एक गलत फैसले ने भारत की गल्फ मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
भारत ऐसे ही बर्बाद नहीं हुआ। भारत की बर्बादी में बहुत बड़ा हाथ कांग्रेस पार्टी के नेताओं का है। यह किसी की राय नहीं है। यह एक तथ्य है। थोड़े समय के लिए भारत रीजनल करेंसी का एंकर बन गया था। सोने की तस्करी और करेंसी आर्बिट्राज को रोकने के लिए भारत ने एक विदेशी करेंसी जारी की थी,जिसका नाम गल्फ रुपी रखा गया। इसके नोट लाल रंग में छपते थे और रुपी से पहले इसमें अंग्रेजी का अल्फाबेट जेड लिखा जाता था। यह करेंसी काठमांडू से कुवैत और पूर्वी अफ्रीका से दक्षिण एशिया तक चलती थी। यूएई, कतर,ओमान,बहरीन यहां तक कि अफ्रीका में केन्या,युगांडा,तंजानिया में भी यह गल्फ रुपया चलता था और भारत के साथ इसी में व्यापार होता था। किसी भी देश की सबसे बड़ी ख्वाहिश होती है कि उसकी करेंसी को दूसरे देशों में भी मान्यता मिले। तो इस गल्फ रुपी ने भारत को एक विशेष देश बना दिया। भारत की यह ताकत किसी समझौते या सैन्य शक्ति के कारण नहीं थी,यह भारत और भारतीय करेंसी पर विश्वास का नतीजा था।

1949 में ब्रिटेन ने अपनी करेंसी पाउंड स्टर्लिंग का डिवैल्यूएशन किया। चूंकि भारत उस समय पाउंड स्टर्लिंग से जुड़ा हुआ था तो उसने भी अपनी करेंसी यानी रुपए का 30% अवमूल्यन कर दिया। इससे भारत को झटका तो लगा,लेकिन बहुत ज्यादा नहीं। बड़े झटके के लिए भारत को इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने का इंतजार करना पड़ा। इंदिरा गांधी 1966 में देश की प्रधानमंत्री बनीं। उसके बाद अमेरिका ने भारत पर दबाव डालना शुरू किया। आजकल जो राहुल गांधी बोलते हैं कि मोदी ने अमेरिका के आगे सरेंडर दिया तो उनको जरा अपनी दादी का इतिहास पलट कर देखना चाहिए। एक समझौते के तहत भारत में उस समय अमेरिका से गेहूं आता था। अमेरिका में जो गेहूं जानवर भी नहीं खाते थे वह भारत भेज दिया जाता था। अमेरिका ने दबाव बनाया कि गेहूं तभी देंगे जब भारत अपनी करेंसी का अवमूल्यन करेगा। इसी दबाव में इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर गईं और उनके लौटकर आने के बाद भारतीय रुपए का 57% अवमूल्यन हो गया। यानी जो एक डालर 4.76 रुपये का था वह रातों रात 7.5 रुपये का हो गया।

What does Weakening Rupee Against Dollar Signify? | Trade Brains

इसका नतीजा यह हुआ कि सारा इंपोर्ट महंगा हो गया। एक्सपोर्ट ज्यादा करते नहीं थे तो इसलिए उसका फायदा उठा नहीं पाए। महंगाई बेतहाशा बढ़ने लगी। इंदिरा गांधी के खिलाफ नैरेटिव बनने लगा तो उन्हें मोरारजी देसाई को मंत्री पद से हटाना पड़ा साथ ही बैंकों का नेशनलाइजेशन करना पड़ा,लेकिन इसका कोई फायदा आम आदमी को नहीं हुआ। रुपये का अवमूल्यन करते हुए इंदिरा गांधी की सरकार की ओर से दलील दी गई कि इससे भारत में विदेशी निवेश बढ़ेगा साथ ही भुगतान संतुलन की स्थिति ठीक होगी,लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। चूंकि उस समय हम इंपोर्ट ज्यादा कर रहे थे और एक्सपोर्ट कम था तो हमारा करंट अकाउंट डेफिसिट लगातार बढ़ता जा रहा था। इस सबका असर यह हुआ कि जिन देशों में भारत का गल्फ रुपी चलता था, उनका भारत पर से भरोसा उठ गया? उन्होंने सोचा कि जो देश एक दूसरे देश के दबाव में रातोंरात अपनी करेंसी को इस तरह से डिवैल्यू कर दे, उस देश और उसकी करेंसी पर कैसे भरोसा किया जा सकता है? तो इंदिरा गांधी के इस फैसले का असर यह हुआ कि हमारी गल्फ मुद्रा का चलन खत्म हो गया। जो देश इसमें ट्रेड करते थे, उन्होंने बंद कर दिया। दरअसल उनका भारत की मौद्रिक नीति से ही भरोसा उठ गया। इस सब का ठीकरा इंदिरा गांधी ने अपने सलाहकारों पर फोड़ा कि हमको गलत सलाह दी गई। उन्होंने उन सलाहकारों से तो मुक्ति पा ली,लेकिन भारत की विदेशी करेंसी गल्फ रुपी को फिर से स्थापित नहीं कर पाईं।

