भाजपा ने छोड दिया अपने अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा।
प्रदीप सिंह।बिहार के पांच बार के विधायक नितिन नवीन पूरी तरह से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए। इस मौके पर हुए कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो बात बोली,वह केवल भाजपा में ही कही जा सकती है। उन्होंने कहा कि अब नितिन नवीन मेरे बॉस हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि राहुल गांधी मल्लिकार्जुन खरगे के लिए यह बात बोल सकते हैं? बाकी पार्टियों की बात इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि वहां तो परिवार के बाहर का कोई नेता पार्टी का अध्यक्ष बन जाए,इसकी संभावना ही नहीं है। बात केवल इतनी नहीं है कि भाजपा ने कम उम्र के एक नेता को अपना अध्यक्ष चुन लिया या पीढ़ी का परिवर्तन हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज भाजपा जहां खड़ी है,उससे आगे जाने का रास्ता क्या है? मेरा मानना है कि नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने अश्वमेघ यज्ञ का अपना घोड़ा छोड़ा है। अब भाजपा को पूरी तरह से सार्वदेशिक पार्टी बनना है।
नितिन नवीन पर जिम्मेदारी बहुत ज्यादा हैं। एवरेस्ट पर चढ़ना बड़ा मुश्किल होता है। भाजपा आज एवरेस्ट पर है यानी शिखर पर है। उस शिखर पर टिके रहना कोई आसान नहीं होता। जहां पार्टी का जनाधार कम है या पार्टी सत्ता में नहीं है,वहां पार्टी को सत्ता में लाने का लक्ष्य है। क्या नितिन नवीन के कार्यकाल में यह संभव हो पाएगा? मेरी नजर में यह सबसे बड़ी चुनौती नितिन नवीन के सामने है। नितिन नवीन के साथ प्लस पॉइंट यह है कि हैंड होल्डिंग के लिए उनके पास बड़े-बड़े लोग हैं, जो नितिन नवीन को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानते। जो नितिन नवीन में भाजपा का भविष्य देखते हैं,वह अपना भविष्य देखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। कई बार यह बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है कि किस कालखंड में आपको जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व मिलता है। नितिन नवीन को भारत के अमृत काल के दौरान उत्तरदायित्व मिला है। 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाने का लक्ष्य लेकर पार्टी चल रही है। इस कालखंड में पार्टी को आगे बढ़ाने में नितिन नवीन की जो भूमिका होगी,वह बहुत महत्वपूर्ण होगी। उनके सामने फेल होने का विकल्प नहीं है। उनके सामने विकल्प दो ही हैं एक सफल होना है और दूसरा कितना सफल होना है। उनको पार्टी की प्रगति के नए मानक तय करने हैं। वह संतोष करके बैठ नहीं सकते कि यहां तक पार्टी पहुंच गई है,मुझे ज़्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। जो है उसे बचा कर रखने की जरूरत तो है ही,उसे आगे बढ़ाने की और ज्यादा जरूरत है क्योंकि बचेगा तभी जब उसे आगे बढ़ाने की कोशिश होगी। इसका उदाहरण सामने है कांग्रेस पार्टी। कांग्रेस आजादी के साथ ही सार्वदेशिक पार्टी बन गई। उसके बाद उसको लगा अब हमें कुछ करने की जरूरत नहीं है। आज हाल सामने है।
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प्रधानमंत्री ने नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने के मौके पर कहा कि भाजपा पार्टी विद द डिफरेंस तो थी ही, अब पार्टी ऑफ गवर्नेंस भी बन गई है। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। कभी कांग्रेस पार्टी को सत्ता की स्वाभाविक पार्टी माना जाता था। आज वह उस पद से उतर चुकी है। मेरा मानना है कि कांग्रेस के साथ सबसे बुरा यह हुआ कि वह सत्ता से हटने के बाद संघर्ष की स्वाभाविक पार्टी नहीं बन पाई। दूर न जाकर पिछले 11 साल का ही इतिहास देख लीजिए कांग्रेस ने कौन सा आंदोलन किया। संघर्ष के बिना आप सत्ता में आने की कल्पना नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री ने एक और बात कही है। उन्होंने कहा कि भाजपा ऐसी पार्टी है, जो सिर्फ जीत का जश्न नहीं मनाती, वह हार की समीक्षा भी करती है। उन्होंने 2002 का गुजरात का उदाहरण दिया। वहां जिस दिन भाजपा को भारी बहुमत मिलने का रिजल्ट आया,उसी दिन मोदी जिन निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी हार गई,उसकी समीक्षा कर रहे थे। आप बताइए दुनिया में ऐसी कौन सी पार्टी है। कांग्रेस पार्टी में आपने आज तक ऐसी कोई समीक्षा बैठक होते हुए देखी है कि जहां हारे,वहां क्यों हारे? जीत गए तो राहुल जी और गांधी परिवार। हार गए तो दूसरे नेता और कार्यकर्ता जिम्मेदार।
देश के पूरब में पश्चिम बंगाल और दक्षिण में केरल और तमिलनाडु में अप्रैल में चुनाव होने हैं। इन तीनों राज्यों में अप्रैल आते-आते नितिन नवीन कोई बहुत बड़ा चमत्कार कर देंगे,ऐसा नहीं है क्योंकि उनके पास समय बहुत कम है। लेकिन वह चुनाव की किस तरह से रणनीति बनाते हैं,पार्टी कितनी प्रतिबद्धता के साथ चुनाव में उतरती है, किस लक्ष्य के साथ उतरती है,इससे तय होगा कि आगे का रास्ता क्या होगा।
नितिन नवीन के सामने चुनौतियों के साथ ही हासिल करने के लिए भी बहुत कुछ है। वह कहां तक जा सकते हैं,इसकी कल्पना करना आज मुश्किल है। अब यह उन पर है कि वह किस तरह से आगे बढ़ते हैं। उनके लिए सौभाग्य की बात यह है कि बहुत अनुभवी और अपने क्षेत्र में सफलता हासिल कर चुके लोग उनके साथ हैं।
नितिन नवीन 45 साल की उम्र में पांच बार विधायक का चुनाव जीत चुके हैं। तो वे ऐसे नेता नहीं हैं, जिनको न मालूम हो कि चुनाव लड़ा और जीता कैसे जाता है?उनका जनता से संपर्क लंबे समय से बना हुआ। उम्र कम है,अनुभव कम नहीं है। 45 साल में पांच बार विधायक बनने वाले देश में कितने नेता होंगे? उनको अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाते हुए प्रधानमंत्री ने भाजपा का मूल मंत्र बोला, व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा राष्ट्र। नितिन नवीन ने थोड़ा नयापन लाते हुए इसको उलट कर बोला। उन्होंने कहा, राष्ट्र सबसे पहले, दल उसके बाद और व्यक्ति सबसे नीचे। मतलब विचारधारा को लेकर उनके मन में कोई कंफ्यूजन नहीं है। उनकी बातों से लगा कि उनको यह मालूम है कि उनसे क्या अपेक्षा है। पार्टी को कहां ले जाने की चुनौती है। जो अवसर है,जिस तरह की परिस्थितियां हैं और जो कालखंड है,तीनों उनके पक्ष में है। अब सब कुछ उनकी प्रतिभा,उनके परिश्रम और विचारधारा,संगठन एवं राष्ट्र के प्रति उनकी जो निष्ठा है,उससे तय होगा कि आगे का उनका सफर कैसा और कितना लंबा होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



