डॉ. मयंक चतुर्वेदी

देश की अर्थव्यवस्था पर चोट करने की कोशिश अब किसी एक क्षेत्र तक सिमटी नहीं रहीं। कभी जम्मू-कश्मीर तक सीमित दिखने वाला नकली मुद्रा नेटवर्क अब देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनी जड़ें फैला रहा है। चिंताजनक यह है कि हाल के वर्षों में पकड़े गए कई मामलों में ऐसे लोग सामने आए हैं जो अधिकांश मजहबी या शैक्षणिक संस्थानों खासतौर पर मदरसों से जुड़े हुए हैं।

खंडवा से उठती चेतावनी

Courtesy: Vocal TV

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले का ताजा मामला इसी चिंता की जड़ को उजागर करता है। पेठिया गांव के इमामबाड़े में इमाम जुबेर अंसारी के कमरे से जब पुलिस ने करीब 19.87 लाख रुपये के नकली नोट बरामद किए, तो यह सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रही। यह उस सच्चाई का आइना बन गई है जिसमें कुछ लोग मजहब और शिक्षा की आड़ में राष्ट्र की आर्थिक संरचना को खोखला करने में लगे हैं। जुबेर मदरसे में शिक्षक था, इमाम था, यानी समाज में भरोसे और आस्था का प्रतीक लेकिन उसने उसी भरोसे को जालसाजी की छाया में बदल दिया।

यहां जुबेर का नेटवर्क भी बहुत कुछ कहता है, मालेगांव, बुरहानपुर और खंडवा के बीच फैले इस गिरोह की परतें यह दिखाती हैं कि नकली मुद्रा निर्माण अब संगठित आर्थिक अपराध के रूप में विकसित हो चुका है। पुलिस और ग्रामीणों की सतर्कता ने इस नेटवर्क का पर्दाफाश किया, वस्‍तुत: यह राहत की बात है; किंतु यह भी उतना ही सच है कि यदि यह नेटवर्क कुछ महीनों और सक्रिय रहता तो लाखों की फर्जी करेंसी बाजार में खप चुकी होती।

श्रावस्ती और प्रयागराज में मदरसे बने छपाईघर

उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती और प्रयागराज से इससे पहले सामने आए मामले स्थिति की भयावहता को और गहरा करते हैं। श्रावस्ती में पकड़े गए मदरसा संचालक मुबारक अली उर्फ नूरी और उसकी पत्नियों का गिरोह यूट्यूब से तकनीक सीखकर नोट छापने का धंधा चला रहा था। वहीं प्रयागराज के अतरसुइया इलाके में जिस मदरसे में नकली नोट छपते पाए गए, उसका कार्यवाहक प्रिंसिपल खुद इस रैकेट में शामिल था।

मौलवी तफसीरुल आरीफीन और उसके साथियों के पास से पुलिस ने 1.30 लाख रुपये के नकली नोट, प्रिंटर, अर्धनिर्मित करेंसी और अन्य उपकरण बरामद किए। खास बात यह थी कि ये लोग केवल रुपए 100 के नोट छाप रहे थे ताकि उन्हें बाजार में आसानी से खपाया जा सके। यह पूरी प्रक्रिया एक सुनियोजित आर्थिक अपराध की तरह दिखती है, जहां अपराधी जानते हैं कि कौन सा मूल्यवर्ग पकड़ में कम आएगा, किस रास्ते से नकदी बाजार में उतारी जा सकती है, और कैसे डिजिटल युग में जालसाजी को ‘घरेलू उत्पादन’ जैसा रूप दिया जा सकता है।

गुजरात, महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक फैला नेटवर्क

सितंबर 2025 में गुजरात के बनासकांठा जिले के महादेविया गांव में खेत के भीतर नकली नोटों की फैक्ट्री पकड़ी गई। वहीं महाराष्ट्र, हरियाणा, तेलंगाना, तमिलनाडु और बिहार में राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने फरवरी 2025 में एक साथ 11 ठिकानों पर छापेमारी कर सात मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया। यह कार्रवाई बताती है कि यह नेटवर्क किसी राज्य या भाषा की सीमा में बंधा नहीं है, यह तो पूरे देश में फैले बहुस्तरीय गिरोह का हिस्सा है।

