कश्मीर के मामले में पहला पाप नेहरू ने किया और दूसरा कोर्ट ने।
प्रदीप सिंह।
कश्मीर घाटी एक बार फिर देश में चर्चा के केंद्र में है और इसका कारण लाल किले के सामने हुआ विस्फोट है। इस मामले में जिस तरह से आतंकी पकड़े गए हैं, आतंकियों का जो मॉड्यूल पकड़ा गया है, जिसमें डॉक्टर शामिल हैं और कितनी बड़ी साजिश थी,तो इससे जुड़े हुए कई सवाल उठते हैं। इस देश में कश्मीर को लेकर पहला पाप जवाहरलाल नेहरू ने किया था। उन्होंने अगर कश्मीर का मुद्दा सरदार पटेल के जिम्मे छोड़ दिया होता और खुद उसका जिम्मा न लिया होता तो आज इस नासूर का हमें इलाज खोजने की जरूरत न पड़ती। उन्होंने अपने दोस्त शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री, उस समय मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के पद नाम से जाना जाता था, बनवाने के लिए सब कुछ किया। नेहरू ने कश्मीर का विलय भारत में तब तक रुकवाए रखा जब तक राजा हरि सिंह इसके लिए तैयार नहीं हो गए कि विलय के बाद शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बनेंगे।

आप जरा तुलना कर लीजिए दो रियासतों में। एक हैदराबाद निजाम और दूसरा कश्मीर। हैदराबाद का निजाम भी नहीं चाहता था कि भारत में विलय करें। वह या तो स्वतंत्र होना चाहते थे या पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे। सरदार पटेल ने जवाहरलाल नेहरू से पूछे बिना भारतीय सेना हैदराबाद भेज दी। जब जवाहरलाल नेहरू को इसका पता चला तो वे झल्लाते हुए चले गए कि जो मन में आए करें सरदार किसी की सुनते नहीं हैं। हैदराबाद निजाम और भारतीय सेना में युद्ध हुआ, जिसमें कई हजार भारतीय सैनिक मारे गए और अंत में हैदराबाद का भारत में विलय हुआ, लेकिन हैदराबाद के निजाम को जवाहरलाल नेहरू ने उनके शाही महल में हैदराबाद में ही रहने दिया। बाहर कहीं नहीं भेजा। दूसरी तरफ राजा हरि सिंह को जब तक वे जीवित रहे कभी जम्मू कश्मीर राज्य में ही आने की इजाजत नहीं दी, जबकि जम्मू में उनका महल था। उनका पूरा जीवन उसके बाद मुंबई (तत्कालीन बंबई) में बीता और वहीं पर उनका निधन हुआ। तो यह थे जवाहरलाल नेहरू। इसी से पता चलता है उन्होंने किस तरह बदले, हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की। उनके लिए ये मुद्दे राष्ट्र के हित से ऊपर थे। इसके बाद उन्होंने जो दूसरा सबसे गलत काम किया वह था कश्मीर का मुद्दा लेकर यूनाइटेड नेशंस चले जाना और इसके लिए उन्होंने न कैबिनेट की इजाजत ली और न ही संसद की। वह कहीं भी प्रस्ताव नहीं लाए।
उस समय के थल सेना अध्यक्ष जनरल करियप्पा नेहरू को लगातार समझाते रहे कि सिर्फ एक महीना रुक जाइए। हम पूरा कश्मीर ले लेंगे लेकिन उन्होंने नहीं सुनी। उनको पूरा कश्मीर नहीं चाहिए था। आप जानते हैं क्यों? क्योंकि शेख अब्दुल्ला नहीं चाहते थे कि कश्मीर के जिस हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा किया है,जिसको आज हम पीओके कहते हैं, वह हिस्सा जम्मू-कश्मीर के साथ आए। उनका मानना था कि इन दोनों हिस्सों का कल्चर और भाषा अलग है। वे उनको कश्मीरी मानते ही नहीं थे। उनको लगता था कि वह हिस्सा भी अगर साथ आ जाएगा तो समस्या पैदा करेंगे। तो शेख अब्दुल्ला की समस्या जवाहरलाल नेहरू ने दूर की। उस हिस्से को भारत में वापस नहीं आने दिया और उसके बाद भी कोई प्रयास नहीं किया। जवाहरलाल नेहरू ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाकर भारत के लिए हमेशा के लिए एक स्थाई समस्या पैदा कर दी। लेकिन उनको इसका कभी अफसोस नहीं हुआ। इतने बड़े कांड के बाद उन्होंने सिंधु जल समझौता किया, वह भी पाकिस्तान के पक्ष में। अब आप इससे समझ सकते हैं कि नेहरू की मंशा, नीयत और नीति क्या थी? नेहरू ने जो किया उसका नुकसान हम आज तक उठा रहे हैं। उसका भारत के सामाजिक जीवन, राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और विकास सब पर असर पड़ा है। अगर जम्मू कश्मीर का वो हिस्सा न गया होता तो हम यह प्रॉक्सी वॉर न लड़ रहे होते। हमारी सीमा तिब्बत से लगती। मतलब गिलगिट बाल्टिस्तान अगर न गया होता तो हमारे लिए इंटरनेशनल ट्रेड का रूट बाय रोड खुला होता। