डील के बाद दुनिया भारत को सबसे टफ नेगोशिएटर बता रही पर कांग्रेस की नजर में सरेंडर।
प्रदीप सिंह।
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील का मामला लंबे समय से अटका हुआ था। अप्रैल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ 18% से बढ़ाकर 25% कर दिया। फिर अगस्त 2025 में उन्होंने रूस से तेल खरीदने का आरोप लगाते हुए भारत पर 25% और टैरिफ लगा दिया। अब ये उनका दोगलेपन था क्योंकि अमेरिका, पूरा यूरोपियन यूनियन और चीन भी रूस से तेल खरीद रहे हैं लेकिन उन्होंने भारत पर इतना ज्यादा टैरिफ इसलिए लगा दिया क्योंकि उन्हें लगा कि इससे भारत झुक जाएगा और उसे दबाकर अमेरिका को फायदा मिल सकता है। दूसरे उनके चुनाव प्रचार में फंडिंग करने वालों में अमेरिका के एग्रीकल्चर प्रोडक्ट का व्यापार करने वाले शामिल थे,उनको खुश करने के लिए ट्रंप चाहते थे कि भारत अपना बाजार अमेरिका के एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स के लिए खोल दे। लेकिन भारत के नेगोशिएटर्स और प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि हम अपने किसानों,दुग्ध उत्पादकों, अपने मछुआरों के हितों से कोई समझौता नहीं करेंगे।
ट्रंप यह भी चाहते थे कि भारत अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी छोड़ दे और अमेरिका का पिछलग्गू या जूनियर पार्टनर बन जाए,हालांकि यह बात उन्होंने सीधे-सीधे नहीं बोली, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया कि यह नहीं होने वाला है। अब जब सोमवार की रात ट्रंप ने भारत के साथ ट्रेड डील की घोषणा की तो उन्होंने कहा कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। सवाल यह है कि भारत किससे क्या खरीदेगा या नहीं खरीदेगा, यह भारत तय करेगा। ट्रंप नहीं तय करेंगे। भारत आज भी रूस से तेल खरीद रहा है। यह सही है कि तीन साल पहले जब हमने तेल खरीदना शुरू किया था तब से अब में काफी कमी आ गई है, लेकिन उसका बड़ा कारण रूस की दो बड़ी तेल उत्पादक कंपनियों पर लगा प्रतिबंध है।

रूस से हमने तेल इसलिए खरीदना शुरू किया क्योंकि वह हमको प्रति बैरल इंटरनेशनल मार्केट से 15 डॉलर कम में दे रहा था। उसका नतीजा यह हुआ कि पिछले तीन साल में भारत सरकार ने 26 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत की है। विपक्ष के लोग आरोप लगाते हैं कि रूस से तेल खरीद का फायदा रिलायंस और अंबानी को हुआ। अब मुझे उनकी समझ पर तरस आता है। दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरीज में से एक जामगर की रिफाइनरी रिलायंस की है। रूस का तेल रिफाइन कर रिलायंस ने यूरोप को बेचा। इससे रिलायंस को विंड फॉल प्रॉफिट यानी अप्रत्याशित मुनाफा हुआ और भारत सरकार ने उससे 70,000 करोड़ का विंड फॉल टैक्स वसूल किया। मतलब 26 बिलियन डॉलर की बचत और 70 हजार करोड़ का विंडफॉल टैक्स भारत सरकार के खजाने में आया। दूसरा इस क्राइसिस के दौर में भारत ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने नहीं दिए, जिससे महंगाई नहीं बढ़ी और आम लोगों को फायदा हुआ।
अमेरिका के साथ अभी जो ट्रेड डील हुई है,इसको पूरी ट्रेड डील मत समझिए। अभी जो समझौता हुआ है, हालांकि उसका ब्योरा सामने नहीं आया है, उसमें आईटी और सर्विसेज शामिल नहीं है। अभी केवल गुड्स की बात हुई है और अमेरिका ने भारत पर टैरिफ घटाकर 18% कर दिया है। इससे भारत को टेक्सटाइल, लेदर,जेम्स एंड ज्वेलरी के क्षेत्र में फायदा होगा। अपने कॉम्पिटिटर बांग्लादेश,श्रीलंका, कंबोडिया वियतनाम,चीन की तुलना में अब भारत पर सबसे कम टैरिफ है। इससे अमेरिका में हमारे सामानों की ज्यादा मांग होगी। इस डील के बाद अमेरिका के कृषि मंत्री का एक बयान सामने