आपका अखबार ब्यूरो।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के कला निधि विभाग द्वारा डॉ. कपिला वात्स्यायन स्मृति व्याख्यान शृंखला के अंतर्गत “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर व्याख्यान एवं एक अनूठी प्रदर्शनी “अभिव्यक्ति” का आयोजन किया गया। यह आयोजन डॉ. कपिला वात्स्यायन संग्रह (सांस्कृतिक अभिलेखागार) पर आधारित है, जिसे सुश्री सारिका अगरवाल द्वारा क्यूरेट किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात साहित्यकार एवं गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. भाग्येश वासुदेव झा ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का आधार वक्तव्य आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा दिया तथा स्वागत एवं परिचय कला निधि के प्रमुख एवं एवं डीन प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ द्वारा किया गया।


डॉ. भाग्येश वासुदेव झा ने कहा कि आज का वैश्विक संकट ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ का संकट है, जो केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित कर रहा है। फ्रांसिस फुकुयामा, सैमुअल हंटिंगटन और शंकराचार्य के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक विचारधाराएं समयबद्ध हैं, जबकि भारतीय चिंतन शाश्वत है। इज़राइल-हमास युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक राजनीति के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हर संघर्ष की जड़ पहचान (Identity) का प्रश्न है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान को उन्होंने भारतीय आत्मबोध का आधुनिक स्वरूप बताया। टेक्नोलॉजी के युग में सबसे बड़ा खतरा मानसिक असंतुलन (Mental Disorder) है और इसका समाधान केवल तकनीक नहीं, बल्कि आत्मबोध है।


भगवद्गीता और उपनिषदों का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ और ‘तत्त्वमसि’ भारतीय चेतना के केन्द्रीय सूत्र हैं, जो व्यक्ति को अहंकार, भय और ईर्ष्या से मुक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि आत्मबोध केवल ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभूति है। शंकराचार्य के साधन-चतुष्ट्य (विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति और मुमुक्षा) को आत्मबोध की वैज्ञानिक प्रक्रिया बताया गया। उन्होंने आगे कहा कि मोक्ष का अर्थ ‘Salvation’ नहीं, बल्कि ‘Freedom from Fear’ है- डर, अहंकार और आसक्ति से मुक्ति। भारतीय दृष्टि में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि चेतना की निरंतर यात्रा बताया गया, जिसे उपनिषद् और लोकजीवन आज भी जीवित रखते हैं। ‘साक्षीभाव’ पर बल देते हुए वक्ता ने कहा कि स्वयं को देखने की क्षमता ही आत्मबोध की शुरुआत है। भगवद्गीता के विश्वरूप दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय विश्वबोध ‘मैं और तुम’ के भेद को समाप्त करता है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ को भारतीय विश्वदृष्टि का मूल बताते हुए कहा कि भारत की पहचान संकीर्ण नहीं, सर्वकल्याणकारी है। अंत में, उन्होंने कहा कि नदी, प्रकृति और पृथ्वी को माता मानने की परम्परा ही भारत की वैश्विक पहचान है। आत्मबोध से विश्वबोध की यह यात्रा ही भारत का वास्तविक योगदान है, जो आज के वैश्विक संकट का समाधान प्रस्तुत करती है।

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, कपिला वात्स्यायन जी की स्मृति में आयोजित इस स्मृति व्याख्यान के अवसर पर डॉ. भाग्येश वासुदेव झा ने उनके आईजीएनसीए से गहरे जुड़ाव और संस्थान के प्रति उनके विश्वास को स्मरण किया। डॉ. जोशी ने कहा, कार्यभार संभालने के बाद अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय के मार्गदर्शन में कपिला जी से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित हुआ, जिससे आपसी विश्वास और निरंतर मार्गदर्शन की परम्परा बनी। यह संस्थागत निरंतरता और सम्मान आईजीएनसीए की सांस्कृतिक परम्परा का महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने ‘अभिव्यक्ति’ वस्त्र प्रदर्शनी का उल्लेख करते हुए कहा कि वस्त्र केवल भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि स्मृति, भाव और परम्परा के संवाहक होते हैं। यह प्रदर्शनी कपिला वात्स्यायन जी के वस्त्र-संग्रह के माध्यम से भावनाओं और कथाओं को सामने लाती है। साथ ही, आत्मबोध, स्व की खोज और राष्ट्र-बोध जैसे विचारों पर केन्द्रित आज के स्मृति व्याख्यान को भारतीय दर्शन और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ते हुए डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने विश्वास व्यक्त किया कि यह कार्यक्रम दर्शकों को एक नई वैचारिक अनुभूति प्रदान करेगा।


व्याख्यान का परिचय प्रस्तुत करते हुए प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा कि हर वर्ष दिसंबर में आयोजित किए जाने वाले स्मृति व्याख्यान की परम्परा के अंतर्गत यह कार्यक्रम पिछले छह वर्षों से निरंतर आयोजित किया जा रहा है। आगे उन्होंने बताया कि आईजीएनसीए में विद्वानों के व्यक्तिगत संग्रहों को संरक्षित करने और उन्हें जनता तक पहुंचाने के उद्देश्य से निरंतर कार्य किया जा रहा है। प्रदर्शनी 7 जनवरी तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। प्रदर्शनी के साथ उसका कैटलॉग भी जारी किया गया। अंत में, उन्होंने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि यह स्मृति व्याख्यान और प्रदर्शनी शोध, विमर्श और सांस्कृतिक संवाद को नई दिशा देंगे। इस अवसर पर, विभिन्न क्षेत्रों के विद्वतजन, संस्कृतिप्रेमी, शोधकर्ताओं, युवाओं और छात्रों ने सहभागिता की।