एनआरसी, जनगणना और डीलिमिटेशन बदल डालेंगे सारे सियासी समीकरण।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
जिस विषय पर मैं बात करने जा रहा हूं,उस पर पहले एक लघुकथा सुनाऊंगा। उससे यह समझने में आसानी होगी कि मैं जिस मुद्दे को उठा रहा हूं, उसकी गंभीरता क्या है,उसका प्रभाव क्या पड़ने वाला है और उससे डर क्यों है। एक गांव था जहां पर बाघ का बड़ा आतंक था। गांव के लोगों ने बाघ से अपील की कि हम लगातार इस आतंक में जीते हैं कि कब क्या हो जाएगा। तो बाघ ने कहा कि ठीक है आप लोग व्यवस्था कर लीजिए। मुझे रोज एक आदमी चाहिए। एक व्यक्ति का नाम तय हुआ। जिस दिन उसे बाघ के पास जाना था, उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी और उसकी झोपड़ी टपक रही थी। इस कारण उसे जाने में देर हो गई। बाघ को लगा कि यह व्यक्ति धोखा देने वाला है तो बाघ आकर उसके दरवाजे पर खड़ा हो गया। उधर वह व्यक्ति अपनी टपकती झोपड़ी के अंदर परिवार के लोगों से भोजपुरी में बोला कि ‘बघवा से ढेर टिपटिपवा का डर।’ मतलब जो पानी टपक रहा है वह उनकी स्थाई और बड़ी समस्या है, बाघ तो एक बार आएगा खा जाएगा कहानी खत्म। यह बात बाघ ने सुनी तो उसको लगा कि यह कौन सा नया  जानवर आ गया, जो मुझसे भी ज्यादा खतरनाक है। इसके बाद बाघ वहां से भाग खड़ा हुआ।अब मैं विषय पर आता हूं। विषय है एसआईआर यानी मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण। अब यह बड़ी स्वाभाविक प्रक्रिया है। वहां गांव वालों ने तय किया था। यहां संविधान ने तय किया और इसका अधिकार दिया है चुनाव आयोग को कि आप समय-समय पर एसआईआर करवाएंगे। बिहार में इसके विरोध में जब कुछ दल सुप्रीम कोर्ट गए तो उसने कहा कि ये तो इलेक्शन कमीशन को संविधान से प्रदत्त अधिकार है। हम उसमें कोई रोक नहीं लगा सकते जब तक कि आप हमको कोई बड़ी अनियमितता न दिखाएं। एसआईआर हो गया। फाइनल मतदाता सूची प्रकाशित हो गई। चुनाव हो गया। रिजल्ट आ गया, लेकिन जो लोग विरोध कर रहे थे वह एक केस भी नहीं ला पाए जहां किसी का नाम गलत कट या जुड़ गया हो। इससे आप समझ सकते हैं कि किस तरह का हौवा एसआईआर के खिलाफ खड़ा किया जा रहा था। अब 12 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्र में एसआईआर हो रहा है। इनमें वे राज्य भी शामिल हैं,जहां अगले साल चुनाव होने हैं। इसके विरोध में तमिलनाडु और पुडुचेरी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। इनके  अलावा तमिल फिल्मों के सुपरस्टार विजय की पार्टी भी एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई है। पश्चिम बंगाल से टीएमसी पहुंची है क्योंकि सबसे ज्यादा डर उसे ही है। पश्चिम बंगाल की कांग्रेस पार्टी भी कोर्ट गई है। इस मामले पर 26 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी।