मनोरंजन उद्योग का चेहरा बदल देगा यह सौदा।
बालेन्दु शर्मा दाधीच।
पंद्रह साल पहले, जब वॉर्नर ब्रदर्स बहुत बड़ी कंपनी थी और नेटफ्लिक्स नाम की एक छोटी कंपनी फिल्मों के डीवीडी किराए पर देने का धंधा कर रही थी, तब किसी ने टाइम वॉर्नर (तब का नाम) के तब के सीईओ जेफ बूकस से पूछा कि क्या ‘नेटफ्लिक्स’ उनके लिए कोई चुनौती पेश कर सकती है? बूकस हँस पड़े। बोले- “ये तो ऐसा सवाल हुआ जैसे क्या अल्बानिया की सेना दुनिया पर कब्ज़ा कर लेगी? मुझे नहीं लगता कि कभी ऐसा कुछ होगा।”बात समझ में आती है। वॉर्नर ब्रदर्स अमेरिका में मनोरंजन की दुनिया की विशालकाय कंपनी है जिसका दायरा फिल्मों से लेकर टेलीविजन, ओटीटी से लेकर वीडियो गेम्स तक फैला हुआ है।

वही बूकस अब यह खबर पढ़कर भौंचक्के रह गए होंगे कि उसी चिंदी सी नेटफ्लिक्स ने वॉर्नर को 82.7 अरब डॉलर में खरीदने का प्रस्ताव रखा है। हालाँकि उनकी कंपनी इस बीच और भी बड़ी होकर ‘वॉर्नर ब्रदर्स डिस्कवरी’ (डब्लूबीडी) बन चुकी है जिसमें डिस्कवरी समाहित है। वह एचबीओ नामक बहुत बड़े प्रीमियम टीवी नेटवर्क की भी मालिक है और दो केबल टेलीविजन नेटवर्कों- सीएनएन (न्यूज नेटवर्क) तथा टीएनटी- की भी। एचबीओ की स्ट्रीमिंग सर्विस मैक्स भी उसके दायरे में है। जाहिर है कि डील को मंजूरी मिली तो बहुत बड़े साम्राज्य का शहंशाह बदलने जा रहा है।
मनोरंजन और इंटरनेट की दुनिया भी इस सौदे पर भौंचक्की है। वही नेटफ्लिक्स जो महज 28 साल पहले 1997 में डीवीडी रेंटल कंपनी के रूप में सामने आई। उसके इंटरनेट पोर्टल पर लोग अपनी पसंद की फिल्में चुनते थे और उन्हें डाक से डीवीडी भेज दी जाती थी। बूकस ही क्या, शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इस किस्म की कंपनी कोई बड़ा कमाल कर सकती है। लेकिन तकनीकी बदलावों और चुनौतियों के बरक्स नेटफ्लिक्स ने बड़े इनोवेटिव तरीके से काम किया। उसने कोडक की तरह नए जमाने की तकनीक के सामने हथियार नहीं डाले बल्कि खुद को लगातार बदला। सन् 2007 में जब उसने फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों की स्ट्रीमिंग सेवा शुरू की, तो वह मनोरंजन की दुनिया की शक्ल बदल देने वाला कदम था। धीरे-धीरे वह सिर्फ़ फिल्मों और पुराने शोज़ की स्ट्रीमिंग करने वाली कंपनी नहीं रही बल्कि खुद अपनी फिल्में और कार्यक्रम बनाने लगी। अब वह अपनी किस्म का सबसे बड़ा वैश्विक ब्रांड वह 190 से ज़्यादा देशों में मौजूद है, लगभग हर भाषा में कंटेंट बना रही है और 30 करोड़ से ज़्यादा सब्सक्राइबरों के साथ दुनिया के मनोरंजन उद्योग की बहुत बड़ी ताक़त बन चुका है।
वही ‘बहुत बड़ी ताकत’ अब ‘सबसे बड़ी ताकत’ बन जाएगी, अगर वॉर्नर ब्रदर्स डिस्कवरी सौदे को नियामकों की मंजूरी मिल गई। वॉर्नर ब्रदर्स डिस्कवरी आर्थिक संकट से गुजर रही थी और उस पर भारी कर्ज़ था। हॉलीवुड की दूसरी कंपनियाँ जैसे पैरामाउंट, स्काईडांस और कॉमकास्ट आदि भी उसे खरीदने की होड़ में थीं, लेकिन नेटफ्लिक्स ने सबको पीछे छोड़ दिया।

