डॉ. मयंक चतुर्वेदी।
आलेख का शीर्षक सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, वस्तुत: आज की भारतीय विपक्षी राजनीति और उसके अंतरराष्ट्रीय रिश्तों की समझ का कटु सत्य है। कांग्रेस किस तरह उन अंतरराष्ट्रीय चेहरों को प्रोत्साहित करती दिखती है, जो विश्व मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करने में सक्रिय रहे हैं इसका नया उदाहरण इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार के लिए चिली की पूर्व राष्ट्रपति और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख रह चुकी मिशेल बैश्लेट का चयन है। जिस व्यक्ति ने भारत के आंतरिक मामलों पर बार-बार पक्षपातपूर्ण और तथ्यहीन टिप्पणियाँ की हों, वह कांग्रेस के लिए शांति और मानवाधिकारों की प्रतीक हो सकती हैं, यह सोचकर भी आश्चर्य होता है, फिर तो वह इस पूरे परिदृष्य को हकीकत में बदल चुकी है!
कहने को पुरस्कार इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा दिया जाता है, जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। पुरस्कार देते समय दावा यही किया जाता है कि ये उन लोगों को प्रदाय होता है जिन्होंने वैश्विक शांति और विकास में रचनात्मक योगदान दिया हो। प्रश्न यह है कि क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति भारत की संप्रभुता, उसकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया और उसकी सुरक्षा को लेकर किस तरह के रवैये रखता है? या कांग्रेस को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उक्त व्यक्ति ने विश्व मंचों पर बार-बार भारत को कठघरे में कितनी ही बार क्यों न खड़ा किया हो?
आज मिशेल बैश्लेट का नाम आते ही भारत के प्रति उनका वही रवैया याद आता है जो लगातार आलोचनात्मक रहा, वह भी एकतरफा और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से। यह वही बैश्लेट हैं जिन्होंने बार-बार भारत के प्रयासों, उसके सुधारों और उसकी नीतियों को न तो समझा और न स्वीकारा। उनका रुख शुरू से अंत तक ऐसा रहा है जैसे भारत किसी दमनकारी शासन वाला देश हो और वे एक न्यायधीश बनकर भारत पर टिप्पणियाँ करना अपना अधिकार समझती हों।
सीएए के खिलाफ जब देश में भ्रम फैलाया जा रहा था, तब भी बैश्लेट ने एक कदम आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट में याचिका तक दाखिल करवाई। किसी को ये नहीं भूलना चाहिए कि यह भारत की संसद द्वारा स्वीकृत विधेयक था, जो पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने के लिए लाया गया था, किंतु बैश्लेट ने इसे मुसलमानों के खिलाफ बताया और प्रचारित किया, जबकि ये सच नहीं। भारत सरकार द्वारा बार-बार ये स्पष्ट किया गया था कि सीएए देश का आंतरिक विषय है, पर बैश्लेट कब मानने वाली थीं, उन्होंने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए खूब भुनाया।
इसी तरह से सितंबर 2021 में देखने में आया कि कैसे उन्होंने मानवाधिकार काउंसिल में कश्मीर में प्रतिबंध, ब्लैकआउट, पत्रकारों पर दबाव जैसे विषयों को मुद्दा बनाया था। भारत ने स्पष्ट कहा कि ये टिप्पणियाँ गलत जानकारी पर आधारित हैं और भारत की संप्रभुता से जुड़े मामलों में किसी विदेशी संस्था की कोई भूमिका नहीं। पर इस के बाद भी यह बैश्लेट थीं जिन्हें हर बार भारत की आलोचना में ही रस मिलता था।
