डॉ. मयंक चतुर्वेदी।
भारत अपनी सभ्यतागत बहुलता, विविध विचारधाराओं और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं के कारण दुनिया में विशिष्ट पहचान रखता है, परंतु इन्हीं विविधताओं के भीतर समय-समय पर कुछ तत्व ऐसे भी उभरते रहे हैं, जिन्होंने मजहब (रिलीजन) की आड़ लेकर कट्टरपंथ, दुष्प्रचार और हिंसा को वैचारिक आधार देने की कोशिश की है। पिछले पचास वर्षों 1975 से 2025 की अवधि को देखें तो सुरक्षा एजेंसियों ने अनेक ऐसे खुलासे किए, जिनमें कुछ मौलवियों की भूमिका अत्यधिक चिंताजनक पाई गई है, जिन्होंने अपने मजहबी (धार्मिक) वेश और उपदेश की आड़ में उग्रवाद, जिहाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है।
यहां कई लोग बचाव में ये तर्क देते नजर आते हैं कि अच्छा जिहाद भी होता है, लेकिन जो तर्क दे रहे हैं, आप उनकी न मानकर स्वयं से अध्ययन करें, ध्यान में आएगा कि गैर मुसलमान के प्रति एक मोमीन के लिए जिहाद के मायने आखिर हैं क्या? यहां यह भी समझ लें कि जिहादियों को आतंकवादी कहना अपने को भरमाना है। उग्रवाद, जिहाद और आतंकवाद ये तीनों ही अपने आप में अलग हैं। लेकिन भारत में कई मौलवी ये तीनों ही करते हुए नजर आए हैं।
1970 के दशक का उत्तरार्ध कश्मीर घाटी के भीतर कट्टरपंथी, जिहादी, उग्रवादी, आतंकी गतिविधियों के उभरने का शुरुआती दौर रहा। स्थानीय मौलवियों ने अलगाववाद को हवा दी। इस दौर में भले ही गिरफ्तारियाँ कम थीं, परंतु इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्टें करती है कि मस्जिदें और अन्य मजहबी संस्थान आतंकी संगठनों के दुष्प्रचार का माध्यम बनते रहे। 1990 के बाद कश्मीर में हिंसा चरम पर पहुँची तो अनेक मौलवी खुलकर हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों से जुड़कर जिहाद एवं इस्लामिक आतंकवादी के वैचारिक सहायक के रूप में सामने आए। कई इमाम ऐसे पकड़े गए जो मस्जिदों से भड़काऊ भाषण देते थे, युवाओं को ‘जिहाद’ के नाम पर उकसाते थे और आतंकी संगठनों से सीधे संपर्क में पाए जाते थे। आप यदि इनके विस्तार में जाना चाहेंगे तो अनेक नाम आपको मिल जाएंगे।
वस्तुत: 2000 के दशक तक यह स्पष्ट हो चुका था कि इस्लामिक चरमपंथ देश के सिर्फ सीमावर्ती राज्यों तक सीमित नहीं रहा है, यह पूरे देश में फैल चुका है। 2014 के बाद डिजिटल प्लेटफॉर्मों के तीव्र प्रसार ने इस खतरे को कई गुना बढ़ा दिया। व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, सोशल मीडिया चैनल और वीओआईपी कॉल्स ने कट्टरपंथी विचारधारा के प्रसार को अत्यंत आसान बना दिया। परिणामस्वरूप 2014 से 2025 यानी आज दिनांक तक देश भर में सैकड़ों मौलवी आतंकवाद, कट्टरपंथी दुष्प्रचार या संदिग्ध विदेशी संपर्कों के आरोप में गिरफ्तार किए गए। जिसमें कि कुछ प्रकरण एवं नाम राष्ट्रीय स्तर पर बहस का केंद्र बने।
ओडिशा के मौलाना अब्दुल रहमान कटकी को 2015 में अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंटस (एक्यूआईएस) से संबंध के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 2023 में विशेष अदालत द्वारा दोषसिद्धि और सजा इस बात की पुष्टि थी कि कटकी युवाओं को उग्रवाद की ओर प्रेरित करता था। धार्मिक प्रवचनों की आड़ में वह अल-कायदा की विचारधारा फैलाता और युवाओं को संगठन से जोड़ने का प्रयास करता था। उसके नेटवर्क के खुलासे ने कट्टरपंथ के गहरे पैठे स्वरूप को उजागर किया।
जम्मू-कश्मीर के शोपियां का मौलवी इरफान अहमद वागे इस खतरे के नए रूप का उदाहरण है। ये नौगाम मस्जिद के इमाम (उपदेशक) के रूप में काम कर रहा था और पहले एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (पैरामेडिक) के रूप में भी काम करता रहा था, जिससे चिकित्सा समुदाय के बीच आसानी से घुलने-मिलने में मदद मिली। मौलवी इरफान अहमद वागे हाल ही में दिल्ली लाल किला बम विस्फोट की साजिश से जुड़े एक “व्हाइट कॉलर” आतंकी मॉड्यूल के मास्टरमाइंड के रूप में सुरक्षा एजेंसियों की जांच के घेरे में आया है।
