ओमा द अक्क ने इफ्तार दावत में कीं कुछ सच्ची कड़वी बातें
ओमा द अक्क।
अच्छी बातें जहां भी मिलें वहां से लेनी चाहिए। यह प्रवृत्ति हमें लानी पड़ेगी। अगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं तो हम इस देश में कितनी भी अच्छी बातें कर लें सौहार्द, प्रेम और गंगा-जमुनी तहजीब की- पर वो आएगी नहीं। आज आप सब यहां इकट्ठा हैं और मुझे लगता है आप में 95% मुस्लिम लोग हैं। तारीफ तो आप लोग सुन सुन के अब तक अघा गए होंगे और बहुत बुरी वाली नफरत भी देख देख के अघा गए होंगे। थोड़ी देर हम लोगों को बैठकर समीक्षात्मक दृष्टि से एक बार अध्ययन करना चाहिए। मुझे लगता है दुनिया की हर कौम को, समाज को हर कम्युनिटी को बीच-बीच में अपनी समीक्षा करनी चाहिए कि अगर उसका पतन हो रहा है, उसके खिलाफ लोगों की आवाज बुलंद हो रही है तो सारी कमी हमारे विपक्षी की नहीं होती। बहुत सी कमियां हमारे भीतर व्याप्त होती हैं।
मुझे लगता है कि आज वह समय है कि देश और दुनिया के मुसलमान बैठें और सोचें कि उनसे कहां पर कौन सी गलती होती चली जा रही है जिसकी वजह से एक बहुत बड़ा हिस्सा, बहुत बड़ा तबका उसके खिलाफ हो चुका है, उसके मुखालिफ है। ये बातें सुनने में अजीब लग सकती हैं। मैं यहां से बहुत मीठी बातें कर सकता हूं। आप लोगों को बहुत अच्छा बता सकता हूं। इस्लाम धर्म की महानता गिना सकता हूं। पर, इसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि, यदि मेरे लिए इस्लाम दुनिया का सबसे महान धर्म होता तो मैं सुबह कलमा पढ़ के मुसलमान बन चुका होता। यकीनन मेरे और आपके, दोनों के दृष्टिकोण में कोई तो फर्क है और इस फर्क के साथ हमें इस देश में और इस दुनिया में रहना होगा। समस्या कहीं और छुपी हुई है।
हम मुसलमान हैं, या हम हिंदू हैं, या हम ईसाई हैं, या हम सिख हैं- इन बातों से दुनिया में किसी को कोई बैर नहीं होता। इन बातों से किसी को कोई समस्या नहीं होती कि हम कौन हैं। सारी यहां से शुरू होती है जब हम कहते हैं कि- हमसे बेहतर कोई नहीं है। आपके मुसलमान होने से इस दुनिया को कोई तकलीफ नहीं होती। याद रखिए, आज मुसलमानों के बीच में एक सामान्य बात फैला दी गई है। मेरे पास अक्सर बहुत सारे मुस्लिम ऐसे मीम, ऐसे मैसेज। ऐसे वीडियोज फॉरवर्ड करते हैं जिसमें हिंदू लोग मुसलमानों को मार रहे हैं- या कोई गुरु उकसा रहा है- या कोई गुरु इस्लाम को गालियां दे रहा है- या कोई नेता मुसलमानों के विरुद्ध बोल रहा है। मैं कई बार सोचता हूं कि जवाब में फिर मैं वो सारे वीडियोज निकाल दूं जिसमें कि मुसलमान नेता पूरी दुनिया को गाली दे रहे हैं- मुस्लिम नेता-मौलाना पूरी दुनिया से नाराज घूम रहे हैं- उनको दुनिया में कोई अच्छा नहीं लगता। ऐसी बातें भरी पड़ी हैं।
