दिल्ली कोर्ट ने शुक्रवार को आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के खिलाफ सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) द्वारा दर्ज कथित नौकरी के बदले ज़मीन घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आरोप तय किए। ‘लाइव लॉ’ की एक रिपोर्ट के अनुसार राउज़ एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज विशाल गोगने ने कहा कि यादव और उनके परिवार ने आपराधिक सिंडिकेट की तरह काम किया और उनकी तरफ से एक बड़ी साज़िश रची गई थी।

जज ने आदेश सुनाते हुए कहा, “कोर्ट को शक के आधार पर लगता है कि लालू प्रसाद यादव ने अपने परिवार (बेटियों, पत्नी और बेटों) के लिए अचल संपत्ति हासिल करने के लिए सरकारी नौकरी का इस्तेमाल सौदेबाजी के हथियार के तौर पर करने की एक बड़ी साज़िश रची थी।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि सीबीआई की चार्जशीट से पता चलता है कि यादव के करीबी सहयोगियों ने साज़िश रचने वालों के तौर पर मदद की। कोर्ट ने यादव और उनके परिवार द्वारा दायर डिस्चार्ज की याचिका को पूरी तरह से अनुचित बताते हुए खारिज कर दिया।
98 आरोपियों में से कोर्ट ने 52 लोगों को बरी कर दिया, जिसमें कुछ सीपीओ भी शामिल थे। 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए। कोर्ट ने यादव की पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी प्रसाद यादव और कई अन्य आरोपियों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के आरोप तय किए।
इस मामले में कुल 107 लोगों को आरोपी बनाया गया है। हालांकि, उनमें से पांच की मौत हो गई है और उनके खिलाफ कार्यवाही खत्म कर दी गई।
सीबीआई ने 10 अक्टूबर, 2022 को इस मामले में 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती और अन्य लोग इस मामले में आरोपी हैं। एजेंसी का कहना है कि 2004 से 2009 के बीच बिहार के कई निवासियों को मुंबई, जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर में स्थित रेलवे के अलग-अलग ज़ोन में “ग्रुप-डी पदों” पर सब्स्टीट्यूट के तौर पर नियुक्त किया गया।
आरोप है कि इसके बदले में उन लोगों या उनके परिवारों ने अपनी ज़मीन तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के परिवार के सदस्यों और मेसर्स एके इंफोसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक कंपनी के नाम पर ट्रांसफर कर दी, जिसे बाद में उनके परिवार के सदस्यों ने अपने कब्ज़े में ले लिया। सीबीआई ने दावा किया कि रेलवे में की गई नियुक्तियां भारतीय रेलवे द्वारा भर्ती के लिए तय मानकों और दिशानिर्देशों के अनुसार नहीं थीं।



