हिंदू श्रद्धालुओं के पैसे से चल रहे संस्थान की 50 मेडिकल सीटों में से 42 पर मुस्लिमों को दाखिला।
प्रदीप सिंह।
जम्मू-कश्मीर में खासतौर से घाटी में जो कुछ हो रहा है उससे लोगों के जो छिपे हुए चेहरे हैं,वे सामने आ रहे हैं। जिस व्यक्ति के बारे में बात करने जा रहा हूं उसका नाम है उमर अब्दुल्ला। ये खानदानी हैं। इनके दादा मुख्यमंत्री थे। उसके बाद इनके पिता फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और अब ये जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री हैं और मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने जो बातें कही हैं, वह इनका असली चेहरा बताती हैं।
पहले जान लेते हैं कि मुद्दा क्या है। जम्मू-कश्मीर के श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटेलेक्चुअल एक्सीलेंस में मेडिकल और दूसरे विषयों की पढ़ाई होती है। इसमें एमबीबीएस की 50 सीटें हैं। इनमें से 42 सीटों पर सिर्फ मुसलमान चुने गए हैं। इस पर लोगों के कान खड़े हुए। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने इस मुद्दे को उठाया और अलफला यूनिवर्सिटी में जो कुछ हुआ,उसके बाद यह एक बड़ा मामला बन गया कि क्या जम्मू कश्मीर में मेडिकल कॉलेज और इस तरह के जो संस्थान बने हैं, वे क्या डॉक्टर के रूप में आतंकवादी पैदा कर रहे हैं? फरीदाबाद और दिल्ली की घटना ने साबित किया है कि डॉक्टर के वेश में उनके लिए काम करना आसान हो जाता है। क्या ये जो 42 लोग हैं, ये डॉक्टर बनकर आतंकवाद के रास्ते पर नहीं जाएंगे। इसकी गारंटी कौन ले सकता है? अब ये धारणा बिल्कुल खत्म हो जानी चाहिए कि पढ़े-लिखे लोग आतंकवाद के रास्ते पर नहीं जाते। दुनिया में जितने बड़े आतंकी हमले हुए हैं, सबके पीछे बहुत ज्यादा पढ़े लिखे लोग रहे हैं। दिल्ली की घटना के बााद जो यह नैरेटिव चल रहा है कि यह वाइट कॉलर आतंकवाद है तो यह वाइट कॉलर आतंकवाद हमेशा से था। मजहब के नाम पर ये गरीब मुसलमानों को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं और वे सहज तैयार हो जाते हैं। तो इस मेडिकल इंस्टीट्यूट में जो कुछ हुआ, उसके बाद हिंदुओं में जागरण शुरू हुआ है और इसे लेकर जम्मू में दूसरा बड़ा आंदोलन होने जा रहा है।

इससे पहले 2008 में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन वापस लेने के विरोध में बड़ा आंदोलन हुआ था। उस समय गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने अमरनाथ यात्रियों की सुविधा का इंतजाम करने के लिए दी गई जमीन के अलॉटमेंट को रद्द कर दिया था। उस समय महबूबा मुफ्ती ने सवाल उठाया था कि घाटी में आपने किसी हिंदू धार्मिक संस्थान के लिए जमीन दी ही क्यों? अब इससे इन लोगों की सोच और मानसिकता का अंदाजा लगाइए। इसके बाद अमरनाथ श्राइन बोर्ड संघर्ष समिति बनी और आंदोलन किया। आंदोलन के दबाव में सरकार को जमीन का जो आवंटन रद्द किया गया किया था, उसको बहाल करना पड़ा। उसी विवाद में गुलाम नबी की सरकार गिर गई।

