धन्यभागी हैं वे प्रेमी, जिनको उनकी प्रेमिकाएं नहीं मिल पातीं!

ओशो।
ऐसा नहीं है, आमतौर से हम सोचते हैं कि एक गरीब आदमी परेशान है, क्योंकि गरीबी है। लेकिन हमें पता नहीं है कि अमीर होते ही से परेशानी का तल बदलता है, परेशानी नहीं बदलती। सच तो यह है कि गरीब इतना परेशान कभी होता ही नहीं जितना अमीर परेशान हो जाता है। क्योंकि गरीब को एक तो जस्टीफिकेशन होता है परेशानी का..कि मैं गरीब हूं। अमीर को वह जस्टीफिकेशन भी नहीं रह जाता। अब वह कारण भी नहीं बता सकता कि मैं परेशान क्यों हूं? और जब परेशानी अकारण होती है, तब परेशानी भयंकर हो जाती है। कारण से राहत मिलती है, कंसोलेशन मिलता है, क्योंकि कारण से यह भरोसा होता है कि कल कारण को अलग भी कर सकेंगे। लेकिन जब कोई बीमारी अकारण खड़ी हो जाती है तब कठिनाई शुरू हो जाती है।

Who is Osho? Know about the rise and fall of 'Sex Guru': Here's everything  about his life, career & more - Lifestyle News | The Financial Express
Courtesy: The Financial Express

इसलिए गरीब मुल्कों ने बहुत दुख सहे हैं; जिस दिन वे अमीर होंगे उस दिन उनको पता चलेगा कि अमीर मुल्कों के अपने दुख हैं। हालांकि मैं पसंद करूंगा, गरीब के दुख की बजाय अमीर का दुख ही चुनने योग्य है। जब दुख ही चुनना हो तो अमीर का ही चुनना चाहिए। लेकिन तीव्रता बेचैनी की बढ़ जाएगी।

इसलिए आज अमेरिका जितना बेचैन और परेशान है, उतना आज पृथ्वी पर कोई भी नहीं है। हालांकि जितनी सुविधा अमेरिका के पास है, उतनी कभी किसी समाज के पास नहीं थी। असल में अमेरिका में पहली दफे डिसइल्यूजनमेंट हुआ, पहली दफे भ्रम टूट गए। सोचते थे कि कारण के कारण हम परेशान हैं। अमेरिका को पहली दफा पता चलना शुरू हुआ है कि कारण नहीं है। परेशानी कारण की वजह से नहीं है, आदमी परेशानी है। वह नई परेशानी खोज लेता है। वह जो उसके भीतर एक अस्तित्व है, वह चैबीस घंटे मांग कर रहा है उसकी जो नहीं है। जो है, वह रोज बेकार हो जाता है। जो मिल जाता है, वह बेकार हो जाता है। जो नहीं है, वह आकर्षित करता है। वह जो नहीं है, उसको पाने की निरंतर चेष्टा है।

नीत्शे ने कहीं कहा है कि आदमी एक सेतु है, स्ट्रेच्ड बिट्वीन टू इंपासिबिलिटीज। दो असंभावनाओं के बीच में फैला हुआ पुल है। निरंतर असंभव के लिए आतुर, पूरे होने के लिए आतुर।

इस पूरे होने की आतुरता से सारे धर्म पैदा हुए। और यह जानना उपयोगी होगा कि एक दिन धर्मगुरु और चिकित्सक पृथ्वी पर एक ही आदमी था। धर्मगुरु ही चिकित्सक था, पुरोहित ही चिकित्सक था। वह जो प्रीस्ट था, वही डाक्टर था। और आश्चर्य न होगा कि कल फिर स्थिति वही हो जाए। थोड़ा सा फर्क होगा। अब जो चिकित्सक होगा वही पुरोहित हो सकता है! अमेरिका में वह घटना घटनी शुरू हो गई है, क्योंकि पहली दफा यह बात अमेरिका में साफ हो गई है कि सवाल सिर्फ शरीर का नहीं है। बल्कि यह भी साफ होना शुरू हो गया है कि अगर शरीर बिल्कुल स्वस्थ हुआ तो मुसीबतें बहुत बढ़ जाएंगी, क्योंकि पहली दफे भीतर के छोर पर जो रोग हैं, उनका बोध शुरू हो जाएगा।