1991 में पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत ने आर्थिक उदारीकरण किया, लेकिन भारतीय रुपए का वह रुतबा तब भी नहीं लौटा। तब तक दुनिया पर डॉलर का राज हो गया था। गल्फ रुपी को खत्म करके हमने डॉलर का वर्चस्व स्थापित करने में मदद की। इंदिरा गांधी और उनकी सरकार के रुपये के अवमूल्यन के उस फैसले से भारत के पास जो मॉनिटरी लीडरशिप थी, वह चली गई। सबसे बड़ी बात  भारत पर प्रतिबंध लगाने या सैन्य कार्रवाई की धमकी नहीं दी गई थी,अमेरिका ने सिर्फ जरा सा दबाव डाला था और इंदिरा गांधी झुकने को तैयार हो गईं। उन्होंने इस बात की कोई परवाह नहीं की कि इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?

अब आप उस घटना को याद कीजिए और आज जो भारत और अमेरिका के बीच में ट्रेड डील की बात चल रही है, उसको याद कीजिए। दोनों की तुलना कीजिए। जो सबसे बड़ा फर्क नजर आएगा वह लीडरशिप,आत्मसम्मान और देश के गौरव की रक्षा का नजर आएगा। अमेरिका से ट्रेड डील कोई मुश्किल नहीं है। नरेंद्र मोदी को इंदिरा गांधी जितना भी झुकने की जरूरत नहीं है। उससे कम में काम चल जाता, लेकिन अगर नरेंद्र मोदी ऐसा करते तो वह भारत के लोगों की नजर से उतर जाते। उनकी जो साख है, वह रातोंरात खत्म हो जाती और अमेरिका पूरी दुनिया को बताता कि देखिए हम कैसे भारत को जब चाहते हैं झुका लेते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि लीडरशिप की क्वालिटी में फर्क था। उस समय की लीडरशिप देश की संप्रभुता से समझौता करने को तैयार हो गई लेकिन आज की लीडरशिप ऐसा करने को तैयार नहीं है। उस समय अगर इंदिरा गांधी अमेरिका के दबाव के आगे न झुककर अड़ गई होतीं तो आज भारत की तस्वीर अलग होती। शायद आज हम चीन से पीछे नहीं होते।

आप समझ सकते हैं किसी भी देश की मुद्रा का 57% डिवैल्यूएशन हो जाए तो क्या होगा? इस फैसले ने देश में गरीबी को कई गुना बढ़ा दिया। उन्होंने सोवियत संघ की नीतियां अपना लीं। कोटा परमिट राज अपना लिया। भारत के प्राइवेट सेक्टर को बढ़ने नहीं दिया। सब कुछ सरकारी नियंत्रण में आ गया। 1991-92 से पहले भारत में सिर्फ दो गाड़ियां बनती थीं। वह भी कोटा के तहत कि इतने से ज्यादा नहीं बना सकते। टेलीफोन का कनेक्शन पाने के लिए मंत्री तक सिफारिश लगानी पड़ती थी। केवल नीतियों और नेतृत्व के कारण आज सब कुछ सहज उपलब्ध है। 81 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त में राशन मिल रहा है। फिर भी कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया और जिन्होंने वास्तव में बर्बाद किया, उनका गुणगान हो रहा है। तो आप इस अंतर को समझिए। आप किसी की बात पर मत आइए। आप तथ्य पता कीजिए। जब कोई कहे कि हर बात के लिए कांग्रेस को दोष देना ठीक नहीं है,उससे कहिए कि तथ्यों पर बात कीजिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)