नए साल में आस्था के केंद्रों का नजारा बता रहा 11 साल में बहुत बदल गया देश।
प्रदीप सिंह।
भारत में इस समय सनातन पुनर्जागरण का दौर चल रहा है। बहुत से लोग सवाल पूछते हैं कि 11 सालों में मोदी ने क्या किया? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी सत्ता में 9 साल होने जा रहे हैं, उनके बारे में भी लोग सवाल उठाते हैं। इन दोनों ने ही विरासत और विकास को साथ लेकर चलने का फैसला किया और उसका नतीजा सामने आ रहा है। अब आप इसे डबल इंजन की सरकार कहें। दोनों की सनातन के प्रति आस्था कहें। जिस तरह से भी इसको देखना चाहे देख सकते हैं।

भारत में एक नई परिघटना हो रही है, जो इससे पहले कभी नहीं हुई। वैसे तो भारत में तीर्थों का महत्व हमेशा से रहा है,लेकिन मुगलों और फिर अंग्रेजों के समय और उसके बाद भारतीय अंग्रेजों के समय सनातन धर्म का लगातार दमन किया गया। कभी हिंदू धर्म स्थलों को उभरने नहीं दिया गया। अयोध्या में राम जन्म स्थान पर भगवान राम का मंदिर बनवाने के लिए 500 साल की लड़ाई लड़नी पड़ी। लेकिन देखिए जब इतिहास करवट बदलता है तो कैसे बदलता है आज वह मूर्त रूप में काशी,मथुरा और अयोध्या में दिखाई दे रहा है । एक समय हमारे देश में पर्यटन के दो बड़े स्थल होते थे। एक आगरा का ताजमहल और दूसरा गोवा। आज हालत यह है कि इन दोनों स्थानों पर पर्यटकों की संख्या से इन तीन स्थानों पर जो तीर्थ यात्रियों की संख्या है,वह बहुत आगे निकल गई है और यह शुरुआत भर है।
अभी साल शुरू ही हुआ है और इन तीनों तीर्थस्थलों यया इनके अलावा भी महाकाल, विंध्यवासिनी देवी या देश के दूसरे मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है। अयोध्याा,काशी और मथुरा में केवल उत्तर प्रदेश से नहीं, देश-दुनिया से लोग आ रहे हैं। हालत यह है कि इन तीनों शहरों में आपको होटल या गेस्ट हाउस मिलना मुश्किल है। ट्रांसपोर्ट के साधन मिलना मुश्किल है। हवाई जहाज और ट्रेन की टिकटें महीनों पहले से बुक हैं। लोग अपने संसाधनों से आ रहे हैं। दर्शनों के लिए 4-4 किलोमीटर लंबी लाइन लग रही है। काशी विश्वनाथ मंदिर में स्पर्श पूजा 3 जनवरी तक के लिए बंद कर दी गई है,ताकि भीड़ को जल्दी से जल्दी आगे बढ़ाया जा सके। इस तरह का दृश्य आपने कब देखा,पढ़ा या सुना था? यह हिंदू जागरण से बनने वाला नया भारत है। लेकिन मैं बात केवल आस्था की नहीं कर रहा हूं। आस्था की कमी पहले भी नहीं थी। यह जो परिवर्तन हो रहा है,उस परिवर्तन से क्या निकल रहा है? सनातन धर्म को अपमानित करने के लिए एक शब्द गढ़ा गया था- हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ। 1952-53 से लेकर 1975-80 तक भारत की औसत विकास दर 3.5% थी। भारत के एक बहुत बड़े अर्थशास्त्री हुए हैं प्रोफेसर राजकृष्ण। उन्होंने 1978 में एक इंटरव्यू में कहा था कि यह हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ है। यानी हिंदू बहुत धीमे चलते हैं। अपनी विचारधारा के अनुसार वे तेजी से विकास नहीं कर सकते। आज जब हमारी विकास दर 8.5% पहुंच गई है और भारत की अर्थव्यवस्था जापान को पछाड़कर दुनिया की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था बन गई है,तब कोई ऐसा नहीं बोलता कि यह हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ है। यह सब पिछले 11 सालों में हुआ है। याद कीजिए जब अयोध्या का आंदोलन चल रहा था तो कहा जाता था कि यहां पर सार्वजनिक शौचालय बनवा दीजिए। पार्क या स्कूल बनवा दीजिए। मंदिर बनवाने से क्या होगा? ऐसे हजारों-लाखों हिंदू मिल जाएंगे, जो हिंदू धर्म को नहीं मानते। वे ही ऐसा कहते थे। अभी हाल ही में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तक ने बयान दिया कि मंदिर बनवाने से क्या रोजगार मिल जाएगा? महाकुंभ को मृत्युकुंभ कहा गया। तो वह जो मानसिकता थी,वह गई नहीं है। तो सवाल यह है कि बदला क्या है? बदला यह है कि जिन लोगों की आस्था सनातन धर्म में थी,वे मुखर हो गए