हार की हताशा से कांग्रेस संसद और सड़क का अंतर भूल गई।
प्रदीप सिंह।
संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार से शुरू तो हो गया, लेकिन चलेगा इसमें भारी शंका है। वैसे हमारे यहां जो संसदीय व्यवस्था है वहां सदन को चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है,लेकिन संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि विपक्ष अगर सदन को चलने न देने पर उतारू हो जाए तो सत्ता पक्ष क्या करें? अगर सदन में हंगामा हो, नारेबाजी हो,प्ले कार्ड दिखाए जाएं और मंत्री यहां तक कि स्पीकर और सभापति को भी बोलने न दिया जाए तब क्या हो?

कांग्रेस की सांसद हैं रेणुका चौधरी। सोमवार को वे अपने साथ अपने पेट डॉग को लेकर संसद परिसर पहुंचीं। इस पर भाजपा के सांसद जगदंबिका पाल ने एतराज जताया। रेणुका से जब इस बारे में किसी रिपोर्टर ने सवाल किया तो उन्होने कहा, यह छोटा सा कुत्ता है, यह काटता नहीं है। काटने वाले तो अंदर बैठे हैं। शायद यह बोलते समय वे भूल गईं कि वह भी अंदर ही बैठती हैं। अगर वे अपने साथी सांसदों को काटने वाला कुत्ता बताने के लिए तैयार हैं तो आप समझ लीजिए कि उनकी मानसिकता क्या है?
सत्र शुरू होने से पूर्व प्रधानमंत्री ने मीडिया से बात करते हुए विपक्ष को सलाह दी कि आप सारे मुद्दे उठाइए,सरकार को घेरिए लेकिन अपने चुनाव की हार की हताशा को लेकर सदन में मत आइए। इससे कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे बौखला गए। सोमवार को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन पहली बार सभापति की कुर्सी पर बैठे तो उनके स्वागत में भाषण हुए। इस दौरान मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री की ओर इशारा करके कहा कि आपने बाहर जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोला है, उसका तो हम मुंहतोड़ जवाब देंगे। यह सदन में प्रतिपक्ष के नेता की भाषा हो सकती है क्या? वे पहली बार सांसद होते तो माफ किया जा सकता था,लेकिन खरगे की उम्र 80 साल के आसपास है। वे कई बार सांसद, विधायक,मंत्री रह चुके हैं। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। अपने भाषण के दौरान उन्होंने पुराने सभापति जगदीप धनखड़ का उल्लेख करते हुए अफसोस जताया कि उनका विदाई भाषण नहीं हुआ। लेकिन वे भूल गए इन्हीं जगदीप धनकड़ को कांग्रेस पार्टी ने कौन सी गाली नहीं दी थी। कांग्रेस पार्टी ने दो-दो बार धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दिया था। जब तृणमूल के सांसद उनकी मिमिक्री कर रहे थे तो राहुल गांधी वीडियो बना रहे थे। लेकिन सोमवार को खरगे धनखड़ के लिए अफसोस जता रहे थे क्योंकि उनको लग रहा था कि ऐसा करने से सत्तारूढ़ पक्ष और प्रधानमंत्री परेशानी में आ जाएंगे।

विपक्ष ने संसद का मानसून सत्र एसआईआर पर चर्चा कराने की मांग को लेकर नहीं चलने दिया था। इस पर चर्चा क्यों नहीं हो सकती पहले इसका तकनीकी पक्ष समझ लेते हैं। एसआईआर चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है। यह तो एक मुद्दा हुआ। दूसरी बात यह कि एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। मतलब यह मामला सबजुडिस है। तीसरी बात कांग्रेस के नेता और लोकसभा अध्यक्ष रहे बलराम जाखड़ की रूलिंग है कि इलेक्शन कमीशन के कामकाज के बारे में सदन में चर्चा नहीं हो सकती। फिर भी अगर मान लीजिए कि सरकार इस पर चर्चा करने के लिए तैयार हो जाए तो सवाल यह है कि चर्चा के बाद विपक्ष के आरोपों का जवाब कौन देगा? इलेक्शन कमीशन तो सदन का सदस्य है नहीं और सरकार इलेक्शन कमीशन की ओर से जवाब दे नहीं सकती। मानसून सत्र में बिहार में एसआईआर को लेकर विपक्ष ने इस बात को लेकर हंगामा किया था कि समय कम है। चुनाव के नजदीक क्यों करा रहे हैं? इस मुद्दे पर समय को लेकर सोमवार को विपक्ष की ओर से दो तरह के बयान आए। कार्तिक चिदंबरम ने कहा कि एसआईआर पर ऐतराज नहीं है, लेकिन चुनाव के इतने नजदीक क्यों?पहले से क्यों नहीं? और अखिलेश यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में चुनाव तो अभी बहुत दूर है। राज्य में एसआईआर अभी क्यों हो रही है? मतलब चुनाव के पहले कराएं तो भी ऐतराज,चुनाव बहुत दूर हो तब भी ऐतराज। कुल मिलाकर आपको एसआईआर नहीं कराना है। विपक्ष को डर है कि जो घुसपैठिए हैं,वे वोटर लिस्ट से निकल जाएंगे और उन्हीं के आधार पर उसका जनाधार बना हुआ है। बिहार में एसआईआर के खिलाफ राहुल गांधी ने खूब अभियान चलाया लेकिन जनता की ओर से विरोध प्रदर्शन की एक भी घटना नहीं हुई। यानी मतदाता को कोई ऐतराज नहीं। सुप्रीम कोर्ट को कोई ऐतराज नहीं है। ऐतराज केवल कुछ पार्टियों और नेताओं को है। राहुल गांधी तो अभी भी इस जिद पर अड़े हुए हैं कि एसआईआर होनी ही नहीं चाहिए। मतलब संविधान ने जो व्यवस्था की है, वह होना ही नहीं चाहिए और यही राहुल गांधी संविधान बचाने की बात करते हैं। दरअसल राहुल गांधी के पास कोई मुद्दा ही नहीं है। उनको लगता है कि एसआईआर ही सबसे बड़ा मुद्दा है। उनकी पिछले 11 साल की राजनीति देखिए तो मुद्दों के मामले में वह गोल पोस्ट शिफ्ट करते रहे हैं। एक मुद्दा उठाते हैं और फिर उसको भूल जाते हैं। फिर दूसरा मुद्दा उठाते हैं। अब वे वोट चोरी, कास्ट सेंसस, जिसकी जितनी आबादी उसको उतना हक की बात नहीं करते। उनके उठाए सारे मुद्दे निष्फल साबित हुए हैं और बिहार विधानसभा के चुनाव ने एसआईआर के मुद्दे को भी निष्प्रभावी साबित कर दिया है।

