संदर्भ: व्योमेश जुगरान की पुस्तक ‘पहाड़ के हाड़’
महेश दर्पण।
एक सजग पत्रकार के रूप में व्योमेश जुगरान को मैंने करीब से देखा-पढ़ा है। पहाड़ के हाड़ उनकी ऐसी पुस्तक है जो न सिर्फ उत्तराखंड आदोलन के इतिहास से परिचित कराती है बल्कि वर्तमान चुनौतियों से भी साक्षात्कार का अनुभव कराती है। इसकी भूमिका में वरिष्ठ पत्रकार-कथाकार संजय खाती ने ठीक ही उनके वस्तुनिष्ठ व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रशंसा की है। पुस्तक के पांच अध्याय है उत्तराखंड आंदोलन और राजनीति, पर्यावरण और पर्यटन, लोक संस्कृति और सरोकार, विभूतियों और स्मृतियों व विविध। इसके पहले अध्याय में नवभारत टाइम्स, युगवाणी, उत्तरांचल पत्रिका, अलकनंदा हिन्दुस्तान सरीखे पत्र-पत्रिकाओं में सन् 1995 से 2019 के मध्य प्रकाशित लेख टिप्पणियों व आकलन प्रस्तुत हैं।
इनमें उजागर होता है उत्तराखंड राज्य के लिए संघर्ष का प्रारंभिक समय जिसमें पहाड़ी गांधी इंद्रमणि बडोनी के नेतृत्व में पौड़ी में धरना और मांगे सामने हैं- उत्तराखंड को पिछड़ा क्षेत्र घोषित कर 27 फीसदी आरक्षण, शिक्षा को आक्षण मुक्त रखना, पंचायतों का परिसीमन भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर। बडोनी जी से साक्षात्कार में अहिंसक आंदोलन, जनआंदोलन में समर्थ नेतृत्व और निहित स्थार्थ की एक्सपोज करती बातें तो हैं ही, यह निर्भीक अंदाज भी है कि संसद प्रधानमंत्री की जागीर नहीं।
उत्तराखंड हो कैसा? इस पर भी विचार करते हैं व्योमेश। उन्हें इस राज्य में कमीशनखोरी के तंत्र से मुक्ति तो चाहिए ही, वह चाहते है कि क्षेत्र के संसाधन व विशेषताओं को रोजगार हेतु उपयोगी भी बनाया जाये। इसके साथ ही जरूरी है कि क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताओं को समझा जाये। उद्योगपतियों को जमीन खरीदने की छूट देने वाले तंत्र से मुक्ति के साथ ही व्योमेश ठोस वैचारिक काम की जरूरत पर विशेष बल देते हैं।
अच्छी बात यह है कि उनकी नजर इतिहास पर भी बराबर बनी रहती है। पहाड़ के सुंदर व समृद्ध अतीत को वह विदेशियों द्वारा उल्लेख करने के संदर्भ भी प्रस्तुत करते हैं। इनमें फ्रेंच व्यापारी जीन बैपटिस्ट टैवर्नियर के यात्रा वृत्तांत और स्कॉटिश चिकित्सक व वनस्पतिशास्त्री एफ बुकेनिम के सर्वेक्षण शामिल हैं। वह 1938 की पहाड़ यात्रा के दौरान नेहरू के बयान जिसमें वह पहाडी क्षेत्र की विशिष्ट संस्कृितिक पहचान की समृद्ध करने के आंदोलन कर समर्थन करते हैं और पीसी जोशी का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पीसी जोशी ने सन् 1930 के दशक में पृथक पहाड़ी राज्य की मांग की और सी.पी.आई द्वारा 1952 में प्रस्ताव भी पारित कराया।
अध्याय 1: उत्तराखंड आंदोलन और राजनीति
व्योमेश इस बात पर गौर करते है कि जब-जब उत्तराखंड में आंदोलन की बात उठी, माफिया का खौफ सर उठाने लगा। इसके पार्श्व में जल संसाधनों पर इस क्षेत्र का व्यापक अधिकार होने की चिंता प्रमुख रही। प्रारंभमें संक्रमण के दौर को समझते हुए उनका यह कहना सही है कि इस आंदोलन के संदर्भ में सभी राजनैतिक दालों की भूमिका संदिग्ध रही है। यही कारण है कि क्षेत्रीय जनता खुद की छला अनुभव करती रही। व्योमेश यह जरूरी बात रेखांकित करते हैं कि किसी पर्वतीय मू-भाग की कल्पना उसकी जड़ में फैली तराई अथवा मैदान के बिना नहीं की जानी चाहिए।
