भारत ने साफ किया- स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी से समझौता नहीं।
प्रदीप सिंह।
क्या भारत और अमेरिका के संबंध इस मोड़ पर पहुंच गए हैं कि उनमें सुधार नहीं हो सकता? मुझे लगता है कि इस सवाल को थोड़ा बदल कर पूछा जाना चाहिए। क्या भारत और ट्रंप के संबंध उस मोड़ पर पहुंच गए हैं, जहां से उनमें सुधार की गुंजाइश नहीं है? क्योंकि हमें अमेरिका और ट्रंप को अलग-अलग करके देखना होगा। अमेरिकी प्रशासन पिछले 20-25 सालों से,चाहे डेमोक्रेट्स की सरकार रही हो या रिपब्लिकनंस की,भारत से संबंध बेहतर बनाने की लगातार कोशिश करता रहा है। अमेरिका ने भारत को स्ट्रेटेजिक पार्टनर बनाया। ट्रंप जब अपने पहले कार्यकाल में आए थे तब उन्होंने भी इसी नीति को आगे बढ़ाया। लेकिन जब वह दूसरी बार राष्ट्रपति बने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उनसे मुलाकात हुई तो उसी समय मोदी को समझ में आ गया था कि वह पहले कार्यकाल वाले ट्रंप नहीं हैं।

अगर अमेरिका का राष्ट्रपति अपने पड़ोसी और अपने मित्र देश कनाडा के बारे में यह टिप्पणी करे हम उसे अमेरिका का 51वां राज्य बनाने को तैयार हैं तो इसे आप क्या समझेंगे। यह एक देश की संप्रभुता पर सीधा हमला है। इसके बाद ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की कैमरे के सामने बेइज्जती की। इस पर भी हम यह समझने को तैयार नहीं हुए कि यह शुरुआत है। ट्रंप सबका नंबर लगाने वाले थे और लगा रहे हैं। इसके बाद ट्रंप ने ब्राजील के साथ बदले की कार्रवाई करते हुए उस पर 50% टैरिफ लगाया। ब्राजील पहला देश बना जिस पर 50% टैरिफ लगाया गया। आपने वह दृश्य भी देखा होगा जब यूरोपियन यूनियन के देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ट्रंप से मिलने गए और उनके सामने वैसे ही बैठे हुए नजर आए जैसे हेड मास्टर के सामने बच्चे बैठते हैं। तो यह ट्रंप का नया शौक है। ट्रंप ने भारत को भी इसी स्तर पर लाने की कोशिश की। पहले रूस से तेल खरीदने का बहाना बनाया लेकिन किया क्या? एक आतंकी देश पाकिस्तान को हथियार दिए, उसे आईएमएफ से कर्जा दिलाया,वहां के फेल्ड फील्ड फील्ड मार्शल को लंच पर बुलाया और उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बुलाना चाहते थे। मोदी समझ गए और उन्होंने जाने से मना कर दिया। उसके बाद से ट्रंप ऑपरेशन सिंदूर पर लगातार झूठ बोल रहे हैं। इससे प्रधानमंत्री मोदी को समझ में आ गया कि ट्रंप का इरादा अच्छा नहीं है। वह मोदी और भारत को झुकाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और कुछ भी झूठ बोल सकते हैं। यह बात सही है कि जुलाई में ट्रेड डील लगभग तय हो गई थी, लेकिन उसकी जो शर्तें थीं उसको मानने को भारत तैयार नहीं था। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री ने कहा भी कि डील पूरी तरह से तैयार थी। केवल राष्ट्रपति के सिग्नेचर होने थे। शर्त इतनी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फोन करें। ट्रंप ने चार बार बात करने की कोशिश की,लेकिन मोदी ने बात नहीं की।
ट्रेड डील को लेकर ट्रंप की शर्तें थीं कि रूस से तेल और हथियार मत खरीदिए। इसके अलावा चीन के प्रभाव वाले जो फोरम हैं, उनसे बाहर हो जाइए। ट्रंप चाहते थे कि भारत ब्रिक्स से बाहर हो जाए। ब्रिक्स ट्रंप को अमेरिका के पेट्रो डॉलर के लिए सबसे बड़ा खतरा नजर आता है। ब्रिक्स में शामिल देशों की संख्या बढ़ती जा रही है,जिन दिन वे अपनी लोकल करेंसी में व्यापार करना तय कर लेंगे,उस दिन डॉलर का भाव धड़ाम से नीचे गिरेगा। इसीलिए ट्रंप कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह से भारत और रूस दोनों को ब्रिक्स से अलग किया जाए। लेकिन ट्रंप को एससीओ में सबसे बड़ा झटका लगा। वहां चीन,भारत और रूस जिस तरह से मिले और उनकी जो बातचीत हुई, उसके बाद अमेरिका का सार्वजनिक बयान है कि हमने भारत और रूस को चाइना के हाथों खो दिया है। उस समय से ट्रंप को लगा कि भारत अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी से समझौता करने को तैयार नहीं है। ट्रंप चाहते थे कि भारत उसका एफ-35 फाइटर जेट खरीदे लेकिन भारत उसके लिए तैयार नहीं है। उसका कारण एक तो एफ-35 बहुत महंगा है दूसरा अमेरिका उसका सोर्स कोड देने यानी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए तैयार नहीं होता। ट्रंप भारत से यह भी चाहते थे कि वह बड़े पैमाने पर अमेरिका से हथियारों की खरीद का सौदा करे लेकिन मोदी ने साफ मना कर दिया। तो भारत का अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी से समझौता करने को तैयार न होना और एससीओ एवं ऑपरेशन सिंदूर का झटका ट्रंप