आया,जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद देते हुए कहा कि हमारे किसानों के लिए आपने बहुत बड़ी राहत कर दी। अब हम अपना कृषि उत्पाद भारत को बेच सकेंगे। सवाल है कि कौन सा कृषि उत्पाद बेचेंगे? कौन सा नहीं बेचेंगे? भारत पहले कह चुका है कि हम अपना एग्रीकल्चर सेक्टर नहीं खोलेंगे। भारत पहले से ही अमेरिका से मटर की दाल खरीदता रहा है। उसकी खरीद हो सकता है कि बढ़ जाए। नेगोशिएशन के दौरान अमेरिका का जोर था कि भारत मक्का भी खरीदे। तो भारत अमेरिकी मक्का अपने आम लोगों के कंजमशन के लिए खरीदने को तैयार नहीं है। हम अमेरिका का मक्का एथेनॉल बनाने मतलब इंडस्ट्रियल यूज़ के लिए खरीद सकते हैं क्योकि एथेनॉल बनाने के लिए हम जो गन्ने,धान की भूसी एवं दूसरे उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं, वे पूरे नहीं पड़ते हैं। अमेरिकी मक्का खरीद कर अगर हम एथेनॉल बनाते हैं तो उससे हमारे किसानों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। हालांकि इस बारे में डिटेल्स अभी सामने नहीं आए हैं।
डील की घोषणा होते ही कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाने शुरू कर दिए कि इसकी घोषणा ट्रंप ने क्यों की है? सवाल है कि ट्रंप किसकी घोषणा करेंगे,क्या बोलेंगे,यह भारत तो तय नहीं करेगा। डील के लिए ट्रंप को तैयार होना था। भारत ने अपनी ओर से डील फाइनल कर दी थी और सार्वजनिक रूप से कहा गया था कि जो बेस्ट डील हम ऑफर कर सकते थे वो हमने कर दी है। इस डील के बाद दुनिया में मीम बन रहे हैं, जिसमें कहा जा रहा है कि भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल दुनिया के सबसे टफ नेगोशिएटर हैं। तो भारत कहीं से झुका नहीं। अमेरिका ने 50% टैरिफ लगाकर झुकाना चाहा तो भारत ने यूरोपियन यूनियन से एफटीए कर लिया। इससे डोनाल्ड ट्रंप को बहुत बड़ा धक्का लगा। ऐसा नहीं है कि अमेरिका से डील के न होने से हमको नुकसान नहीं हो रहा था। निश्चित रूप से हो रहा था,लेकिन हमारा सर्वाइवल उस पर नहीं टिका था। हमने नए बाजार खोजने शुरू कर दिए और हमको सफलता भी मिल रही थी। ट्रंप ने देखा कि अगर इसको ज्यादा लटकाया तो उनकी पूरी रणनीति मुंह के बल गिरेगी। उनके देश के अंदर से उनकी आलोचना शुरू हो गई थी। अमेरिका में महंगाई बढ़ रही थी। अमेरिकी एक्सपर्ट का मानना था कि भारत को अपने से दूर करके ट्रंप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। इसी सब ने ट्रंप को झुकने पर मजबूर कर दिया और डील हो गई।

भारत में अब विपक्ष को बड़ी परेशानी है। अभी डील के बारे में किसी को नहीं मालूम है कि उसमें हुआ क्या,लेकिन विपक्ष ने इसे मोदी का सरेंडर बताना शुरू कर दिया। सवाल है कि ट्रंप 50% से 18% टैरिफ पर आ गए और सरेंडर मोदी ने कर दिया। 50% टैरिफ लगने के बाद भी भारत ने डील करना मंजूर नहीं किया और सरेंडर नरेंद्र मोदी ने कर दिया। यूरोपियन यूनियन से मदर ऑफ ऑल डील्स हो गई लेकिन सरेंडर नरेंद्र मोदी ने कर दिया। भारत का विपक्ष खासकर कांग्रेस ही ऐसा कर सकती है कि जहां देश के लिए अच्छा हो रहा हो,वहां खुरपेच करो। उसमें बेवजह की गलती ढूंढने की कोशिश करो। डील का मतलब ही होता है कि दोनों पक्ष किसी न किसी मुद्दे पर समझौता करते हैं। विपक्ष जिस तरह का नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रहा है वह दरअसल भारत विरोधी है, जिसका दुनिया में कोई देश समर्थन नहीं करने वाला है। जब तक डील की सारी डिटेल्स नहीं आ जाती, तब तक हम यह नहीं कह सकते कि किसको ज्यादा फायदा हुआ है, किसको कम। किसी क्षेत्र में हमको ज्यादा फायदा होगा,किसी क्षेत्र में अमेरिका को ज्यादा फायदा होगा। हर डील में ऐसा ही होता है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



