यूजीसी के नए नियमों से पार्टी कहीं कांग्रेस की गत में न पहुंच जाए।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
इन दिनों यूजीसी की गाइडलाइंस को लेकर मुद्दा बहुत गर्म है। यह मेरी कल्पना से बाहर है कि भाजपा की सरकार ऐसा कर सकती है। लोगों के मन में सीधा सा प्रश्न है कि अगर भाजपा की सरकार को कांग्रेस का ही एजेंडा लागू करना है तो फिर भाजपा की क्या जरूरत है? ये गाइडलाइंस 2011 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार में तैयार हुई थीं। ये गाइडलाइंस ठीक उसी तरह की हैं, जिस तरह का सांप्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक था। उसमें प्रावधान था कि जहां भी सांप्रदायिक दंगा होगा, वहां एक्शन सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ होगा। हिंदू ही आक्रमणकारी माने जाएंगे। उस विधेयक का भाजपा ने विरोध किया था और उसको पास नहीं होने दिया।

इस बात को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि अनुसूचित जाति/जनजाति को आरक्षण देने पर इस देश के सवर्णों ने कभी ऐतराज नहीं जताया। जब पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिया गया, उस समय भी एक वर्ग को छोड़कर ज्यादा लोगों ने विरोध नहीं किया। लेकिन अब इस गाइडलाइंस से समस्या पैदा की जा रही है। मेरा मानना है कि जिन लोगों ने यह गाइडलाइन बनाई है वे या तो अफीम के नशे में थे या सत्ता के नशे में कि हम कुछ भी कर सकते हैं और हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कोई अगर विरोध करेगा तो उसका कोई असर नहीं होगा। या वे ऐसे लोग हैं जो भाजपा के अंदर रहकर उसे बर्बाद करना चाहते हैं। मुझे नहीं लगता इनके अलावा कोई और कारण हो सकता है। किसी में अगर जरा सा भी कॉमन सेंस होता तो इस तरह की गाइडलाइंस न आती। इसका मतलब है कि सोच विचार कर सेबोटेज किया जा रहा है। यह हिंदू समाज को बांटने की कोशिश है। भाजपा की विचारधारा हिंदू समाज को जोड़ने की है और सरकार का यह फैसला हिंदू समाज को तोड़ने वाला है। इस गाइडलाइन से क्या होगा? इससे आपने सवर्ण और पिछड़ा वर्ग को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। दोनों को एक दूसरे के दुश्मन के रूप में पेश कर दिया है। आपने कह दिया कि पिछड़ा वर्ग सवर्णों से पीड़ित है और सवर्णों से कह दिया कि तुम आतताई हो। सरकार कह रही है कि दोनों को साथ नहीं रखा जा सकता। हमको रेफरी की भूमिका निभानी पड़ेगी।

कहीं भी न्याय की व्यवस्था होती है तो वह कई स्तरीय होती है। लोअर कोर्ट से अगर न्याय न मिले तो हाईकोर्ट जाइए। हाईकोर्ट से न मिले तो आप सुप्रीम कोर्ट जाइए। सुप्रीम कोर्ट में भी रिव्यू का प्रावधान है। फिर आप राष्ट्रपति के यहां अपील कर सकते हैं। लेकिन यूजीसी की इस गाइडलाइन ने क्या किया है? पूरे देश की एक नेशनल मॉनिटरिंग कमेटी होगी। देश में आज सरकारी और गैर सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या हजारों में है। उसकी सिर्फ एक मॉनिटरिंग कमेटी होगी। मानहानि के मुकदमे के मामले में भी कोर्ट का रवैया यह होता है कि किसी को गलत तरीके से प्रताड़ित न किया जाए। फंसाने की कोशिश न की जाए। लेकिन यूजीसी की इस गाइडलाइन में इस बात की कोई व्यवस्था नहीं है कि कोई छात्र अगर अपने टीचर या अपने सहपाठी के खिलाफ गलत आरोप लगा दे और वह साबित हो जाए कि गलत है तो उसको कोई सजा मिलेगी। आरोप गलत होने पर भी उसको कोई सजा नहीं मिलेगी। उसको सिर्फ आरोप लगाना है और आरोप लगाने से पहले व्यवस्था ऐसी बनाई गई है कि सवर्ण को अपराधी घोषित कर दिया गया है। उसको केवल सजा सुनाई जाएगी। यह व्यवस्था यह मानकर चल रही है कि सारे सवर्ण पिछड़ों पर अत्याचार करते हैं।