को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। फिर ट्रंप के सामने सारी दुनिया झुक गई है। पूरा यूरोपियन यूनियन झुक गया, कोरिया, जापान और वियतनाम झुक गए। केवल चीन,भारत व ब्राजील नहीं झुके। ट्रेड डील पर भारत ने कह दिया कि जुलाई में हमने जो ऑफर दिया था, वो हमारा लास्ट ऑफर है। उससे ज्यादा हम कुछ नहीं दे सकते। मतलब अगर इन शर्तों पर डील करनी है तो होगी वरना नहीं। तो ट्रंप उसके बाद से लगातार भारत पर दबाव बनाने के लिए तरह-तरह के कदम उठाते रहे हैं। रूस की जो दो बड़ी तेल कंपनियां थीं। उनमें से एक से जिससे रिलायंस तेल खरीदता था, उस पर प्रतिबंध लगा दिया। अब वहां के एक रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम 500% टैरिफ का बिल लेकर आए हैं। हाल ही में ग्राहम ने ट्रंप के बगल में खड़े होकर कहा कि भारत के एंबेसडर बार-बार हमसे कह रहे थे कि हमने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है। अब ट्रंप से कहिए कि डील कर लें। सवाल यह है कि इस तरह की डिप्लोमेटिक बात जिन लोगों के बीच हुई है, उन्हीं के बीच रहती है। अगर ये सच है तब भी उसको सार्वजनिक करने के पीछे आपका इरादा क्या है। दूसरा भारत की ओर से इसका एक तरह से खंडन किया गया है। सितंबर-अक्टूबर में भारत ने रूस से जितना तेल खरीदा था, उससे ज्यादा नवंबर में खरीदा है और ट्रंप कह रहे हैं कि मोदी को पता था कि मैं रूस से तेल खरीदने के कारण नाराज हूं इसलिए मुझे खुश करने के लिए रूस से तेल खरीदना कम कर दिया। अब इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है?

तो एक तरह से ट्रंप के राज में अमेरिका ने भारत को छोड़ दिया है। क्यों छोड़ दिया है? अमेरिका पिछले काफी समय से लगातार ये कोशिश कर रहा है कि चीन के काउंटर वेट के रूप में भारत को खड़ा किया जाए, लेकिन साथ ही उसका यह भी ध्यान था कि भारत इतना ताकतवर न हो जाए कि फिर हमारे लिए चुनौती बन जाए। लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया कि हम किसी देश के खिलाफ अमेरिका का काउंटर वेट बनने यानी इस्तेमाल होने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका से हमारे अलग रिश्ते हैं। चीन से हमारे अलग रिश्ते हैं। यह ठीक है कि चीन और हमारे बीच कोई दोस्ताना रिलेशन नहीं हैं, लेकिन हम उसको और बिगाड़ना नहीं चाहते। इसके अलावा 2020 में जब लद्दाख में चीन के साथ झड़प हुई तो अमेरिका चाहता था कि भारत चीन से युद्ध करे। भारत ने इस ट्रैप में फंसने से मना कर दिया। भारत की इन नीतियों के कारण अमेरिका तरह-तरह के हथकंडों से भारत को परेशान करने में जुटा है। ट्रंप के आने के बाद भी यह नीति जारी है। कभी भारत में फर्जी किसान आंदोलन चलाया गया,दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगा कराया गया जिसे जांच एजेंसियों ने रिजीम चेंज ऑपरेशन बताया है, सीएए के विरोध में विदेशी फंडेड आंदोलन चलाया गया,भारत के पड़ोसी देशों श्रीलंका,बांग्लादेश,नेपाल में तख्ता पलट कराया गया। अमेरिका किसी भी हालत में भारत को झुकाना चाहता है और मोदी के नेतृत्व में भारत कह रहा है कि किसी भी सूरत में झुकेंगे नहीं।
ट्रंप के लिए उनके ईगो से बड़ा कुछ नहीं है। तो जो आसिफ मुनीर की तरह उनका ईगो मसाज करेगा, उसको इनाम मिलेगा और जो मोदी की तरह ऐसा नहीं करेगा,उसको परेशान करने की कोशिश की जाएगी। अब अमेरिका कह रहा है कि जुलाई और नवंबर में हमने जो डील ऑफर की थी वह अब खत्म हो चुकी है। भारत को भी मालूम है कि वह खत्म है क्योंकि उस डील में जो शर्तें थीं उसको भारत मानने को तैयार ही नहीं था। आने वाले समय में भी भारत और अमेरिका के बीच में कोई ट्रेड डील होगी, इसकी संभावना कम हो गई है। 50% टैरिफ के साथ जीना हमने सीख लिया है। हालांकि उसका कुछ नुकसान हुआ है,लेकिन हमने अपनी ताकत भी बढ़ाई है। एक्सपोर्ट को डाईवर्सिफाई किया है। आत्मनिर्भर भारत अभियान को तेज किया है। तो भारत हर संकट का सामना करने और उससे निपटने के लिए तैयार है।
वैसे ट्रंप प्रशासन के भारत को परेशान करने वाले कदमों के बीच भारत भी अमेरिका से अब दो स्तर पर डील कर रहा है। एक व्हाइट हाउस से और दूसरा अमेरिकी संसद एवं अमेरिकी कंपनियों से। अमेरिका की मल्टीनेशनल कंपनियां भारत में इन्वेस्टमेंट की रोज नई घोषणाएं कर रही हैं और भारत उनका स्वागत कर रहा है। भारत अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए सीनेट और कांग्रेस में भी लॉबिंग कर रहा है। भारत ट्रंप से झुककर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। अब ये देखना यह है कि अमेरिका किस हद तक जाता है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)