मुझे नहीं लगता है कि आप में से जितने लोग अभी यहां मेरी प्रशंसा कर रहे थे इस देश में ऐसे दस-बारह मौलाना निकालिए जो ठीक यही कर रहे हों। मैंने तो अपने यहां ये दावत इफ्तार आज नहीं, 20 साल से रखा है। लेकिन और कितने मौलाना हैं, कितने मुस्लिम स्कॉलर हैं, जिनके घर में आप होली मिलने गए थे और कितने हिंदू लोगों को बुलाकर होली मिलन कराया गया था। आप में से कितने लोगों ने रंग गुलाल लगा के ये करने की कोशिश की थी। मुझे नहीं लगता कि आप में से अधिकांश लोगों ने ऐसा किया होगा। बहुत शरीफ मुसलमानों ने अपने घरों के खिड़की-दरवाजे बंद कर लिए होंगे ताकि रंग का छींटा ना पड़े, होली की आवाज ना सुनाई दे। कुछ एक होंगे, जो बाहर निकल के गए होंगे, होली खेली होगी। पर, उनको बाद में कितनी गालियां सुननी पड़ी होंगी अपनी कम्युनिटी में… जरा उनसे जाकर यह भी पूछिएगा।
मैं इसलिए ये बात कह रहा हूं कि पिछले काफी समय से ना केवल मुसलमान, बल्कि यहां का एक बहुत बड़ा वामपंथी धड़ा भी बहुसंख्यक यानी हिन्दुओं के खिलाफ है। पूरी दुनिया में ऐसा है। दुनिया में जहां भी वामपंथी होते हैं… वामपंथी समझते हो ना लेफ्टिस्ट!… जैसे आजकल जो पत्रकार आपको अच्छे लग रहे हैं वो लेफ्टिस्ट हैं। दरअसल भारत के मुसलमानों को अजीत अंजुम अच्छा लगता है, रवीश कुमार अच्छा लगता है, बरखा दत्त अच्छी लगती है। ये सब लोग अच्छे लगते हैं क्योंकि वो इस वक्त मोदी को, बीजेपी सरकार को, हिंदुओं को, हिंदुओं की संकीर्णता को गाली देते हुए आपकी प्रशंसा या आपकी सुरक्षा करते हैं। पर, आप में से किसी को (वो जो गुजर गए) पाकिस्तान के तारिक़ फ़तह शायद ही अच्छे लगते होंगे। लेफ्ट की एक विशिष्टता समझिएगा। लेफ्ट हमेशा अल्पसंख्यकों को, माइनॉरिटी को पकड़ता है, क्योंकि उसके पास अपनी कमजोरी होती है। वह बहुसंख्यक के साथ नहीं है, तभी वह लेफ्ट है। इसलिए वो उस देश के अल्पसंख्यक को पकड़ता है और अल्पसंख्यक को हमेशा सत्ता के खिलाफ बरगलाता रहता है।
बहुत बदकिस्मती की बात है कि भारत में ज्यादातर मुसलमान पढ़ते नहीं है। मैं बीस बाईस सालों से मुसलमानों के संपर्क में हूं। मैंने निरंतर यह कहा कि पढ़ो। तुम्हारी किताब का ही नाम पढ़ो। कुरान के मानी होता है पढ़ना, स्टडी करना। पर तुम नहीं पढ़ते हो। जब तुम नहीं पढ़ते हो तो तुम इतिहास भी नहीं पढ़ते हो। और जब तुम इतिहास नहीं पढ़ते हो, तो तुम अपनी रूट्स नहीं खोज पाते हो, अपनी जड़ नहीं खोज पाते हो। फिर तुम्हें जो बता दिया जाता है तुम उसमें खुश हो जाते हो। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी केवल हिंदुओं के घर नहीं चल रही है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी मुसलमानों के घर भी चल रही है, सिखों के घर भी चल रही है ,ईसाइयों के घर भी चल रही है, दलितों के घर भी चल रही है। सबके घर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी चल रही है।
अच्छी बातें करने का जमाना जा चुका है। अब समझने का जमाना है। यकीनन वो लोग मूर्ख हैं जो किसी बादशाह की कब्र खोद कर उसे सपाट करके उस पे तुलसी का बिरवा लगा देना चाहते हैं। इससे क्या फर्क पड़ने वाला है। ये तो लगभग वही काम हो गया जो उस बादशाह ने खुद किया था। लेकिन उससे बड़े मूर्ख वो हैं जो उस कब्र को बचाने में लगे हुए हैं- जिन्हें ऐसा लगता है कि उस कब्र को बचा लेने से उनका इतिहास सुरक्षित हो जाएगा। इतिहास कब्रों में नहीं रहता। इतिहास इंसानों में रहता