बीएमसी में उद्धव की हार ममता और अखिलेश के लिए संदेश।

प्रदीप सिंह।

मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगियों ने जीत का डंका बजाया है। इनमें खासतौर पर बीएमसी के चुनाव पर सबकी नजर थी। वहां भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने बहुमत हासिल कर ठाकरे परिवार की राजनीति के खात्मे की शुरुआत कर दी है। अब यह परिवार आगे नहीं जाने वाला है। लगभग 74,000 करोड़ के बजट वाली बीएमसी पर पिछले लगभग ढाई दशक से शिवसेना का कब्जा था। इसे शिवसेना का ब्रेड एंड बटर कहा जाता था,लेकिन सब खत्म हो गया। मेरी नजर में देश में यह पहला चुनाव है,जिसमें एक पार्टी को हिंदुत्व छोड़ने की सजा मिली है।

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आप 1992 को याद कीजिए। जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा था। उसके बाद उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी गई। उस समय हिमाचल प्रदेश,राजस्थान और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारों को भी बिना किसी आधार के बर्खास्त कर दिया गया था,लेकिन हिंदुओं ने उस समय भाजपा का साथ नहीं दिया। 1993 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में  भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भी उसे सत्ता नहीं मिली। केवल राजस्थान में भैरव सिंह शेखावत की राजनीतिक चतुराई के कारण भाजपा सरकार बना पाई। वह दिन था और आज का दिन है। उद्धव ठाकरे ने हिंदुत्व को छोड़ा। हिंदुत्व विरोधियों के खेमे में चले गए। हालांकि उनको लोकसभा चुनाव में थोड़ा फायदा हुआ। उनको लगा कि मुसलमान उनके साथ रहेगा। लेकिन बीएमसी चुनाव में उन्हें पता चल गया कि विचारधारा छोड़ने का नतीजा क्या होता है? जनता सब कुछ देखती रहती है। हालांकि बहुत से लोग उन्हें मिली सीटों की संख्या के आधार पर कह रहे हैं कि हार तो गए लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुए,लेकिन इस बात को गहराई से समझने की जरूरत है।

उद्धव ठाकरे या कहें ठाकरे परिवार का पॉलिटिकल सर्वाइवल बीएमसी से था। इसीलिए 29 निकायों के चुनाव हो रहे थे,लेकिन उद्धव ठाकरे सिर्फ दो बार मुंबई से बाहर निकले। उनको गलतफहमी थी कि मराठी मानुष का मुद्दा उठाकर और साथ में राज ठाकरे जैसे अराजक व्यक्ति को लेकर वह बीएमसी का चुनाव जीत सकते हैं। राज ठाकरे बहुत बड़े जीरो हैं। उनका महाराष्ट्र की राजनीति में न तो पहले कोई प्रभाव था, न आज है और न कभी होगा। उनको साथ लेने से उद्धव को कोई फायदा नहीं हुआ। जब आप युद्ध के समय किसी कमजोर को साथ लेते हैं तो इसका मतलब आप पहले ही हार चुके हैं। बीएमसी से सत्ता जाने का मतलब यह है कि अब उद्धव ठाकरे के लिए पॉलिटिकली सर्वाइव करना बेहद कठिन होगा। मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति में बाला साहब ठाकरे की धमक सिर्फ इस वजह से थी कि उन्हें हिंदू हृदय सम्राट का तमगा हासिल था। अगर वे भी हिंदुत्व को छोड़ देते तो उनका कमोबेश यही हश्र होता। इस बात को उद्धव ठाकरे समझ नहीं पाए और राज ठाकरे की समझ में तो राजनीति कभी आई ही नहीं। हालांकि एकनाथ शिंदे के लिए भी बीएमसी चुनाव के नतीजे थोड़े निराशाजनक होंगे। जितनी अपेक्षा थी, उन्हें उससे कम सफलता मिली है। उनका स्ट्राइक रेट भी कम रहा है। महाराष्ट्र स्थानीय निकाय के चुनाव ने एकनाथ शिंदे का कद थोड़ा घटाया है और अजीत पवार का कद तो एकदम जड़ से काट दिया है। चाचा के साथ मिलकर भी वह अपने गढ़ पुणे और पिपरी चिंचवाड़ में नहीं जीत पाए। महाराष्ट्र और मुंबई के लोगों ने यह भी बता दिया है कि राज ठाकरे उनकी नजर में कोई मायने नहीं रखते। उन्होंने जिस तरह से दक्षिण और उत्तर भारतीयों को गाली देने का काम किया उसका समर्थन मराठी मानुष ने भी नहीं किया। यह ठीक है कि बीएमसी में मराठी मानुष का एक हिस्सा उद्धव ठाकरे के साथ रहा, लेकिन मुंबई से बाहर मराठी मानुष भी उद्धव ठाकरे के साथ खड़ा नहीं हुआ। इन चुनावों ने साबित किया है कि महाराष्ट्र के सबसे कद्दावर नेता देवेंद्र फडनवीस हैं। कई लोग देवेंद्र फडनवीस और एकनाथ शिंद की तुलना करते हुए कहते थे कि शिंदे को दबा दिया गया। लेकिन अब साबित हो गया कि एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडनवीस की कोई तुलना नहीं है। शिंदे को महाराष्ट्र के लोगों ने बता दिया कि भाजपा बड़ा नहीं, बहुत बड़ा भाई है। आप भाजपा की उंगली पकड़ कर चलेंगे तो आगे बढ़ पाएंगे। उंगली छोड़ी तो वही हाल होगा, जो उद्धव ठाकरे का हुआ।

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बीएमसी में अब भाजपा का मेयर ही नहीं बनेगा,स्टैंडिंग कमेटी का चेयरमैन भी बनेगा। इस तरह मुंबई की पूरी तस्वीर बदलने का जिम्मा अब देवेंद्र फडनवीस और भाजपा पर आ गया है।

उद्धव ठाकरे जब तक भाजपा के साथ थे महाराष्ट्र के बड़े नेता दिखते थे। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पूछ होने लगी थी। साथ छोड़ा तो केंद्र की सत्ता से बाहर हुए,राज्य की सत्ता से बाहर हुए और अब बीएएमसी से भी बाहर हो गए। तो यह होता है विचारधारा छोड़ने का नतीजा। पहली बार हिंदुओं ने विचारधारा छोड़ने वाले को, हिंदुत्व को छोड़ने वाले को सजा दी है। अभी तक चुनावी राजनीति में ऐसा होता हुआ देखा नहीं गया है। राज ठाकरे को साथ लेकर उद्धव ने अपने जीवन की तीसरी सबसे बड़ी भूल की। उनकी पहली गलती भाजपा से गठबंधन तोड़ना और दूसरी गलती मुख्यमंत्री बनने के बाद हिंदुओं के खिलाफ अभियान चलाना थी। पालघर में साधुओं की हत्या के बाद उद्धव ने जिस तरह से हमलावरों का पक्ष लिया और मुसलमानों से गले मिले, यह सब हिंदू देख रहे थे।

महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों के नतीजे यह भी बता रहे हैं कि देश में हवा बदल रही है। जो हिंदू विरोध करेगा,उसके लिए पॉलिटिकली सर्वाइव करना मुश्किल होता जाएगा। यह ममता बनर्जी और अखिलेश यादव के लिए भी संदेश है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)