श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटेलेक्चुअल एक्सीलेंस में मेडिकल सीटें जिस तरह भरी गईं उसके विरोध में अब एक बार फिर से जम्मू के हिंदू इकट्ठा हुए हैं। सनातन धर्म सभा के नाम से जम्मू के लगभग 60 संगठन एक छतरी के नीचे आए हैं और तय हुआ है कि आंदोलन होगा और सरकार पर दबाव डाला जाएगा कि यह जो एडमिशन का प्रोसेस चला है, जिसमें 50 में से 42 सीटों पर मुसलमान चुने गए हैं, उस प्रोसेस को रद्द किया जाए। भाजपा के सारे विधायकों ने उप राज्यपाल मनोज सिन्हा से मिलकर उनको ज्ञापन दिया है कि इस पूरी प्रवेश प्रक्रिया को रद्द किया जाए। साथ ही यह जो एक्ट बना है, जिसके तहत यह विश्वविद्यालय इंस्टीट्यूट बना है,उस एक्ट में संशोधन किया जाए। यह मांग जायज भी है क्योंकि यह इंस्टीट्यूट जो हिंदू श्रद्धालु हैं, उनके पैसे से बने कोष से बना है। सवाल यह है कि दूसरे धर्म के लोगों पर इसे क्यों खर्च किया जाए? आज यह सवाल देशभर में घूम रहा है कि हिंदू मंदिरों का पैसा दूसरे मजहब के लोगों पर लगाया जाता है। देश में अगर धर्मनिरपेक्षता है और सब बराबर हैं तो फिर आप मुसलमानों के जो ऐसे संस्थान है, उनके पैसे का भी इस्तेमाल कीजिए। चर्च का जो पैसा है, उसका भी इस्तेमाल कीजिए। अगर आप उनका इस्तेमाल नहीं करते हैं तो हिंदू संस्थानों का ही क्यों होगा। तो जम्मू में इन 60 संगठनों ने सुखबीर सिंह मनकोटिया को संघर्ष समिति का संयोजक चुना है। तय हुआ है कि आंदोलन चलना चाहिए और इस समस्या का तात्कालिक नहीं, स्थाई हल होना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर में जो कुछ चल रहा है ये एक बार फिर साबित करता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को विधानसभा चुनाव कराने का आदेश देकर कितना बड़ा पाप किया था। उस आदेश का ही नतीजा है कि यह पॉलिटिकल लीडरशिप, जिसको खत्म करने की कोशिश हो रही थी और जो अलगाववादियों व आतंकवादियों का फ्रंट थी,वह फिर से रिवाइव हो गई है। ये क्यों कहा जा रहा है, अगर आप इस मामले में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का बयान सुनेंगे तो आपको मालूम होगा। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अभी तक भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द है। अगर भाजपा इसे खत्म करनी चाह करना चाहती है तो संविधान से इसे निकाल दे। दूसरी चौंकाने वाली बात उन्होंने कही कि मजहब के आधार पर कैसे तय होगा कि किसको एडमिशन मिलेगा,किसको नहीं मिलेगा? अगर मजहब के आधार पर यह तय होना है तो क्या फिर राशन की दुकान पर भी मजहब पूछा जाएगा। उन्होंने कहा कि जब ये एक्ट बन रहा था तभी तय हुआ था कि यहां एडमिशन मेरिट के आधार पर होगा। लेकिन सवाल यह है कि दूसरे मजहब के लोगों को इसका फायदा क्यों मिलेगा? आतंकवादी बनाने के लिए,आतंकवाद फैलाने के लिए। इस सवाल का जवाब उमर अब्दुल्ला नहीं देते। उन्होंने अलफला यूनिवर्सिटी के बारे में अभी तक नहीं कहा कि ऐसे विश्वविद्यालय या ऐसे मेडिकल कॉलेज को बंद कर देना चाहिए। अलफला विश्वविद्यालय का जो मालिक है, वह कई हजार करोड़ के घोटाले में लिप्त है, लेकिन उसके खिलाफ उमर अब्दुल्ला के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। इससे आप अंदाजा लगाइए कि उनकी मानसिकता क्या है? उन्होंने कहा कि अगर मजहब के आधार पर एडमिशन तय होगा तो फिर तो वेलफेयर स्कीम्स का लाभ भी मजहब के आधार पर मिलना चाहिए।