वह अपनी भाषा में स्पष्ट बताते है कि उत्तराखंड में अधिकांश तो वन क्षेत्र है। कृषि योग्य भूमि केवल 13 फीसदी है। वह ब्रिटिश उपनिवेशवाद द्वारा वनों पर 1911 में प्रशासनिक नियंत्रण, पुरुषों की उद्यमिता घटने से महिलालों पर बढ़ते बोड़ा और अनेक ऐसी स्थितियों की चर्चा करते है जो दूर बैठे लोग समझ ही नहीं सकते। व्योमेश स्वप्न दिखाने वाली व्यवस्था से साफ कहते है स्विटजरलैंड भले न बने, उत्तराखंड ठीक-ठाक राज्य तो बन ही सकता है। वह यह चिंतन भी करते हैं कि राज्य बनने के उपरांत प्रारंभ में व्यवस्था कैसे चलेगी। वह बस उत्तर प्रदेश की कार्बन कॉपी बनने से बचने की वकालत करते हैं। परिसीमन में सावधानी बरतते हुए वह पहाड़ बनाम मैदान के द्वंद्व से बचने को कहते हैं। उनके लिए मुख्य मुद्दे बने रहते है- नाम, राजधानी मुख्यमंत्री चयन और परिसीमन।

राज्य बनने के उपरांत व्योमेश की चिंता उत्तरांचल के पहाड़ से जुड़ी रहती है। वह उसकी समस्याएं सम्मुख करते हुए विकास के महाप्रश्न पर बात करते हैं। स्थानीयता को महत्त्व दिलाने की उनकी चेष्टा निरंतर बरकरार रहती है। वह यह ध्यान दिलाते है कि इस क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों ही थी जिनके चलते अलग प्रशासनिक इकाई की मांग उठी थी। आंदोलनोपरांत वह उत्तराखंड नाम की बहाली की लेकर भी प्रयत्नशील रहते है। उत्तरांचल के विधिवत अस्तित्व में आने की कहानी तो वह कहते ही है. यह भी इंगित करना नहीं भूलते कि अंतरिम सरकार के अनेक कार्य आलोचना के घेरे में रहे। केंद्र से धन पर बढ़ती निर्भरता व राशि का प्रयोग प्रश्नों के घेरे में तो वह बताते ही है. यह भी साफ कहते है कि इस क्षेत्र की छवि ऐसी बनी कि अनुशासन नहीं, अराजकता चाहिए। इसे ठीक न मानते हुए वह एक बेहतर राज्य की चिता में रहते हैं। यह देखते हैं कि ऐसे में विकास का संक्रमण करान यहाँ कैसे बढ़ता चला गया।
पढ़ने वाला समझ सकता है कि यहाँ अतीत का सुनहरा समय एक स्वप्न कथा है और वर्तमान का कड़वा सच यह कि पहाड़ी गांवों से पलायन बढ़ा। यही नहीं नवीन राज्य को सार्थक नेतृत्व न मिलने की तकलीफ भी बनी रही। राज्य बनने के बाद दस वर्ष के भीतर की आबादी में 15 लाख से भी अधिक की बढ़ोत्तरी को व्योमेश संजीदगी से देखते हुए बताते हैं कि राज्य के मैदानी इलाकों में ऐसा पोच गुना अधिक हुआा। इसमें छिपे वोट के खेल को इस पत्रकार की आंख साफ पकड़ लेती है। उसे दुख है कि बिजली-पानी जैसे अधिकार भी क्षेत्र के पास न लौटे। उलटे जमीन की लूट-खसोट का धंधा बढ़ता रहा। मूल निवासियों पर ही राज्य बनने की मार पहने लगी। उल्लेखनीय है कि ऐसा केवाल इसी पहाड़ी राज्य में संभव हुआा।
सन् 2006 में राज्य का मूल गाम उत्तराखंड लौटाकर राजधानी का मुद्दा फिर पीछे छोड दिया गया। नेहरू के समय से चली आ रही गैरसैण की गढ़वाली जी प्रदत्त मांग आज तक पूरी न हुई। योजनाओं के लाम इसी कारण सुदूर पर्वतीय इलाकों तक नहीं पहुंच सके।
व्योमेश राज्य के यथार्थ को खुली आंखों देखते हुए प्रश्नांकन करने पर यकीन करते हैं। वह खजूही के सफाईनाम में भी कमजोरी खोजकर सटीक आलोचना करते हैं। बताते हैं कि नौकरशाहों ने उत्तराखंड से लोकतंत्र को ही विसर्जित कर दिया। उन्हें दुख है कि क्षेत्रीय दलों ने परिपक्यता का परिचय नहीं दिया। पलायन को लेकर ऊपरी चिता व्यक्त जरूर की गई किंतु उसके मूल कारणों पर विचार नहीं हुआ। व्योमेश का पूरा जोर भौगोलिक परिस्थितियों को समझकर सही व्यवस्था बनाने पर रहता है।
अध्याय 2: पर्यावरण और पर्यटन
