अंग्रेजों ने कांग्रेस को बनाया ही क्रांति रोकने के लिए था

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
अकबर इलाहाबादी का एक शेर है- कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ, रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। मेरा मानना है कि यह पूरी तरह से कांग्रेस के इतिहास और उसके वर्क कल्चर को बताता है। कांग्रेस पार्टी कभी आंदोलन की पार्टी नहीं रही है। वह बीच-बीच में आंदोलन की घोषणा तो करती है लेकिन कभी कर नहीं पाती है। इसका कारण है कि कांग्रेस का गठन आंदोलन के लिए हुआ ही नहीं था। कांग्रेस को अंग्रेजों ने बनाया था। अंग्रेज अफसर ही उसका पहला अध्यक्ष था। उसके बाद भी कई अध्यक्ष अंग्रेज अफसर ही रहे। कांग्रेस के गठन का उद्देश्य भारत में क्रांति को रोकना था।कांग्रेस लगातार आजादी के आंदोलन की विरासत का दावा करती है। अब आजादी का आंदोलन किसके खिलाफ था? अंग्रेजों के खिलाफ। आप मुझे एक भी कांग्रेसी नेता का नाम बताइए,जिसको अंग्रेजों ने काले पानी की सजा दी हो। अंग्रेजों को कांग्रेस से ऐसा क्या प्रेम था? कांग्रेस के बड़े नेता जेल भेजे जाते थे तो उन्हें हर तरह की सुविधा दी जाती थी। तो कांग्रेस के डीएनए में आंदोलन और संघर्ष नहीं है। आजादी से पूर्व कांग्रेस के नेता अंग्रेजों से लड़ भी रहे थे और अंग्रेजों के साथ उनकी दोस्ती भी थी। इस तरह की लड़ाई आपने दुनिया में और कहीं नहीं देखी होगी। जिसने आपको गुलाम बनाकर रखा हो,वह आपका दोस्त तो नहीं हो सकता। गांधी जी पूरे जीवन अहिंसा की बात करते रहे, लेकिन जब अंग्रेजों को विश्व युद्ध में सैनिकों की जरूरत पड़ी तो भारतीय सैनिकों को भेजने की वकालत की। चाहे पहला विश्व युद्ध रहा हो या दूसरा। भारत का विश्व युद्ध से कोई लेना देना नहीं था,लेकिन हमारे सैनिक अंग्रेजों के लिए लड़े और कुर्बानियां दीं। यह कांग्रेस की मदद के बिना नहीं हो सकता था।1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने यह बात समझ ली थी कि भारत में अगर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांति और सशस्त्र विद्रोह को रोकना है तो उनको एक टूल चाहिए। एक ऐसा टूल जो क्रांति की धार को भोथरा कर सके। इसीलिए कांग्रेस पार्टी ने कभी क्रांतिकारी नेताओं का समर्थन नहीं किया। चाहे भगत सिंह रहे हों या चंद्रशेखर आजाद या सुभाष चंद्र बोस,आप एक-एक करके नाम लेते जाइए, इनमें से किसी के साथ कांग्रेस पार्टी कभी खड़ी नहीं हुई। ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी क्रांतिकारी को अंग्रेजों ने फांसी की सजा दी हो और कांग्रेस की टॉप लीडरशिप, जिसमें गांधी जी सबसे ऊपर हैं, ने अंग्रेज सरकार से बात करके फांसी को रुकवाने या फांसी के विरोध में किसी आंदोलन की घोषणा की हो। तो कांग्रेस भारत के क्रांतिकारियों से ब्रिटिश सरकार को बचाने का सुरक्षा कवच थी।