तो सवाल यह है कि एसआईआर का विरोध क्यों? हर पार्टी, हर नेता और आम लोग मानते हैं कि मतदाता सूची परफेक्ट नहीं है। उसमें बहुत सारी गड़बड़ियां हैं। जो लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके नाम हैं। जो लोग राज्य या शहर छोड़कर चले गए, उनके भी नाम वोटर लिस्ट में शामिल हैं। कुछ लोगों ने दूसरे शहर में वोटर आई कार्ड बनवा लिया। दो जगहों पर नाम है। तो यह पूरी प्रक्रिया ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने की प्रक्रिया है। मतदाता बनने के दो ही आधार हैं। एक आपकी जन्मतिथि, जिससे पता चले कि आप 18 साल के हो चुके हैं और दूसरा आप भारत के नागरिक हों क्योंकि भारत में चुनाव में मतदान करने का अधिकार सिर्फ भारत के नागरिकों को है। सुप्रीम कोर्ट में जब बिहार के मामले पर सुनवाई चल रही थी तो जो लोग विरोध कर रहे थे उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार नहीं है कि वह लोगों की नागरिकता का फैसला करे। इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि ऐसा हम कर भी नहीं रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि यह काम गृह मंत्रालय का है। मैं केवल इसी वाक्य के आधार पर आगे की बात करने जा रहा हूं। चुनाव आयोग के पास ऐसा कोई इंस्ट्रूमेंट नहीं है जिससे वह लोगों की नागरिकता जांच सके। वह केवल पूछ सकता है। आपसे फॉर्म भरवा सकता है। एफिडेविट ले सकता है। एफिडेविट गलत होने पर आपके खिलाफ कानूनी कारवाई हो सकती है, लेकिन चुनाव आयोग यह नहीं कह सकता कि आप नागरिक हैं या नहीं। अगर ऐसा कर सकता तो सोनिया गांधी के इस देश का नागरिक बनने से पहले मतदाता सूची में उनका नाम न आता। ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है, जिनके नाम मतदाता सूची में हैं।

बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या क्या है? जब राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार थी तो उस समय के गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने इनकी संख्या डेढ़ से पौने दो करोड़ बताई थी। अनुमान है कि अब पांच से सात आठ करोड़ के बीच ऐसे लोग हैं। ऐसे लोग कौन है? यह अभी तक तो पता ही नहीं चलता था। ये हमारे आपके बीच ही रहते थे। अब एसआईआर की घोषणा होते ही भारत-बांग्लादेश बॉर्डर का दृश्य देख लीजिए। हजारों की संख्या में वहां लोग जमा हैं। क्यों? वे बांग्लादेश लौटना चाहते हैं। इनमें से कई ने तो कहा कि हम चार-पांच बार चुनाव में वोट दे चुके हैं। तो इससे आप अंदाजा लगाइए कि भारत में चुनाव प्रक्रिया को कौन प्रभावित कर रहा था। और अगर यह सफाई हो रही है तो डर क्यों? लेकिन डर है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल जहां अगले साल चुनाव होना है, वहां एसआईआर को लेकर डर ज्यादा है। सबसे ज्यादा कोई डरा हुआ है तो वह ममता बनर्जी हैं क्योंकि बांग्लादेश बॉर्डर पर जो लोग बैठे हुए हैं,वे सब टीएमसी के वोटर थे। ये कभी सीपीएम के वोटर हुआ करते थे। ये दोनों पार्टियां चुनाव के समय बांग्लादेश से ऐसे लोगों को बुलाती थीं। इन्हें मतदाता बनाया जाता था। इनसे कहा जाता था कि वोट डालें और कुछ दिन बाद लौट जाएं,लेकिन इनमें से बड़ी संख्या में लोग भारत में ही बस गए तो उनको प्रोटेक्ट करने का काम राज्य सरकार करती हैं। पश्चिम बंगाल में पिछले 14 साल से ज्यादा समय से ममता बनर्जी की सरकार इन्हें प्रोटेक्ट कर रही है क्योंकि उन्हें पता है कि ये घुसपैठिये पक्के तौर पर टीएमसी के वोटर हैं। वे किसी भी हालत में भाजपा को वोट नहीं दे सकते।