मौलवी इरफान अहमद का आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के लिए काम करना पाया गया है। उन पर डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों सहित शिक्षित युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें आतंकी गतिविधियों में शामिल करने का आरोप है। कुल मिलाकर दिल्ली धमाके से जुड़े मॉड्यूल के खुलासे ने यह सामने ला दिया है कि मेडिकल छात्रों तक कट्टरपंथी विचारधारा पहुँचाने के पीछे मौलवी वागे की निर्णायक भूमिका रही। उसके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से आईएसआईएस और एक्यूआईएस से जुड़ी डिजिटल सामग्री पत्रक, वीडियो, चैट और विदेशी संपर्क मिले। इसी मॉड्यूल का एक हिस्सा इश्तियाक अहमद भी था, जिसे हरियाणा और राजस्थान में संयुक्त कार्रवाई के दौरान गिरफ्तार किया गया। उसके घर और मदरसे से बरामद दस्तावेज और विदेशी लेनदेन नेटवर्क ने यह बताया कि वह लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करने के साथ अपने इस आतंकी गिरोह को विस्फोटक सामग्री के छुपाव में भी शामिल है।
झारखंड में 2016 में अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंटस लिंक के आरोप में गिरफ्तार मौलाना कलिमुद्दीन मुजाहिरी का मामला भी उल्लेखनीय रहा। हालांकि 2025 में अदालत ने सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया, लेकिन इससे यह सवाल अवश्य उठा कि धार्मिक संस्थान किस हद तक आतंकी संगठनों की भर्ती या संदेश प्रसार का साधन बन सकते हैं। अभी हाल ही में राजस्थान के जालोर से गिरफ्तार मौलवी ओसामा उमर कट्टरपंथ के नवीनतम स्वरूप की भयावह झलक प्रस्तुत करता है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से उसका चार वर्षों का संपर्क, डिजिटल उपकरणों से मिली तीन लाख से अधिक कट्टरपंथी सामग्री, विदेशी प्रशिक्षण की तैयारी और युवाओं को डिजिटल जिहाद में शामिल करने का प्रयास यह सब इस खतरे के वैश्विक विस्तार की ओर संकेत करते हैं। यह स्पष्ट है कि आज कट्टरपंथी मौलवी अब सिर्फ स्थानीय मस्जिदों तक सीमित नहीं रहे हैं, इन सभी का वैश्विक आतंकी संगठन प्रत्यक्ष मार्गदर्शन कर रहे हैं।
आज मौलवियों से जुड़ा यह तथ्य देश को जान लेना चाहिए कि पिछले पचास वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों ने लगभग तीन सौ से अधिक मौलवियों को आतंकवाद, कट्टरपंथी विचारधारा या विदेशी संपर्कों के आधार पर गिरफ्तार किया है। हवाला नेटवर्क, विदेशी फंडिंग, मदरसों में संदिग्ध गतिविधियाँ और डिजिटल मॉड्यूल इन सभी का पर्दाफाश यह बताता है कि खतरा जटिल और बहुआयामी है।
अब सवाल उस कौम से है, जहां इस प्रकार के मौलवी पैदा हो रहे हैं, यदि किसी भी समाज में इस तरह के चरमपंथी, आतंकवादी बार-बार सामने आ रहे हैं, इसका मतलब यही निकलता है कि उनके बीच ऐसे लोगों के पैदा होने पर व्यापक विरोध नहीं हो रहा, यदि होता तो कोई कारण नहीं ये जिहादी और आतंकी मौलवियों की फसल पैदा होती! अब आवश्यकता मुसलिम समुदाय के अपने भीतर आत्मसमीक्षा करने की है। अच्छा हो वे इसके प्रति जागरूकता विकसित करे। डिजिटल मॉनिटरिंग, डी-रैडिकलाइजेशन कार्यक्रम, स्कूलों-मदरसों में आधुनिक शिक्षा और समुदाय स्तर पर संवाद ये करना आज की अनिवार्यता है। क्योंकि चरमपंथ का मुकाबला केवल पुलिस या सुरक्षा एजेंसियाँ नहीं कर सकतीं; इसके लिए समाज और राज्य दोनों की साझी सतर्कता आवश्यक है। अन्यथा इस प्रकार के मौलवी लगातार पैदा होते रहेंगे और जो दिल्ली में घटा, ऐसे विस्फोट देश के आम नागरिकों की जान लेते रहेंगे!