डीआरआई की जांच से सामने आया कि अब ये गिरोह भारतीय मुद्रा के लिए प्रयुक्त “सिक्योरिटी पेपर” तक आयात करने लगे हैं। यानी अब नकली नोट बनाना केवल प्रिंटर और स्कैनर का खेल नहीं रहा है, यह अंतरराष्ट्रीय अवैध व्यापार का हिस्सा बन चुका है। जब गाजीपुर, ठाणे, भिवानी, कोल्हापुर, बेलगाम, पश्चिमी गोदावरी और खगड़िया जैसे शहरों में नकली नोट छपते पाए जाएं, तो यह किसी छिटपुट अपराध की बात नहीं रह जाती। स्‍वभाविक तौर पर यह एक सुनियोजित आंतरिक तोड़फोड़ की रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है।

जिस पर कि लोकसभा में सामने आए आंकड़े जो इस साल पिछले वित्त वर्ष 2024–25 के संदर्भ में रखे गए में बताया गया है कि कुल 2.17 लाख नकली नोट पकड़े गए, जिनमें सर्वाधिक ₹500 मूल्यवर्ग के नोट (1,17,722) थे। वस्‍तुत: यह जानकारी ये संकेत देती है कि नकली मुद्रा का कारोबार अब नए स्वरूप में और नई तकनीक से सक्रिय है।सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक लगातार सुरक्षा विशेषताओं को अद्यतन कर रहे हैं, लेकिन जालसाज़ भी उतनी ही तेजी से नए रास्ते खोज रहे हैं।

मदरसे और इमामों की भूमिका पर प्रश्न

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि ऐसे अपराधों में मजहबी शिक्षा संस्थान और उनसे जुड़े व्यक्ति क्यों बार-बार सामने आ रहे हैं? आप समझें कि यह पूरे समुदाय पर आरोप लगाने का विषय नहीं है, फिर भी आज समाज विशेष के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता अवश्य दिखती है। मदरसे शिक्षा के केंद्र हैं; जहाँ बच्चों को नैतिकता, शुचिता और मजहबी ज्ञान दिया जाता है। यदि इन्हीं जगहों से आर्थिक अपराधों की जड़ें पनपने लगें तब फिर सत्‍य आचरण की उम्‍मीद किससे की जाएगी, यह आज एक बड़ा प्रश्‍न उभरता है?

राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से खतरा

पिछले एक दशक में पाकिस्तान की एजेंसी आईएसआई द्वारा भारत में नकली नोटों की तस्करी के प्रमाण मिलते रहे हैं। अब जब देश के भीतर ही ऐसे नेटवर्क तैयार हो रहे हैं, तो यह संकेत है कि दुश्मन की रणनीति ने भीतर तक रास्ता बना लिया है। नकली मुद्रा से बाजार की विश्वसनीयता तो प्रभावित होती ही है, साथ ही इससे आतंकवादी गतिविधियों को वित्तीय सहायता मिलना भी संभव हो जाता है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि अकेले इस समस्या से पुलिस कार्रवाई द्वारा नहीं निपटा जा सकता, आम जन की भागीदारी अधिक महत्‍वपूर्ण है, इसलिए लोग सचेत हों और देखें कि उनके आसपास कोई अवैध गतिवि‍धि तो नहीं चल रही। यदि कहीं भी कोई संदेह नजर आए तो तुरंत पुलिस को इसकी खबर देनी चाहिए।

यहां कहना यही है कि देश को कमजोर करनेवाले हर कृत्‍य को रोकना प्रत्‍येक भारतवासी का कर्तव्‍य है, यह हम सभी को समझना होगा, तभी इस तरह की अपराधिक गतिविधियों को रोका जा सकता है। जिस पर कि मदरसा, इमाम का जाली मुद्रा निर्माण में बार-बार नाम सामने आने पर एक विशष समुदाय पर उंगली उठना स्‍वभाविक है, अब इसे इसी समुदाय के लोगों को आगे आकर रोकना होगा, वस्‍तुत: आज देशहित में ये बहुत जरूरी लगता है।

(लेखक ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रीय संपादक हैं)