दिग्विजय ने उठाए नेतृत्व क्षमता पर सवाल, कांग्रेस में भूचाल।
प्रदीप सिंह।
कांग्रेस कार्य समिति की शनिवार को हुई बैठक से ठीक पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के 10 साल मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह ने एक ट्वीट करके राहुल गांधी के नेतृत्व को चुनौती नहीं तो चेतावनी जरूर दे दी है। दिग्विजय सिंह का कहना है कि जैसे चुनाव आयोग मतदाता सूची का शुद्धिकरण कर रहा है,उसी तरह कांग्रेस संगठन में भी रिफॉर्म की जरूरत है। सीधे राहुल गांधी को एड्रेस करते हुए वह कहते हैं कि संगठन में रिफॉर्म आप कर सकते हैं, लेकिन आप सुनते नहीं हैं। यह इतना तीखा हमला है,जो जी-23 बना था शायद उसने भी नहीं किया होगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हैं,लेकिन दिग्विजय उन्हें एड्रेस नहीं कर रहे क्योंकि उन्हें मालूम है कि असली ताकत राहुल गांधी के हाथों में है। सीधे-सीधे राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा कि ऊपर से प्रदेश अध्यक्ष बन जाता है लेकिन उसकी कमेटी कभी नहीं बनती। तो संगठन कैसे काम करेगा?

अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यक्रम की फोटो भी लगाई,जो उस समय की है जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री भी नहीं बने थे। फोटो में भाजपा नेता अटल जी,आडवाणी जी और दूसरे अन्य वरिष्ठ नेता कुर्सी पर बैठे हैं और आडवाणी जी के चरणों के पास नरेंद्र मोदी जमीन पर बैठे हुए हैं। दिग्विजय सिंह कहते हैं कि यह होती है संगठन की ताकत कि एक जमीनी कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बना दिया। तो यह गांधी परिवार पर दिग्विजय सिंह का सीधा हमला है। पद हो न हो,ताकत गांधी परिवार के ही पास है। जो पद पर बैठता है,उनकी कठपुतली होता है। चाहे वह पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष हो या प्रधानमंत्री हो। दिग्विजय के कहने का मतलब था कि इससे पार्टी खड़ी नहीं होती। दिग्विजय सिंह 10 साल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और उनकी नीति वही रही जो लालू प्रसाद यादव की थी कि विकास से वोट नहीं मिलता। तो विकास को उन्होंने इग्नोर किया। उनके कार्यकाल में मध्य प्रदेश में सड़क में गड्ढा था या गड्ढे में सड़क पता नहीं। स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसें लाल डिब्बा कहलाती थीं। बिजली,सड़क और पानी तीनों का बुरा हाल था। इसी कारण कांग्रेस राज्य की सत्ता से जो बाहर हुई तो 2018 में डेढ़ साल के लिए मुश्किल से आ पाई। कांग्रेसी कहते हैं कि भाजपा ने सरकार गिरा दी,लेकिन कांग्रेस में बगावत न होती तो बीजेपी कैसे सरकार गिरा देती?
2004 में राहुल गांधी जब राजनीति में आए और लोकसभा का पहला चुनाव लड़े थे तब उनके राजनीतिक गुरु दिग्विजय सिंह थे। उस समय यूपी के भट्टा पारसोल में एक आंदोलन चला था। अनिल अंबानी की कंपनी को बिजली संयंत्र लगाने के लिए मायावती सरकार ने जमीन दी थी। जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। राहुल गांधी को समझाया गया कि उस आंदोलन में शामिल हो जाएं तो यूपी की जनता उनके साथ हो जाएगी। वहां कांग्रेस समेत किसी भी विपक्षी दल के नेता के जाने पर रोक लगी हुई थी,तब दिग्विजय सिंह गांव के रास्ते से मोटरसाइकिल पर बिठाकर राहुल गांधी को वहां ले गए थे। 2003 में विधानसभा का चुनाव हारने और सत्ता से बाहर होने के बाद आज तक 22 साल हो गए दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश से लोकसभा के सदस्य नहीं बन पाए हैं। अब भी राज्यसभा में हैं।
लेकिन उन्होंने राहुल गांधी को कई बार अच्छी सलाह भी दी है। 2007 में यूपी विधानसभा चुनावों में वह उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे। तब एक तरह से राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में लॉन्च किया जा रहा था। राहुल के लिए स्ट्रेटजी बनाने वालों में तब दिग्विजय सिंह प्रमुख थे। कांग्रेस की उस चुनाव में बुरी तरह से हार हुई। उसके बाद दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस पार्टी को सुझाव दिया था कि 2007 के चुनाव में सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के जो उम्मीदवार थे,उन्हें ही उस विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी बना दीजिए और उनसे कहिए कि अपनी संगठन की टीम बनाएं। उन्हें कहा जाए कि अगला चुनाव वे ही लड़ेंगे। ऐसा करने से संगठन जल्द खड़ा होगा और पार्टी का धीरे-धीरे रिवाइवल शुरू हो जाएगा। लेकिन गांधी परिवार को यह बात समझ में नहीं आई। इसलिए कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 2007 में जहां थी, उससे भी आज नीचे है।