दूसरा अध्याय पर्यावरण और पर्यटन पर आधारित है। इसमें सन् 1995 से 2021 तक प्रकाशित आलेख प्रस्तुत है। इसकी शुरुआत ही टिहरी बांध के तिरछे सवाल से होती है. जही लेखक निर्माणाधीन टिहरी बांधपरियोजना की कार्यप्रणाली पर ही प्रश्नचिह्न खड़े करता नजर आता है। दरअसल, उसकी चिंता में भूकंप के सत्तरे, पर्यावरण विनाश, विस्थापन व धन की कमी जैसे मुद्दे तो है ही, वह भ्रष्ट तंत्र को भी बेनकाब करना चाहता है। यह वह तंत्र है जो झूठे आंकडे प्रस्तुत कर नंगी पहाड़ियों की तरफ पीत फेर लेता है। यह निहित स्वार्थों पर तो बात करता ही है. बांधविरोधी आंदोलन के कमजोर नेतृत्व पर भी टिप्पणी करता है। उसकी सहानुभूति विस्थापितों के प्रति है जिन्हें झूठे आंकड़ों की चादर से दबा दिया गया है। विस्थापन और पुनर्वास ही नहीं, लेखक की चिंता में पर्यावरण और पारिस्थिकी बराबर बने हुए हैं। वह देख रहा है कि वीसे नदी घाटी निजी हाथों में सौंपी जा रही है। वर्षा में निरंतर हो रही कमी की ओर ध्यान दिलाते हुए व्योमेश सवाल उठाते है कि हिमालय को बाधों से पाटना क्या सही है? आज से बीस वर्ष पूर्व इन सवालों की और गौर किया जाता तो शायद आाज जैसी स्थिति न होती।
इस पत्रकार की भांख गंगा विरोध के पीछे छिपे राजनैतिक सच को भी पकड़ लेती है और बत्ताती है कि धर्मप्राण जनता को मूर्ख कैसे बनाया जा रहा था। वह अआंख में अंगुली डालने बााने अंदाज में बताता है कि जिस विहिप को गमा की इतनी चिता है. उसे गमोत्री से गोमुख तक साधुओं व बाबाओं द्वारा नगा घाटी व पर्वतश्रृंखला को पहुंचाया जा रहा नुकसान क्यों नजर नहीं आता? व्योमेश आम जन को समझ में आने वाली मात्रा में बताते हैं कि मागीरथी गंगा की एक धारा ही तो है। शिवाजी की जटा की लटों से फूटी अन्य धाराएं अलकनंदा, विष्णुगमा, मंदाकिनी, नदाकिनी, पिठर और अनेक अन्य उपधाराएं भी तो है जो गंगा का निर्माण करती है। इन्हें विहिप ने क्यों भुला दिया?
व्यवस्था का मूल काम जन कल्याण की मावना को साकार रूप देना है, लेकिन टिहरी के विस्थापितों के साथ उसने ऐसा नहीं किया। नई टिहरी को खड़ा तो किया गया पुनर्वास के मॉडल के रूप में, किंतु लेखक की दृष्टि में सच्चाई यह है कि सरकारी सुभीते के लिए बसाया गया यह नगर मूल विस्थापितों के सपने से कहीं दूर धकेल दिया गया। कुछ विस्थापितों को तो और भी दूर मैदानी इलाकों में जाने को विवश होना पड़ा।
व्योमेश शौकिया घुमंतू नहीं है। वह जहां जाते है, वहां के बारे में बताना और जागरूक करना उनका लक्ष्य है। वह बदरीनाथ का माहात्म्य तो सामने रखते ही हैं देवप्रयाग के पंडों की देश भ्रमण की सुविचारित वृत्ति और उसके प्रभाव को भी रेखांकित करते हैं। वह बदरीनाथ के पंडाओं की यात्रा के छह सौ साल के इतिहास पर प्रामाणिकता से बात करते हैं। उनके द्वारा धार्मिक पर्यटन के प्रचार-प्रसार में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका पर भी उनकी नजर रही है। वह पुरोहिती व्यवस्था के साथ-साथ तीर्थयात्रियों के लिए उनके द्वारा किए गए कल्याण-कार्यों पर भी संजीदगी से बात करते हैं। उनकी यह मान्यता सही है कि संचार के अत्याधुनिक संसाधनी के बावजूद पंडाओं की प्रासंगिकता बनी हुई है। बस, वह चाहते यह है कि सैकड़ों वर्ष पुराने यजमानों के लेखा को आज संरक्षित करने की आवश्यकता को समझा जाये। इसके लिए आधुनिक तरीकों को अपनाया जाए।
व्योमेश की भाषा में प्रकृति का रूप-स्वरूप शब्दचित्र की तरह खिल उठता है नर और नारायण पर्वतों की उपत्यका में बसे पवित्र तीर्थ बदरीनाथ धाम में यदि भगवान बदरी नारायण के देवीय वर्चस्व और देवत्व का कोई बलशाली प्रतीक महसूस किया जा सकता है तो वह नीलकंठ ही है। दो विशाल काले शैल शिखरों के बीच चांदी बिखरता 21000 फीट की ऊंचाई पर खड़ा नीलकंठ यहां से बिलकुल लपकने लायक दूरी पर है। उसकी प्रात कालीन आभा किसी को भी जादुई पाश में बांधने की शक्ति रखती है।”