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तो एसआईआर वह बाघ है जो कह रहा है कि हम जितने भी गैर भारतीय यहां पर नागरिक बने हुए हैं या फिर वोटर बने हुए हैं उनको खा जाएंगे। यानी मतदाता सूची से उनका नाम हटा देंगे। लेकिन अगर मामला केवल यहां तक होता तो मुझे लगता है जो पार्टियां एसआईआर के विरोध में सुप्रीम कोर्ट गई हैं, उनका विरोध इतना तीव्र न होता जैसा हो रहा है। अब सवाल उनके राजनीतिक अस्तित्व का बन गया है। तो डर बाघ का नहीं, टिपटिपुआ का है और इस मामले में टिपटिपुआ कौन है- एनआरसी। उनको डर है कि एसआईआर का अगला कदम एनआरसी होगा और आने वाले दो-तीन सालों में ऐसी प्रक्रिया लगातार चलने वाली है। एनआरसी होते ही अभी जो सवाल उठाया जा रहा है कि चुनाव आयोग को किसी की नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है,वह अधिकार केंद्र सरकार का होगा। एनआरसी मतलब नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस। उससे यह पक्का हो जाएगा कि कौन इस देश का नागरिक है,कौन नहीं। अगर एनआरसी में उस रजिस्टर में आपका नाम है तो आप मतदाता बन सकते हैं। आप आधार कार्ड बनवा सकते हैं। आप पैन कार्ड एवं राशन कार्ड बनवा सकते हैं और भारत सरकार की जितनी योजनाएं हैं, उनका लाभ उठा सकते हैं, लेकिन एनआरसी से बाहर हो गए तो इनमें से कुछ नहीं कर सकते।

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एसआईआर से डर केवल इसलिए नहीं है कि मतदाता सूची से फर्जी वोटर बाहर हो जाएंगे। इस डर और भागने का एक और बड़ा कारण है। नागरिकता और इमीग्रेशन कानून में केंद्र सरकार ने जो संशोधन किया है,उसके अनुसार सारे राज्यों को निर्देश हैं कि वे तीन काम करें। जितने विदेशी हैं उनको आइडेंटिफाई करें,उनको डिटेन करें और उनको डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू करें। अभी दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने सारे जिला अधिकारियों को निर्देश दिया है कि केंद्र सरकार के इस कानून के अनुसार आप हर जिले में डिटेंशन सेंटर बनाएं। एसआईआर के बाद जो लोग डिटेन किए जाएंगे, उनको इस सेंटर में रखा जाएगा। जो लोग भाग रहे हैं,उनको मालूम है कि पकड़े जाएंगे तो फिर गिरफ्तार कर डिटेंशन सेंटर में रखे जाएंगे। कानून में संशोधन के अनुसार इन्हें जिला जेल में नहीं अलग रखा जाएगा। इसलिए आप देखिए चाहे अखिलेश यादव हों एक बार कहते हैं कि हम समर्थन करते हैं। हम इसके विरोध में नहीं है। फिर उसका विरोध करते हैं। वे तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि इधर रहें कि उधर रहें। बिहार में विरोधी दलों ने देख लिया कि विरोध करने का कोई फायदा नहीं हुआ। राहुल गांधी ने इसको सबसे बड़ा मुद्दा बनाया और मजाक का सबसे बड़ा पात्र बन गए। तो एनआरसी अगर हो गई तो स्थाई रूप से ऐसे मतदाता हमेशा के लिए बाहर हो जाएंगे। इन पार्टियों की चिंता यही है कि अभी तो नुकसान होगा ही भविष्य के लिए भी हमारा यह फायदा बंद हो जाएगा। इन दलों को मालूम है कि एनआरसी के अलावा दो और चीजों की घोषणा हो चुकी है। एक है जनगणना। 2026 में जनगणना होगी। वैसे जनगणना 2021 में ही होनी चाहिए थी लेकिन कोविड की वजह से टल गई। अब सरकार ने घोषणा कर दी है कि जनगणना के साथ जाति की भी गणना होगी। बिहार में जाति की गणना का जो लोग सबसे ज्यादा शोर मचा रहे थे, उनको चुनाव में कोई फायदा नहीं हुआ। चाहे वह कांग्रेस हो, आरजेडी हो या दूसरी पार्टियां हों। जनगणना के बाद डीलिमिटेशन का काम होना है। यानी जो लोकसभा और विधानसभा के चुनाव क्षेत्र हैं, उनका पुनर्निर्धारण होगा। उनकी संख्या बढ़ेगी। 