डॉ. मधुबाला शुक्ला।
मुम्बई की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ ने हिंदी काव्य मंच के सबसे लोकप्रिय कवियों में एक गोपालदास सक्सेना नीरज पर शनिवार 10 जनवरी, 2026 को ‘शताब्दी स्मरण’ कार्यक्रम का आयोजन किया। नीरज की रचनात्मकता को जानने-समझने और फिल्म गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से यह अंतस को समृद्ध कर देने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन रहा…। नीरज को याद करना केवल एक कवि को याद करना नहीं, बल्कि उस युग को स्मरण करना है, जिसमें कविता जीवन का उत्सव और संघर्ष का स्वर बन जाती है।
प्रमुख वक्ता के रूप में लेखक और व्यंग्यकार वागीश सारस्वत ने कहा कि कवि नीरज को पढ़ते हुए उनके शब्दों में स्मृतियों की गरमाहट उतर आती है। उनके लिए कविता एक साधना थी। कवि-सम्मेलनों से कई बार उनका मोह-भंग हुआ, क्योंकि वे तालियों के नहीं, चेतना के कवि थे। उनका व्यक्तित्व मंच की सीमाओं से कहीं बड़ा था। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे और अंग्रेज़ों के विरुद्ध आंदोलन करते हुए कई बार जेल भी गये थे। नीरजजी ने आंदोलन पर केवल लिखा ही नहीं, बल्कि उन्हें जीया भी। नीरज की कविताओं में श्रृंगार की मधुरता के साथ विरह की गहरी छाया भी है। शायद इसी कारण जीवन भर उनका मन कहीं न कहीं अतृप्त रहा। वे प्रेम के कवि थे, पर उनका प्रेम केवल सौंदर्य नहीं, पीड़ा और प्रतीक्षा से भी भरा था। वागीशजी के अनुसार यह एक अजीब संयोग ही था कि अलीगढ़ में सिर्फ़ चार गलियों के फ़ासले पर घर होने के बावजूद उनसे कभी मेरी भेंट न हो सकी। उन्होंने ‘धर्म समाज कॉलेज में पढ़ाया’, जहां मेरा विद्यार्थी जीवन बीता है। नीरज जी उस पीढ़ी के शिखर पुरुष थे। सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए मामाजी के माध्यम से ‘कुरुक्षेत्र’ में उनसे मेरी भेंट हुई, तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया, जो मुझ बालक को किसी महापुरुष द्वारा हृदय से लगा लेना लगा था। वह क्षण आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है। नीरज जी केवल कवि नहीं थे, अपने संघर्ष, स्वाभिमान व सादगी में वे सृजन के एक जीवित मूल्य थे। उनकी स्मृति शब्दों के माध्यम से हमारे बीच जीवित है और रहेगी…।

इसी तरह शायरा दीप्ति मिश्र ने बताया कि उनके पिता लखीमपुर में एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। वहां प्रतिवर्ष दशहरे के अवसर पर लगने वाले भव्य मेले में कवि-सम्मेलन भी होता था, जिसकी पूरी जिम्मेदारी पिताजी पर ही होती थी। वीरेंद्र अवस्थी, काका हाथरसी, गोपालदास नीरज जैसे बड़े कवि वहाँ आते थे। उस समय बहुत छोटी होने पर भी उन कवियों की उपस्थिति और उनके गीत अनायास ही मन को आकर्षित कर लेते थे। विशेष रूप से नीरजजी की रचनाएँ स्मृति में बस गई हैं। 