उमर अब्दुल्ला को यह समझ में नहीं आ रहा है कि जम्मू कश्मीर कोई देश नहीं है। भारत का राज्य है और अगर मजहब के आधार पर कश्मीर में यह तय होगा तो पूरे देश के स्तर पर क्यों नहीं? देश भर में जहां-जहां बहुसंख्या हिंदुओं की है,वहां वेलफेयर स्कीम्स का अधिकतम लाभ उनको मिलना चाहिए। उमर अब्दुल्ला किस दिशा में देश को ले जाना चाहते हैं? दरअसल वे भारत को एक और विभाजन की दिशा में ले जाना चाहते हैं। वह धीरे-धीरे अपने मकसद की ओर बढ़ रहे हैं। आतंकवादी तेजी से बढ़ रहे हैं। लक्ष्य दोनों का एक है। वरना उमर अब्दुल्ला यह बोलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते कि आप धर्मनिरपेक्षता शब्द को संविधान से हटा दीजिए। फिर उसके बाद आपको जो करना है कीजिए और हम तय करेंगे कि हमको क्या करना है। उमर अब्दुल्ला क्या करेंगे आप? आप तो 370 के मुद्दे पर भी बोल रहे थे। आपके पिताजी कह रहे थे कि तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं होगा। खून की नदियां बह जाएंगी। तो आपकी कितनी हैसियत और औकात है, यह पूरा देश देख चुका है। आप भारत के पैसे पर और इस मामले में तो हिंदुओं के पैसे पर फल फूल रहे हैं। आपको जो सत्ता मिली हुई है, वह भारत की कृपा है। कायदे से तो जम्मू कश्मीर में 370 और 35 ए खत्म होने के बाद विधानसभा के चुनाव होने ही नहीं चाहिए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ज़िद के कारण चुनाव हुए और उसका नुकसान पूरा देश भुगत रहा है।
उमर अब्दुल्ला का लक्ष्य बिल्कुल साफ है। पाकिस्तान जो चाहता है,जिहादी जो चाहते हैं, आतंकवादी जो चाहते हैं,वही वह चाहते हैं। फर्क है तो आवरण का। उनको जो सत्ता मिली हुई है, वह उस पर अपना खानदानी अधिकार समझते हैं। उनकी नजर में डेमोक्रेसी तब तक है जब तक उनकी सत्ता है और उनको भारत से कोई मतलब नहीं है। उनकी सत्ता बरकरार रहे इसलिए वह दिल्ली से संबंध बनाकर रखना चाहते हैं। तो चाहे उमर अब्दुल्ला हों,फारूक अब्दुल्ला हों या जब जिंदा रहे उनके दादा शेख अब्दुल्ला और इधर मुफ्ती परिवार, ये सब एक भाषा बोल रहे हैं। भारत विरोध की भाषा। सनातन विरोध की भाषा। इनको दो चीजों से नफरत है। एक सनातन दूसरा भारत। ये दोनों से छुटकारा चाहते हैं। दोनों को खत्म करना चाहते हैं। इनके इस लक्ष्य और इरादे को अगर आप नहीं समझेंगे तो उसका इलाज नहीं हो सकता। अब समय आ गया है। 79 साल हो गए। कितनी छूट देंगे? कितनी बार माफ करेंगे? पृथ्वीराज चौहान ने 13 बार मोहम्मद गौरी को छोड़कर गलती की थी, उसका नतीजा उन्हें अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। तो युद्ध में माफी जैसा कोई शब्द नहीं होता। यह धर्म युद्ध है। यह राजनीति का युद्ध नहीं है। यह सत्ता का युद्ध नहीं है। और यह मानकर चलिए कि इसे लड़ना ही पड़ेगा। या तो आप सरेंडर कर दीजिए या लड़िए और जीतने की कोशिश कीजिए। इन दो के अलावा आपके पास तीसरा कोई विकल्प नहीं है। आज उमर अब्दुल्ला जैसे लोग इस तरह की भाषा बोल रहे हैं तो वह इसलिए क्योंकि कश्मीर घाटी की डेमोग्राफी ऐसी है। आप कल्पना कीजिए कि वह जम्मू के मुख्यमंत्री होते तो क्या ऐसी भाषा बोल सकते थे? ऐसी भाषा कहने की हिम्मत उनको घाटी की डेमोग्राफी से आ रही है और डेमोग्राफी को जब तक नहीं बदलेंगे तब तक कश्मीर में कुछ नहीं बदलने वाला। कश्मीरी कभी भारत को अपना नहीं मानेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)


