आदमी होने की बीमारी का इलाज…

ओशो।
मेडिसिन आदमी को ऊपर से उसके शरीर की व्यवस्था और बीमारी से मुक्त करने की चेष्टा है। ध्यान रहे, आदमी सब बीमारियों से मुक्त होकर भी आदमी होने की बीमारी से मुक्त नहीं होता। वह जो आदमी होने की बीमारी है, वह असंभव की चाह है। वह जो आदमी होने की बीमारी है, वह किसी भी चीज से तृप्त न होना है। वह जो आदमी होने की बीमारी है, वह सदा जो मिल जाए उसे व्यर्थ कर देना है और जो नहीं मिला उसकी सार्थकता में लग जाना है।

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वह आदमी होने की बीमारी का इलाज ध्यान है। बीमारियों का इलाज चिकित्सक के पास है, चिकित्सा के पास है, लेकिन बीमारी… वह जो आदमी जिसका नाम है… उस बीमारी का इलाज ध्यान के पास है। और उस दिन चिकित्सा-शास्त्र पूरा हो सकेगा, जिस दिन हम आदमी के भीतरी छोर को भी समझ लें और उसके साथ भी काम शुरू कर दें। क्योंकि मेरी अपनी समझ ऐसी है कि भीतरी छोर पर वह जो बीमार आदमी बैठा हुआ है, वह हजारों तरह की बीमारियां बाहर के छोर पर भी पैदा करता है।

जैसा मैंने कहा..शरीर पर बीमारी पैदा हो, तो उसके वाइब्रेशंस, उसकी तरंगें अंतरात्मा तक पहुंच जाती हैं। अगर अंतरात्मा बीमार हो, तो उसकी तरंगें भी शरीर के छोर तक आती हैं। इसीलिए तो दुनिया में हजारों तरह की चिकित्साएं चलती हैं; हजारों तरह की पैथीज हैं दुनिया में। यह हो नहीं सकता। यह होना नहीं चाहिए। अगर पैथोलॉजी एक साइंस है, तो हजारों तरह की नहीं हो सकतीं। लेकिन हजारों तरह की हो सकती हैं, क्योंकि आदमी की बीमारियां हजारों तरह की हैं। कुछ बीमारियों को एलोपैथी फायदा पहुंचा ही नहीं सकती। जो बीमारियां भीतर से बाहर की तरफ आती हैं, उनके लिए एलोपैथी एकदम बेमानी हो जाती है। जो बीमारियां बाहर से भीतर की तरफ जाती हैं, उनके लिए एलोपैथी बड़ी सार्थक हो जाती है। जो बीमारियां भीतर से बाहर की तरफ आती हैं, वे बीमारियां शारीरिक होती ही नहीं, शरीर पर केवल प्रकट होती हैं। उनके होने का तल सदा ही साइकिक या और गहरे में स्प्रिचुअल होता है; या तो मानसिक होता है या आध्यात्मिक होता है।

अब जिस आदमी को मानसिक बीमारी है, उसका अर्थ यह हुआ कि उसको शारीरिक चिकित्सा कोई फायदा नहीं पहुंचा सकेगी। शायद नुकसान पहुंचाए। क्योंकि चिकित्सा कुछ करेगी उस आदमी के साथ। और उसका कुछ करना अगर फायदा नहीं पहुंचाता तो नुकसान पहुंचाएगा। सिर्फ वे ही चिकित्साएं नुकसान नहीं पहुंचातीं जो फायदा भी नहीं पहुंचा सकती हैं। जैसे होमियोपैथी कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती, क्योंकि फायदे का भी कोई डर नहीं है। लेकिन होमियोपैथी से फायदा होता है। पहुंचा नहीं सकती, इसका यह मतलब नहीं कि होमियोपैथी से फायदा नहीं होता है। फायदा होता है। फायदा होना दूसरी घटना है, फायदा पहुंचाना बिल्कुल दूसरी घटना है। ये दो चीजें हैं अलग-अलग। फायदा होता है।

फायदा इसलिए होता है कि वह आदमी अगर बीमारी को मनस के तल से पैदा कर रहा है, तो उस बीमारी के लिए फाल्स मेडिसिन की जरूरत है, उसे झूठी औषधि की जरूरत है। उसे सिर्फ भरोसा दिलाने की जरूरत है कि वह ठीक है। वह बीमार नहीं है, सिर्फ बीमार होने के ख्याल में है। उसे भरोसा भर आ जाए। वह राख से भी आ सकता है किसी साधु की, वह गंगा के जल से भी आ सकता है। और अभी तो बहुत प्रयोग चलते हैं, जिसको आप औषधि-आभास, प्लेसिबो कहें, उसके बहुत प्रयोग चलते हैं। अगर दस मरीज एक ही तरह की बीमारी के मरीज हैं, उनमें तीन को एलोपैथी की चिकित्सा दी जाए, तीन को होमियोपैथी की दी जाए, तीन को नेचरोपैथी की दी जाए, बड़े मजे की बात यह है कि सब पैथियां बराबर ठीक करती हैं और बराबर मारती हैं। अनुपात में कोई बहुत फर्क नहीं पड़ता। तब थोड़ा सोचने जैसा मामला हो जाता है कि बात क्या है?

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मेरी दृष्टि में, एलोपैथी अकेली वैज्ञानिक चिकित्सा है। लेकिन चूंकि आदमी अवैज्ञानिक है, इसलिए वैज्ञानिक चिकित्सा अकेला काम नहीं कर सकती है। एलोपैथी अकेली विज्ञान के ढंग से आदमी के शरीर के साथ व्यवहार करती है। लेकिन आदमी चूंकि भीतर से काल्पनिक भी है, प्रोजेक्टिव भी है, प्रक्षेप भी करता है, इसलिए एलोपैथी पूरा काम नहीं कर पाती। सच तो यह है कि जिस मरीज पर एलोपैथी काम नहीं कर पाती, वह मरीज अवैज्ञानिक ढंग से बीमार है।

अवैज्ञानिक ढंग से बीमार होने का मतलब क्या है? यह शब्द बड़ा अजीब सा लगेगा! क्योंकि वैज्ञानिक ढंग की चिकित्सा हो सकती है, अवैज्ञानिक ढंग की चिकित्सा हो सकती है। मैं आपसे कह रहा हूं कि वैज्ञानिक ढंग से बीमार होना भी होता है, अवैज्ञानिक ढंग से भी बीमार होना होता है। अन-साइंटिफिक वे.ज ऑफ बीइंग इल हैं। असल में जो बीमारी चित्त के तल से शुरू होती है और शरीर पर आती है, वह वैज्ञानिक रूप से हल नहीं हो सकती।

एक स्त्री को मैं जानता हूं, युवती को, जिसकी आंखें अंधी हो गईं। लेकिन जो अंधापन था वह साइकोलाजिकल ब्लाइंडनेस थी। उसकी आंखें सच में ही अंधी नहीं हो गई थीं। आंख के जानकारों ने कहा कि आंखें बिल्कुल ठीक हैं; लड़की धोखा दे रही है। लेकिन लड़की बिल्कुल धोखा नहीं दे रही थी। क्योंकि आप उसको आग की तरफ छोड़ दें, तो वह आग की तरफ भी चली जाती थी। वह दीवाल से भी टकराती थी और सिर भी फोड़ लेती थी। वह लड़की धोखा नहीं दे रही थी, आंखें उसकी सच में ही अंधी हो गई थीं। लेकिन चिकित्सक की पकड़ के बाहर थी बीमारी।

मेरे पास उसे लाए थे। तो मैं उसको समझने की कोशिश किया। पता चला कि किसी से उसका प्रेम है और घरवाले लोगों ने उसके प्रेमी से उसका मिलना-जुलना बंद कर दिया। जब मैं निरंतर उससे थोड़े दो-चार दिन बात किया, तो उसने कहा कि मुझे तो सिवाय उसके किसी को देखने की इच्छा ही नहीं है। यह संकल्प कि सिवाय उसके अब देखना ही नहीं है किसी को, इतनी तीव्रता से अगर मन में उठे कि अब उसके सिवाय देखने का कोई अर्थ ही न रहा, तो आंखें साइकोलाजिकली ब्लाइंड हो जाएंगी, आंखें अंधी हो जाएंगी, आंखें देखना बंद कर देंगी। यह आंख की एनाटॉमी को देख कर नहीं समझा जा सकेगा; क्योंकि आंख की एनाटॉमी बिल्कुल ही ठीक होगी, आंख का यंत्र बिल्कुल ही ठीक होगा। सिर्फ पीछे से जो ध्यान देने वाला था आंख के, वह सरक गया, उसने हटा लिया अपना हाथ।

यह हम रोज अनुभव करते हैं, लेकिन हमारे ख्याल में नहीं है कि हमारे शरीर का यंत्र तभी तक काम करता है जब तक हम पीछे मौजूद होते हैं। (हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानम्)