फिल्म ने बॉलीवुड में पल रहे कई सांपों को बिल से निकलने पर मजबूर किया।

प्रदीप सिंह।
भारत के सामने इस समय ‘थ्री एंड हाफ (साढ़े तीन) फ्रंट वॉर’ का खतरा है। ये जो तीन फ्रंट चीन,पाकिस्तान और बांग्लादेश हैं,इनसे निपटने के लिए हमारी तीनों सेनाएं पूरी तरह से सक्षम हैं। ये इनसे लड़ भी सकती हैं और जीत भी सकती हैं। इसमें किसी को कोई दो राय नहीं होनी चाहिए। अब वह 1962 का समय नहीं है। यह कारगिल का समय भी नहीं है जब हम पाकिस्तान की वायु सीमा में प्रवेश करने में संकोच करते थे। ऑपरेशन बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने पाकिस्तान में घुसकर उसे उसकी औकात बताई है। भारत की सैन्य क्षमता आज कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है। वह अपना रक्षा बजट लगातार बढ़ा रहा है। यह एके एंटनी या मनमोहन सिंह का जमाना नहीं है, जब बहाना बनाया जाता था कि सरकार के पास पैसे नहीं है। आज चीन तक को समझ में आ गया है कि भारत की ताकत क्या है और इसीलिए उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। लेकिन मैं इन तीन फ्रंट की बात नहीं कर रहा हूं। जो आधा फ्रंट भारत के अंदर बैठे दुश्मनों का है,मैं उसकी बात करने जा रहा हूं।


यह आधा फ्रंट देश में रह रहे ऐसे इंटेलेक्चुअल्स, पॉलिटिकल पार्टियों के नेता,अलग-अलग संस्थानों में काम करने वाले वे लोग हैं जो भारत विरोधी और सनातन विरोधी हैं। हालांकि इनकी बड़ी संख्या नहीं है,लेकिन ऐसे लोग ज्यादा मुखर हैं। और जो उनके साथ नहीं हैं,वे मौन या निष्क्रिय हैं। लंबे समय तक वे अपने करियर,अपनी व अपने परिवार की सुरक्षा और सामाजिक प्रताड़ना को लेकर डरते रहे,लेकिन 2014 के बाद से जब से नरेंद्र मोदी आए हैं,वे बोलने लगे हैं। देश के भीतर सनातन विरोधी और भारत विरोधी तत्वों को अगर डिफाइन करना हो तो आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। इस देश का बॉलीवुड हार्ड एंटी इंडियन कैबाल है। यहां के लोग पैसे के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हैं। हालांकि बॉलीवुड में कुछ अच्छे लोग भी हैं और समय-समय पर उन्होंने यह बताया भी है,लेकिन जो भारत और सनातन विरोधी तत्व हैं इंडस्ट्री पर उनका प्रभुत्व है। वे ही नैरेटिव सेट करते हैं। कुछ समय पहले तक इस नैरेटिव को तोड़ने की कोई हिम्मत नहीं करता था। जो कोशिश करे उसके सामने इंडस्ट्री से बाहर कर दिए जाने का खतरा था,लेकिन अब वह डर खत्म हो रहा है और उसकी शुरुआत द कश्मीर फाइल्स फिल्म से हुई और इसका सबसे ताजा प्रमाण धुरंधर फिल्म है। मैं मानता हूं कि यह कोई फीचर फिल्म नहीं है। यह जीता जागता इतिहास है। यह इतिहास हमें बताता है कि सच्चाई हमसे कैसे छिपाई गई। कैसे भारत विरोधी नैरेटिव गढ़ा गया। जो नैरेटिव बनना चाहिए था, उसे बनने नहीं दिया गया। बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में आज भी ऐसे सांप और सपोले हैं, जो भारत और सनातन विरोधी हैं। धुरंधर ने ऐसे सांपों को बिल से निकलने पर मजबूर कर दिया।

