यूं ही नहीं लाई गईं यूजीसी की गाइडलाइंस,बड़ी गहरी है ये साजिश।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद विवाद या आंदोलन भले ही थम गया हो,लेकिन यह साजिश बड़ी गहरी है और संकट इतनी आसानी से टलने वाला नहीं है। इस मामले में अगर सुप्रीम कोर्ट का फाइनल जजमेंट भी आ जाता है और 2026 की इन गाइडलाइंस को पूरी तरह से रिजेक्ट कर दिया जाता है तब भी हमें इस साजिश का जो मूल है, उसको समझना होगा वरना यह संकट खत्म होने वाला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नियम तो बदल जाएगा, लेकिन वह मनोवृत्ति या सोच नहीं बदलने वाली है,जो ये गाइडलाइंस लेकर आई है।

इस बात को समझने के लिए हमें थोड़ा सा इतिहास की ओर जाना होगा। 1871 में ब्रिटिश सरकार ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट बनाया। इसमें हिंदुओं की लगभग 200 जातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया। इनमें नट,बंजारे, लोधी, मीणा, पासी, कारीगर जातियां,घूम-घूम कर व्यापार करने वाले, लगातार तीर्थ यात्रा पर रहने वाले साधु संन्यासी आदि को शामिल किया गया। यह हिंदुओं में विभेद पैदा करने का बड़ा गहरा षड्यंत्र था। दुनिया का कौन सा न्यायिक सिद्धांत है जिसके तहत इन जातियों और समुदायों के लोगों को जन्म से ही अपराधी मान लिया गया। इलाके में कोई भी अपराध हो पुलिस इन जातियों के लोगों को पकड़ने और मुकदमा चलाने का अधिकार रखती थी।

चूंकि वे अंग्रेज थे और हमारे ऊपर हुकूमत कर रहे थे तो उन्होंने ऐसा किया। लेकिन आजादी के बाद क्या हुआ? 1947 के बाद भी जवाहरलाल नेहरू की सरकार इस क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को बनाए रखना चाहती थी। अब आप अंग्रेजों के बाद इन देसी अंग्रेजों की मानसिकता देखिए। इस तारतम्य को जोड़िए तो आप समझ पाएंगे कि 2026 की यूजीसी यह जो गाइडलाइंस हैं, वे कहां से आ रही हैं। उसके पीछे का मूल विचार क्या है? क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट नेहरू सरकार ने 1952 में तब खत्म किया जब कांग्रेस के ही मोरारजी देसाई, गुलजारी लाल नंदा,बीजी खेर,हिरन मुखर्जी जैसे नेताओं ने इसका विरोध किया। और खत्म भी इस तरह किया गया कि इन जातियों को डी नोटिफाइड ट्राइब्स यानी विमुक्त जाति घोषित कर दिया गया और वह सिलसिला अब तक चल रहा है। मोदी सरकार बनने के बाद 2019 में इन जातियों और समुदायों के लिए पहली बार प्रीमैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक वजीफे की योजना शुरू हुई। इनके लिए वेलफेयर बोर्ड बना। मोदी सरकार ने यह काम भले किया हो लेकिन 2026 की यूजीसी गाइडलाइन बताती है कि उनकी सरकार और पार्टी में ऐसे लोग हैं, जो औपनिवेशिक मानसिकता वाले हैं। मैकाले की सोच वाले अगर उनकी पार्टी और सरकार में नहीं होते तो यूजीसी की यह गाइडलाइन नहीं आती।