यह लेखक विषय से सम्बद्ध पुरा कथाओं और साहित्य का अध्येता भी है। इस पुस्तक में अनेक स्थलों पर उसकी इस विशेषता का पता बलता है। पर वह प्रकृति के गुण-गान तक ही सीमित न रहकर उसकी दिव्यता व मध्यता के दोहन का प्रतिरोध भी करता है। विकास के नाम पर हो रहे अराजक मानवीय हस्तक्षेप को वह असहनीय पाता है। उसका कहना सही है कि बदरीनाथ यात्रा को सुगम बनाने के लिए सड़क चौड़ी करने में विस्फोटकों के इस्तेमाल से चट्टानें कमजोर हुई है। अन्य विकास कार्यों के साथ हो रहे परिवर्तन भी प्रकृति के लिए घातक साबित हो रहे है। वह इस ओर भी ध्यान आकर्षित करता है कि यात्रा को सुरक्षित बनाने की जगह यात्रियों की संख्या पर ध्यान दिया जाना खतरनाक है। वह उन वैकल्पिक प्रस्तावों पर भी ध्यान देने की ठीक ही कहता है जिनके पालन से इस क्षेत्र में मानवीय दबाव कम किया जा सके। वह उत्तराखंड की जल विद्युत परियोजनाओं के संदर्भ में सन् 2013 में जयराम रमेश द्वारा प्रस्तुत चिंताजनक तस्वीर को उल्लेखनीय मानते है। उन्हें पहाड़ में निर्माण कार्य की अपसंस्कृति और समवविशेष में नेताओं व नौकरशाही के लिए अवसर बन जाने की स्थिति पर भी क्षोभ सही है। वह साफ कहते है कि योजनाएं इस क्षेत्र में न सिर्फ मनमाने ढंग से मंजूर होती रहीं, बल्कि जी चाहा आकार भी लेती रहीं। और जो पाबंदियों लगीं भी, उनका सबसे बुरा असर स्थानीय आबादी पर पड़ा। उनका यह सुझाव उस वक्त सटीक था कि मंदिर समिति सहित अनेक जिम्मेदार संस्थाओं के प्रतिनिधियों का एक कोर ग्रुप बनाकर हिमालय में नीति व निर्माण की ठोस पहल संभव है।
राजनीतिक परिवर्तन और व्यक्ति की सोच के सम्बंध को उमा भारती के बहाने व्योमेश कायदे से प्रस्तुत करते हुए बताते है कि विपक्षी राजनेता का स्वर मंत्री बनते ही कैसे बदल जाता है। यह उत्तराखंड सम्बंधी अनेक रिपोर्टों की असलियत भी खोलते दीखते हैं। उनका यह कहना गलत नहीं कि भागीरथी और अलकनंदा घाटी में निर्माणाधीन अनेक परियोजनाओं की उचित जांच-पड़ताल और आकलन नहीं हुआ। सात-आठ बरस पूर्व हुए ग्रामीणों के आंदोलनों में पेड़ बचाने की चेष्टा के साथ ही व्योमेश अनियोजित विकास की संवेदनहीनता पर भी कायदे से बात करते दीखते हैं। उनकी नजर कानूनी विकल्पों की संकरे होते जाने पर भी है और यात्रा के पारंपरिक स्वभाव के बदल जाने के खतरे पर भी।
अनेक योजनाओं को लेकर उनका विरोध तार्किक आधार लिए है। वह भीतरी पहाडों में रेल की पहुंच की तीर्थाटन के विकास का नया दौर जरूर मानते हैं। वह इसके लिए अनेक भू-वैज्ञानिकों के विचार प्रस्तुत करते हुए बताते है कि उत्तराखंड के पहाड रेल लाइन बिछाने के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित है। वन्च जीव और जीवन को लेकर व्योमेश का पत्रकार खुले दिल-दिमाग से सोचता है। बाघ को वह वन्य जीवन के अनुशासन का कारक बताते हुए जंगल और मनुष्य के अन्तर्सम्बन्ध पर भी विचार करता है। बह स्लोगन्स की उलटबांसियों के बीच सच की तलाश करना चाहता है और ‘बाघ रहेंगे तो जंगल बचेंगे’ से ‘जंगल रहेंगे तो बाघ बचेंगे’ को सामने रख योजनाओं की कमजोरियों की और संकेत करता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में बाघ और बस्ती के बीच वह सदा कवच के रूप में पेड़ों का बने रहना जरूरी मानता है, तो यह ठीक भी है। वह सिर्फ बात ही नहीं करत्ता, शिकारी जॉय हुकिल से साक्षात्कार भी करता है। उसका किया यह साक्षात्कार अनेक व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बाघों के जीवन के बारे में भी शिक्षित करता है।
