सावरकर ने नहीं दी थी हिंदुत्व की अवधारणा।
प्रदीप सिंह।
हिंदुत्व शब्द आजकल बहुत चर्चा में है। हिंदू धर्म के खिलाफ अभियान चलाने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि हिंदू धर्म तो अच्छा है लेकिन हिंदुत्व बुरा है। इसमें पश्चिमी संस्थान और एनजीओ सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। इसके अलावा भारत में भाजपा और संघ विरोधी या कहें राष्ट्रवाद विरोधी ताकतें यह नैरेटिव बनाने में लगी हुई हैं।

मुझे यह तो समझ में आता था कि हिंदुत्व और हिंदू धर्म में कोई फर्क नहीं है,लेकिन यह पता नहीं था कि हिंदुत्व का कांसेप्ट कब आया और हिंदुत्व की यात्रा कहां से शुरू हुई? इसका पता मुझे जे साईं दीपक के एक भाषण से चला। कोलकाता में एक कार्यक्रम में कहा गया कि हिंदूइज़्म को हिंदुत्व से बचाने की जरूरत है। अब जो लोग इस तरह की बात करते हैं दरअसल उनका लक्ष्य हिंदू धर्म के खिलाफ बोलना है। हिंदू धर्म पर हमला करने के लिए उनको लगता है कि हिंदुत्व के रूप में उनको एक हथियार मिल गया है। इसके लिए तर्क दिया गया कि हिंदुत्व की अवधारणा दरअसल वीर सावरकर की दी हुई है, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आगे बढ़ाया। याद रखिए हिंदुत्व के बारे में वीर सावरकर ने 1922-23 में लिखा। सावरकर का जन्म 1883 में हुआ जबकि संघ की स्थापना 1925 में हुई। फिर सवाल यह है कि हिंदुत्व कहां से आया? कब आया? इसी का जवाब जे साईं दीपक ने दिया। उन्होंने बताया कि हिंदुत्व की जन्मस्थली कलकत्ता (अब कोलकाता) ही है। कॉलोनियल पावर की शुरुआत कोलकाता से हुई। उसी दौरान ब्रह्म समाज की स्थापना हुई और बढ़ते-बढ़ते कलकत्ता यूनिटेरियन कमेटी का गठन हुआ। इसमें द्वारकानाथ टैगोर,राममोहन राय और विलियम एडम्स सक्रिय थे। 1830 से 1860 के बीच एक समस्या हुई। इन लोगों को लगने लगा कि अगर कॉलोनियल पावर के करीब जाना है तो उनके तौर तरीकों और सोच को अपनाना पड़ेगा। जे साईं दीपक कहते हैं कि 1860 से 1909 के बीच हिंदुत्व की यात्रा शुरू हुई। यह महाराष्ट्र या वीर सावरकर या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अवधारणा नहीं है। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति की बात कोई नहीं करता। वह हैं क्रांतिकारी से संत बने श्री अरविंद। हिंदुत्व का उनसे बड़ा समर्थक कोई नहीं है। श्री अरविंद की 1909 की उत्तरपाड़ा की एक स्पीच है। जिसमें उन्होंने कहा कि सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रवाद है। सनातन धर्म का क्षरण होगा तो राष्ट्रवाद का भी क्षरण होगा। तो जिन लोगों को राष्ट्रवाद को लेकर गलतफहमी है,जो सनातन और राष्ट्रवाद को अलग-अलग करके देखते हैं,उनको श्री अरविंद की बात सुननी चाहिए और उनसे बड़ी अथॉरिटी इस विषय पर और कोई हो नहीं सकती है। जे साईं दीपक कहते हैं कि 1866 से 1909 के बीच में जो हमारे आधुनिक ऋषि हैं,उनको एक बात समझ में आ गई कि भारत का समाज दो आक्रमणकारी शक्तियों के बीच में दब गया है। यह दोनों शक्तियां विस्तारवादी भी हैं और हिंसक भी। उन्होंने जिक्र नहीं किया कि ये शक्तियां कौन हैं, लेकिन बड़ा स्पष्ट है कि वह इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की बात कर रहे थे।