इसी तरह देश में 2004 से 2014 तक रही सोनिया और मनमोहन की सरकार कम्युनल वायलेंस बिल लाई थी। उसमें प्रावधान था कि कहीं भी सांप्रदायिक दंगा होगा, उसके लिए सिर्फ और सिर्फ हिंदू जिम्मेदार ठहराए जाएंगे। यह पूरे हिंदू समाज को क्रिमिनल घोषित करने की साजिश थी। वह तो भाजपा,संघ और हिंदू संगठनों ने इसका तीव्र विरोध किया,जिसके कारण कांग्रेस यह बिल पास नहीं करा पाई। अगर यह बिल पास हो गया होता तो वही होता जो अंग्रेज सरकार ने किया था यानी हिंदू जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया जाता। दंगा होने पर आपको साबित करना होता कि आप दोषी नहीं हैं। सोनिया और मनमोहन की सरकार ने ऐसा ही एक और काम किया। वे राइट टू एजुकेशन एक्ट लेकर आए। इसमें बड़ी चालाकी से एक प्रावधान घुसेड़ा गया कि केवल हिंदू संगठनों द्वारा संचालित स्कूलों और शिक्षण संस्थाएं में गरीबों को 25 फीसदी आरक्षण देना पड़ेगा। यह व्यवस्था ठीक थी लेकिन केवल हिंदुओं के स्कूल क्यों? इससे क्रिश्चियन स्कूलों और इस्लामी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे मदरसों को अलग रखा गया। उसका नतीजा यह हुआ कि हिंदू संगठनों द्वारा संचालित स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा महंगी हो गई और बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल बंद हो गए। आरटीई में यह प्रावधान आज तक चल रहा है। तो यूजीसी की 2026 की गाइडलाइंस,जो शिक्षा मंत्रालय लेकर आया था, दरअसल हिंदुओं को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश थी। इन गाइडलाइंस का इतना विरोध होने के बावजूद और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश आने से एक दिन पहले तक देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान मीडिया के सामने जिस तरह से इनका बचाव कर रहे थे, उसका मतलब वह इनसे सहमत थे।

मैं अपने पिछड़ा वर्ग के मित्रों से आग्रह करना चाहता हूं कि आंखें खोलें और देखें कि हो क्या रहा है। मंडल कमीशन लागू होने के बाद से उनके खिलाफ बड़ी साजिश हो रही है। जब संविधान सभा में आरक्षण पर चर्चा चल रही थी तो तय हुआ कि जाति व्यवस्था केवल हिंदू समाज में है। तो आरक्षण का लाभ हिंदू समाज की पीड़ित जातियों को ही मिलेगा। उस समय प्रश्न उठा कि हिंदू कौन? तो यह कहा गया कि जो मुसलमान नहीं है, जो ईसाई नहीं है,जो पारसी नहीं है,जो यहूदी नहीं है, वह सब हिंदू हैं। इसका मतलब यह हुआ कि सिख, बौद्ध,जैन हिंदू समाज में आते हैं। लेकिन मंडल के बाद क्या किया गया? पिछड़ा वर्ग में मुस्लिम जातियों को भी शामिल कर दिया गया। मुसलमान और इस्लाम तो यह कहता था कि हमारे यहां कोई भेदभाव नहीं है। कोई जाति व्यवस्था नहीं है। आज स्थिति यह है कि मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी पिछड़ा वर्ग में शामिल होकर आरक्षण का लाभ ले रही है। और यह किसका हक मारकर दिया जा रहा है? हिंदुओं के जो पिछड़ा वर्ग के लोग हैं, उनका हक मारकर। लेकिन इस पर सब मौन हैं।

कांग्रेस की बात छोड़िए उसे तो यह सूट करता है लेकिन जब धर्म के आधार पर आरक्षण देने की कोई व्यवस्था संविधान में नहीं है तो भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन क्यों मौन हैं? एक तरफ मुसलमानों को पिछड़ा वर्ग के नाम पर आरक्षण दिया जा रहा है और दूसरी तरफ हिंदू समाज के दो समुदायों को लड़ाने की कोशिश हो रही है।

यूजीसी की ये गाइडलाइंस किसी भोलेपन में नहीं बनीं। लेफ्ट इकोसिस्टम की पूरी की पूरी मांग यूजीसी की इन गाइडलाइंस में कैसे शामिल हो गईं? कमेटी में भाजपा के बड़े-बड़े लोग शामिल थे। कानून के जानकार रविशंकर प्रसाद और बांसुरी स्वराज के साथ घनश्याम तिवारी और संबित पात्रा थे। कमेटी में भाजपा की मेजॉरिटी रहते ऐसा कैसे हो गया। मान लीजिए हो भी गया तो शिक्षा मंत्रालय ने इसको नोटिफाई कैसे कर दिया। इस मामले में अगर सुप्रीम कोर्ट दखल न देता

इस देश में जो लोग चाहते हैं कि जेन-जी सड़क पर उतरे उनकी इच्छा पूरी हो जाती। सुप्रीम कोर्ट ने इस देश और समाज को बचाया है। सरकार ने अपनी ओर से इन्हें वापस नहीं लिया। इस बात की गंभीरता को समझिए कि सरकार में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो इस काले नियम को ठीक समझते हैं। उनकी पहचान होनी चाहिए। उनको सजा मिलनी चाहिए। मैकाले की सोच वालों को पार्टी और सरकार से बाहर किया जाना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)