भाजपा समर्थकों में फिर बढ़ रही बेचैनी और कसमसाहट।
प्रदीप सिंह।भारतीय जनता पार्टी में 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान एक बेचैनी और कसमसाहट थी। उसके बाद जो पांच-छह राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए उससे इस बेचैनी और कसमसाहट में थोड़ी कमी आई थी। लेकिन, यूजीसी की गाइडलाइंस के बाद जो मुद्दा उठा है,उससे फिर से यह बेचैनी और कसमसाहट बढ़ गई है। यह परिस्थिति ऐसी है कि जिससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीनों को चिंतित होना चाहिए। इसको अभी से ठीक करने की कोशिश शुरू नहीं हुई तो बड़ा नुकसान हो सकता है।इन परिस्थितियों में भाजपा के लिए अच्छी बात यह है कि उसका कोई विकल्प नहीं है। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के पास न नेतृत्व है, न नीति है और न ही संगठन। उसके नेता राहुल गांधी ने अपने को हंसी का पात्र बना लिया है। अब उनको देश में कोई गंभीरता से नहीं लेता। कितने कांग्रेसी उनको गंभीरता से लेते हैं, इस पर भी शक है। भाजपा की कमजोरी का लाभ उठा पाने की स्थिति में कांग्रेस पार्टी नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इसकी वजह से भाजपा को बहुत खुश हो जाना चाहिए। हालांकि अभी यह स्थिति नहीं आई है कि भाजपा समर्थकों के मन में गुस्सा आ गया हो,लेकिन असंतोष तो जरूर दिखाई दे रहा है। लेकिन मैं मानता हूं कि उससे बड़ा खतरा है, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में थोड़े पैमाने पर दिखाई दिया, समर्थकों का उदासीन हो जाना। 2024 का चुनाव मैं आज भी मानता हूं कि भाजपा की लहर का चुनाव था। 400 सीटों का लक्ष्य आसानी से पूरा हो सकता था। लेकिन, भाजपा के कई नेताओं का अहंकार,संगठन की शिथिलता,मतदाता की उदासीनता और टिकट वितरण में जो घपले घोटाले हुए, इन सबके कारण भाजपा 240 पर रुक गई और कांग्रेस 99 तक पहुंच गई। तो वर्तमान परिस्थिति में इस बात का खतरा बढ़ रहा है कि भाजपा का समर्थक उदासीन हो जाए। यह भाजपा के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
2024 में भाजपा का मतदाता उदासीन क्यों हुआ? कार्यकर्ता शिथिल क्यों हुआ? यह सबको पता है। वाराणसी जैसी सीट पर जो प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र है, वहां प्रधानमंत्री के वोट कम हो गए। ऐसा किन लोगों के कारण हुआ और किन वजहों से हुआ,यह सब जानते हैं। लेकिन, इसके बाद भी किसी को उसके लिए जवाबदेह नहीं ठहराया गया। दोषियों को कोई सजा नहीं दी गई। अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभूतपूर्व विकास का काम किया है। 10-11 सालों में जो हुआ है, उसकी 2014 से पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर के जितने प्रोजेक्ट आए हैं,उन सबको देख लीजिए। इसके बावजूद प्रधानमंत्री का वोट घट क्यों गया? इस सवाल का जवाब खोजे बिना आगे का रास्ता नहीं मिलने वाला है। अब इस बीच में यूजीसी की गाइडलाइंस आ गईं। यह किसके दिमाग की उपज है? मुझे तो लगता है कि जिसने भी किया, वह भाजपा का सबसे बड़ा दुश्मन है। इस एक काम से भाजपा का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है और पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इमेज को ठेस पहुंची है। पहली बार जब मैं कह रहा हूं तो 2001 अक्टूबर जब वे मुख्यमंत्री थे, से लेकर अब तक की बात कर रहा हूं। मेरा मानना है कि उनके प्रति विश्वास तो खत्म नहीं हुआ है, लेकिन एक संदेह के बीज का बीजारोपण हो गया है।

ऐसा नहीं है कि केवल यूजीसी गाइडलाइंस के कारण यह स्थिति आई है। धीरे-धीरे यह असंतोष पनप रहा था, लेकिन बार-बार लोग प्रधानमंत्री, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संदेह का लाभ दे रहे थे कि सरकार चलानी है, विदेश नीति चलानी है, इसलिए बहुत से समझौते करने पड़ेंगे। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि लक्ष्य क्या है? इस असंतोष,इस कसमसाहट,इस उदासीनता के बीच समर्थकों की प्रधानमंत्री से क्या अपेक्षा है? भाजपा के वोटों में मोदी अपनी छवि के कारण एडिशनल वोट जोड़ते हैं। तो फिर सवाल यह है कि समस्या क्या है? समस्या यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सनातन को जगाने का जो अभियान चलाया उससे सनातनी अपने अधिकार समझने लगा है। वह अपने दुश्मनों की पहचान करने लगा है। उसमें इतिहास बोध आने लगा है।
आज का सनातन समर्थक, 2002 वाले नरेंद्र मोदी को खोज रहा है। मोदी में मोदी को खोज रहा है। उसे लग रहा है कि जिस मोदी को हमने अपने सिर माथे पर बिठाया, आंख बंद करके विश्वास किया, वह आज के मोदी में हमें दिखाई नहीं दे रहे हैं। नेता को हमेशा तलवार की धार पर चलना पड़ता है कि उसके समर्थकों की जो अपेक्षा है और उसकी जो परफॉर्मेंस है, उसमें एक संतुलन बना रहे। दोनों में जब अनुपात का अंतर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो समस्या बढ़ जाती है। तो अभी मेरा मानना है कि सब बिगड़ा नहीं है। परिस्थितियों को सुधारा जा सकता है। उसका पहला कदम जो गलतियां हुई हैं, उनको स्वीकार करना चाहिए। दूसरा जिन लोगों की वजह से ऐसा हुआ, उनको कटघरे में खड़ा करना चाहिए। मोदी बार-बार कहते हैं कि हमको देश को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलानी है। लेकिन, प्रधानमंत्री जी आपकी पार्टी और सरकार में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो उसी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हैं। ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है जो लेफ्ट इको सिस्टम के विचारों से सहमत हैं। ऐसे लोगों की पहचान करने की जरूरत है।
सरकार के प्रति,पार्टी के प्रति और वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति के बारे में भाजपा कार्यकर्ताओं और संघ स्वयंसेवकों से उनकी राय पूछकर देखिए। स्वयंसेवक छोड़िए संघ के पदाधिकारी ऐसे मिल जाएंगे और उनका बहुमत होगा,जो संतुष्ट नहीं हैं। जिनको बहुत शिकायतें हैं, लेकिन कोई बोल नहीं रहा है और डेमोक्रेसी में सबसे खतरनाक होता है जब लोग बोलना बंद कर देते हैं, जब अपनी बात कहने से हिचकने लगते हैं,उससे सच्चाई सामने नहीं आती। नेतृत्व को ऐसे लोगों की जरूरत है, जो उनके सामने कड़वी बातें बोल सकें। उनको बता सकें कि समस्या कहां है। प्रशंसा करने वाले यह आपको कभी नहीं बता पाएंगे। नेतृत्व तक जब तक जमीनी हकीकत नहीं पहुंचेगी, नेतृत्व का फैसला गलत होने की आशंका बनी रहेगी। प्रधानमंत्री,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा तीनों को ऐसे लोगों की पहचान करनी पड़ेगी जो सरकार,संगठन,नेतृत्व और देश के खिलाफ काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों को जब तक निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाएगा तब तक स्थिति में सुधार आने वाला नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



