अभी बहुतों को निपटाएगा भारतीय राजनीति का यह प्रायश्चित काल।

प्रदीप सिंह।

एक फिल्म आई थी वक्त। उसका एक गाना लोगों की जुबान पर चढ़ गया था-‘कल जहां बसती थी खुशियां,आज है मातम वहां,वक्त लाया था बहारें,वक्त लाया है खिजा।’ इस समय देश की राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करना हो तो यह गाना बिल्कुल फिट बैठता है। कहां से कहां पहुंच गया विपक्ष और कहां से कहां पहुंच गई भाजपा।

PM Modi@11: A decade of change and challenge – Firstpost
Courtesy: Firstpost

देश की राजनीति में अगर पिछले 11-12 साल की बात करें तो दो इनफ्लेक्शन प्वाइंट आए। पहला 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में देश के सामने आए और उन्होंने देश की राजनीति बदल दी। पहली बार भाजपा को केंद्र में अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिला। यह कोई छोटी बात नहीं थी। दूसरा आया 2024 के लोकसभा चुनाव में। 2024 में भाजपा की सीटें 2014 और 2019 के मुकाबले घट गईं। उस समय कई पॉलिटिकल एक्सपर्ट ने यह नैरेटिव गढ़ना शुरू किया कि अब बीजेपी और मोदी दोनों ढलान पर हैं। दोनों का प्रभाव कम हो रहा है। तो 2024 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति का वह इनफ्लेक्शन प्वाइंट था,जिसने भाजपा को संभलने का मौका दे दिया। भाजपा ने अपना कोर्स करेक्शन किया। अपनी गलतियों और कमियों को दूर करने का प्रयास शुरू कर दिया और आप देखिए उसके बाद से जिन राज्यों में चुनाव हुए उसमें क्या नतीजा रहा। महाराष्ट्र, हरियाणा,दिल्ली और बिहार में उसे बंपर जीत मिली। इसके अलावा हालिया बीएमसी और महाराष्ट्र निकाय चुनावों में भी उसने विपक्ष को धूल चटा दी। इस दौरान केवल आप झारखंड की हार को कह सकते हैं कि वह भाजपा की जीत में एक काले टीके की तरह था।

तो लोकसभा चुनाव के बाद राज्यों में भाजपा को मिल रही जीत में आपको एक पैटर्न दिखाई देगा। एक निरंतरता और एक संदेश दिखाई देगा। लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को ढलान पर जाने से रोकने वाली ताकत कौन थी? वह ताकत मतदाता की थी। भाजपा ने 2024 में जो अबकी बार 400 पार का नारा दिया था,वह मतदाता को पसंद नहीं आया। उसका नुकसान भाजपा को हुआ। लेकिन उसके बाद उसके विरोधियों ने जो नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की कि भाजपा और मोदी दोनों ढलान पर हैं,इसे भारत के लोगों और मतदाता ने बहुत ही ज्यादा नापसंद किया। 2024 में सीटें कम मिलने से बीजेपी और नरेंद्र मोदी कितना दुखी हुए यह तो पता नहीं,लेकिन ऐसा लगता है कि मतदाता बहुत दुखी हुआ। उसको लगा कि हमसे गलती हो गई। उसको लगा कि हमने यह न्याय नहीं किया और जब व्यक्ति को अपराध बोध होता है और उसमें नैतिक बल होता है तो वह प्रायश्चित करता है। मैं मानता हूं कि भारतीय मतदाता प्रायश्चित कर रहा है और यह भारतीय राजनीति का प्रायश्चित काल है। यह मत समझिए कि बीएमसी के चुनाव के बाद यह प्रायश्चित काल रुक जाएगा। विधानसभा के चुनावों का जो अगला दौर है,जिसमें पश्चिम बंगाल,केरल,तमिलनाडु,असम और पुदुचेरी में चुनाव होने हैं,वहां भी यह नजर आएगा। असम में तो अभी से ही नजर आ रहा है कि भाजपा की जीत में कोई शंका नहीं है। असली लड़ाई पश्चिम बंगाल,केरल और तमिलनाडु में मानी जा रही है। अभी तक आकलन है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एमके स्टालिन को हराना बहुत कठिन है जबकि केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन हार सकता है और कांग्रेस के नेतृत्व वाला जीत सकता है। लेकिन ये सारे समीकरण मुझे बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। ममता सरकार,उनकी पार्टी और प्रशासन के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह की टिप्पणी की है उससे इस बात की संभावना तेजी से बढ़ रही है कि ममता बनर्जी का सितारा डूब रहा है। वहां ममता बनर्जी का हारना क्षेत्रीय दलों पर बीजेपी की बड़ी और निर्णायक जीत को स्थापित करेगा। तमिलनाडु में एमके स्टालिन का भाग्य टीवीके पार्टी के सर्वेसर्वा सुपरस्टार विजय तय करेंगे। अगर वे डीएमके विरोधी गठबंधन में आते हैं तो वह क्लीनस्वीप करेगा और डीएमके का सफाया हो जाएगा। अगर वह अलग लड़ते हैं तब भी डीएमके के हारने की संभावना बहुत ज्यादा है। इसी तरह से केरल में सीपीएम का जाना तय लग रहा है लेकिन उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ का सत्ता में आना दिखाई नहीं दे रहा है। डीएमके का हारना तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ियन पॉलिटिक्स के खात्मे की शुरुआत होगी। इसी तरह सीपीएम का हारना और कांग्रेस का न आना केरल की राजनीति में एक आमूल परिवर्तन की शुरुआत होगी।

मेरा मानना है कि देश में एक नई राजनीतिक व्यवस्था बन रही है, जिसमें भाजपा सबसे ऊपर है और उसकी यह बढ़त उत्तरोत्तर बढ़ने ही वाली है। भारतीय राजनीति में पिछले 20-25 सालों में प्रो इनकंबेंसी का सिलसिला शुरू हुआ है और इसमें सबसे बड़ा योगदान बीजेपी का है। उसकी राज्य सरकारें बार-बार लौट कर आ रही हैं। अब तो केंद्र सरकार के मामले में भी लगातार तीन जीत ने यह धारणा स्थापित कर दी है। तो भारतीय राजनीति के इस प्रायश्चित काल में पता नहीं कितने लोग निपट जाएंगे। 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटें कम होना मेरा मानना है कि बीजेपी के लिए ब्लेसिंग इन डिसगाइस था। उससे बीजेपी को सुधरने का मौका मिला। वहां से वह लगातार शिखर की ओर बढ़ रही है और उसके विरोधी रसातल की ओर जा रहे हैं और यह सिलसिला 2029 के लोकसभा चुनाव तक तो दिखेगा ही।

लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा और बीएमसी चुनाव के नतीजे जिस तरह से भाजपा के पक्ष में गए हैं,वह बता रहे हैं कि भारत के मतदाता का स्वभाव बदल रहा है। वह स्थिरता,विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा चाहता है। वह चाहता है कि देश में डेमोग्राफी बदलने का जो खतरा पैदा हो रहा है,उसको रोकने वाला कोई तो हो। और जब वह विचार करता है कि कौन ऐसा कर सकता है तो उसको केवल नरेंद्र मोदी दिखाई देते हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)