इन मॉडर्न ऋषियों ने तय किया कि भारतीय समाज को इससे बचाने के लिए हमें कुछ करना पड़ेगा। इन लोगों ने महसूस किया कि ब्रह्म समाज दरअसल हिंदू धर्म को पश्चिमी सभ्यता के चश्मे से देखने लगा है और पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण की ओर उसको ले जा रहा है। इसको रोकने के लिए देवेंद्र नाथ टैगोर ने 1867 में हिंदू मेला शुरू किया, जो बाद में जाति मेला बन गया। इसी दौरान गुरुदेव रविंद्रनाथ ठाकुर को लगा हिंदू समाज को ईसाई समाज के प्रभाव से दूर ले जाना पड़ेगा। तो उन्होंने हिंदू ब्रह्मो समाज बनाने का फैसला लिया। अब सवाल यह है कि हिंदूइज़्म यानी हिंदू धर्म और हिंदुत्व का फर्क कहां से आया? यह अवधारणा आई कहां से? तो चंद्रनाथ बसु जब शकुंतला तत्व लिख रहे थे तो उन्होंने इस बारे में लिखा कि हिंदू धर्म और तत्व को जोड़ा जाए और उससे बना हिंदुत्व। यह कोई हिंसक अवधारणा नहीं थी। यह हिंदू धर्म या सनातन धर्म का ही स्वरूप था। यह हिंदूइज़्म का कांसेप्ट 19वीं सेंचुरी का ब्रिटिश कांसेप्ट है। हिंदू धर्म यानी सनातन धर्म को बांटने के लिए अंग्रेज इसे लेकर आए थे। उससे पहले हमारा धर्म सनातन धर्म के नाम से जाना जाता था। 1902 में श्री अरविंद ने अनुशीलन समिति का गठन किया। तो जे साईं दीपक कहते हैं कि यही हिंदुत्व का इतिहास है। हिंदुत्व को मां दुर्गा की शक्ति के रूप में देखा जाता है। हिंदुत्व एक सभ्यतागत अनिवार्यता है और यह कोई पॉलिटिकल टूल नहीं है। लेकिन उन्होंने कहा अगर पॉलिटिकल टूल है भी तो समस्या क्या है? किसी पॉलिटिकल पार्टी या पॉलिटिशियन को पॉलिटिकल टूल से क्या समस्या होनी चाहिए? तो जो लोग कहते हैं कि हिंदुत्व की अवधारणा वीर सावरकर ने दी तो उनको समझ में आना चाहिए कि हिंदुत्व की अवधारणा 1866 से 1909 के बीच में आई। 1866 में तो वीर सावरकर का जन्म भी नहीं हुआ था। लेकिन यह सही है कि 1922-23 में वीर सावरकर ने हिंदुत्व के बारे में लिखा।
तो जब कोई आपसे कहे कि हिंदू धर्म को हिंदुत्व से बचाना है तो उससे एक बात जरूर कहिएगा कि हिंदू धर्म को अगर कोई बचा सकता है तो वह है हिंदुत्व। हिंदू धर्म को अगर किसी से बचाना है तो वह है धर्मनिरपेक्षता। इस धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत ने हिंदू धर्म का जितना नुकसान किया है और किसी चीज ने नहीं किया। भारत सनातन को मानने वाला देश है। दुनिया में और कोई देश नहीं है जिसने इतने सारे मजहबों को अपने यहां शरण दी हो और किसी को परेशान नहीं किया। आज उस धर्म को लोग सेकुलरिज्म सिखाने की कोशिश कर रहे हैं। सेकुलरिज्म तभी तक इस देश में है,जब तक सनातन धर्म है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