1965 में आई फ़िल्म ‘नई उमर की नई फसल’ का गीत ‘कारवाँ गुजर गया’ ने मन पर गहरा प्रभाव डाला। फिर बाद के वर्षों में कई कार्यक्रमों में नीरज जी के साथ मंच साझा करते हुए लगता – जैसे किताबों से निकलकर कवि साक्षात सामने आ खड़े हुए हों। मंच पर उन्हें देखकर पहली बार यह अनुभव हुआ कि कवियों का व्यक्तित्व और कृतित्व कितना विशाल होता है। लेकिन जब उन्हें और निकट से देखा, तो कुछ भ्रांतियाँ भी टूटीं, कुछ आदर्श चरमराए, कुछ धारणाएँ बिखरीं। नीरज जी के साथ मंच साझा करना उनके लिए गर्व की बात थी, किंतु जिस आत्मीयता की अपेक्षा थी, वह नहीं बन पाई। उनसे बहुत कुछ सीखना चाहती थी, पर इसके लिए पूरा अवसर न मिल सका। उन दिनों को याद करते हुए यह प्रश्न बार-बार मन में उठता है – क्या किसी रचनाकार का व्यक्तित्व और कृतित्व कैसा होना चाहिए? निष्कर्ष स्पष्ट नहीं। कवयित्री ने नीरज की प्रसिद्ध कविता ‘कारवाँ गुजर गया’ प्रस्तुत भी की।

वरिष्ठ शायर राकेश शर्मा ने बीती यादों को खंगालते हुए बताया कि अपने आरंभिक दिनों में मथुरा के अनेक कवि-सम्मेलनों में नीरज जी को सुना था। उनकी उपस्थिति ही आयोजन की गरिमा बढ़ा देती थी। राकेशजी को यह एक विचित्र संयोग और अपना दुर्भाग्य लगता है कि उनके मुंबई आने के ठीक पहले नीरज जी मुंबई छोड़ चुके थे, जिससे वे उन्हें निकट से सुनने और समझने का अवसर खो बैठे। नीरज की भाषा और काव्य-शैली ने उन्हें गहरे प्रभावित किया। उनके लेखे नीरजजी की भाषा में शुद्ध हिंदी और गंगा-जमुनी तहज़ीब जो अद्भुत समन्वय था, जो विरले ही देखने को मिलता है। तभी तो राकेशजी अपनी ग़ज़लों पर नीरजजी के गहरे प्रभाव को खुले मन से स्वीकारते हैं। क़वि एवं नामचीन प्रकाशक रमन मिश्र ने बताया कि बचपन में ही ‘घरेलू लाइब्रेरी योजना’ के सदस्य बन गये थे, जहां नीरज जी की लगभग सभी पुस्तकें उपलब्ध थीं। तभी तो वे दसवीं कक्षा में पढ़ने तक ही नीरज जी को लगभग पूरा पढ़ चुके थे। नीरजजी को पढ़ना उनके लिए असाधारण अनुभव रहा। उनकी कविताएँ रमनजी को भीतर तक झकझोर देती थीं – “मैं विद्रोही हूँ, जग में विद्रोह कराने आया हूँ, क्रांति, क्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूँ” जैसी पंक्तियाँ मन में बस गई थीं, जिन्हें सुनाकर उन्होंने काव्य-पाठ की प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार भी जीते। रमनजी के अनुसार नीरजजी की भाषा सरल है, लेकिन उसमें गहराई बहुत है। वह लोक से जुड़ी है, फिर भी बौद्धिक गरिमा से भरपूर है। उसमें वही हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी तहज़ीब दिखाई देती है, जिसकी कल्पना महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने की थी। नीरजजी के फिल्मी गीत केवल प्रेम तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें जीवन-मृत्यु, समय-नियति और मनुष्य की विवशता का गहरा दर्शन मिलता है। यही कारण है कि उनके गीत आज भी केवल सुने नहीं जाते, बल्कि महसूस किये जाते हैं। इसी सब से नीरजजी को मिश्रजी केवल कवि नहीं, संवेदनशील विचारक मानते हैं, जो शब्दों के माध्यम से मनुष्य के भीतर उतर जाते हैं।

नीरजजी को याद करते हुए शायर एवं निर्देशक कमर हाजीपुरी ने कहा – मैं नीरज जी से मिला हूँ। यह वाक्य आज भी मन में एक गहरी भावुकता भर देता है। उस दिन मैंने केवल एक कवि को नहीं जाना, बल्कि गोपालदास ‘नीरज’ नाम के मनुष्य को भी समझा। वे बहुत कम बोलने वाले, दिखावे से कोसों दूर और आत्मसंयमी व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व की सादगी मन को छू गई। नीरजजी के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी ये पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं- “ज़िंदगी की आँख में