व्योमेश एक एक्टिविस्ट और पत्रकार होने के साथ-साथ अथक यात्री भी है। उनकी अनेक यात्राएं रिपोर्टिंग से जुड़ी है, किंतु कुछ का संबंध पर्यटन शिक्षा से भी है। चोपता तुंगनाथ की उनकी दूसरी यात्रा ऐसी ही है। यहीं वह एक सम्मोहक परिदृश्य की अलौकिकता के मुरझा जाने से व्यथित होते हैं। इसका कारण वह ठीक ही, पर्यटकों की लापरवाही और गैरजिम्मेदारी में देखते हैं। यही नहीं, फैले हुए कचरे को कोई समेट भी दे, तो वहाँ उसके समुचित निपटान की भी कोई व्यवस्था न देख उन्हें शोम होता है। इसके लिए यह खराब व्यवस्था को दोषी पाते हैं।
इस लेखक की भाषा पर बात करना भी जरूरी है। यह टू द पॉइंट, सटीक और सारगर्भित है। आज के पत्रकारों के हाथ से यह फिसल रही है। व्योमेश देशज शब्दों का खूब प्रयोग करते हैं। यहां आपको रागस भी मिलेगा और मथार’ भी। छूमंतर भी मिलेगा और बणाम भी। क्षेत्रीय भाषा के शब्दों मुहावरों और कहावतों से भाषा समृद्ध होती है। दावानल की भेंट चढ़े जंगल की चर्चा करते हुए वह स्थानीय लोगों की शौर्य गाथा का जिक्र भी करते हैं। वह बताते हैं कि क्यों यह मीडिया के लिए खबर तक नहीं बनी। पर वह यह अपना दायित्व समझते हैं कि वन विभाग की जालसाजी और दुष्चक्र को उजागर करें। वह विनाश को ही विकास मनवा लेने की चतुराई को अतार्किक तो बताते ही हैं, सरकारों के लापरवाह रवैये की आलोचना भी करते हैं। वह उन पहलुओं की ओर ध्यान खीचते हैं, जिनके चलते सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद वस्तुस्थिति वही की यही बनी रही। बार-बार वह हिमालय के संरक्षण को नियोजन का केंद्र बनाने का आग्रह अलग-अलग भाषा में करते हैं।
खतलिंग ग्लेशियर की खैरियत पुछने का आग्रह करते हुए व्योमेश वहां की यात्राओं पर भी बात करते है। उन्हें इंद्रमणि बडोनी के उस प्रयास की स्मृति भी है जो खतलिंग को उत्तराखंड के पांचवें धाम का दर्जा दिलाने को लेकर प्रारंभ किया गया था। स्वयं व्योमेश 2017 की यात्रा में शामिल रहे। यही कारण है कि इस पर उनका लिखा फर्स्ट हैड सूचनाओं पर आधारित और प्रामाणिक है। वह स्थानीयता को न सिर्फ आत्मीय नजर से देखते हैं, योजनाकारों के अन्याय को भी रेखांकित करते हैं।
अध्याय 3: लोक संस्कृति और सरोकार
पुस्तक का तीसरा अध्याय लीक संस्कृति और सरोकार केंद्रित है। इसमें सन् 2000 से 2020 तक प्रकाशित आलेख दिए गए है। यहां नंदा देवी राजजात से लेकर पहाड़ी उत्पादों के व्यापार मेले तक दौड़ती लेखक की पारखी नजर ने बहुत कुछ देखा-समझा है। एक दुर्गम पैदल मार्मिक यात्रा से बाजार तक इस आयाम में व्योमेश ने बहुत कुछ नापा-मापा है। पाया है कि लोक परंपरा से जुड़े अनुष्ठानों में आस्था का लगाव कैसे एक इतिहास बन जाता है। पुस्तक बताती है राजजात यात्रा हर बारह वर्ष के अंतराल में सातवीं शताब्दी से चली आ रही है। इसके स्वरूप और ऐतिहासिक व मिथकीय महत्व को समझाते हुए लेखक ने नंदा की कथा के प्रति लोक-विश्वास को उजागर किया है। वह पौराणिक पात्र से जुड़ी कथा के साथ ही लोक परंपरा में उसकी जड़ें पहचानते हुए यात्रा के रोमांच को दृश्य कर देते है। इस प्रक्रिया में श्रीयंत्र का नौरी गांव में स्थापित होना और भानुप्रताप द्वारा राजगुरु को इसकी पूजा का दायित्व सौंपना तो सम्मुख है ही, हर बारह साल बाद नंदा देवी को मायके बुलाकर उसे पुनः ससुराल भेजने का नियम भी जाहिर होता है। साथ ही विचित्र मेढ़े चौसिन्या खाडू की परंपरा का औचित्य भी। यात्रा का रोडमैप तक व्योमेश ने प्रस्तुत कर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
