीफा नहीं दिया था। आपको पता चल गया था कि आप बहुमत खो चुके हैं, आपके ज्यादातर विधायक आपके साथ नहीं हैं, एकनाथ शिंदे के साथ दो तिहाई से अधिक विधायक हैं, फ्लोर टेस्ट होगा तो आपकी सरकार गिर जाएगी। आप विधानसभा का सामना नहीं करना चाहते थे, यह आपकी राजनीतिक अपरिपक्वता थी। आपको यह खेल समझ में नहीं आया। अगर समझ में आया होता तो आप पहले महाराष्ट्र विकास अघाड़ी के दूसरे घटक दलों के साथ विचार-विमर्श करते और उसके बाद फैसला लेते। मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि दोनों घटक दल कांग्रेस और एनसीपी उनको इस्तीफा देने से रोकते और यह कहते कि अगर आपको इस्तीफा देना ही है तो विधानसभा के पटल पर फ्लोर टेस्ट करने के बाद दीजिए जो उद्धव ठाकरे ने नहीं किया। उनको लगा कि इससे मेरी उच्च नैतिकता दिखाई देगी और लोग सड़कों पर मेरे समर्थन में उमड़ पड़ेंगे, बड़ी सहानुभूति मिलेगी लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। सच में लोगों के मन में उनके प्रति सहानुभूति है या नहीं है इसका फैसला तो चुनाव से ही होगा।
अब जनता तय करेगी कि वह किसके साथ है
अगले करीब डेढ़ साल में महाराष्ट्र में तीन चुनाव होने हैं। बीएमसी एवं पूरे प्रदेश के स्थानीय निकायों का चुनाव है, उसके अलावा लोकसभा और फिर विधानसभा का चुनाव है। उससे तय होगा कि उद्धव ठाकरे के साथ कितने लोगों की कितनी सहानुभूति है। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है उसने एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की सरकार को स्थायित्व दिया है। कानूनी रूप से यह सरकार सही है, संवैधानिक रूप से इस सरकार के गठन में कोई गड़बड़ी नहीं है। जो कुछ गड़बड़ी सुप्रीम कोर्ट ने बताई है वह सिर्फ गवर्नर के इस आदेश को कि उद्धव ठाकरे को फ्लोर टेस्ट के लिए कहा गया। उसके बाद जो कुछ भी हुआ वह सब संवैधानिक तरीके से हुआ है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट इसके अलावा और कुछ कर नहीं सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने वही किया है जो संविधान इस बारे में कहता है। मुझे लगता है कि गवर्नर और स्पीकर की भूमिका के दोनों मुद्दे आने वाले समय में बहस का विषय बनेंगे कि गवर्नर का अधिकार क्या होना चाहिए, गवर्नर की सीमा कहां तक होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी है कि गवर्नर को कभी राजनीतिक मामलों में नहीं पड़ना चाहिए। पार्टी के अंदर या गठबंधन के साथियों के बीच झगड़े में उसे नहीं पड़ना चाहिए। जब तक उसके पास पर्याप्त आधार न हो कि सत्तारूढ़ दल बहुमत खो चुका है तब तक उसे विश्वास मत हासिल करने के लिए नहीं कहना चाहिए।
इसके अलावा, विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर को भी कहा है कि आप 16 विधायकों की अयोग्यता के बारे में विचार कीजिए। चीफ व्हिप के मामले में भी उन्हें यह तय करना है कि उस समय पार्टी पर अधिकार किसका था। इससे तय होगा कि चीफ व्हिप की नियुक्ति सही थी या गलत। अगर स्पीकर इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि उस समय पार्टी और विधायक दल दोनों पर अधिकार एकनाथ शिंदे का था तो उन्हें चीफ व्हिप नियुक्त करने का अधिकार था। अयोग्यता के बारे में कहा है कि सभी पक्षों को सुनने के बाद समयबद्ध तरीके से इस मामले पर फैसला सुनाइए। अब स्पीकर का फैसला आएगा और उसके बाद हो सकता है कि उद्धव ठाकरे गुट के पक्ष में फैसला न आए तो वह फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे। फिलहाल के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की सरकार पर राजनीतिक स्थायित्व की मुहर लग चुकी है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ न्यूज पोर्टल एवं यूट्यूब चैनल के संपादक हैं)