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने अपने दोस्त शेख अब्दुल्ला को खुश करने के लिए सब नष्ट कर दिया। शेख अब्दुल्ला घोषित रूप से सांप्रदायिक, भारत विरोधी और हिंदू विरोधी था। ये जो नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोग आज तक शहीद दिवस मनाने की कोशिश करते हैं, उस दंगे में शेख अब्दुल्ला का बहुत बड़ा योगदान था बल्कि एक तरह से कह सकते हैं वे मास्टरमाइंड थे। तो नेहरू ने इतिहास का सबसे बड़ा ब्लंडर किया। ऐसे ब्लंडर को ठीक करने में बड़ा समय लगता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार 2014 में आई और 2019 में उनकी सरकार ने संसद से प्रस्ताव पास करके जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया। याद कीजिए जब इसे खत्म किया गया तो किस तरह के बयान आते थे। महबूबा मुफ्ती कहती थीं कि खून की नदियां बह जाएंगी। फारूक अब्दुल्ला कहते थे कि राज्य में कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं होगा। अब जितना तिरंगा 5 अगस्त 2019 के बाद जम्मू कश्मीर में लहराया गया उतना दशकों में कभी नहीं लहराया गया। इससे पहले के 30-35 साल तो लाल चौक पर पाकिस्तानी या आईएस का झंडा फहराया जाता था और ऐसा करने वाले लड़कों को फारूक अब्दुल्ला कहते थे कि ये नौजवान हैं। अपना गुस्सा निकाल रहे हैं। किसी डेमोक्रेसी में ऐसे नौजवानों की जगह सिर्फ और सिर्फ जेल में होनी चाहिए और ऐसे लोगों का समर्थन करने वालों को भी जेल में होना चाहिए। ये जो अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार हैं, आज इनका हौसला फिर से बढ़ गया है। लाल किले के पास जो फिदाईन हमला हुआ, उस पर अगर यह कहा जाएगा कि कश्मीर में अत्याचार होगा तो उसका असर दिल्ली तक तो होगा ही,इसका क्या मतलब है। फारूक अब्दुल्लाह पूछ रहे हैं कि हमें यह सोचना चाहिए कि ये पढ़े लिखे लोग क्यों इस रास्ते पर जा रहे हैं? अरे भाई सबसे लंबे समय तुम्हारे परिवार ने राज किया। आज भी आपका बेटा है मुख्यमंत्री। तो क्यों नहीं पूछते इन लोगों से कि क्यों इस रास्ते पर जा रहे हो? और सबको मालूम है सब नाटक कर रहे हैं कि ये जानते नहीं हैं और इस नाटक का पर्दाफाश किसी और ने नहीं उस फिदाईन डॉक्टर ने ही किया है। एक वीडियो में वह कह रहा है कि हमारे इस्लाम में इसकी इजाजत है। वे इसको आत्महत्या ही नहीं मानते। वे कहते हैं यह शहादत है। यह मजहब का काम है। अब यह बात फारूक अब्दुल्ला को न मालूम हो, महबूबा मुफ्ती को न मालूम हो, उमर अब्दुल्ला को न मालूम हो, यह संभव है क्या? ये नहीं जानने का नाटक करते हैं। ये भारत की सुरक्षा, स्वायत्तता, एकता और अखंडता से खतरनाक खेल खेल रहे हैं। ये देश में हर समय हिंदू मुस्लिम का मुद्दा बनाए रखना चाहते हैं और इसमें इनकी सबसे बड़ी मददगार है कांग्रेस पार्टी, जिसको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में माओवादी मुस्लिम लीग कांग्रेस कहा है।