स्पेन के एक दूरस्थ गांव की तरह उत्तराखंड के सैकड़ों गावों से जुड़ा पलायन का सच कितना हृदयविदारक है, यह चूर जैसे गांव की कथा में खुलता है। यह उस समय की कथा है जब उत्तराखंड के 25 फीसदी लोग रोजगार की खोज में गांव छोड़कर भाग रहे है क्योंकि यहाँ बेरोजगारी 58 फीसदी के करीब है। खुद सरकार के आंकड़े इस मामले में भयावह हैं। यह सच सामने रखते हुए लेखक की मंशा डराने की नहीं, इस ओर ध्यान आकर्षित करने की रही है कि इस दिशा में उत्तराखंड में ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।
व्योमेश भारत-तिब्बत सीमा पर अंतिम गाँव माणा से परिचित कराते हुए व्यास गुफा का रास्ता दिखाते है। मान्यता है कि व्यास ने यहीं महाभारत के अनेक अध्यायों की रचना की थी। अच्छी बात यह है कि वह दौड़ते-भागते पर्यटक से अलग, वहीं के जीवन की जटिल कठिनाइयों को भी महसूस करते है। माणा गाँव की बुनकरी का प्रसंग ऐसा ही है जिसमें समय के साथ आ रहे बदलावों और बेबसी ने धूसर रंग भर दिए है। उनकी सहानुभूति इस कला को बचाए रखने में दिखती है।
करीब 120 साल पुरानी पौड़ी की रामलीला के प्रति भी लेखक का अनुराग अकारण नहीं है। वह न सिर्फ इसकी विशेषताओं से परिचित हैं, इसकी लोकप्रियता व परंपरा को भी पहचानते हैं। बताते है कि लोकगायक नरेंद्र रिसंह नेगी इसी कलामंच की देन हैं। इस कलाकार के आत्मीय नाम ‘नरु भाई’ बनने की कहानी के पीछे इसके श्रम और लोक समर्पण की दास्तान को लेखक ने करीने से प्रस्तुत किया है। यह भी कि एक जन-कलाकार को सत्ता उसके मूल सरोकार से ही कैसे च्युत कर देना चाहती है ताकि एक कालाकार सत्ता की प्रशंसा के रास्ते पर चल निकले। नीछमी नारेण प्रसंग को व्योमेश ने तरीके से उठाया है। वह प्रश्न उठाते हैं कि क्या नरेंद्र सिंह नेगी ने लोकमत जगाने की चेष्टा कर गुनाह किया है? यही नहीं, वह नेगी जी की गीत मात्रा के चालीस वर्षों पर भी आत्मीय नजर डालते हैं। अच्छी बात यह है कि वह गायकी के एक अन्य प्रतिमान चंदर सिंह राही के साथ नरेंद्र सिंह नेगी का तुलनात्मक अध्ययन करने की चेष्टा भी करते हैं। उनका कहना समीचीन है कि राही लोकगायन की कमलनाल है और नीलकमल हैं नेगी। वह राही की शास्त्रीयता बनाए रखने की विशेषता को तो रेखांकित करते ही है, सहज संप्रेषण हेतु नेगी की प्रयोगशीलता की भी उल्लेखनीय मानते हैं।
वहीं सीमित न रहकर उनकी दृष्टि गिर्दा के अवदान तक भी जाती है। उत्तराखंड से बाहर उत्तराखंड की पहचान को देखने की दृष्टि से वह प्रवासिथों में इस क्षेत्र के प्रति आत्मीयता को उत्सवों, आयोजनों व समारोहों में पाते हैं। पर उनकी नजर उद्देश्य से भटके उन संगठनों संस्थाओं पर भी है जो वास्तविक जिम्मेदारियों से बचते है और महज मनोरंजन व धाक जमाने की नीयत से काम करते हैं। उनका कहना सही है कि हमारी दृष्टि अपने मूल सामाजिक व राजनीतिक प्रश्नों पर टिकी रहनी चाहिए। यह पहाड़ से पलायन व पहाड़ में बाह्य धनाक्रमण के कारण लोक-जीवन को नष्ट होता बताते हुए चेताते हैं।