कांग्रेस के बड़े और अनुभवी नेता तक जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे एक बात तो पूरी तरह से साबित हो जाती है कि यह पार्टी संसद और सड़क का अंतर भूल गई है। उसकी जो सड़क की भाषा है वही उसकी संसद की भाषा हो गई है। यह दृश्य भारतीय संसद पहली बार देख रही है। कांग्रेस ने जो रास्ता अपना लिया है,यह बताता है कि पार्टी के अंदर हार की हताशा कितने गहरे बैठ गई है। सीटें कम होने के बावजूद कांग्रेस नरेंद्र मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोक पाई और उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव तो उसके लिए वज्रपात जैसे रहे। महाराष्ट्र जहां से उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें आती हैं। देश की जिसे आर्थिक राजधानी कहा जाता ह, वहां से कांग्रेस का पूरा सूपड़ा साफ हो गया। तो राहुल गांधी के मुद्दे और उनकी पार्टी को इस देश का मतदाता लगातार रिजेक्ट कर रहा है। बीजेपी करे तो बात समझ में आती है क्योंकि वह प्रतिद्वंद्वी है। लेकिन जो जनादेश है, उसको कैसे नकार सकते हैं? जनता राहुल के उठाए मुद्दों को सुनने के लिए भी तैयार नहीं है। उसके आधार पर कोई निर्णय करने की तो बात ही अलग है, लेकिन यह सामान्य सी बात राहुल गांधी की समझ में नहीं आ रही है। तो यह संसद का यह सत्र भी धुल जाएगा। इसकी पूरी संभावना है। क्योंकि संसद का सत्र जब आप चलने देंगे तो मुद्दों पर बहस होगी। उसके लिए तैयारी करनी पड़ती है। उसके लिए विषय की समझ होना जरूरी है। और जब यह सब कुछ न हो तो खड़े होकर गाली देना शुरू कर दो। उसके लिए किसी तैयारी की जरूरत नहीं होती। वही काम राहुल गांधी कर रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी संसदीय आचरण को नुक्कड़ के आचरण में बदलने में सफल हो गई है। मल्लिकार्जुन खरगे इतने अनुभव के बाद भी संसद में इस तरह की भाषा बोल रहे हैं, जो शायद गली मोहल्ले का कोई छोटा नेता भी बोलने में संकोच करेगा। भाषण में गाली देकर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को लगता है कि देश और जेन-जी उनके साथ खड़ा हो जाएगा। अगर आप जेन-जी का आह्वान कर रहे हैं तो पहले आपको पता होना चाहिए कि वे कम्युनिकेट किस तरह से करते हैं? उनकी आकांक्षा क्या है? उनके विषय क्या है? उनकी समस्याएं क्या हैं? लेकिन राहुल गांधी को इस सबसे मतलब नहीं है। उनको मतलब है कि मैं जो कह रहा हूं वही मुद्दा है। मतदाता मुझे हराता रहे कोई बात नहीं। पार्टी खत्म होती रहे कोई बात नहीं, लेकिन मैं अपना रास्ता नहीं छोडूंगा। उनकी यही हठधर्मिता देश की सबसे पुरानी और इस समय देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तेजी से पतन का कारण बनती जा रही है। तो कांग्रेस मुक्त भारत भाजपा नहीं बना पाएगी। कांग्रेस मुक्त भारत कांग्रेस ही बनाएगी। राहुल गांधी ने तय कर लिया है कि कांग्रेस को तो मैं खत्म करके रहूंगा और उस रास्ते पर वह बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



