हर्ष कुमार।
मंगलवार को उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री व कैराना के बीजेपी सांसद स्व. हुकुम सिंह (5 अप्रैल 1938 – 3 फ़रवरी 2018 ) की आठवीं पुण्यतिथि थी। लंबी बीमारी के बाद 2018 में उनका निधन हो गया था। उनके साथ ही सात बार के विधायक व कई बार के मंत्री बाबू जी की राजनीतिक विरासत भी खत्म हो गई।
2014 में वे पहली बार सांसद बने और अपना पहला ही कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। उपचुनाव हुआ तो उनकी बेटी मृगांका सिंह को स्व. मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन (रालोद के टिकट पर सर्वदलीय प्रत्याशी) ने हरा दिया। 2019 के चुनावों में बीजेपी ने प्रदीप चौधरी (जो सहारनपुर से थे) को टिकट दिया और मोदी लहर में वे सांसद भी बन गए लेकिन उनकी कमजोर कार्यशैली के कारण वे लोकप्रिय नहीं हो सके। 2024 में हार गए और स्व. मुनव्वर हसन की युवा व पढ़ी लिखी बेटी इकरा हसन सांसद बन गई समाजवादी पार्टी के टिकट पर। इकरा के भाई नाहिद हसन कैराना से विधायक हैं ही।
जब तक हुकुम सिंह और मुनव्वर हसन जीवित रहे दोनों में कैराना में टकराव होता ही रहा। हुकुम सिंह ने कैराना क्षेत्र में दबदबा बनाए रखा। मुनव्वर सांसद बने भी तो चार साल (2004) के लिए मुजफ्फरनगर से और केवल दो साल कैराना (1996-98) से। मुनव्वर हसन बहुत युवावस्था में ही 2008 में सड़क हादसे का शिकार हो गए। वे भी पूरा कार्यकाल नहीं कर पाए। दिसंबर में उनका निधन हुआ था तो उपचुनाव भी नहीं हुआ क्योंकि जल्द ही आम चुनाव होने वाले थे। 2009 में मायावती ने तबस्सुम को टिकट दिया और वे पांच साल सांसद रही।
आज की तारीख में कैराना की राजनीति में हसन परिवार का दबदबा कायम हो चुका है। हुकुम सिंह की बेटियों में से कोई भी उनकी राजनीतिक विरासत को आगे नहीं बढ़ा पाई। बेटा उनका कोई है नहीं। भाजपा कभी भी कैराना में अपना कोई नेतृत्व नहीं बना पाई। या यूं कहें कि हुकुम सिंह जैसे कद्दावर नेता के कारण बन नहीं पाया।
कुल मिलाकर आज बीजेपी के लिए कैराना में टिकट के लिए भी कोई उचित प्रत्याशी नहीं है। और हसन परिवार के लिए कोई चुनौती देने वाला किसी पार्टी में नजर ही नहीं आता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं। आलेख लेखक की सोशल मीडिया वॉल से साभार)