है। कब्रों के अंदर इतिहास नहीं रहते। इस्लाम की मूलभूत परंपरा में कब्रों, समाधियों इन सब चीजों का विरोध किया गया था। इसका मतलब क्या था? मोहम्मद कहना क्या चाहते थे? क्या वो अपने लिए एक बड़ा सा मंदिर, एक बड़ा सा मस्तबा नहीं बनवा सकते थे? पिरामिड से ऊंचा उनका एक समाधि स्थल बन सकता था। इतनी ताकत मोहम्मद की अपनी जिंदगी में आ चुकी थी। नहीं बनवाया तो क्यों? इसलिए क्योंकि मोहम्मद जानते थे कि इस्लाम समाधियों में, बुतों में, कब्रों में, महलों में, दरवाजों में, शिलालेखों में नहीं होगा। इस्लाम अगर जिंदा रहेगा तो वो किसी मुसलमान के किरदार के अंदर जिंदा रहेगा।
मगर ऐसा होता नहीं है। निजामुद्दीन औलिया ने मोहब्बत, प्रेम-सहिष्णुता, सद्भाव की भावना का प्रचार किया। उसे आपने स्वीकार नहीं किया। पर उनकी मजार पर चादर ले ले के आप हर बृहस्पतिवार, हर जुमरात, हर जुम्मा, हर शनिवार, हर खड़े हैं। सवाल किसी बुतपरस्ती, किसी मजारपरस्ती का नहीं है। मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं। मैं तो खुद बुतपरस्त हूं। मेरा इन सब से कोई मुखालिफत नहीं। मेरी मुखालिफत इस बात से है कि ठीक है, आपका अकीदा है, आपको अच्छा लगता है। आप ले जाइए गुलाब और चढ़ा के आ जाइए… निजामुद्दीन के दरवाजे पर… अमीर खुसरो के दरवाजे पर… किसी भी बाबा के, पीर के दरवाजे पर… कोई फर्क नहीं पड़ता। जाइए बोसा ले आइए जाकर के खाना-ए काबे में लगे हुए वो संग असद का। पर इससे क्या होना है? दरअसल जब तक आपके किरदार के भीतर वो मूल बातें नहीं आती हैं जिससे कि इस्लाम दुनिया में इतना फैला… या, एक हिंदू के भीतर जब तक वो बातें उसके चरित्र में नहीं उतरती हैं जिससे राम दुनिया में पूजनीय बने या कृष्ण दुनिया में पूजनीय बने… या एक ईसाई के अंदर नहीं आतीं जिससे ईसा पूरी दुनिया में इतने प्यारे, पूजनीय बने… तब तक किसी समुदाय के होने का अर्थ वास्तव में केवल और केवल दुष्टों की एक बड़ी फौज खड़ा करना होता है। याद रखिएगा आप में से तमाम लोग केवल यह रोज़े रख के, इफ्तार मना करके और दावत इफ्तार करने के बाद बहुत सारी गालियां उन लोगों को देते हो जो आपके खिलाफ बोलते हैं… या चुगलियां करते हुए निकल जाएंगे… या उन लोगों से प्रभावित हो जाएंगे जो बिना मतलब आपको सांत्वना दे रहे हैं… ऐसा है तो आप अपना नुकसान करते जा रहे हैं।
इस वक्त मेरे सामने मुसलमान हैं, इसलिए मैं सिर्फ मुसलमानों से बातें कर रहा हूं। भारत में वो तथाकथित संघीय विचारधारा या संकीर्ण विचारधारा आपकी दुश्मन हो सकती है। पाकिस्तान में कौन सा आरएसएस काम करता है? अफगानिस्तान में कौन सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा है? सूडान में कौन सा मोदी है? इराक में कौन कर रहा है? ईरान में कौन है? दुनिया में शायद 50 से कुछ ज्यादा देश इस्लामिक हो चुके हैं। उन देशों में कौन नरेंद्र मोदी जाकर के बैठा है, कौन योगी आदित्यनाथ बैठा है, कौन सा आरएसएस काम कर रहा है? अरब के कुछ बहुत अमीर, ओबाश और अय्याश देशों को छोड़ दीजिए। उसके बाहर कौन सा ऐसा देश है जहां आपस में एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का कत्ल नहीं कर रहा है- उसकी हत्या नहीं कर रहा है- उसे मार नहीं रहा है। इसकी समस्या कहां छुपी हुई है यह आप खोजेंगे। इसे मैं खोजूंगा तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊंगा। आपको ऐसा लगेगा कि यह तो काफिर है- यह तो हमें बरगला रहा है- तो बेहतर है इसे आप ही खोजिए कि किस समस्या के चलते आपको पूरी दुनिया में जिल्लत, बेइज्जती का सामना करना पड़ रहा है।
आपको पता है आपको यूरोप और अमेरिका का वीजा लेना पड़े को तो कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे। आपकी टोपी और दाढ़ी कितनी बड़ी समस्या बन जाएगी। ऐसा हमेशा से तो नहीं था अचानक से कैसे हो गया? सन 2000 में बीबीसी अपने सर्वे में दुनिया का सबसे सफल और सबसे ताकतवर इतिहास का व्यक्ति चुनता है प्रॉफेट मोहम्मद को। सन 2000 से 2015-16 और फिर 2023-24 आते-आते यूरोप, अमेरिका आपको वीजा नहीं देता है। क्या हो गया इतने दिनों के अंदर? इस समस्या को समझिएगा। यह समस्या हिंदू में भी है, मुसलमान में भी है, सिख में भी है और ईसाई में भी है। मैं सब में एक बराबर समझता हूं।
हमारे बुत परस्त होने से, हमारे आतिश परस्त होने से, हमारे मजार परस्त होने से या हमारे तथाकथित खुदा परस्त होने से किसी को कोई तकलीफ नहीं होती है। तकलीफ शुरू तब होती है जब बहार भाई ये सोचते हैं कि पूरी दुनिया उस निराकार खुदा को मानने लगे, या जब ओमा द अक्क सोचते हैं कि पूरी दुनिया मेरे भगवान राम को मानने लगे… सारी समस्या वहां से शुरू होती है। दूसरे को अपने जैसा बनाने की धुन इस दुनिया में हमें एक दूसरे का शत्रु बनाती है। तुम्हारा बच्चा तुम्हारी तरह नहीं होता, वो तुम्हारी बात नहीं मानता है और तुम चाहते हो पूरा मुल्क तुम्हारी बात मान ले। ना केवल मुल्क बल्कि पूरी दुनिया तुम्हारी बात मान ले। ये घमंड शायद अच्छा भी लगेगा। यकीनन अच्छा लगेगा। हो सकता है तुम में से कोई उठ के कह दे कि हमारे तो रसूल की सुन्नत है उन्होंने तो खुद इतनी बड़ी जंग लड़ी थी। तो मेरा सवाल होगा कि क्या तुम्हारा किरदार तुम्हारे रसूल की तरह है? क्या तुम दौलत से दूर हो? क्या तुम खुशामद से दूर हो? क्या तुम तारीफों से फूलते नहीं हो? क्या तुम बड़े-बड़े लोगों की चापलूसी नहीं करते हो? क्या तुम्हारा चरित्र तुम्हारे सर के ऊपर बोलता रहता है- कि तुम्हारी लालच तुम्हारी नाक पर चढ़ी रहती है- कि तुम्हारी वासनाएं तुम्हारे सर पर बैठी रहती हैं। किस चीज पर तुम तुलना कर रहे हो क्योंकि तुम्हारा चेहरा देख के तो बार-बार ऐसा ही लगेगा कि इस्लाम यकीनन औरंगजेब की तरह के लोगों ने फैलाया होगा जिनके हाथ में तलवारें थीं, जिन्होंने अपने बाप का कत्ल किया, अपनी बहनों का कत्ल किया, अपने भाइयों का कत्ल किया… और फिर भी टोपी बुन करके अपने को औलिया बताता रहा। इतिहास यही है तुम इसको बदल नहीं सकते हो। लेकिन खुश होने की जगह नहीं है यहां किसी हिंदू को- क्योंकि यही काम बिंबसार भी कर रहा था- यही काम समुद्रगुप्त भी कर रहा था- अजात शत्रु भी कर रहा था… यह काम तो चलता ही रहा है। सत्ताओं में यही होता है। हमेशा एक सत्ता दूसरी सत्ता को निगलने के लिए यही करती है। सत्ताओं में कोई बाप, बेटा, भाई, बहन नहीं होता। मैंने पिछले दिनों कहा भी था कि अकृतज्ञता, एहसान फरामोशी सियासतदान की पहली निशानी होती है। तुम सियासत नहीं कर सकते हो जब तक तुम में एहसान फरामोशी ना आ जाए।
