2029 के बाद देश की नंबर दो पार्टी भी नहीं रहेगी कांग्रेस।
प्रदीप सिंह।
सच्चाई की एक खूबी है कि वह कहीं न कहीं से रास्ता बनाकर निकल आती है। अभी हाल तक कांग्रेस के एक नेता हुआ करते थे डॉ.शकील अहमद। वह बिहार से हैं। सांसद और विधायक के साथ केंद्र और राज्य में मंत्री रह चुके हैं। सोनिया गांधी के करीबी लोगों में थे। कांग्रेस में सोनिया की जब तक चलती थी तब तक उनको सम्मान मिलता रहा। राहुल गांधी की जब चलने लगी तो शायद उनकी पूछ नहीं रही। शकील अहमद आजकल सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव हैं। उनका नया बयान आया है,जिसमें उन्होंने कहा है कि राहुल गांधी बहुत डरपोक नेता हैं।
अब आप देखिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाहे-बगाहे डरपोक बताते रहते हैं,लेकिन शकील अहमद, जो इनसाइडर रहे हैं और अब आउटसाइडर हो गए हैं, वह कह रहे हैं कि राहुल गांधी डरपोक हैं और हर उस व्यक्ति से डरते हैं, जो उनसे ज्यादा काबिल हो। ऐसे किसी व्यक्ति को वह अपने आसपास नहीं आने देते। ऐसे व्यक्ति से बातचीत करने या मिलने में वह सहज नहीं होते। शकील अहमद ने राहुल गांधी के व्यक्तित्व की जो पोल खोली है,प्रकारांतर में कांग्रेस छोड़कर जाने वाले कई लोग ऐसा ही कहते रहे हैं। इन बातों में कितनी सच्चाई है,वह राहुल गांधी के आसपास जुटे लोगों को देखकर भी पता चलती है। राहुल गांधी ने अपने आसपास ऐसे लोगों को जोड़ा है, जो राजनीतिक रूप से नौसिखिया या अक्षम कहे जा सकते हैं। इनमें से ज्यादातर लोगों को न चुनाव लड़ना आता है और न लड़ाना आता है। इसके कारण कांग्रेस की जो हालत है आप समझ सकते हैं। शकील अहमद ने कहा कि कोई ऐसा नेता जिसका नाम लेने के साथ राहुल को जी लगाना पड़े, उससे वह बात नहीं करना चाहते। उन्होंने एक और बात कही कि राहुल गांधी का मानना है कि एक दिन ऐसा आएगा,जब लोग नरेंद्र मोदी और भाजपा से निराश हो जाएंगे। उस दिन विकल्प के रूप में कांग्रेस के अलावा कोई और पार्टी हो ही नहीं सकती क्योंकि देश में केवल दो ही नेशनल पार्टियां हैं। नंबर एक पार्टी अगर सत्ता से बाहर जाएगी तो जाहिर है कि नंबर दो पार्टी आएगी। अब यह सिंपल अर्थमेटिक राजनीति में काम नहीं करती। याद कीजिए देवेगौड़ा की सरकार,इंद्र कुमार गुजराल की सरकार, चंद्रशेखर की सरकार। ये सभी सरकारें कांग्रेस के समर्थन से चलीं लेकिन कांग्रेस के हाथ में सत्ता नहीं आई। कांग्रेसियों को 2004 याद रहता है। उनको लगता है कि जिस तरह बिना कुछ किए 2004 में हमको सत्ता मिल गई,वैसे ही फिर मिल जाएगी।

तो राहुल गांधी डरपोक हैं,यह बात कोई भाजपा का नेता या संघ का पदाधिकारी नहीं बोल रहा है। कांग्रेस में जो लंबे समय तक रहा है वह नेता बोल रहा है। शकील अहमद के पिता भी कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं। शकील अहमद की बात पर इसलिए भी भरोसा किया जा सकता है,क्योंकि कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने दो घोषणाएं की कि वह किसी और पार्टी में नहीं जा रहे हैं और राजनीति से भी बाहर हो रहे हैं। साथ ही उनके परिवार का कोई व्यक्ति राजनीति में नहीं आएगा। तो ऐसा भी नहीं है कि वह अपने परिवार के किसी व्यक्ति को राजनीति में लाने या उसका भविष्य संवारने के लिए राहुल की आलोचना कर रहे हैं कि कोई दूसरी पार्टी उनको ले ले और उनके बच्चों या परिवार का भी राजनीतिक भविष्य बना दे।

राहुल की ही तरह सोच रखने वाले एक और नेता हैं-तेजस्वी यादव। लालू प्रसाद यादव ने हाल ही में उन्हें आरजेडी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। कांग्रेस और उसकी समर्थक क्षेत्रीय पार्टियों में यह बड़ा चलन है कि वहां चुनाव हारने के बाद प्रमोशन हो जाता है। हाल ही में हुए बिहार विधानसभा के चुनावों में उनकी पार्टी 25 सीटों पर सिमट गई है फिर भी वह कह रहे हैं कि हम कमजोर नहीं हुए हैं। हमारा समय कमजोर चल रहा है। समय बदलेगा और हम मजबूत होंगे। यानी उनकी सोच भी बिल्कुल राहुल गांधी जैसी है कि कुछ करने की जरूरत नहीं है। तो ये दोनों नेता निष्क्रियता, अक्षमता और आलस्य को बढ़ावा दे रहे हैं। एक की महत्वाकांक्षा बिहार का मुख्यमंत्री बनने की है और दूसरे की देश का प्रधानमंत्री बनने की। इन दोनों की समझ के स्तर और सोच के तरीके से आप समझिए कि ये कितनी दूर तक जा सकते हैं।
कांग्रेसियों में एक अजीब तरह का अहंकार है कि राहुल गांधी कुछ भी कर लें, कितना भी गिरा लें कांग्रेस देश में नंबर दो की पार्टी तो रहेगी ही। राहुल गांधी को लगता है कि नंबर दो की जगह कोई छीन नहीं सकता। लेकिन यह गलतफहमी भी समय के साथ दूर होगी। समय कहीं वैक्यूम नहीं रहने देता। यह नंबर दो की जगह कांग्रेस को बाय डिफॉल्ट मिली हुई है क्योंकि और कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। जिस दिन वह प्रतिद्वंदी आएगा, उस दिन कांग्रेस पार्टी नंबर तीन पर चली जाएगी। इसी तरह से आरजेडी के तेजस्वी यादव को लगता है कि उनकी पार्टी बिहार में नंबर दो पर है और वह हमेशा सत्ता की दावेदार बनी रहेगी। मेरा मानना है कि इन दोनों नेताओं की गलतफहमी 2029 के लोकसभा चुनाव तक बनी रहेगी। उसके बाद जब राजनीतिक परिदृश्य बदलेगा तब इनको सच्चाई का असली दर्शन होगा।
शकील अहमद जैसे पुराने कांग्रेसी ही अब राहुल गांधी की सच्चाई बाहर लाने लगे हैं। यह सिर्फ राहुल गांधी की नहीं, पूरे गांधी परिवार की सच्चाई है। उनको लगता है कि जब तक कांग्रेस पार्टी पर हमारा कब्जा है तब तक हम सत्ता के दावेदार बने रहेंगे, तब तक हमारा प्रभाव बना रहेगा, तब तक हमसे कुछ पाने की लोग उम्मीद करते रहेंगे। लेकिन कहते हैं कि गलतफहमी का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। तो राहुल गांधी हों या तेजस्वी यादव उनकी गलतफहमी का भी कोई इलाज नहीं है। इलाज जनता ही करेगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)