बाजार के प्रभाव को व्योमेश करीने से भांपते नजर आते हैं। पहाड़ी उत्पादों के प्रति बढ़ती ललक के कारण इनके व्यापार मानी में बिचौलियों का खेल जैसे चल रहा है, इसे वह कायदे से एक्सपोज करते हैं। उनका कहना सही है कि स्वयं सहायता समूहों को किसान के हित में समर्पित भाव से काम करना चाहिए। वह काला ही नहीं, उजला पक्ष भी सामने रखते हैं जिसमें स्यारा बटे त्यारा धौर की भावना प्रमुख है। दरअसल, यह पहाड़ की खेती किसानी को नये सिरे से जिंदा करने की बात करते हैं।
अध्याय 4: विभूतियां और स्मृतियां
पुस्तक का चौथा अध्याय है व्यक्ति, स्मृति और समाज केंद्रित। इसमें 1993 से 2018 के मध्य प्रकाशित लेख प्रस्तुत हैं। इसमें रियो सम्मेलन को चिपको की प्रेरणा से जोड़ने का काम कर लेखक ने बताया है कि कैसे रैणी गांव की गौरा देवी ने एक अभियान की शुरुआत की। कैसे महिलाओं की भागीदारी को एक सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया। व्योमेश का कहना सही है कि यहीं पर्वतीय महिला के कठिन दैनिक जीवन के अनुभवों में जंगल उसका मायका और वन्य वनस्पतियां मायके की नियामत हैं। रेणी से प्रारंभ अभियान के प्रभावी और कारणों के मूल पर उनकी दृष्टि बनी रहती है। जोर वह इस प्रश्न पर भी देते है कि वनाश्रित ग्रामीणों की आर्थिक-सामाजिक लड़ाई को भूला क्यों दिया गया? अपनी बात की पुष्टि के लिए वह उपलब्ध प्रकाशित साक्षात्कार व विचार सामग्री का उल्लेख स्रोत समेत करते हैं। आंदोलन के इतिहास को वह सांखों देखे रिपोर्ताज की शक्ल में रख जन-मानस को आंदोलन के ऊर्जावान स्वरूप से परिचित कराते हैं। वह चंडी प्रसाद भट्ट और गोविंद सिंह रावत समेत आंदोलनकारियों की भूमिका और महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं। उनकी दृष्टि आंदोलन कमजोर करने वाली शक्तियों की चालबाजी पर तो रहती ही है, दिवयों की एकजुटता व संघर्ष पर भी बनी रहती है। आंदोलन में वह विरोधी शक्तियों के दुर्व्यवहार के जवाब में आंदोलनकारियों की करुणा को सामने रख मानवीयता को रेखांकित करते हैं। यह अध्याय सरकार द्वारा आंदोलनकारी महिलाओं की सम्मानित पुरस्कृत करने की चाल से सम्पन्न होते हुए यह संकेत देता है कि सत्ता कैसे अपनी छवि बनाने के लिए अवसर का इस्तेमाल करती है।
आसपास के संगीन सवालों को उठाने वाले निर्भीक पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या में शराब माफिया का हाथ बताते हुए व्योमेश यह बताना भी नहीं भूलते कि शासन तंत्र से इस माफिया की मिलीभगत्त है। वह उस समय विशेष में उत्तराखंड में शराब की खपत के आंकड़ों को चौकाने वाला ठीक ही बताते हैं। बस यह समझ नहीं आता कि दो अवसरों पर उन्हें उमेश की आंखों में दो रंग (भूरा और नीला) क्यों नजर आते हैं? पाश, सफदर और नियोगी जैसा डोभाल का अंत बताकर व्योमेश यह रेखांकित करते हैं कि लड़ने और संघर्ष करने वाला आज अकेले लड़ने पर विवश हो जाता है। उमेश के स्वभाव, साथ और आत्मीय दिनों का वह मन से स्मरण करते हैं। बताते है कि उनके जैसे संघर्षकर्ता का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। राजेन्द्र रावत की कथा भी एक अर्थ में उमेश डोभाल की कथा को आगे बढ़ाने वाली एक संघर्ष कथा ही है। इसे कुछ और आगे ले जाने की कथा यहीं लेखक ने गिरीश तिवाडी गिर्दा के बहाने कही है। संघर्ष की धारा को नया आयाम देने वाले गिर्दा और नरेन्द्र सिंह नेगी गढ़वाल कुमाऊ की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक कैसे बने- यही नहीं, गिर्दा पर फैज के असर और उनके प्रभावशाली अनुवादक के रूप की भी लेखक ने देखा है। देखा तो उसने एवरग्रीन के नारे के खीखालेपन को भी है जिसके विरुद्ध लड़ाई में गिर्दा जैसे लोगों का स्मरणीय योगदान है।