हैं। वे निकल कर बाहर आने लगे हैं। अपनी आस्था का प्रगटीकरण करने लगे हैं। किसी को नुकसान पहुंचाए बिना अपने तीर्थस्थलों में चुपचाप आते हैं, दर्शन करते हैं और चले जाते हैं। उसका नतीजा क्या हो रहा है? एक नई हिंदू इकॉनमी की रचना हो रही है, जो तीर्थ स्थलों के इर्दगिर्द हो रही है। सिर्फ अयोध्या में 2024-25 में 18 करोड़ तीर्थ यात्री आए। मंदिर बनने से पहले यह संख्या बमुश्किल लाखों में होती थी। इतनी बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री आ रहे हैं तो वे किसी ट्रांसपोर्ट मोड का इस्तेमाल करते हैं।

मतलब जो भी साधन जिसके पास उपलब्ध तो उसमें तेल भरवाया जाता होगा। उसकी मेंटेनेंस करते होंगे। कहा जा रहा है कि इन स्थानों पर टैक्सी वालों की आमदनी पांच से छह गुना बढ़ गई है। होटलों,रेस्टोरेंट्स की आमदनी चार-पांच गुना बढ़ गई है। अर्थव्यवस्था का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसकी प्रगति न हो रही हो और यह केवल मंदिर के कारण हो रहा है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल रहा है। विकास के काम हो रहे हैं। इन शहरों का आधुनिकीकरण हो रहा है। ऐसा तो है नहीं कि श्रद्धालु आते हैं और दर्शन करके चुपचाप चले जाते हैं। वे कहीं रुकते भी हैं, खाना भी खाते हैं। वहां से कुछ न कुछ खरीद कर ले जाते हैं तो स्थानीय अर्थव्यवस्था के विकास में भी योगदान पहुंचाते हैं। तो भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था में मंदिरों का बड़ा योगदान है। बीते 10-11 सालों में यह जो बदलाव आ रहा है वह देश के नेतृत्व में विश्वास का प्रतीक है। मैं दो लोगों का नाम लूंगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,इन दोनों की जो इच्छाशक्ति है, विरासत को विकास से जोड़कर एक साथ चलने की जो सोच है,उसका असर दिखाई दे रहा है। लोगों को समझ में आ रहा है कि बदल क्या रहा है। इस देश में कोई ऐसा राज्य नहीं है, जहां कोई बड़ा मंदिर,बड़ा तीर्थ स्थान न हो। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा तो लोगों का रोजगार बढ़ेगा। रोजगार बढ़ेगा तो अर्थव्यवस्था बढ़ेगी। तो हिंदू धर्म एकमात्र ऐसा धर्म है, जिसकी आस्था से आर्थिक विकास भी जुड़ा हुआ है। इसका इतने लंबे समय तक तिरस्कार किया गया। हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ कहने का मतलब ही था हिंदुओं को अपमानित करना। और इस देश ने वह सब कुछ सुना और सहा। अब इतिहास करवट बदल रहा है। काशी और मथुरा के मुक्त होने के बाद आप देखेंगे कि किस तरह का बदलाव आता है। जिस तरह से अलग-अलग स्थानों पर हिंदू आस्था के चिन्ह मिल रहे हैं,वह बता रहे हैं कि लोगों की आस्था आज से हजारों साल पहले कितनी घनीभूत थी और उसका किस तरह से दमन किया गया। लेकिन हर बदलाव की तरह यह परिवर्तन भी धीरे-धीरे हो रहा है। बीते 10-11 सालों में यह परिलक्षित होने लगा है। पहले माना जाता था कि दुनिया में आस्था के दो केंद्र हैं। एक क्रिश्चियनिटी का वेटिकन और दूसरा इस्लाम का मक्का। अब तीसरा केंद्र बना है अयोध्या।
अयोध्या एक नए आस्था और अर्थव्यवस्था के मॉडल के रूप में उभर रही है। अगर हम देश भर में अपने पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार करें। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर सुविधाएं उपलब्ध कराएं तो यह इकॉनमी इतनी बड़ी हो सकती है, जिसकी कल्पना करना आज शायद कठिन है। जिन लोगों के सड़े हुए दिमाग में यह बात है कि मंदिर बनाने से रोजगार नहीं मिलता। विकास नहीं होता। ऐसे दिमाग वालों को आम लोगों ने जवाब दिया है। बदलाव की यह प्रक्रिया अगर चलती रही तो अगले 8-10 सालों में आपको भारत की एक नई तस्वीर दुनिया के सामने मिलेगी। दुनिया भर में उस मॉडल को अपनाने की कोशिश होगी। तो सांस्कृतिक पुनर्जागरण का काल शुरू हो चुका है। अब यह यात्रा रुकने वाली नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