कश्मीर को लेकर मैंने कहा था कि दो पाप हुए हैं। एक तो शेख अब्दुल्ला को खुश करने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने किया। दूसरा पाप हमारे सुप्रीम कोर्ट ने किया। जब केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35 ए को खत्म किया, उसके बाद कश्मीर घाटी की स्थिति को सुधारने और वहां से अलगाववाद व आतंकवाद को समूल नष्ट करने के लिए जितने बड़े पैमाने पर काम हुआ,आजादी के बाद से 2019 तक कभी नहीं हुआ था। आतंकवादियों का पूरा आर्थिक तंत्र तोड़ दिया गया। सरकारी नौकरियों में उनके जो कारिंदे थे, उन सबको चिन्हित करके निकाला गया। उन पर मुकदमा हुआ, गिरफ्तारी हुई। बड़ी संख्या में अभियान चलाकर आतंकवादियों को मारा गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को लगा कि अरे इतना बड़ा फैसला हो गया। इसमें हमारी तो कोई भूमिका ही नहीं है। तो जब कुछ राजनीतिक दलों और एक इकोसिस्टम ने अनुच्छेद 370 व 35 ए को खत्म करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी तो सुप्रीम कोर्ट को लगा कि इस देश में धर्मनिरपेक्षता को बचाने का ठेका उन्हीं के सिर पर है। उन्हीं के कंधे पर मानवाधिकार की रक्षा का जिम्मा है। उसको लगता है कि अगर कोई प्रस्ताव संसद से पास हुआ है, उसको उसने रद्द नहीं किया तो इसके बदले में उस प्रस्ताव का विरोध करने वालों को बैलेंस करने के लिए कुछ उधर का भी किया जाए। वह सही है, गलत है, संवैधानिक है या असंवैधानिक है, इससे मतलब नहीं है। तो जब सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 और 35 ए को खत्म करने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई तो केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि आप वहां विधानसभा चुनाव कराइए। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि सही समय पर चुनाव कराएंगे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नहीं, यह कैसे हो सकता है? यह सरकार कैसे तय करेगी? उन्होंने निर्देश दिया कि अक्टूबर 2024 तक हर हाल में विधानसभा चुनाव कराइए। हालांकि सरकार 5 अगस्त 2019 के बाद से घाटी में एक नई राजनीतिक व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश कर रही थी। इसीलिए पंचायत, स्थानीय निकाय और डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट काउंसिल के चुनाव कराए गए और इन सभी संस्थाओं को पहले से ज्यादा अधिकार दिए गए। राज्य में परिवर्तन दिखाई देने लगा, डेवलपमेंट दिखाई देने लगा। पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी। लाल चौक पर तिरंगा फहराया जाने लगा। आतंकवादी मारे जाने लगे। पत्थरबाजी बंद हो गई। सरकार चुनाव इसलिए नहीं करा रही थी कि अभी तो नई व्यवस्था तैयार नहीं हुई है। चुनाव हुए तो पुरानी राजनीतिक व्यवस्था फिर से हावी हो जाएगी। सत्ता उसी के हाथ में चली जाएगी। तो एक तरह से सारा मामला 360 डिग्री घूमकर मतलब जहां से चले थे, वहीं पहुंच जाएगा। और वही हुआ। जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने का निर्देश देना सुप्रीम कोर्ट का बहुत बड़ा पाप है। बात एक राज्य में चुनाव की नहीं है। बात है देश की सुरक्षा की, भारत की सार्वभौमिकता की, भारत की एकता अखंडता की, इन सब मुद्दों को नजरअंदाज किया गया। ये मुद्दे एग्जीक्यूटिव और संसद के हैं। लेजिस्लेचर और एग्जीक्यूटिव ही मिलकर तय कर सकते हैं कि क्या होना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम पीछे कैसे रहेंगे। हमारा महत्व कैसे नहीं। तो निर्देश दिया गया कि चुनाव कराइए। अब सरकार के सामने दो ही विकल्प थे। सुप्रीम कोर्ट को डिफाई करती तो ढिंढोरा पीटा जाता कि देश में लोकतंत्र खत्म हो गया है। सारी संवैधानिक संस्थाएं खत्म हो गई हैं। तो सरकार ने तय किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन किया