चार फरवरी को रचे गए षड्यंत्र से देश को डरना चाहिए

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
चार फरवरी 2026 की तारीख को याद रखिए। इस तारीख को जो हुआ, वह इस देश के इतिहास और शायद दुनिया के किसी जनतंत्र के इतिहास में नहीं हुआ होगा। उससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत में ऐसा आगे नहीं होगा,इसकी कोई गारंटी नहीं है। उस दिन एक सुनियोजित षड्यंत्र इस देश के पार्लियामेंट्री सिस्टम,देश की डेमोक्रेसी और इस देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ रचा गया। इस षड्यंत्र को जिस गंभीरता से लिया जाना चाहिए था,मुझे नहीं लगता उस तरह से लिया गया।डेमोक्रेसी में राजनीतिक दलों में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, नीतिगत मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं। कभी विपक्ष का तो कभी सत्ता पक्ष का पलड़ा भारी हो जाता है। यह संतुलन एक तरह से बना रहता है, लेकिन अगर पूरी व्यवस्था को नष्ट करने का कोई षड्यंत्र रचा जाए तो वह सामान्य घटना नहीं है। 4 फरवरी की शाम को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उसका उत्तर देना था। यह एक परिपाटी और परंपरा है। लेकिन प्रधानमंत्री नहीं आए। ऐसा भारत के संसदीय इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। सवाल है कि प्रधानमंत्री क्यों नहीं आए? वह इसलिए नहीं आए क्योंकि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने उनको सूचना दी कि आप सदन में न आएं। उस दिन एकसुनियोजित षड्यंत्र के तहत कांग्रेस और उसके कुछ साथी दलों की महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री सदन में जहां बैठते हैं, उस आसन को सामने और पीछे से घेर लिया था। अब आप एक मिनट के लिए कल्पना कीजिए कि प्रधानमंत्री लोकसभा अध्यक्ष की बात न मानते और सदन में आ जाते तो उनके साथ क्या हो सकता था? प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरा था। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन पर शारीरिक रूप से हमला हो सकता था। चलिए यह माना जा सकता है कि ऐसा करने का उन महिला सांसदों का इरादा नहीं था। लेकिन अगर प्रधानमंत्री आकर बैठते और विपक्ष की महिला सांसद उनको घेर कर रखतीं तो आप मानकर चलिए कि सत्तारूढ़ दल के सांसद चुपचाप बैठकर तमाशा तो नहीं देखते। वे भी वेल में आते और उसके बाद जो दृश्य होता उसकी आप कल्पना कर सकते हैं। दोनों पक्षों में धक्का-मुक्की, गु्त्थम-गुत्था सब हो सकता था। कांग्रेस की यही योजना थी कि ऐसा दृश्य बने और उसका लाइव टेलीकास्ट पूरा देश और दुनिया देखे। प्रधानमंत्री का आसन घेरने वाली महिला सांसदों में जानबूझकर दलित महिला सांसदों को आगे रखा गया। उपद्रव कर रहे सांसदों को बाहर करने के लिए मार्शल आते और मारपीट की नौबत आती,जिसकी पूरी तैयारी थी, तो उसका क्या नैरेटिव बनाया जाता, इसकी आप कल्पना कर सकते हैं।

कुल मिलाकर मामला इतना है कि कांग्रेस पार्टी की बेचैनी,हताशा और छटपटाहट हर दिन के साथ बढ़ रही है। वह चाहती है कि कैसे भी नरेंद्र मोदी की छवि को खराब किया जाए। देश और देश के बाहर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनका जो बढ़ता कद है, उस पर कैसे दाग लगाया जाए? कांग्रेस के षड्यंत्र की जानकारी होने के बाद प्रधानमंत्री जब सदन में नहीं आए तो कांग्रेस नेता प्रियंका वाड्रा गांधी ने मीडिया से कहा कि अगर विपक्षी महिला सांसद प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गईं तो इसमें क्या हो गया? प्रधानमंत्री को इसमें डरने की क्या जरूरत है? तो इससे पुष्टि हो गई कि यह सब प्रियंका की जानकारी में हुआ। मतलब गांधी परिवार की ओर से यह षड्यंत्र रचा गया। राहुल गांधी का बयान सुनिए कि प्रधानमंत्री डर कर भाग गए। जब उनका षड्यंत्र कामयाब नहीं हुआ तो यह मुद्दा बनाने की कोशिश की गई। जबकि प्रधानमंत्री ने इस देश की संसदीय परंपरा, संसद की गरिमा को बचाने के लिए यह कदम उठाया। 4 फरवरी को कांग्रेस ने संसद में उसी तरह का  दृश्य बनाने का षड्यंत्र रचा था जैसा कभी उत्तर प्रदेश की विधानसभा में देखा गया था। जब विपक्षी दलों के विधायकों ने माइक तोड़कर सत्तारूढ़ दल के विधायकों और मंत्रियों की ओर फेंके। इसमें कई मत्री और विधायक खून से लथपथ हो गए थे।

