कानून की धज्जियां उड़ाकर भी खुलेआम धमका रहीं बंगाल की मुख्यमंत्री।
प्रदीप सिंह।
पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा है,उसके निहितार्थ क्या है? क्या संदेश दिया जा रहा है? संदेश यह दिया जा रहा है कि राज्य सरकार केंद्र सरकार पर भारी है। केंद्र सरकार राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से डरी हुई है। अगर राज्य में केंद्र की जांच एजेंसी स्वतंत्र ढंग से काम नहीं कर सकती। अगर राज्य में हाईकोर्ट की कार्यवाही शांतिपूर्वक नहीं चल सकती। उसमें बाधा डालने की कोशिश होती है और जज को कहना पड़ता है कि यहां व्यवस्था कायम नहीं है इसलिए सुनवाई नहीं होगी तो यह कोई सामान्य घटना नहीं है। आजाद भारत में ऐसा पहली बार हो रहा है।

जब राज्य की मुख्यमंत्री केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों के हाथ से डॉक्यूमेंट्स छीन लें और उसके बाद सड़क पर उतर कर अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए बोलें कि हम अपने लोगों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे। तो सवाल है कि ममता बनर्जी क्या कह रही हैं? ममता बनर्जी कह रही हैं कि उन्हें केंद्र,संविधान और कानून की कोई परवाह नहीं है। इस तरह की स्थिति इमरजेंसी के अलावा कभी नहीं देखी गई। अब सवाल आता है केंद्र सरकार का। वह क्या कर रही है। पश्चिम बंगाल से सबसे ज्यादा घुसपैठ हो रही है,जिसके कारण देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में है। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग के लिए बीएसएफ को जमीन उपलब्ध कराने के वास्ते वह ममता बनर्जी को सात चिट्ठियां लिख चुके हैं। बिल्कुल सही बात है। यह संवैधानिक तरीके से उठाया गया कदम है। लेकिन जब कोई राज्य सरकार संविधान के रास्ते से हट जाए तो केंद्र सरकार क्या करें? इस संबंध में इसी देश के संविधान ने दो स्टेप बताए हैं। पहला आर्टिकल 355 के तहत राज्य सरकार को चेतावनी दीजिए। वहां अधिकारी एवं सलाहकार भेजिए और कहिए कि यह नहीं चलेगा। दूसरा उपाय है आर्टिकल 356 का प्रयोग यानी राज्य सरकार को बर्खास्त कीजिए और राष्ट्रपति शासन लगाकर व्यवस्था को सुधारिए। जब राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में हो उस समय भी केंद्र सरकार का संविधान प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल न करना क्या कहलाएगा? यह आप तय कीजिए।

पश्चिम बंगाल में ईडी की रेड के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरह डीजीपी और कोलकाता के पुलिस कमिश्नर के साथ पहुंचीं,वह कई सवाल खड़े करता है। अब ममता बनर्जी कह रही हैं कि वे मुख्यमंत्री के नाते नहीं,टीएमसी अध्यक्ष के नाते गई थीं तो फिर सवाल है कि टीएमसी अध्यक्ष के साथ डीजीपी और कमिश्नर क्यों जाएंगे? वे ईडी की टीम का घेराव क्यों करेंगे। ईडी के अधिकारियों को एक तरह से धमकी दी गई कि बाहर कैसे निकलोगे? ममता हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री तक को धमका चुकी हैं तो फिर अधिकारियों को धमकाना उनके लिए कौन सी बड़ी बात है। उनके राज में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की कार पर जानलेवा हमला हो चुका है। भाजपा के कितने कार्यकर्ता मारे गए,कितनों के घर जलाए गए,कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ,इसका कोई हिसाब नहीं है। और मैं सब बातें पीछे छोड़ने को तैयार हूं। देश की सुरक्षा के मुद्दे पर तो कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यहां तो देश की सुरक्षा के साथ-साथ सुनियोजित षड्यंत्र के तहत देश की डेमोग्राफी बदलने का भी सवाल जुड़ा हुआ है। ममता बनर्जी ने ईडी के अधिकारियों से डॉक्यूमेंट छीनकर जिस तरह से धमकी दी,उससे उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया कि मैं नहीं डरती हूं तुम्हें भी डरने की जरूरत नहीं। केंद्र सरकार मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती तो तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगी? मेरे रहते तुम्हारा कोई कुछ नहीं कर सकता। राज्य में मार्च-अप्रैल में चुनाव हैं। लग रहा था कि तृणमूल कार्यकर्ताओं ने जिस तरह 2021 में हिंसा की,इस बार वैसा करने की उनकी हिम्मत नहीं होगी। भाजपा के जो समर्थक हैं,कार्यकर्ता हैं,उनका हौसला बढ़ जाएगा। उनमें तृणमूल कैडर का डर कम हो जाएगा। उस पूरे खेल को ममता बनर्जी ने पलट दिया है। ऐसा दृश्य देखने के बाद भाजपा के पक्ष में बोलने, प्रचार करने और वोट देने की हिम्मत कौन करेगा? तो पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव तो आप सपना ही समझ लीजिए। जब कोलकाता हाईकोर्ट सुनवाई तक नहीं कर पा रहा है तो फैसला क्या आएगा,आप समझ सकते हैं। इतने गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट तक स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करने को तैयार नहीं। हालांकि सुन रहे हैं कि ईडी सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही है। ममता बनर्जी ने जो किया है, भारत के किसी नागरिक ने किया होता तो इस समय वह जेल में होता। ममता बनर्जी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई है। सवाल यह है कि दर्ज कौन कराएगा? दर्ज करने वाली है पश्चिम बंगाल की पुलिस,जो उनके कहे पर चलती है। ममता बनर्जी ने सीधे-सीधे भारत के संविधान और केंद्र की सरकार दोनों को चुनौती दी है कि जो करना हो करके दिखाओ। ऐसी चुनौती आज तक देश के किसी मुख्यमंत्री ने केंद्र की सरकार को नहीं दी है। तो पश्चिम बंगाल के चुनाव का नतीजा दो तरह से तय है। निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव हों तो ममता बनर्जी सत्ता से बाहर हो जाएंगी,लेकिन जो परिस्थितियां हैं इनमें चुनाव हुए तो ममता बनर्जी को कोई नहीं हटा सकता।
केंद्र सरकार अगर अब भी कोई एक्शन नहीं ले पाई और ममता बनर्जी की इस चुनौती का जवाब नहीं दे पाई तो पश्चिम बंगाल के जो आम नागरिक हैं,वे तो यही मानेंगे कि ममता बनर्जी की ताकत के सामने केंद्र की कुछ करने की हिम्मत नहीं होती है। सवाल है कि क्या केंद्र सरकार ममता बनर्जी के खिलाफ कोई कार्रवाई करने की हिम्मत जुटा पाएगी। कुछ लोग कह रहे हैं कि ममता बनर्जी डरी हुई हैं इसलिए यह सब कर रही हैं। अब आप तय कीजिए कि डरा हुआ कौन है? वह जो सड़क पर खुलेआम घूमकर चुनौती दे रहा है या वह जिसके हाथ में संविधान ने ताकत दी है और उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