इस सौदे से नेटफ्लिक्स को क्या कुछ मिलेगा? वॉर्नर ब्रदर्स का पूरा फिल्म स्टूडियो-जिसका मतलब है कि अब हैरी पॉटर, डीसी के सुपरहीरोज़, गेम ऑफ थ्रोन्स,फ्रेंड्स, स्ट्रेंजर थिंग्स,सक्सेशन और द व्हाइट लोटस जैसी नामी फ्रेंचाइज़ सीधे नेटफ्लिक्स के नियंत्रण में होंगी। उसे एचबीओ भी मिल जाएगा जो फिल्मों का एक और बहुत बड़ा ब्रांड है। कभी नेटफ्लिक्स के सह-सीईओ टेड सारानडोस ने कहा था कि उनकी कंपनी एचबीओ जैसी बनना चाहती है। लीजिए, अब नेटफ्लिक्स एचबीओ की मालिक बनने जा रही है। वॉर्नर ब्रदर्स सीएनएन और टीएनटी की भी मालिक है। लेकिन नेटफ्लिक्स को उनमें दिलचस्पी नहीं है। शायद उनका कुछ और भविष्य हो जो 2026 में सामने आएगा। नेटफ्लिक्स का पूरा फोकस भविष्य डिजिटल पर केंद्रित दिखाई देता है, यानी ओटीटी और स्ट्रीमिंग पर, न कि पारंपरिक टीवी पर।
अगर यह डील पूरी हो गई तो नेटफ्लिक्स अकेले दुनिया के 40 से 45 प्रतिशत स्ट्रीमिंग मार्केट पर कब्ज़ा कर लेगा। डिज्नी, अमेजन प्राइम, एप्पल टीवी और बाकी प्लेटफॉर्मों के लिए यह बहुत बड़ा झटका होगा। दुनिया के सबसे शानदार शो, सीरीज और फिल्में एक ही प्लेटफॉर्म पर आ जाएंगी तो बाकी के पास कौनसा बड़ा आकर्षण बचेगा? उनके कारोबार पर दबाव बढ़ेगा।
यहाँ मुद्दा एकाधिकार से जुड़ जाता है जिसकी वजह से प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की भँवें तनी हुई हैं। अमेरिका के कुछ नेताओं को लगता है कि इस सौदे से प्रतिस्पर्धा खत्म हो सकती है और यह “एंटी-मोनोपॉली” के दायरे में आ सकता है।अटकलें हैं कि ट्रंप प्रशासन वॉर्नर ब्रदर्स डिस्कवरी की बिक्री के लिए पैरामाउंट की बोली के पक्ष में था। चूँकि यह विलय बहुत बड़ा है, अमेरिकी नियामक संस्थाएँ इसको बारीकी से जांचेंगी।

एकाधिकार आता है तो मनमानी की संभावना बनती है। जहाँ आम दर्शकों को अब सिर्फ नेटफ्लिक्स के सबस्क्रिप्शन में ही ज्यादा और तगड़ा कंटेंट मिल जाएगा वहीं आने वाले समय में सबस्क्रिप्शन की दरें बढ़ाए जाने के आसार भी रहेंगे। अंततः बोझ उपभोक्ताओं पर ही तो पड़ता है।
सिनेमाघरों के मालिक भी चिंतित हैं। नेटफ्लिक्स ओटीटी जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की कंपनी है जो थिएटरों के साथ होड़ करती है। बड़ी से बड़ी फिल्में ओटीटी की तरफ चली जाएंगी तो सिनेमाघरों के कारोबार को झटका लगेगा जो कोविड के दिनों की मार से अब तक पूरी तरह उबरे नहीं हैं।
इस सौदे की कहानी सिर्फ बिजनेस की बात नहीं है। वह तय करेगी कि आने वाले दस सालों में हम फिल्में कैसे देखेंगे, किसके द्वारा बनाए गए शो देखेंगे और हमारे मनोरंजन पर किसका नियंत्रण होगा। मनोरंजन की दुनिया में बड़ा भूचाल आने वाला है। हॉलीवुड के इतिहास में यह शायद वैसा पल है, जैसा मोबाइल के दौर में नोकिया के लिए स्मार्टफ़ोन का आना था, और वैसे ही विशेषाधिकार के आसार हैं जैसा इंटरनेट सर्च पर गूगल का है।
(लेखक वरिष्ठ आईटी विशेषज्ञ हैं)।