क्या इसके बाद यह होगा कि सदन के अंदर प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए एसपीजी को तैनात किया जाएगा? यह बात केवल नरेंद्र मोदी की नहीं है। इस देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री की है। उसकी सुरक्षा अगर सदन के अंदर खतरे में पड़ जाए तो संसदीय जनतंत्र के लिए इससे बड़ा काला दिन और क्या हो सकता है। इतने बड़े षड्यंत्र के बाद भी सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सत्तारूढ़ दल ने इसको बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बनाया। हाल ही में एक फिल्म आई थी धुरंधर। उसमें एक पात्र कहता है अगर ऐसा किया तो जो राष्ट्रीय नेतृत्व है, उसका धैर्य खत्म हो जाएगा। तो दूसरा पात्र जवाब देता है कि कभी-कभी राष्ट्रीय नेतृत्व का धैर्य टूटना, देश के हित में होता है। मैं कह रहा हूं कि अब वह समय आ गया है जब भारत के राष्ट्रीय नेतृत्व का यानी प्रधानमंत्री और उनके साथियों का धैर्य टूटना चाहिए। अगर संसदीय जनतंत्र की गरिमा को बनाए रखना है तो उनका धैर्य टूटना चाहिए। यह मामला यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी सुरक्षित हैं कि नहीं। यह मामला है कि इस देश के प्रधानमंत्री सुरक्षित हैं कि नहीं। इस मामले में लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला भी अपने दायित्व का निर्वाह करने में पूरी तरह से असफल रहे हैं। बार-बार सदन का न चलना,बार-बार कार्यवाही में बाधा होना,प्ले कार्ड दिखाना, वेल में घुसकर नारेबाजी करना, पीठासीन अधिकारी की तरफ कागज फाड़ कर फेंकना,यह एक तरह का हमला है। सवाल है कि जो महिला सांसद प्रधानमंत्री के आसन के करीब गईं और उसे आगे और पीछे से घेर रखा था, उनके खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष ने क्या कारवाई की? उन सदस्यों की सदस्यता क्यों नहीं खत्म होनी चाहिए? इसमें कमजोरी मैं सरकार की भी मानता हूं। क्या सरकार ने लोकसभा अध्यक्ष से कहा कि आपने ऐसा क्यों होने दिया और हो गया तो आपने क्या कदम उठाया? क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष के मुताबिक उनको इस बात की जानकारी पहले ही मिल गई थी कि प्रधानमंत्री को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो सकती है। आप कल्पना कर सकते हैं कि लोकसभा का अध्यक्ष प्रधानमंत्री से कहे कि आप अपने दायित्व का निर्वाह करने के लिए सदन में मत आइए क्योंकि वहां आपके लिए खतरा है। और खतरा कौन है? कोई दूसरा अराजक तत्व नहीं। उसी सदन के सदस्य जिनको चुनकर जनता ने भेजा है। इस पूरे मामले में लोकसभा अध्यक्ष और सरकार जवाबदेही से नहीं बच सकते। मामले अगर सदस्यों के सस्पेंशन से ठीक नहीं हो रहे हैं तो उससे आगे के कदम के बारे में सोचने की जरूरत है।

सदन में किस-किस तरह के दृश्य इस देश ने देखें हैं यह भूलना नहीं चाहिए। डॉक्टर राम मनोहर लोहिया हालांकि कभी मान्यता प्राप्त प्रतिपक्ष के नेता नहीं रहे, लेकिन उनका कद किसी राष्ट्रीय नेता से कम नहीं था। वह प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से किसी मायने में कमतर नहीं थे। न पढ़ाई लिखाई में, न जानकारी में, न राजनीतिक अनुभव में और न सामाजिक क्षेत्र में काम करने के अनुभव में। आप उस समय की लोकसभा की प्रोसीडिंग्स को देखिए। आपको गिनती करना मुश्किल होगा कि कितनी बार डॉ. राम मनोहर लोहिया को मार्शल्स ने उठाकर सदन से बाहर फेंका था। राहुल गांधी तो राम मनोहर लोहिया के पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है। लोहिया नेहरू के खिलाफ बोलते थे तो उनको सदन से निकाल दिया जाता था। मार्शल उठाकर ले जाते थे बाहर फेंक देते थे। आज वह क्यों नहीं हो रहा है? आज उससे आगे कुछ करने की जरूरत है। मेरी समझ जहां तक जाती है दो ही तरीके हैं। जो सदस्य इस तरह का हंगामा करते हैं उनका वेतन उनके पूरे निर्वाचित कार्यकाल के लिए रोक दिया जाए। दूसरा उनकी सदस्यता को खत्म कर दिया जाए और उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाए। प्रधानमंत्री की सुरक्षा,पीठासीन अधिकारी की सुरक्षा को खतरे में डालना बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)