हमारे बोध के भी तो कारण होते हैं। अगर मेरे पैर में कांटा गड़ा होता है तो मुझे पैर का पता चलता है। जब तक कांटा पैर में न हो, पैर का पता नहीं चलता। और जब पैर में कांटा होता है तो मेरी पूरी आत्मा एरोड हो जाती है, तीर बन जाती है पैर की तरफ। वह सिर्फ पैर को ही देखती है, कुछ और नहीं देखती..स्वाभाविक। लेकिन पैर से कांटा निकल जाए, फिर भी आत्मा कुछ तो देखेगी। भूख कम हो जाए, कपड़े ठीक मिल जाएं, मकान व्यवस्थित हो जाए, जो पत्नी चाहिए वह मिल जाए..हालांकि इससे बड़ा दुख नहीं है दुनिया में। जिनको चाही गई पत्नी मिल जाए, उनके दुख का कोई अंत नहीं है; क्योंकि चाही गई पत्नी न मिले तो कम से कम आशा में एक सुख रहता है; वह भी खो जाता है।

Osho's Discourse on His Enlightenment
Courtesy: Ma Ananda Sarita

मैंने सुना है एक पागलखाने के संबंध में। एक आदमी गया है एक पागलखाने को देखने। सुप्रिनटेंडेंट उसे घुमा रहा है। और एक कठघरे में उसने पूछा कि इस आदमी को क्या हो गया है? उस सुप्रिनटेंडेंट ने..वह एक पागल है, अपने सींकचों में बंद, एक तस्वीर को लिए हुए, उसे हृदय से लगा रहा है, कुछ गीत गा रहा है..तो उस सुप्रिनटेंडेंट ने कहा कि इस आदमी को जिस स्त्री से प्रेम था, वह इसे मिल नहीं पाई, यह पागल हो गया है। फिर दूसरे कठघरे में एक दूसरा आदमी सींकचे तोड़ने की कोशिश कर रहा है, छाती पीट रहा है, बाल नोच रहा है। पूछा कि इस आदमी को क्या हो गया है? तो उस सुप्रिनटेंडेंट ने कहा कि इसको वही स्त्री मिल गई, जो उसको नहीं मिल पाई! यह इसलिए पागल हो गया है।

लेकिन जिसको नहीं मिल पाई वह आनंद में था तस्वीर के साथ, इतना फर्क था। जिसको मिल गई वह छाती पीट रहा था और सींकचों से सिर फोड़ रहा था, वह आनंद में नहीं था। धन्यभागी हैं वे प्रेमी, जिनको उनकी प्रेयसियां नहीं मिल पातीं!

असल में जो हमें नहीं मिल पाता उसके लिए हम सदा ही आशा बांध कर जी पाते हैं। मिलते ही आशा टूट जाती है और हम खाली हो जाते हैं। जिस दिन चिकित्सक शरीर से आदमी को छुटकारा दिला देगा, उस दिन चिकित्सक को दूसरा काम पूरा करना ही पड़ेगा। जिस दिन हम आदमी को बीमारी से मुक्त करा देंगे, उस दिन हम आदमी को पहली दफे आध्यात्मिक बीमारी को पैदा करने की सिचुएशन, स्थिति देंगे। वह पहली दफे भीतर परेशान होगा और पूछना शुरू करेगा कि अब सब ठीक हो गया, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं है!

यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि हिंदुस्तान के चैबीस तीर्थंकर राजाओं के बेटे हैं; बुद्ध राजा के बेटे हैं; राम, कृष्ण, ये सब शाही परिवारों से आए हैं। इनकी बेचैनी शरीर के तल से समाप्त हो गई है। इनकी बेचैनी भीतर के तल से शुरू हो गई है। (हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्)