कविता पोस्टर को एक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले और भोजपत्र पर चित्रांकन व पोर्ट्रेट बनाने बाले बी. मोहन नेगी कला की सामाजिक सरोकार से जोडने वाले अनूठे कलाकार थे। लेखक ने उनसे बातचीत कर उनके कला-प्रेरक को खोजा है। बताया है कि चंद्रकुंवर बर्तवाल की कविताओं पर लगाई उनकी प्रदर्शनी ऐसी थी कि इस अनूठे कवि की ओर फिर सबका ध्यान आकर्षित हुआ।
सरल व्यक्तित्व के धनी, आंदोलनकर्मी पत्रकार गहन अध्येता होते हुए भी सत्ता-प्रतिष्ठानों द्वारा भुला दिए गए नाटककार राजेन्द्र धस्माना पर व्योमेश का व्यक्ति चित्र कायदे का है। सहृदय और श्रमशील पत्रकार बीरेन्द्र डंगवाल को वह आत्मीयता से स्मरण करते है। पहाड़ से असीम प्यार करने वाले पत्रकार कथाकार दयानंद अनंत की मिशनरी जील को लेखक ने खूब पहचाना है। उसने पत्रकारिता की उनके अवदान की चर्चा की है और उनके महत्व को रेखांकित किया है।
प्रायः व्योमेश के व्यक्तिचित्र श्रद्धांजलि की मुद्रा में हैं, किंतु इनमें चरित्र का व्यक्तित्व बाकायदा खुलता है। ग्रामांचल में पत्रकारिता कर जागरण च संघर्ष की अलख जगाने वाले कुंवर प्रसून पर स्मृति सभा की एक रिपोर्ट के बहाने भी व्योमेश बहुत कुछ कह जाते है। वह बताते है कि एक प्रेरक पत्रकार कैसे पहाड़ और शेष देश के मध्य एक पुल बन सकता है। उस जैसा पर्वतीय स्त्री समाज की विडंबनाओं को सामने रखने वाला पत्रकार दूसरा न होगा। एल. मोहन कोठियाल, कैलाश चन्द्र जुगरान, श्रीप्रकाश कांडपाल सरीखे व्यक्तित्वों पर भी जानकारीपरक लेख पुस्तक में हैं। आकार छोटे-बड़े हो सकते हैं किंतु कोई न कोई अनूठी जानकारी इसमें व्यक्तिविशेष से जुड़ी अवश्य मिल जाती है।
जैसे, पौड़ी के इतिहास पर काम करने वाले कोठियाल, पत्रकारिता को सामाजिक कार्य मानने वाले और आंदोलन में सक्रिय रहने वाले व ग्रामीण विकास को समर्पित जुगरान और निस्वार्थ सेवाकर्मी कांडपाल के चरित्र सहज व आत्मीय भाषा में यहीं खुलते चले जाते हैं।
अध्याय 5: विविध
अंतिम व पींचवें अध्याय में विविध विषय समाये हैं। यहीं 1995 से 20120 तक का समय लेखों में खुलता है। इनमें अटल बिहारी वाजपेयी की सहज सरलता और सादगी, माल्दा आम के बहाने गिरीश चन्द्र बहुगुणा से मुलाकात, उत्तराखंड विश्वविद्यालय विधेयक, मुख्यमंत्री की रस्मप्रदायगी पर कटाक्ष, गढ़वाल के श्रीद्वार अर्थात कोटद्वार की वस्तुस्थिति की आलोचना, मोहन चन्द्र शर्मा और सुराजन को श्रद्धांजलि देते हुए व्यवस्था पर प्रश्नांकन् राजनीति के खेल और कूटनीतिक चालें, शिक्षा मंत्री का दिखावा, रांसी स्टेडियम के निर्माण की दुखद दास्तां और कोरोना काल में यूएई. में फंसे 300 से अधिक लोगों की वतन वापसी की कहानी प्रस्तुत करते हुए व्योमेश गद्य लेखन के अनेक रूपों से परिचित कराते हैं। कहीं वह रिपोर्ट लिखते है. कहीं संस्मरण, तो कहीं श्रद्धांजलि। पर हर प्रयास में उनकी चेष्टा कोई न कोई संदेश देने की रहती है। चूंकि यह अलग-अलग समय पर लिखे गए लेखों, टिप्पणियों व रिपोर्ट्स का संग्रह है, इसलिए कभी-कभी पुनरावृत्ति भी नजर आती है। किंतु यह स्वाभाविक है। समूची पुस्तक ‘पहाड़ के हाड़’ में व्योमेश की सजग, विवेकशील और दूरगामी दृष्टि के दर्शन होते हैं। इसे पढ़कर उनसे और कुछ बड़े कामों की उम्मीद बंधती है।
(लेखक जाने-माने साहित्यकार और आलोचक हैं)
पुस्तक- ‘पहाड़ के हाड़’,
लेखक: व्योमेश जुगरान,
प्रकाशक: अलकनंदा प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य: 450 रुपये



