आपका अखबार ब्यूरो।

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को लेकर लंबी और विस्तृत सुनवाई हुई। यह सुनवाई मुख्य रूप से इस मुद्दे पर केंद्रित रही कि मतदाता सूची में आधार और राशन कार्ड को पहचान के दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार न करने का चुनाव आयोग का निर्णय उचित है या नहीं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ताओं और चुनाव आयोग, दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं।

चुनाव आयोग की ओर से अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि अभी केवल ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हुई है और इस पर दावा-आपत्तियां आमंत्रित की गई हैं। उन्होंने माना कि इतनी बड़ी प्रक्रिया में कुछ खामियां होना स्वाभाविक है, लेकिन इन्हें सुधारने के लिए तंत्र मौजूद है। आयोग का कहना था कि आधार और राशन कार्ड को निर्णायक पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा, क्योंकि ये दस्तावेज़ नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं माने जा सकते। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सही माना और स्पष्ट किया कि ऐसे दस्तावेजों को निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और शादान फरासत पेश हुए। उन्होंने एसआईआर के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए। सिब्बल ने आरोप लगाया कि बिहार में इस प्रक्रिया के तहत लगभग 65 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। उनके अनुसार, कई ऐसे लोग जिन्हें जीवित होना चाहिए, उन्हें सूची में मृत दिखाया गया है और इसके विपरीत, कई मृत व्यक्तियों के नाम अब भी सूची में मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बीएलओ (BLO) ने सही तरीके से काम नहीं किया, जिसके चलते मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल खड़े होते हैं।

सुनवाई के दौरान सिब्बल ने यह भी मुद्दा उठाया कि नए मतदाता के पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म 6 में जन्म तिथि के प्रमाण के लिए आधार कार्ड को सूची में शामिल किया गया है, लेकिन एसआईआर के दौरान आयोग इसे मान्य नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को भारतीय नागरिक बताता है तो उसकी नागरिकता सिद्ध करने का दायित्व चुनाव आयोग पर है, न कि उस व्यक्ति पर। सरकार या आयोग को ही संदेह की स्थिति में इसे प्रमाणित करना चाहिए।

लंच ब्रेक के बाद सुनवाई फिर शुरू हुई, जिसमें सिब्बल ने एसआईआर की पूरी प्रक्रिया को कानून के विरुद्ध बताया। उन्होंने कहा कि बिहार के अधिकांश लोगों के पास वे दस्तावेज़ नहीं हैं, जो आयोग ने मांगे हैं। केवल 3.06% लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र, 2.7% के पास पासपोर्ट और 14.71% के पास मैट्रिक का सर्टिफिकेट है। ऐसे में जिन लोगों के पास केवल आधार या राशन कार्ड हैं, उन्हें एसआईआर में न मानना अनुचित है।

इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि बिहार भारत का ही हिस्सा है, इसलिए यह समस्या अन्य राज्यों में भी हो सकती है। आयोग का कहना था कि दस्तावेज़ों की मांग का उद्देश्य सूची को शुद्ध करना है।

चुनावी विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी अदालत में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वर्ष 2003 में बिहार में जो पुनरीक्षण हुआ था, वह ‘गहन पुनरीक्षण’ था, न कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’। तब न तो फॉर्म भरने की अनिवार्यता थी और न ही दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की बाध्यता। चुनाव कर्मी घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करते थे। उन्होंने कहा कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ में दो नई बातें जोड़ी गईं— फॉर्म भरने की आवश्यकता और नागरिकता का अनुमान— जो कि कानूनी रूप से गलत है।

यादव ने आयोग की मंशा पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह भारत के इतिहास में पहली बार है, जब ड्राफ्ट मतदाता सूची में कोई नया नाम नहीं जोड़ा गया, बल्कि 65 लाख नाम हटाए गए हैं। पहले के पुनरीक्षणों में न केवल पुराने डेटा का संशोधन होता था, बल्कि नए मतदाताओं को भी जोड़ा जाता था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस बार पूरी प्रक्रिया विलोपन पर केंद्रित रही, न कि संशोधन पर।

इस पर आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची का ‘शुद्धिकरण’ है, ताकि गलत या फर्जी प्रविष्टियां हटाई जा सकें। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस प्रक्रिया को रोकने के बजाय इसमें सहयोग किया जाए।

सुनवाई के अंत में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि योगेंद्र यादव ने कई तथ्यात्मक मुद्दे उठाए हैं, जिन पर आयोग को जवाब देना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आयोग ने आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए हैं, तो यह अच्छी बात है, अन्यथा अदालत इस पर विचार करेगी। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई बुधवार को तय की है।