पिछड़ा समाज के लोग शिक्षा में पीछे रह गए, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन उसका कारण यह है कि उन्होंने शिक्षा के बजाए अपने हुनर को चुना सुनार,लोहार,कुम्हार ये जो जातियों के नाम बने,ये दरअसल प्रोफेशन के नाम हैं। आज जो अप्रेंटिसशिप की बात की जा रही है,यही बचपन से इन्होंने की है। उन्होंने पढ़ाई का रास्ता न चुनकर दूसरे काम चुने, जिसमें उनका मुकाबला करने वाला कोई नहीं है। उस क्षेत्र में कोई उनसे ज्यादा योग्य नहीं है। लेकिन अब उनकी इस योग्यता को उनकी कमजोरी बताया जा रहा है और उनकी इस कमजोरी के लिए जिम्मेदार सवर्ण समाज को ठहराया जा रहा है। तो मेरा मानना है कि भाजपा ने इस एक कदम से 100 से ज्यादा की रफ्तार से चलती हुई रेलगाड़ी को पटरी से उतार दिया है। पार्टी ने अपने लिए गड्ढा नहीं, खाई तैयार कर ली है। अब पार्टी की स्थिति वही है,जो 1986 में राजीव गांधी की थी। राजीव जब प्रधानमंत्री थे तो शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और संसद के जरिए उन्होंने उसे पलट दिया। उसके बाद अयोध्या में शिलान्यास करवाया फिर उसे रुकवा दिया। यानी जिस परिस्थिति में राजीव गांधी के समय कांग्रेस थी आज बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है।

यूजीसी की गाइडलाइन बनाने वालों ने बीजेपी के साथ तो धोखा किया ही देश में हिंदू समाज को तोड़ने में जो शक्तियां लगी हुई थीं और सफल नहीं हो पा रही थी, इस एक कदम से उन्होंने उनके उस अभियान को सफल बना दिया है। जिस तरह से मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद सवर्ण और पिछड़ा वर्ग आमने-सामने था, उससे कई गुना ज्यादा अब यूजीसी गाइडलाइन के कारण होगा। इस गाइडलाइन में अपील की कोई गुंजाइश नहीं है। इसकी जो कमेटी बनेगी, उसमें पुरुष सवर्णों के लिए कोई जगह नहीं है। सवर्ण जनसंघ के समय से और खासतौर से राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से बीजेपी का कोर वोट रहा है। बीजेपी की पिछले कुछ सालों से कोशिश है कि समाज के बाकी वर्गों को भी जोड़ा जाए,जो अच्छी बात है। लेकिन दूसरे समाज को जोड़ने के लिए जो आपका कोर वोट है, आप उसको धक्का मारकर बाहर निकाल रहे हैं। उससे कह रहे हैं कि जाओ तुम्हारी जरूरत हमें नहीं है। तो उसको आपके समर्थन की सजा मिल रही है। इन गाइडलाइंस का इस समय जिस तरह से विरोध हो रहा है उससे बीजेपी के लिए बहुत ही बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। अगर सरकार इस गाइडलाइन को रद्द करती है तो भी मुश्किल है और अगर लागू रहने देती है तो भी। तो भाजपा आज वहां खड़ी है जहां आगे कुआं है और पीछे खाई। इसके लिए पार्टी नेतृत्व और सरकार में बैठे लोग जिम्मेदार हैं। इससे पता चलता है कि ये लोग पूरी तरह से या तो अक्षम हैं या षड्यंत्रकारी। भाजपा के अंदर रहकर हिंदू एकता का नारा लगाकर ये हिंदुओं के विरोध में खड़े हैं।

यूजीसी की गाइडलाइन यह बताती है कि इस पार्टी पर सत्ता का नशा सवार हो गया है। वह इस गलतफहमी में है कि हम कुछ भी करेंगे और लोग स्वीकार कर लेंगे। वरना इतना बड़ा फैसला हो गया और उस पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। आज भाजपा या सरकार की ओर से इन गाइडलाइन पर कोई कुछ बोल नहीं रहा है क्योंकि बोलने के लिए कुछ है नहीं। अब भाजपा कांग्रेस को मात भी दे रही है। कांग्रेस के बारे में तो सबको पता है कि वह हिंदू विरोधी है और मुस्लिम तुष्टीकरण करती है। सवाल यह है कि बीजेपी अपने कोर वोट को धक्का देकर क्या पाना चाहती है? जो समाज हर हाल, हर परिस्थिति में भाजपा के साथ खड़ा रहा,उसके साथ यह व्यवहार हो रहा है। उसको बिना किसी अपराध के पहले से अपराधी घोषित किया जा रहा है। आप हजारों-लाखों युवकों का करियर, उनका जीवन बर्बाद करने का इंतजाम कर रहे हैं। आप बताइए कि अगर कोई झूठी शिकायत हो जाए तो उसके निवारण का तरीका क्या है? और झूठी शिकायत नहीं होगी,यह कौन कह सकता है? आप मौका दे रहे हैं कि आओ झूठी शिकायतें करो और इन लोगों को कैंपस से बाहर करो। वह चाहे टीचर हो,चाहे स्टूडेंट।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)