जाए। और विधानसभा चुनाव करा दिए। नतीजा देखिए सत्ता में फिर से वही नेशनल कॉन्फ्रेंस आ गई जो आजादी के बाद से लगातार कश्मीर की हालत को बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार है। उसी परिवार के हाथ में सत्ता आ गई, जिसने कश्मीर को बर्बाद किया और जो भारत का नहीं अपने को पाकिस्तान के ज्यादा करीब समझता है। तो अब लाल किले पर हुए बम विस्फोट के बाद से जो बयान आ रहे हैं वह एक बात चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि कश्मीर भारत का है, लेकिन कश्मीरी अपने को भारत का नहीं मानते। यह बात जिस दिन हमारी सरकार को, हमारे राजनीतिक दलों को, हमारे बुद्धिजीवियों को, हमारी अदालतों को समझ में आएगी, उस दिन से परिवर्तन शुरू होगा। आप कुछ भी कर लीजिए। आप सोने की सड़कें बना दीजिए। घाटी के हर कश्मीरी को हीरे जवाहरात से लाद दीजिए,लेकिन वे भारत के साथ न हैं और न ही होंगे। भारत विरोध ही उनके जीवन का लक्ष्य है। वे पाकिस्तान जिंदाबाद बोल सकते हैं। भारत जिंदाबाद बोलने में उनको समस्या है। वे पाकिस्तान का राष्ट्रगान गा सकते हैं, लेकिन वंदे मातरम नहीं गा सकते। कुछ खुलकर बोलते हैं, कुछ चुप रहकर समर्थन करते हैं। पहलगाम की घटना के बाद से ओवर ग्राउंड वर्कर्स का फर्जीवाड़ा बंद होना चाहिए । ऐसा कुछ नहीं होता। इनका सिर्फ एक नाम है आतंकवादी और उनके साथ आतंकवादियों जैसा ही व्यवहार होना चाहिए। कश्मीर की समस्या का समाधान तब होगा जब हम समस्या को समझेंगे। हम कश्मीर की समस्या के जो लक्षण हैं, उनका उपचार कर रहे हैं। इसलिए समस्या कभी नहीं दूर होने वाली। 1990 में जो कुछ हुआ, उसको कश्मीर के किसी मुसलमान ने गलत माना क्या? आज तक स्वीकार किया क्या? कश्मीर घाटी से हिंदुओं का सफाया कर दिया। एक भी हिंदू अब आपको कश्मीर घाटी में नहीं मिलेगा और इस तरह की परिस्थितियां बनाकर रखी हैं कि अगर कोई लौटना चाहे तो लौट भी न सके। कोई एक कश्मीरी मुसलमान बताइए, जिसने कहा हो कि हमने कश्मीरी हिंदुओं की प्रॉपर्टी पर कब्जा करके गलत किया। हम यह छोड़ रहे हैं। आपको अपवाद के लिए भी एक भी नहीं मिलेगा। तो मानसिकता बदली नहीं है। रणनीति बदल गई है। जब तक उन्हें लग रहा था कि हम बहुत ताकतवर हैं। तब तक बढ़-चढ़कर बोल रहे थे। हत्या कर रहे थे, बलात्कार कर रहे थे। घर पर कब्जा कर रहे थे, घर जला रहे थे। मस्जिदों से ऐलान करवा रहे थे कि या तो कन्वर्ट हो जाओ या फिर मरने के लिए तैयार रहो। अब उनको लग रहा है कि हम थोड़ा कमजोर हैं। इस समय चुप रहना बेहतर है। तो वह चुप रहकर अपने समय का इंतजार कर रहे हैं। वे पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों के लिए पनाहगाह तैयार कर रहे हैं। पहलगाम की घटना से ही आप समझिए कि आतंकी कितने दिन पहले आए थे और घटना के बाद कितने दिन रहे, उनको पनाह किसने दी? कश्मीर के मुसलमानों ने दी। तो समस्या के मूल में जाने की जरूरत है। आप कश्मीर में सिनेमा हॉल खोल दीजिए, उद्योग लगा दीजिए, शिक्षण संस्थान खोल दीजिए, मेडिकल कॉलेज खोल दीजिए, इंजीनियरिंग कॉलेज खोल दीजिए,वे आतंकवादी ही तैयार करेंगे। जो हमारे आपके बीच में रहेंगे और कभी शक नहीं होगा। यह जो अलफला यूनिवर्सिटी है, ये एनसीआर में आतंकवाद का सबसे बड़ा अड्डा था। तो उनकी रणनीति, उनका संगठन और उनका लक्ष्य यह तीनों बिल्कुल स्पष्ट है। गलतफहमी हमें है। हम तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि हमारे दोस्त हैं या दुश्मन हैं। जब दोस्त और दुश्मन के बीच की पहचान न रह जाए तो समझिए कि आप भारी संकट में है,जो इस समय भारत है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)