अब कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक वाले ही दिन दिग्विजय सिंह का ऐसा ट्वीट करना मेरा मानना है कि सीधे राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगाना है। उन्होंने अपने ट्वीट के आखिर में लिखा है- जय सियाराम। उन्होंने यह कहकर एक तरह से इलेक्शन कमीशन का समर्थन किया है कि जैसे मतदाता सूची के मामले में रिफॉर्म हो रहा है,उसी तरह से राहुल गांधी को संगठन के मामले में करना चाहिए। यानी चुनाव आयोग का अनुसरण करना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह नहीं कहा कि आप उसका विरोध करके गलत काम कर रहे हैं। यह अगर कह देते तो शायद अब तक पार्टी से निकाल दिए गए होते। दिग्विजय सिंह को मालूम है कि कहां जाकर रुक जाना है। इस मामले में वह राजनीति के बहुत चतुर खिलाड़ी हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि उनका मार्च में राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है और इस समय मध्य प्रदेश में जो स्थिति है कांग्रेस पार्टी सिर्फ एक व्यक्ति को राज्यसभा भेज सकती है। तो शायद उसके लिए वह दबाव डाल रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि शायद दिग्विजय सिंह को यह अंदाजा हो गया है कि उनको राज्यसभा नहीं भेजा जाएगा। इसलिए उन्हें लग रहा है कि अब बोलने से उनका कोई नुकसान नहीं होने वाला है।

कांग्रेस पार्टी में बहुत दिन से उम्मीद की जा रही थी कि कोई तो बोले,कोई तो दरवाजा खोले। तो दिग्विजय सिंह ने वह दरवाजा खोल दिया है। अब बाकी लोगों पर निर्भर है कि वह उस दरवाजे से अंदर आते हैं या बाहर खड़े होकर तमाशा देखते हैं। जी-23 ने पहली कोशिश की थी, लेकिन उनमें से ज्यादातर लोगों ने या तो हार मान ली या पार्टी से निकाल दिए गए। दिग्विजय सिंह ने जो बोला है,उससे यह नहीं लगता कि वह पार्टी से निकलना चाहते हैं। उनका कहना है कि आप जमीनी कार्यकर्ता को ऊपर आने ही नहीं देते। संगठन बनेगा कैसे? और उदाहरण वह पुरानी कांग्रेस का नहीं दे रहे हैं, वह आज की भाजपा और नरेन्द्र मोदी का दे रहे हैं। संघ का उदाहरण दे रहे हैं कि संघ की कार्यशैली देखिए। भाजपा की कार्यशैली देखिए। एक जमीनी कार्यकर्ता को कहां से कहां पहुंचा दिया। यह होती है संगठन की ताकत। तो वे परोक्ष रूप से कह रहे हैं कि राहुल गांधी को पता ही नहीं है कि संगठन की ताकत क्या होती है और जिसे पता नहीं वह संगठन को मजबूत कैसे करेगा? लग रहा है कि अब कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर जो चुप्पी थी वह धीरे-धीरे टूट रही है।
अपनी ओर से दिग्विजय सिंह ने असंतोष का झंडा उठा दिया है। अब उसका नतीजा आगे क्या होगा? देखने वाली बात होगी। हालांकि उनके ट्वीट का जवाब राहुल गांधी ने नहीं, ट्वीट करके मल्लिकार्जुन खरगे ने दिया कि कांग्रेस ने क्या-क्या किया है। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि कांग्रेस ने क्या-क्या खोया है। राहुल गांधी के पार्टी में सक्रिय होने के बाद से कांग्रेस 90 से ज्यादा विधानसभा चुनाव और तीन लगातार लोकसभा चुनाव हार चुकी है। आखिर इसके लिए किसी की तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जिम्मेदारी की भी बात छोड़िए। इस पर कोई तो मंथन या चिंतन होना चाहिए कि आखिर यह क्यों हो रहा है और इसको सुधारने के लिए क्या करना चाहिए। ऐसी कोशिश होती हुई कहीं दिखाई नहीं दे रही है।
दिग्विजय सिंह यही कह रहे हैं कि संगठन का पुनर्गठन कीजिए। नीचे के लोगों को ऊपर भेजिए। ऊपर से जो अध्यक्ष भेजने का सिलसिला है,इसको रोकिए। उन्होंने सीधा-सीधा हमला राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता,संगठन और राजनीतिक मुद्दों को लेकर उनकी समझ पर किया है। अब इसके बाद तो अगला कदम सिर्फ बगावत हो सकती है। लेकिन वह होती हुई दिख नहीं रही है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