तुम्हारा आदर्श कोई महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी या औरंगजेब या अकबर नहीं है। यकीन करना तुम्हारे हिसाब से, इस्लाम के हिसाब से तुम्हारा आदर्श केवल और केवल एक ही हो सकता है- वो है मोहम्मद पैगंबर… और कोई नहीं। उसके बाद के लोग तुम्हारे लिए मोहब्बत करने के लिए हैं। तुम रूमी से मोहब्बत कर सकते हो। तुम मंसूर से मोहब्बत कर सकते हो। तुम निजामुद्दीन से मोहब्बत कर सकते हो। तुम गालिब से मोहब्बत कर सकते हो। तुम जिससे मन करे उससे मोहब्बत कर सकते हो। गांधी से मोहब्बत कर सकते हो- किसी से भी कर सकते हो। और जब तुम अपने प्रॉफिट, अपने पैगंबर के किरदार को अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश करोगे- मान लो आज से शुरू करोगे- एक साल बाद तुम देखोगे कि तुम्हारे दुश्मन कम हो गए हैं। इसलिए नहीं कि अब लोग तुमसे अदावत नहीं रखते, बल्कि इसलिए कि अब तुम्हें दूसरों की दुश्मनी से खौफ नहीं लगता है। अब तुम्हें अपने खुदा की जात पर इतना यकीन है कि वो तुम्हें हर मुसीबत से बचा लेगा। तुम्हारा डर तुम्हारे दुश्मन बढ़ाता चला जाता है और तुम्हारी हिम्मत तुम्हारे दुश्मनों को घटाती चली जाती है। याद रखना जिसके अंदर हिम्मत होगी उसके दुश्मन घटते चले जाएंगे। जिसके अंदर खौफ होगा उसके दुश्मन बढ़ते चले जाएंगे।
भारत, पाकिस्तान और इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत बड़ी समस्या है कि एक लंबे समय से मुसलमानों को कुछ चंद मुसलमानों ने खौफजदा करके रखा है। डरा करके रखा है। जैसे उनके ऊपर बड़ी कयामत लगी हुई है। सारी दुनिया उनके खिलाफ नेजे (भाले) लेकर खड़ी है। तुम किसी कर्बला में नहीं खड़े हो- इसको अपने दिमाग में रख लेना। तुम एक अच्छी दुनिया में रहते हो। यकीनन ये दुनिया बहुत खराब है लेकिन वो फिर सिर्फ तुम्हारे लिए खराब नहीं है, वो फिर मेरे लिए भी खराब है। वो हर किसी के लिए खराब है। वायु प्रदूषण तुम्हारे लिए ही नहीं है मेरे लिए भी है। वातावरण में गर्मी बढ़ रही है तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी। महंगाई तुम्हारे लिए भी है और मेरे लिए भी। बीमारी तुम्हारे लिए भी, मेरे लिए भी। दुनिया में जो कुछ खराब है वो सब हम में बंटा हुआ है। लेकिन साथ ही साथ इसके दुनिया में जो कुछ अच्छा है वो भी अभी हम में, तुम में बटा हुआ है। ये खत्म नहीं हुआ है भारत के अंदर।
