यहां हरियाणा के कृषि मंत्री जे.पी. दलाल का कहना रहा कि हरियाणा के किसानों को फसल विविधीकरण और बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। 550 एकड़ में फैला एशिया का सबसे बड़ा बाजार, हरियाणा के गन्नौर में निर्माणाधीन है, और यह स्पेन और फ्रांस जैसे विकसित देशों के बाजारों से बेहतर होगा। यह बाज़ार किसानों को ब्लॉक और तहसील स्तर पर ग्रेडिंग, पैकेजिंग और छँटाई की सुविधाएँ प्रदान करेगा, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के निर्यात में मदद मिलेगी।
भारत सरकार के कृषि आयुक्त डॉ. पी.के. सिंह ने एक ही क्षेत्र में कई फसल चक्रों को सक्षम करने में प्रौद्योगिकी की भूमिका; किसानों को शिक्षित करना और कृषि रसायनों की धारणा को फिर से तैयार करना समय की मांग है। विषय पर गंभीरता पूर्वक तथ्यपरक प्रकाश डाला । इस दौरान क्रॉपलाइफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के.सी. रवि ने कहा कि चूंकि भारत एक वैश्विक खाद्य केंद्र के रूप में उभर रहा है, इसलिए फसल सुरक्षा क्षेत्र की उचित वृद्धि के लिए एक पूर्वानुमानित, स्थिर और विज्ञान आधारित नीति और नियामक व्यवस्था की आवश्यकता अनिवार्य है। यह किसानों के सामने आने वाली वर्तमान और आगामी चुनौतियों का समाधान करने के लिए ; आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ड्रोन जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों की शुरूआत का मार्ग प्रशस्त करते हुए नवाचार को बढ़ावा देगा।
इसके साथ ही यहां विस्तार से इस बात पर जोर दिया गया कि पौधे या फसल को कीटों से कैसे बचाएं और वे सबसे अधिक कहां आक्रमण करते हैं। यहां बताया गया कि प्रायः भूमिगत कीट पौधे की जड़ों को हानि पहुँचाते है । इसके अन्तर्गत दीमक, भृंग व उनके ग्रब, चीटियाँ एवं इल्लियाँ प्रमुख हैं । ये कभी-कभी समस्त पौधे की जड़ों को ही काट कर नष्ट कर देती हैं । जिसके कारण पौधे पूर्णरूप से सूख जाते हैं मगर यदि जड़ों का कुछ भाग ही काटा गया है तो इसका प्रभाव भी उपज पर पड़ता है क्योंकि पौधे अपनी आवश्यकता के अनुसार भोजन ग्रहण नहीं कर पाते हैं फलस्वरूप कमजोर पड जाते हैं ।

पौधे जब छोटे होते हैं तो उनके तने कोमल होते है तथा उन पर विभिन्न प्रकार के कीटों का प्रकोप होता है कीट उन्हें नष्ट कर देते हैं जैसे सूँडी दीमक, झींगुर, टिड्डा व मक्खियाँ आदि । इसी प्रकार बड़े पौधों के तनों पर ‘तना बेधक’ नामक कीट का प्रकोप होता है । पत्ती को नुकसान पहुँचाने वाले कीट भी कई प्रकार के होते हैं, पत्ती खाने वाले कीट – टिड्डे मृग, घुन व सुंडियां । पत्तियों के अन्दर रहने वाले कीट – मटर का पर्ण सुरंगक, नीबू का पर्ण सुरंगक । पत्तियों को लपेटने वाले कीट – कपास का पत्ती लपेटक, ज्वार का पत्ती लपेटक । पत्तियों का रस चूसने वाले कीट – माह सफेद मक्खी । ये सभी कीट पत्तियों को खाकर या उनका रस चूसकर उन्हें नष्ट कर देते हैं फलस्वरूप पौधों की भोजन बनाने की किया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है एवं पौधों की वृद्धि रुक जाती है एवं अन्ततः उपज पर कुप्रभाव पड़ता है ।
साथ ही यहां बताया गया कि कुछ कीट फलों व फूलों को नुकसान पहुँचाते हैं इनमें से कुछ इन्हें काटकर नष्ट कर देते है जबकि कुछ इनका रस चूसकर उन्हें कमजोर बना देते है जोकि तेज हवा के साथ गिर जाते हैं । इसके फलस्वरूप पैदावार में भारी कमी आ जाती है । उदाहरण – कद्दू का लाल कीट, फलमक्खी आदि । वहीं, जब अनाज व बीजों को संग्रहित कर गोदामों में रखा जाता है एवं इनकी उचित देखभाल न हो तो भण्डारित कीटों का प्रकोप आरम्भ हो जाता है जो कि पूरे वर्ष भर चलता है जिससे अनाज व बीजों की गुणवत्ता पर कुप्रभाव पड़ता है । उदाहरण- दालों की घुन, चावल की घुन, अनाज का पतंगा आदि ।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में यह भी बताया गया कि कुछ कीटों के भृंग (बीटिल्स) एवं घुन (वीविल्स) पौधों की छाल तथा लकड़ी को खाते हैं इनके प्रकोप से इमारती लकड़ी को काफी भारी नुकसान होता है । छाल खाने वाले कीट पौधों के इन भागों को नग्न कर देते हैं जिससे उन पर अन्य प्रकार के कीटों व सूक्ष्मजीवों का प्रकोप होने लगता है । उदाहरण – छाल भक्षी सूँडी, दीमक इत्यादि ।
कीटों द्वारा पौधों को अप्रत्यक्ष हानियां
कीट पौधों को सीधे नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ कई प्रकार की बीमारियों जैसे वायरस व माइकोप्लाजमा जैसे रोगकारकों का संचारण एक पौधे से दूसरे में करते हैं । माह, फुदका, सफेद मक्खी आदि इस प्रकार के कीट । इसी प्रकार ये अन्य सूक्ष्म जीवों द्वारा नुकसान पहुँचाने के लिये अनुकूल वातावरण भी पैदा करते हैं जैसे माहू पत्तियों का रस चूसते समय मधुरस उत्सर्जित करते हैं जो कि पत्तियों पर एकत्रित होता है तथा काली फफूंदी के प्रकोप को बढ़ाता है ।(एएमएपी)