1971 की आबादी के आधार पर जो है आखिरी परिसीमन हुआ था,उसे करीब 20 साल के लिए फ्रीज किया गया था। फिर वह बढ़ता गया। अब सरकार ने तय किया है कि इसको और नहीं बढ़ाया जा सकता। यानी आबादी के अनुपात में सीटों की संख्या बढ़ेगी।

SIR exercise not so rosy on the ground in Tamil Nadu

इस पर दक्षिण के राज्यों, खासतौर से तमिलनाडु ने यह मुद्दा उठाया कि इससे हमारी संख्या संसद में कम हो जाएगी। उसका कहना था कि बीजेपी कोशिश कर रही है कि नॉर्थ इंडिया की सीटें बढ़ जाएं जिससे उसका हमेशा बहुमत बना रहे। इस पर केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि संख्या जरूर बढ़ेगी लेकिन अभी  जो अनुपात है, वह बना रहेगा। जैसे आज पुदुचेरी को मिलाकर तमिलनाडु में 40 लोकसभा सीटें हैं और उत्तर प्रदेश में 80 हैं। तो यह अनुपात 40 और 80 का बना रहेगा। अगर मान लीजिए कि डीलिमिटेशन के बाद यूपी में 120 सीटें हो जाती हैं तो तमिलनाडु और पुदुचेरी के लोकसभा सदस्यों की संख्या 60 हो जाएगी। दूसरा महिला आरक्षण भी लागू होना है। तो डीलिमिटेशन के समय ही महिला संसदीय क्षेत्रों का भी निर्धारण होगा। इससे पूरा राजनीतिक समीकरण ही बदल जाएगा। अभी जो लोग किसी चुनाव क्षेत्र को अपना गढ़ मानते हैं वे सारे गढ़ ध्वस्त हो जाएंगे और ऐसा हर पार्टी के साथ होगा। विपक्ष को एक और डर है कि असम में जैसा हिमंत बिस्वसरमा ने किया वैसा केंद्र सरकार न करे। जिस तरह से डेमोग्राफी बदल रही है और जिस तरह से मुसलमान अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं तो हिमंत बिस्वसरमा ने यह किया कि जो मुस्लिम बहुल इलाके थे, उनमें से जहां तक संभव हो सकता था, कुछ इलाके काटकर हिंदू बहुल इलाकों के साथ मिला दिए। तो आबादी का एक संतुलन बन गया और जहां यह संभव नहीं था, उनमें से कई निर्वाचन क्षेत्रों को सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया। वहां से एससी, एसटी का उम्मीदवार ही हो सकता है।

विपक्ष का डर है कि मुस्लिम वोट का जो वीटो है, उसको कमजोर करने के लिए सरकार कदम जरूर उठाएगी। तो डर बाघ का नहीं है। टिपटिपुआ का है। विपक्ष को दिखाई दे रहा है कि एसआईआर के बाद एनआरसी, जनगणना और डीलिमिटेशन उनके लिए आसन्न संकट की तरह हैं, जो उनके राजनीतिक अस्तित्व को झिंझोड़ सकता है। इसके लिए उनको नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ेगी। नए सिरे से संगठन खड़ा करना पड़ेगा। वह आराम का जीवन कि इतने परसेंट वोट पक्का है, यह तो मिलेगा ही। वह सब बदलने वाला है। देश की पूरी राजनीति बदलने वाली है। किसको फायदा होगा,किसको नुकसान होगा, यह तो 2029 के चुनाव में पता चलेगा। लेकिन इतना यह तय है कि यथास्थिति नहीं रहने वाली है और परिवर्तन उनको रास नहीं आता जो निकम्मे और आलसी लोग होते हैं। वे हर परिवर्तन से डरते हैं। तो इसीलिए एसआईआर का इतना विरोध हो रहा है और यह डर उनको सता रहा है कि एसआईआर आखिरी कदम नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)