यदि यहां का बहुसंख्यक औरंगजेब से नफरत करता है तो ये नहीं सोचो कि आज नफरत करता है। हम लोग उस समय स्कूल में पढ़ते थे। यहां मौजूद मुमताज भी स्कूल में पढ़ा हुआ है, बहार भाई भी स्कूल में पढ़े हुए हैं। हम लोग के स्कूल में भी औरंगजेब खराब ही बादशाह था। इतिहास में कभी अच्छा बादशाह नहीं बताया गया था। लेकिन उस जमाने में भी हम मोहम्मद रफी की तस्वीर अपने घर में लगाते थे। दिलीप कुमार की लगाते थे। मिर्जा गालिब के ऊपर ऐसे ही हिंदुस्तान फिदा था। मीर तकी मीर को खुदा-ए सुखन यही हिंदुस्तान कह रहा था। अमीर खुसरो के गाने गा करके यही हिंदुस्तान बड़ा हो रहा था। यह मत समझो कि इस देश का हिंदू मुसलमानों से नफरत करता है। लेकिन हां, यकीन करो कि हम में से जितने भी लोग हैं उन सबको जब एक समुदाय बनाकर, एक कम्युनिटी बनाकर रख दिया जाता है, तब हम अपने इतिहास की तरफ देखने लगते हैं। और, इतिहास में दंश होते हैं- चोट होती है- तकलीफें होती है। फिर हम औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर निकालने लगते हैं, ये एक समस्या होती है।
औरंगजेब का गुस्सा मुमताज पर ना निकले इसके लिए एक काम मुमताज को भी करना पड़ता है कि उसे अपना किरदार औरंगजेब के किरदार से जोड़कर नहीं दिखाना होता है। फिर उसे अपना किरदार किसी गालिब से, किसी मीर से, किसी खुसरो से… या फिर और ऊंचा उठ सके तो अपने पैगंबर से जोड़ के दिखाना पड़ता है। जिनके पास सबके लिए मोहब्बत थी। जिन्होंने यह कहा कि मेरा खुदा रहमतुल आलमीन है, मेरा खुदा पूरी दुनिया के लिए रहमत है। यह जबानी जमा खर्च नहीं है कि तुमने मुंह से बोल दिया? क्या तुम इस पर यकीन करते हो कि तुम्हारा खुदा पूरी दुनिया पर रहमत करता है… और यदि ऐसा करता है तो उसकी रहमत से ही तो सब होंगे- वो भी जो उसमें यकीन नहीं करते हैं।
एक पुरानी सूफियों की कहानी है। मूसा ने अल्लाह की तरफ देखा और कहा कोई हुक्म दो, जो मैं पूरा करता रहूं, बार-बार पूरा करता रहूं। अल्लाह ने कहा कुछ नहीं लोगों को खाना खिला देना। इतना किया करो वो सब जो मेरे बंदे हैं उनको तू खाना खिलाया कर। मूसा ने कहा ठीक है। मैं सबको बुलाऊंगा और खाना खिलाऊंगा। वह सबको बुलाते खाने के लिए। मूसा यहूदी थे। वो लोगों को बुलाते, प्रार्थना करने को कहते और फिर सबको भोजन देते। एक दिन एक बूढ़ा आया। उसने आकर के कहा- खाना दो। मूसा ने कहा कि ठीक है। आओ प्रार्थना करो और खाना खाओ। उसने कहा- नहीं, मैं तुम्हारे ईश्वर में यकीन नहीं करता हूं। मेरा यकीन तेरे खुदा में नहीं है। इस पर मूसा ने कहा कि तब तो तुम काफिर हो। तुम्हें कैसे मैं खाना दे दूं। मूसा ने उसे लौटा दिया। जब मूसा फिर गए तूर पर अल्लाह से बात करने के लिए। मूसा कलीमुल्लाह थे, कलाम करते थे। अल्लाह से बात करने के लिए गए। मूसा ने सवाल पूछा- अल्लाह ने कोई जवाब नहीं दिया। सिलसिला चलता रहा। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन। जब एक हफ्ते तक कोई जवाब ना आया तो मूसा को लगा कि लगता है मुझसे कोई गुनाह हो गया है। अब उन्होंने रोना शुरू किया। पुकारना शुरू किया। मेरी गलती माफ करो, मुझे बताओ क्या हुआ? तो फिर आवाज आई कि मैंने तुझे कहा था सबको खाना खिलाने के लिए, तूने नहीं खिलाया। तो उसने कहा कि मैंने तो सबको खिलाया। बस एक को नहीं खिलाया था जो तुझ में यकीन नहीं करता है। अल्लाह ने मूसा से कहा कि क्या मुझे नहीं पता कि वो मुझ में यकीन नहीं करता, लेकिन मैं तो उसे बरसों से खिला रहा हूँ। तूने ये ठेकेदारी कैसे ले ली। सवाल ये है।
