कांग्रेसी नई-नई उपाधियां देकर उनका मजाक बनवा रहे
प्रदीप सिंह।तृष्णा तू न गई मेरे मन से। यह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की बड़ी प्रसिद्ध रचना है। इसमें मनुष्य की चाहतों,लालसाओं,ईर्ष्या का जो मनोविज्ञान है उस पर टिप्पणी है। तृष्णा जब अनियंत्रित हो जाए तो अशांति का कारण बन जाती है क्योंकि उसके बाद व्यक्ति के पास जो है,उससे वह संतुष्ट नहीं होता। वह दूसरों की खुशी से जलता है। अब सवाल है कि यह बात किसके बारे में किस संदर्भ में कही जा रही है?
तमिलनाडु में विधानसभा का चुनाव होने वाला है। पिछले दिनों कांग्रेस नेता राहुल गांधी तमिलनाडु पहुंचे। वह किसी चुनावी रैली में नहीं गए,वह एक स्कूल में गए थे,लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इसको एक पॉलिटिकल इवेंट बनाने की कोशिश की। एक प्रचार सामग्री तैयार की गई,उसमें राहुल गांधी ऐसे चल रहे हैं, जैसे कोई सेनापति चल रहा हो और पीछे से थलाइवा का गीत गाया जा रहा है। थलाइवा नायक को कहते हैं। तो मुझे याद आया कि अभी ज्यादा नहीं हुए बिहार में भी विधानसभा का चुनाव था। वहां चुनाव के पहले कांग्रेस वाले उनको जननायक कहते थे,लेकिन चुनाव का नतीजा बताता है कि बिहार की जनता उन्हें जननायक नहीं मानती। वही जननायक तमिलनाडु पहुंचते-पहुंचते थलाइवा हो गए। सवाल है कि क्या तमिलनाडु के लोग उन्हें इस नजर से देखते हैं। यह जो नई-नई उपाधियां राहुल गांधी को कांग्रेस के लोग देने की कोशिश कर रहे हैं, इसका आधार क्या है? दरअसल यह सब करके कांग्रेसी राहुल गांधी का मजाक बना रहे हैं। ऐसी उपाधियां देने से किसी का कद नहीं बढ़ता। कद जनसमर्थन से बढ़ता है।

बिहार की ही तरह कांग्रेस तमिलनाडु की राजनीति में भी एक गठबंधन में है। वह डीएमके की जूनियर पार्टनर है। पिछले विधानसभा चुनाव में उसे 18 सीटों पर जीत मिली थी। डीएमके कांग्रेस को गठबंधन में तो साथ रखती है पर सरकार में शामिल नहीं करती। इसबार कांग्रेस पार्टी का एक धड़ा तमिलनाडु में द्रमुक के बजाए सुपरस्टार विजय की पार्टी टीवीके से गठबंधन करना चाहता है,जबकि दूसरा द्रमुक के साथ ही गठबंधन जारी रखने के पक्ष में है। राहुल गांधी के एक करीबी प्रवीण चक्रवर्ती हाल ही में विजय से मिल भी चुके हैं। उधर विजय भी एक साइकोलॉजिकल गेम खेल रहे हैं। वह कांग्रेस को नेचुरल एलाई बताते हैं। हालांकि उनको मालूम है कि कांग्रेस का तमिलनाडु में कुछ नहीं है फिर भी वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि अगर डीएमके के अलायंस से कांग्रेस निकल जाती है तो उन्हें यह नैरेटिव बनाने में आसानी हो जाएगी कि डीएमके सत्ता से बाहर जा रही है। उधर कांग्रेस के इस रुख से डीएमके कैडर की नजर में कांग्रेस संदेहास्पद हो गई है। उसका कहना है कि हम अपना वोट ट्रांसफर कराते हैं तभी कांग्रेस के उम्मीदवार जीत पाते हैं। अकेले दम पर जीतना कांग्रेस के बस की बात नहीं है।

विजय के साथ मुश्किल यह है कि उनकी पार्टी का संगठन है नहीं। अभी तक यह मालूम नहीं है कि विजय की फैन फॉलोइंग वोट में बदलेगी कि नहीं। बीजेपी इसमें अवसर देख रही है। विजय अगर अलग लड़ते हैं तो माइनॉरिटी वोट डिवाइड होगा जो एनडीए को फायदा पहुंचाएगा और अमित शाह का मानना है कि देर सवेर विजय को एनडीए में लाया जा सकता है। माइनॉरिटी वोट कटने के डर से विजय फिलहाल बीजेपी के साथ जाते नहीं दिखना चाहते। ऐसे में भाजपा ने एक प्रस्ताव दिया गया है कि विजय अन्ना द्रमुक के साथ अलायंस करें। वैसे भी माना जा रहा है कि इस गठबंधन में बीजेपी 35 से 38 सीटें ही लड़ेगी तो बीजेपी के कुछ कैंडिडेट्स के सामने विजय की पार्टी अपना कैंडिडेट खड़ा कर दे, इससे यह मैसेज नहीं जाएगा कि वे बीजेपी के साथ हैं। अगर अन्ना द्रमुक, बीजेपी और टीवीके का कॉम्बिनेशन बनता है तो आप मानकर चलिए कि यह राज्य में क्लीनस्वीप करेगा। अब सब कुछ निर्भर करता है कि विजय किस तरह से फैसला करते हैं।
उधर राहुल गांधी को लगता है कि नई-नई उपाधियां मिलने से उनका कद बड़ा हो जाएगा,लेकिन जो व्यक्ति अपने अनुभव से भी सीखने को तैयार न हो तो उसका क्या भविष्य होगा,यह आप खुद समझ सकते हैं। उपाधियों से वोट नहीं मिलते। यह उपाधियां कारगर तभी होती हैं जब जनता देती है। आज तक सुभाष चंद्र बोस के साथ नेताजी लगा हुआ है। यह जनता का दिया हुआ है। तो राहुल गांधी को थलाइवा की कितनी ही उपाधियां दे दीजिए कांग्रेस का तमिलनाडु में कुछ होने वाला नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



