ओवैसी साहब, मोदी के डेमोग्राफिक डिविडेंड का वह मतलब नहीं जो आपने निकाला।
प्रदीप सिंह।
आपने वह कहावत तो सुनी होगी कि मेंढकी को जुकाम हो गया। यह ऐसी बातों के लिए चलती है,जिसका होना संभव नहीं है। तो भारतीय राजनीति में भी एक मेंढकी है जिसका नाम है असदुद्दीन ओवैसी। वह ऑल इंडिया मजलिस इत्तहादुल मुस्लिमीन के सर्वेसर्वा हैं। यह उनकी खानदानी पार्टी है। इस पार्टी में अध्यक्ष कौन होगा यह जन्म से तय हो जाता है। वह अपनी पार्टी के एकमात्र लोकसभा सदस्य हैं, लेकिन उनकी अगर आप बातें सुनेंगे तो आपको लगेगा कि वह भारत के सबसे बड़े नेता हैं। उन्होंने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के जवाब में एक बात कही।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का राज्यसभा में जवाब देते हुए कहा था कि दुनिया भर के देशों में आबादी बूढ़ी हो रही है,लेकिन भारत की आबादी में दो तिहाई हिस्सा युवाओं का है। यह हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड है। भारत के लिए जिस तरह दुनियाभर का बाजार खुल रहा है,यह युवाओं के लिए बहुत बड़ा अवसर है। तो प्रधानमंत्री के कहने का कुल मतलब यह था कि हमारा जो डेमोग्राफिक डिविडेंड है, इसको हमें और बढ़ाना चाहिए और उन्होंने जो बात नहीं कही, भाषण शायद बहुत लंबा हो जाता, कि उसके लिए हमको किस तरह से स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में काम करना चाहिए। किस तरह से एजुकेशन में काम करना चाहिए। लेकिन,असदुद्दीन ओवैसी को इसमें क्या समझ में आया? उन्होंने कहा, देखिए हम जो कहते थे उसको प्रधानमंत्री ने सही साबित कर दिया। मुसलमानों की आलोचना होती है कि तुम आबादी बहुत बढ़ाते हो। आज तो प्रधानमंत्री इस बात को मान रहे हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा होने चाहिए। हम ज्यादा बच्चे पैदा करके देश को युवा देते हैं।

असदुद्दीन ओवैसी ने एक बात तो मान ली कि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। फिर उन्होंने हिंदुओं को गफलत में रखने के लिए कहा कि यह कभी हो ही नहीं सकता कि भारत में मुसलमानों की आबादी हिंदुओं की आबादी से ज्यादा हो जाए। उनके कहने का आशय यह था कि हिंदुओं तुम सोते रहो। हमको अपनी आबादी बढ़ाने दो। तुम अपनी आबादी घटाते रहो। उसके बाद क्या होगा,उनको कहने की जरूरत ही नहीं है। दुनिया का इतिहास गवाह है। और दुनिया के इतिहास पर क्यों जाए,सिर्फ 36 साल पहले अपने देश के कश्मीर में क्या हुआ,वही जान लें? कश्मीर घाटी से एक-एक हिंदू को बीन-बीन कर निकाल दिया गया। मस्जिदों से ऐलान हुआ कि या तो धर्म परिवर्तन कर लो या फिर कश्मीर छोड़कर चले जाओ और अपनी औरतों को छोड़ जाओ। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि सभ्य समाज में बंद कमरे में भी इस तरह की बात कोई बोल सकता है और यह तो मस्जिदों से खुलेआम ऐलान हो रहा था। लाखों हिंदू कश्मीर से पलायन कर गए या मारे गए। उनकी औरतों के साथ बलात्कार हुआ। उनके घर जलाए गए। उनके घरों पर कब्जा किया गया। आज भी कश्मीरी हिंदू अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन बिता रहे हैं। देश में होने वाली हर आतंकवादी घटना पर असदुद्दीन ओवैसी विक्टिम कार्ड खेलते हुए कहते हैं कि फलां घटना को लेकर रोष था, उसकी वजह से यह हुआ। वह बताएं कि कश्मीर में इतना बड़ा अत्याचार होने के बावजूद कश्मीरी हिंदुओं में से कोई एक भी ऐसा है, जो आतंकवादी बना। तो प्रतिशोध की भावना केवल मुसलमानों में क्यों आती है? हिंदुओं में क्यों नहीं आती है?