दुनिया के सारे धर्म दरअसल इसलिए महान हुए क्योंकि उन्होंने सबको अपनी तरफ बुलाया- सबको छांव देने की कोशिश की- सबको आश्रय देने की कोशिश की। और यही किरदार अगर किसी हिंदू में, किसी मुसलमान में, किसी सिख में या किसी ईसाई में पैदा हो जाता है तो लोग उसकी तरफ घूमते हैं। लोग उसकी इज्जत करते हैं। और फिर उसके सदके वो उसके दीन की, उसके मजहब की भी इज्जत करने लगते हैं। यह रुकने वाला सिलसिला नहीं होता है। अगर तुम एक बहुत अच्छे मुसलमान से मिलते हो, जो सच में बहुत अच्छा है और दुनिया के लिए उसके दिल में मोहब्बत है इखलाक है, तो तुम किसी भी धर्म के कितने भी कट्टर हो, तुमको मुश्किल होती है कि तुम इस्लाम के बारे में बुरा बोल सको। तब तुम्हें लगता है कि इस प्यारे आदमी के दिल में चोट लग जाएगी। लेकिन जब तुम बड़ी कट्टरता के साथ, बड़ी कठोरता के साथ अपने धर्म का प्रचार करते हो तो ठीक उस समय मेरे भीतर की भी कट्टरता उभर आती है और मैं तुम्हारे खिलाफ बोलने लगता हूं।
मैं बहुत बड़ा भाषण नहीं दे रहा हूं, छोटी सी बात कह रहा हूं। यह केवल एक सुझाव है आप सबके लिए कि आप इस देश में रह रहे हैं, इस दुनिया में रह रहे हैं। मैं बरसों से सुनता चला आ रहा हूं कि दुनिया मुसलमानों की दुश्मन है। मैं यह मानता हूं कि तुम्हारा दुश्मन वही है जिसे तुम अपना दुश्मन मानते हो। अगर तुमने अपने दुश्मन मानने बंद कर दिए तो लोग तुम्हारे दोस्त बन जाते हैं। तो तुम्हें पहले इस दुनिया से अपनी दुश्मनी खत्म करनी पड़ेगी। तुम्हें यह मानना बंद करना होगा कि लोग तुम्हारे हमारे दुश्मन हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। जो जिस तरह से इस दुनिया को देखता है, ये दुनिया ठीक उसी तरह से बदल जाती है। सूफियों में भी ऐसा कहते हैं। शेख सादी ने कहा था कि ये दुनिया आईने खाने की तरह है, जहां हर तरफ शीशा लगा हुआ है। तुम इसमें जैसा चेहरा बनाओगे, हजारों चेहरे तुम्हारे उसमें से दिखाई देने लगेंगे। वो कहानी सुनी पढ़ी होगी कि कुत्ता शीशे के घर में घुस गया जिसमें लाखों शीशे लगे थे। कुत्ता पागल होकर मर गया क्योंकि वह हर कुत्ते पर झपटना चाहता था। जब वह एक कुत्ते की तरह झपटता तो 100 उसकी तरह झपटते। लेकिन दरअसल वहां उसके अलावा कोई दूसरा कुत्ता था ही नहीं। इस बात को दिमाग में रखना कि क्या तुम उसी आईने खाने में फंसे हुए कुत्ते की तरह रहना चाहते हो जो दूसरों का मुंह नोचने के बहाने दरअसल अपना ही मुंह नोचता चला जा रहा है… या तुम इंसान बन के रहना चाहते हो जो हर एक चेहरे के अंदर छुपी हुई मोहब्बत को पहचानता है। वो जानता है कि सबकी आंखों के भीतर जो रूह चमक रही है उस रूह को किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारे खुदा ने ही ताकत बक्शी हुई है।
(लेखक आध्यात्मिक गुरु और जाने माने साहित्यकार हैं। 23 मार्च को अपने बनारस आश्रम में उन्होंने रोज़ा इफ्तार की दावत दी थी। उसमें रोज़ादारों को दिए उद्बोधन के कुछ सम्पादित अंश यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं)