लव जिहाद के खिलाफ हिंदू और क्रिश्चियन साथ आए तो बदल जाएगी राजनीति।

प्रदीप सिंह।
देश की अंदरूनी राजनीति में आजकल बड़ी हलचल चल रही है। अप्रैल में चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश पश्चिम बंगाल,केरल,तमिलनाडु,असम और पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह केरल में थे। वहां उन्होंने कहा कि राज्य में इस बार मुख्यमंत्री भाजपा का होगा। अब यह बात किसी के गले के नीचे नहीं उतरने वाली।

Peace in Kerala but a major threat looms large Amit Shah says action will  be taken like PFI केरल में शांति लेकिन मंडरा रहा है बड़ा खतरा, अमित शाह  बोले- PFI जैसा
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केरल में सत्ता की लड़ाई दो गठबंधनों लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट,जिसका नेतृत्व सीपीएम करती है और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट,जिसका नेतृत्व कांग्रेस पार्टी करती है,के बीच होती रही है। लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट लगातार दो बार से सत्ता में है। वहां पिछली बार के अपवाद को छोड़ दें तो हर पांच साल बाद इन दोनों गठबंधनों के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही  है। इस बार पिनराई विजयन सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी बहुत है, लेकिन फिर भी उसका फायदा उठाने की हालत में कांग्रेस पार्टी दिखाई नहीं दे रही है। ऐसी हालत में इन दोनों गठबंधनों के बीच भाजपा अपना रास्ता बना रही है और शायद इसी वजह से आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर शाह इतने आत्मविश्वास में हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को केरल में 20 में से सिर्फ एक सीट मिली थी। सीटों के लिहाज से देखें तो कोई बड़ी सफलता नहीं है,लेकिन दूसरी दृष्टि से देखें तो केरल में आजादी के बाद से पहली बार भाजपा का कोई लोकसभा सदस्य जीता है। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा ने तिरुवनंतपुरम म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में जीत हासिल की। वहां उसने चार दशक से ज्यादा समय से काबिज सीपीएम को पटखनी दी। राज्य में निकाय और पंचायत चुनाव में भाजपा को शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में अच्छे वोट मिले हैं। केरल की बात करते हुए अमित शाह अपना चुनावी अंकगणित बता रहे थे। वह कह रहे थे कि जब मैं 15 साल का था तब से चुनाव नतीजों का विश्लेषण करता हूं। उन्होंने बताया कि केरल में 2011 में भाजपा को 11%,2016 में 16% और 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 20% वोट मिला। किसी राज्य में अगर किसी पार्टी को 20% वोट मिल जाए तो 20 से 40% पहुंचने में उसको 5 साल का समय नहीं लगता,यह जल्दी हो जाता है। इसी से उनका मतलब था कि भाजपा 2026 के विधानसभा चुनाव में 40% वोट शेयर ले सकती है। अब यह सुनने में अविश्वसनीय लगता है। कोई नहीं मानेगा कि केरल में भाजपा की सरकार बन जाएगी, लेकिन अमित शाह को भरोसा है। तो उनको यह भरोसा क्यों है? उन्होंने यह देखा होगा कि उत्तर प्रदेश में 1991 में भाजपा को पहली बार बहुमत मिला था तो उसको लगभग 33% वोट मिले थे। अब भाजपा 50% का थ्रेशहोल्ड पार कर चुकी है। असम में लोकसभा की 14 सीटें हैं। वहां 2001,2006,फिर 2011 में लगातार तीन चुनाव तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी जीतती रही। 2011 के विधानसभा चुनाव में असम में भाजपा को 16.1% वोट और 27 सीटें मिली थीं। लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव में उसका वोट शेयर बढ़कर 41.9% और सीटें बढ़कर 86 हो  गईं। तो पांच साल में भाजपा ने 16 से 41% की छलांग लगाई,जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार वहां मुस्लिम आबादी करीब 34% थी। तो जब चुनाव बदलता है और खासतौर से मैं कहूंगा मतदाता का मन बदलता है तब सारे आंकड़े फेल हो जाते हैं कि पिछले चुनाव में कितना वोट मिला था। तो अमित शाह जो बता रहे थे वह इन्हीं आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर है।

केरल के ईसाइयों में उम्मीद क्यों देख रही है बीजेपी? नजर वोट बैंक पर
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केरल में भी मुस्लिम पापुलेशन 26.56% है लेकिन वहां डिसाइडिंग फैक्टर क्रिश्चियन वोट होता है। भाजपा को इस बार इसी क्रिश्चियन वोट से उम्मीद है। क्रिश्चियन भाजपा को क्यों वोट देगा,इसके दो-तीन कारण हैं। गोवा और नॉर्थ ईस्ट में क्रिश्चियन वोटों के समर्थन से ही भाजपा की सरकार है। वहां सरकार में बड़ी संख्या में क्रिश्चियन मंत्री हैं। दूसरा जो बड़ा कारण है वह है लव जिहाद। लव जिहाद टर्म की शुरुआत ही केरल से हुई। सीपीएम के मुख्यमंत्री वीएस अचुतानंदन ने असेंबली में इस बात को स्वीकार किया था। क्रिश्चियन समाज ने यह मुद्दा उठाया था कि उनकी लड़कियों का धर्मांतरण कराया जा रहा है। उन्होंने इस मामले में आरएसएस से संपर्क किया कि हम दोनों मिलकर इस समस्या से लड़ें। हिंदुओं के साथ भी यह समस्या है। इस बात को केरला स्टोरी फिल्म में भी दिखाया गया है। अब ये लव जिहाद पूरे देश में फैला हुआ है। मुस्लिम समाज ने डेमोग्राफी बदलने का यह एक नया औजार खोजा है। तो केरल में क्रिश्चियन समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जिनको लगता है कि अगर हमको अपनी महिलाओं को लव जिहाद से बचाना है तो बीजेपी के साथ मिलकर ही ऐसा कर सकते हैं। अगर हमने बीजेपी से हाथ नहीं मिलाया तो ऐसा समय आने में देर नहीं लगेगी, जब हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वोट में बदलेगा? अमित शाह ने जो गणित बताया है वह इसी पर निर्भर है। भाजपा को अगर 2026 में 40% वोट शेयर तक पहुंचना है तो क्रिश्चियन समाज के समर्थन से ही पहुंच सकती है। इसके लिए भाजपा कई तरह के कार्यक्रम चला रही है। आप लगातार दो क्रिसमस से देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री दिल्ली के प्रमुख चर्च में जाते हैं। हैदराबाद में हुई भाजपा की नेशनल एग्जीक्यूटिव में प्रधानमंत्री ने गोवा और नॉर्थ ईस्ट के क्रिश्चियन मंत्रियों से कहा कि केरल जाइए और ईसाई समाज के लोगों को बताइए कि भाजपा उस समाज के लिए क्या कर रही है।

केरल में कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का गठबंधन है। खबर है कि यूडीएफ में एसडीपीआई को भी शामिल किया जा सकता है। वह ऐसे संगठनों में शामिल है, जो लव जिहाद में सबसे आगे हैं। हाल ही में सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि अगर कांग्रेस की सरकार बन गई तो केरल का गृह मंत्री मुस्लिम समाज से होगा। यह क्रिश्चियन और हिंदू समाज दोनों को डराने के लिए काफी है कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो उनका क्या हश्र होने वाला है। केरल में सांप्रदायिक दंगे भी कोई नई बात नहीं है। मोपला का नरसंहार कौन भुला सकता है। फिर भी हिंदू उस पार्टी को वोट देते हैं, जिसके साथ मुस्लिम लीग खड़ी है। तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का कॉन्फिडेंस जमीन पर खरा तभी उतर सकता है,जब हिंदू और क्रिश्चियन दोनों इस खतरे को पहचानें और साथ आने का निर्णय लें।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)