आँसू देखता रहा, हमनवा था बेवफ़ा, वह प्यार देखता रहा… इसीलिए खड़ा-खड़ा गुबार देखता रहा।” वे केवल कवि नहीं थे, एक युग थे, जो आज भी शब्दों के माध्यम से जीवित है। ‘बतरस’ संस्था के संस्थापक प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने नीरज की पंक्ति ‘जहाँ प्यार का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा’ की जानिब से उन्हें प्यार का अनोखा गीतकार बताते हुए उनकी लोकप्रियता की बावत कहा कि उन्होंने जनता की रुचि की कविता नहीं लिखी, बल्कि जनता को अपनी रुचि में ढाल लिया। त्रिपाठी जी ने कवि के फ़िल्म में जाने को वरदान भी बताया और अभिशाप भी, जिसके चलते वे अच्छा कवि होते हुए भी बड़ा कवि नहीं बन पाये। प्यार के सिवा नीरज जी तीसरे विश्व युद्ध से सावधान होने के साथ ही गणतंत्र के विरोधाभासों पर गहरे तंज भी किये – ‘अद्भुत इस गणतंत्र के अद्भुत हैं षडयंत्र। संत पड़े हैं जेल में, डाकू फिरें स्वतंत्र’। वक्ता ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि फ़िल्मों में जाना जहाँ उनकी ख्याति का सबब बना, वहीं उसने उन्हें साहित्य की मुख्य धारा से किनारे भी कर दिया!! ११वीं-१२वीं में एक कविता रख देने के सिवा शिक्षा जगत ने भी उन्हें कोई तवज्जो न दी। कवि अनिल गौड़ का आलेख प्रस्तुत किया डॉ जया दयाल ने। गौड़जी के अनुसार नीरज जी ‘कारवां गुज़र गया’ की स्वरलहरी के साथ सामने आये। बच्चन जी की वैविध्य पूर्ण गीत रचना का उनपर गहरा प्रभाव था। उदाहरण के तौर पर बच्चन की ‘जो बीत गयी सो बात गयी’ कविता की छाया में ‘छुप छुप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों’ गीत की रासायनिक प्रक्रिया को विश्लेषित किया जा सकता है। उनके फिल्मी गीत सहज स्वाभाविक कवि अभिव्यक्ति की अपेक्षा पात्रों और चरित्रों की काल्पनिक और संभावित अभिव्यक्ति-कौशल के प्रदर्शन हैं। ऐसे में धनार्जन की भयंकर प्रतियोगिता से बचकर कुछ ही वर्षों में नीरज जी पुनः हिंदी मंचों पर एक वरिष्ठ गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। हिंदी में किशोर भावुक भावनाओं को मंच पर स्वरित किया। उनकी गायन शैली विशिष्ट थी। उस शैली की एकतानता पंजाब की हीर गायन शैली के शोक व गाम्भीर्य और महाराष्ट्र की तरंगित लावनी शैली से मेल खाती है। उनके समकालीन कवियों रमानाथ अवस्थी, भारतभूषण अग्रवाल और किशन सरोज॰॰॰आदि का गीत-वैभव अधिक प्रफुल्ल है, लेकिन गेयता के चलते जो सफलता नीरजजी को मिली, वह अन्य के हिस्से में नहीं आई। नीरज जी ने अनेक ग़ज़लें भी लिखी हैं, जो उतनी ही अच्छी साबित हुई जैसे उनके गीत। उन्होंने दोहे भी लिखे और उनका एक प्रसिद्ध दोहा कवियों के कुंठित अहम को मरहम लगाने के कारण बहुत चर्चित हुआ – ‘आत्मा के सौंदर्य का, शब्द रूप है काव्य। मानव जीवन भाग्य है, कवि होना सौभाग्य’।।

वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक देवमणि पाण्डेय के अनुसार ‘सिने गीतकार नीरज’ की आवाज़ में जादू था। अंदाज़ में आकर्षण था। गीतों में कशिश थी। व्यक्तित्व सुदर्शन था… जिन सबसे वे मंच पर छा जाते। उनकी लोकप्रियता की ख़ुशबू बॉलीवुड तक पहुंच गई और नीरजजी को अपनी गीतों का हुनर दिखाने का आमंत्रण मिला, तो नीरज यहां भी छा गये। फ़िल्म ‘नई उमर की नई फ़सल’ में उनके गीत ‘कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे’ ने धूम मचा दी। फ़िल्म ‘चंदा और बिजली’ के गीत ‘काल का पहिया घूमे भैया’ के लिए गीतकार नीरज को ‘फ़िल्म फेयर’ सम्मान से विभूषित किया गया। ‘प्रेम पुजारी’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फ़िल्मों में कालजयी गीत लिखने वाले नीरज ने सिर्फ़ बारह साल में सिने जगत को अलविदा कह दिया। एक मुलाक़ात में मैंने उनसे घर वापसी के बारे में पूछा, तो बोले – ‘मुंबई की ज़िंदगी में जो भागदौड़ है, वह मुझे पसंद नहीं आई। मुझे अधिक पैसा कमाने की चाह भी नहीं है। मेरा मन यायावर प्रवृत्ति का है। मैं किसी एक जगह पर अधिक दिन तक टिक नहीं सकता”। नीरजजी ने स्वयं कहा है -‘मैं अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाये, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है – ‘नीरज से बढ़के धनी और कौन है यहाँ, उसके हृदय में पीर है सारे जहान की’। देवमणिजी के अनुसार नीरज के काव्य में मिलन के मधुर क्षण कम हैं, विरह की टीस और जुदाई की तड़प ज्य़ादा है। दुख और उदासी की ऐसी मार्मिक स्थितियों की अभिव्यक्ति के लिए वह जो प्रतीक चुनते हैं, वे हमेशा लौकिक जगत के ख़ूबसूरत एहसास से ताल्लुक़ रखते हैं। बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। उन्होंने कहा था – ‘नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है’ और हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गये। लेकिन अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा। यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता, क्योंकि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं; ‘मधुशाला’ सुनी जाती है। पांडेयजी का मानना है कि जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, उसी तरह मंचीयता के बावजूद नीरजजी के साहित्यिक अवदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इनके साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल न रचकर भावनाओं की उदात्त धारा प्रवाहित की, जिसने लोगों के मन को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया। डॉ॰ मधुबाला शुक्ल ने – ‘लिखि लिखि भेजत पाती’ पुस्तक से कुछ चुनिंदा पत्र पढ़े। बहुत कम लोगों को मालूम है कि किसी अनजान महिला ने नीरज जी को बड़े भावपूर्ण पत्र लिखे थे, जिन्हें क़वि ने संकलन रूप में छपा दिया है।

गायक दीपक खेर ने ‘प्रेम पुजारी’ फ़िल्म का गीत – ‘फूलों के रंग से दिल की कलम से’ एवं जया दयाल ने भी इसी फ़िल्म से ‘रंगीला रे तेरे रंग में यूं रंगी मैं…’ को उसी सलीके से गाया। कवि नीरज नीर ने सुनायी – नीरजजी की गज़ल – ‘जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा’ प्रस्तुत की।
इस कार्यक्रम का विधान किया था – हिंदी के सुपरिचित कवि-गीतकार रासबिहारी पांडेय ने और उन्होंने ही नीरज से संबंधित अनेक रोचक प्रसंग सुनाते-सुनाते और कवि व उसकी कविताई की कई-कई विरल ख़ासियतें बताते-बताते कार्यक्रम का मानीखेज संचालन भी किया। इस अवसर पर विशेष रूप से डॉ राजेंद्र रावत; रंगकर्मी विजय कुमार, अभिनेता प्रमोद सचान, अंबिका झा व विजय पंडित आदि साहित्य-संस्कृति कर्मी उपस्थित थे। कार्यकम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।