वस्तुत: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भारत ने जिस शांतिपूर्ण और संवेदनशील तरीके से स्थिति को संभाला, उसे विश्व ने सराहा, किंतु बैश्लेट ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को आरोपों से घेरने में कोई कमी नहीं छोड़ी। यह वही वक्त था जब भारत दुनिया को बता रहा था कि कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल की जा रही है और आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए निर्णायक कदम उठाए जा रहे हैं। लेकिन बैश्लेट को कोई सुधार नहीं दिखे, वे इस वक्त में कह रही थीं कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, पेलेट गन का इस्तेमाल जारी है और भारत ने पब्लिक पार्टिसिपेशन की जगह कम कर दी है। वास्तव में उन्होंने वही कहा जो भारत-विरोधी तत्व चाहते थे।

मिशेल बैश्लेट आगे इतने पर भी कहा रुकनेवाली थीं, जब भारत ने विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग पर एमनेस्टी इंटरनेशनल के खिलाफ कार्रवाई की, तब भी उन्हें भारत का कानून गलत नजर आया। उन्होंने कहा कि एफसीआरए में ही खामियाँ हैं। सवाल यह है कि क्या अब कोई विदेशी संस्था यह बताएगी कि भारत को अपने कानून कैसे बनाने चाहिए? ऐसे ही किसान आंदोलन के दौरान जब कुछ समूह आंदोलन की आड़ में हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने लगे और 26 जनवरी की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोरा, तब भी बैश्लेट ने वही किया जो वह करती आई हैं, उन्होंने भारत की भरपूर आलोचना की और सरकार को किसानों का विरोधी करार दिया।
उनके द्वारा जब-जब भी संभव हुआ, वे भारत में दलितों, जनजातियों और मुस्लिमों को लेकर हमेशा पक्षपातपूर्ण रिपोर्टें तैयार करती रहीं, जिनमें आधे-अधूरे और गलत तथ्य भरे रहते। उनके बयानों का एक ही उद्देश्य होता कि कैसे ज्यादा से ज्यादा यह दिखाया जा सके कि भारत एक ऐसा देश है जो अपने नागरिकों के अधिकारों का सम्मान नहीं करता। यह वही नैरेटिव है जिसे वर्षों से कुछ अंतरराष्ट्रीय समूह आगे बढ़ाते आए हैं और जिसे भारत का विपक्ष अक्सर राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।
वस्तुत: आज ऐसे व्यक्ति को कांग्रेस द्वारा सम्मानित करना यह दर्शा रहा है कि वह उन अंतरराष्ट्रीय आवाजों को मंच देना चाहती है जो भारत की छवि को कमजोर दिखाने में लगे हों। बैश्लेट को सम्मान देने का अर्थ है कि कांग्रेस उनकी भारत-विरोधी टिप्पणियों को सही मानती है। इसे देखकर कहना होगा कि कांग्रेस के लिए शायद यह पुरस्कार बैश्लेट की उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि भारत की नीतियों पर उनकी आलोचनाओं के लिए है।
यह ठीक वही राजनीति है जिसमें भारत की छवि, भारत की संप्रभुता और भारत के हित से ज्यादा अहम होता है अपना राजनीतिक नैरेटिव। कांग्रेस बैश्लेट में वही आवाज देखती है जो उनकी सोच के अनुकूल भारत को हमेशा विवादों में घिरा, कमजोर और संघर्षरत दिखाने की कोशिश करती है। यदि कांग्रेस सच में भारत के विकास, उसकी प्रगति और उसकी वैश्विक साख की परवाह करती तब वह ऐसे व्यक्ति को सम्मान देने से पहले हजार बार सोचती जरूर] जिसने भारत को बदनाम करने का कोई मौका कभी नहीं छोड़ा।
वस्तुत: आज सम्मान के लिए बैश्लेट जैसी शख्सियत का चयन कांग्रेस की उस मानसिकता को उजागर करता है, जिसमें भारत की आलोचना करने वाले ही अधिक सम्मानित होते हैं। ऐसे में दिख यही रहा है कि वास्तविकता में कांग्रेस को न तो भारत का विकास रास आता है और न ही वह भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उभरते हुए और आगे बढ़ते हुए देखने में खुशी रखती है,अन्यथा कोई कारण नहीं कि वे इस पुरस्कार के लिए ऐसे चेहरे का चुनाव करती, जिसके आचरण में शुरू से अंत तक भारत विरोध के अतिरिक्त अन्य कुछ भी शेष नहीं। अब भारत की जनता के लिए सोचने योग्य है कि आखिर किस सोच के जरिए कांग्रेस बार-बार ऐसे लोगों को आगे बढ़ाती है जिनके शब्दों में भारत विरोध ही उनकी पहली प्राथमिकता में होता है!
(लेखक ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रीय संपादक हैं)