आजादी के बाद से कांग्रेस लगातार सत्ता में रही और सत्ता में रहते हुए तो संघर्ष की जरूरत पड़ती ही नहीं। इसीलिए कांग्रेस आराम तलब हो गई। संघर्ष उसके डीएनए में ही नहीं है। आजादी के बाद कांग्रेस के जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक किसी नेता को देख लीजिए जिसने संघर्ष किया हो। कांग्रेस हमेशा रक्षात्मक खेल खेलने वाली पार्टी रही कि किसी तरह से अपनी सत्ता बनी रहे। इसके लिए कांग्रेस किसी से भी कॉम्प्रोमाइज करने को तैयार थी। कांग्रेस ने जाति का खेल खेला। संविधान में व्यवस्था थी कि 10 साल बाद आरक्षण की समीक्षा होगी लेकिन कांग्रेस आरक्षण को बढ़ाती गई क्योंकि उसमें राजनीतिक फायदा था। अब हालत यह है कि कोई भी पार्टी या कितना भी बड़ा नेता हो, किसी की हिम्मत नहीं है कि आरक्षण के बारे में बोल भी सके। आरक्षण को हटाना तो दूर आप समीक्षा की ही बात बोलकर देखिए कैसा तूफान आता है। कांग्रेस पार्टी तुरंत उसको मुद्दा बनाती है। आप मानकर चलिए कि आरक्षण अनुसूचित जाति, जनजाति और अब पिछड़ा वर्ग की भलाई के लिए नहीं है। यह कुछ नेताओं की राजनीति को जिंदा रखने के लिए है। उनकी राजनीति तभी तक चल रही है जब तक यह आरक्षण की व्यवस्था चल रही है।

राहुल गांधी जो बार-बार आंदोलन की घोषणा करते हैं और कुछ हो नहीं पाता है,उसका कारण यही है कि कांग्रेस आंदोलन कर ही नहीं सकती। उसको अगर आंदोलन करना है तो उसमें भी सुविधा चाहिए। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को याद कीजिए। उनके साथ करीब 100 कंटेनर चल रहे थे और उनमें हर तरह की सुविधा रहती थी। इसी तरह बिहार में एसआईआर के विरोध में उन्होंने जो यात्रा की उसमें भी आप पता लगा लीजिए कितने कंटेनर चलते थे और किस-किस तरह की सुख सुविधाओं का उसमें इंतजाम होता था। आजादी के बाद राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर जो भी आंदोलन हुए हैं वे कांग्रेस विरोधी पार्टियों या गैर कांग्रेस पार्टियों ने किए हैं। समाजवादी नेता डॉ. लोहिया के समय का आदोलन रहा हो या जेपी के समय संपूर्ण क्रांति का आंदोलन या भाजपा और विहिप का अयोध्या आंदोलन या फिर मंडल को लेकर आंदोलन,किसी में भी आपको कांग्रेस पार्टी नहीं दिखाई देगी। आजादी के आंदोलन का श्रेय लेने और गांधी जी की अपील के कारण कांग्रेस देश के गांव-गांव तक पहुंची थी लेकिन राजीव गांधी के समय से इसमें बदलाव शुरू हुआ और कांग्रेस ज्यादा अर्बन ओरिएंटेड पार्टी होने लगी। इसके बाद उसका ग्रामीण वोटबैंक दरकने लगा। आज जो कांग्रेस का 20-22 परसेंट वोट है उसमें ग्रामीण क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी का जनाधार लगातार नीचे गिर रहा है। देश का जो मिडिल क्लास है,वह भाजपा का समर्थक है। वहां कांग्रेस के लिए रास्ता बनाना मुश्किल है।

इस देश की 78 प्रतिशत आबादी हिंदू है और कांग्रेस ने अपनी छवि हिंदू विरोधी बना ली है। हिंदुओं में उसे जो वोट मिलता भी है वह सूडो सेकुलर का है,जो मन से हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त हैं। आप अपने गांव,मोहल्ले,पड़ोस, रिश्तेदारों, स्कूल, कॉलेजों में किसी से बात करके देख लीजिए जो हिंदू विरोधी है वह कांग्रेस का समर्थक हो सकता है, लेकिन जो हिंदू सनातन का समर्थक है वह आपको कांग्रेस का समर्थक नहीं मिलेगा। तो राहुल गांधी जो बार-बार फेल हो रहे हैं,उसका कारण यह है कि वह समस्या की जड़ को नहीं समझ रहे हैं। वे बीमारी को अभी तक  डायग्नोस नहीं कर पाए हैं, इसीलिए उसका इलाज नहीं हो पा रहा और अब तो बीमारी लाइलाज होने की स्थिति में पहुंच गई है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)