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आप पिछले 80 साल की हिंदी फिल्में उठाकर देखिए उनमें आपको दो-तीन चीजें बड़ी कॉमन मिलेंगी। फिल्म में एक अच्छा कररेक्टर होगा,वह कोई अब्दुल मियां या कोई मुसलमान या फिर कोई फादर होंगे और जो शरारती,बदमाश या देश विरोधी तत्व होगा, वह हिंदू होगा। हिंदू को जिस तरह से कलंकित करने का काम बॉलीवुड ने किया मैं नहीं मानता कि इससे पहले मुगलों या ब्रिटिश राज में भी हुआ होगा। इनको पहचानने में हमको 70-80 साल लग गए। इनसे लड़ने की हिम्मत किसी की नहीं हुई क्योंकि इनको सरकारी और एक बड़े इको सिस्टम का संरक्षण प्राप्त था। ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने इस मिथ को तोड़ा कि इनसे लड़ा नहीं जा सकता या इनके झूठे नैरेटिव को तोड़ा नहीं जा सकता। उसके बाद केरला स्टोरी से लेकर धुरंधर तक ऐसी कई फिल्में आईं हैं। धुरंधर ने तो जो किया है,उसके लिए आदित्य धर और उनकी टीम को बहुत-बहुत बधाई। उन्होंने एक सच्ची घटना पर फिल्म बनाने और धारा के विपरीत चलने का साहस किया है। यह आसान नहीं होता है। आदित्यधर ने उस परिपाटी को तोड़ा है कि हर फिल्म में जो आतंकवादी है वह या तो बेचारा है या मजबूर। जो पीड़ित होते हैं दरअसल उनको दोषी दिखाने की कोशिश होती है। जितने आतंकवादी हैं उनका समर्थन करने के लिए कोई जस्टिफिकेशन तलाशने की हर फिल्म में तलाश होती थी। पाकिस्तान को बुरा मत दिखाओ। पाकिस्तान में जो तत्व जिहादी तत्व हैं उनको मजबूर दिखाओ। इस्लाम की बात मत करो। इस्लाम शांति का धर्म है और सबसे बड़ा फरेब कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। यह हमें घुट्टी में पिलाया गया और हमारे आप जैसे बहुत से लोग इस पर विश्वास भी करने लगे थे।

तो बॉलीवुड राष्ट्र विरोध और राष्ट्रद्रोह को स्वीकारिता दिलाता रहा। उसे मजबूरी में किया गया काम बताता रहा और जो राष्ट्रद्रोहियों की पहचान करते हैं, जो राष्ट्रद्रोहियों के खिलाफ बोलते हैं,उनको आतताई और सांप्रदायिक बताता है। बॉलीवुड में कौन कहां खड़ा है धुरंधर की प्रशंसा और विरोध कौन कर रहा है, इससे आपको पता चल जाएगा। पहलगाम में धर्म पूछकर जो नरसंहार हुआ उसके खिलाफ बोलने के लिए बॉलीवुड,बौद्धिक जगत और राजनीतिक जगत के कितने लोग खड़े हुए,यह देख लीजिए तो आपको समझ में आ जाएगा कि यह हाफ फ्रंट वॉर किनसे लड़नी है और कैसे लड़नी है। यह ऐसी लड़ाई है जो कोई फौज नहीं लड़ सकती और कोई सरकार भी अकेले नहीं लड़ सकती है। इसमें जब तक जनता का पूरा साथ नहीं होगा तब तक कुछ होगा नहीं। पिछले 70-75 साल से जो लोग भारत और सनातन विरोधी नैरेटिव चला रहे थे,इन लोगों ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि 2014 में एक नरेंद्र मोदी आएगा जो इनके पूरे नैरेटिव को छिन्न-भिन्न कर देगा। इनको यह भी उम्मीद नहीं थी कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनकर एक योगी आदित्यनाथ आएंगे, जो विधानसभा में खड़े होकर कहेंगे कि मैं ईद नहीं मनाता क्योंकि मैं हिंदू हूं।

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धुरंधर फिल्म भारत के खिलाफ पाकिस्तान के जिहाद और हमारी इंटेलिजेंस एजेंसीज की बहादुरी की कहानी है। यह देश के नेतृत्व के निर्णायक होने की कहानी भी है। यह कहानी बताती है कि दुश्मन को उसके घर में घुसकर मारा जा सकता है। इस फिल्म ने पाकिस्तान से भी ज्यादा उन्हें चोट पहुंचाई है जो भारत में पॉलिटिकल इस्लाम के भाड़े के टट्टू हैं। कई लोग कह रहे हैं कि इस फिल्म से पाकिस्तान के खिलाफ नैरेटिव बनाया जा रहा है। उनसे पूछना चाहिए कि जिससे चार-चार युद्ध लड़े, जो सालों से हमारे देश में आतंकवादी भेज रहा है,उसके पक्ष में नैरेटिव क्यों बनना चाहिए? और यह कौन लोग हैं जिन्हें पाकिस्तान और हमास के लिए तो दर्द होता है,लेकिन बांग्लादेश में हिंदू भाइयों के साथ जो होता है,उस पर कोई दर्द नहीं होता। यह इसी देश में हो सकता है कि बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने की कोशिश हो और उससे लाखों लोग जुड़ जाएं और करोड़ों रुपए इकट्ठा हो जाएं। तो धुरंधर फिल्म हमारी आंखें खोलती है। यह फिल्म बताती है कि हे विषधर अब तुम्हें विषहीन करने का समय आ रहा है। यह फिल्म बता रही है कि 70 साल से ज्यादा समय से जो लोग भारत और सनातन विरोधी नैरेटिव बना रहे थे, उनका जवाब देने वाले आ गए हैं। इस फिल्म को जिस तरह की सफलता मिल रही है, वह यह भी बताती है कि भारत बदल रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)