दूसरी बात प्रधानमंत्री जब आबादी को डेमोग्राफिक डिविडेंड बता रहे हैं तो वह ऐसी आबादी को बता रहे हैं जो देश के विकास में योगदान करे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का सम्मान बढ़ाए। जो प्रतिभाशाली हो। मुसलमान बताएं कि उनका देश की आंतरिक सुरक्षा में क्या योगदान है? देश की शिक्षा व्यवस्था में क्या योगदान है? देश के आर्थिक विकास में क्या योगदान है? देश की वैज्ञानिक प्रगति में क्या योगदान है? देश के स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्या योगदान है? एक-एक सेक्टर को आप गिनते जाइए और उनका योगदान बताइए कि क्या है? उनका योगदान यह है कि वह इस देश में बड़े पैमाने पर आतंकवादी तैयार करते हैं। मदरसों से ऐसे लोग पैदा करते हैं, जो अनइंप्लॉयबल हैं, जिनको कहीं नौकरी नहीं दी जा सकती। जिनका काम है पत्थरबाजी और पेट्रोल बम चलाना। और जो भारत सरकार की ही योजनाओं का फायदा उठाकर स्कॉलरशिप पा जाते हैं,हायर एजुकेशन में एडमिशन मिल जाता है,वे पढ़ लिखकर फिर आतंकवादी बनते हैं, बम विस्फोट कराते हैं। हाल ही में अल-फलाह यूनिवर्सिटी का केस आपने सुना ही है। दुनिया भर में और भारत में खासतौर से जितने आतंकवादी पकड़े जा रहे हैं, सब बहुत पढ़े लिखे लोग हैं। तो भारत को ऐसे युवाओं की जरूरत नहीं है। ओवैसी साहब को लगता होगा कि ये युवा देश के लिए बड़े फायदेमंद हैं। लेकिन ये देश पर बोझ हैं। ये देश के लिए एसेट नहीं, लायबिलिटी बनते जा रहे हैं और हर बात में विक्टिम कार्ड खेलते हैं कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है। 10 साल तक इस देश का वाइस प्रेसिडेंट रह चुका व्यक्ति बोलता है कि इस देश में मुसलमान डरे हुए हैं। अरे डरे हुए हो तो तुम वहां तक पहुंचे कैसे? आप इस मानसिकता को समझिए कि इस देश से सब कुछ पाकर भी वह कभी संतुष्ट नहीं होने वाला है। उसकी संतुष्टि का केवल एक ही आधार है कि भारत इस्लामी राष्ट्र बन जाए, भारत में हिंदुओं की संख्या घट जाए और किसी भी कीमत पर भारत में हिंदुओं और सनातन का राज नहीं होना चाहिए। वह चाहता है कि भारत में शरिया का राज हो। सवाल यह है कि डेमोग्राफिक डिविडेंड क्या यह है कि देश में ज्यादा से ज्यादा आतंकवादी तैयार हों,अपराधी तैयार हों,लव जिहाद करने वाले तैयार हों, लैंड जिहाद करने वाले तैयार हों। आजादी के पहले की बात छोड़ दीजिए,आजादी के बाद कितने लाख एकड़ जमीन पर मुसलमानों ने लैंड जिहाद और बोर्ड के नाम पर कब्जा किया है? लेकिन वक्फ बोर्ड में संशोधन होगा तो विक्टिम कार्ड खेलेंगे कि हमसे हमारा हक छीना जा रहा है।
ओवैसी साहब को बताना चाहिए था कि वे जो युवा पैदा कर रहे हैं ऐसा क्यों है कि हिंदुओं के हर त्योहार पर वे पत्थरबाजी करते हैं। मुझे कोई उदाहरण बताइए जिस देश में मुस्लिम आबादी ज्यादा हो गई हो और वह देश इस्लामी देश न बना हो। वहां शरिया का राज कायम न हुआ हो। दुनिया भर में 56-57 इस्लामी देश हैं। इनमें मुश्किल से दो या तीन में डेमोक्रेसी है। अपने पड़ोस में ही बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान को देख लीजिए। आज से 80 साल पहले वहां हिंदू आबादी कितनी थी और आज कितनी है। जो अल्पसंख्यक या विक्टिम कार्ड खेलते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि इन देशों में हिंदुओं के साथ जो हुआ, उस पर उन्होंने कब अफसोस जाहिर किया? कब उनको दुख हुआ? तो गाजा में जो होगा उसका विरोध करेंगे,लेकिन अपने बगल में बांग्लादेश, पाकिस्तान,अफगानिस्तान में जो होगा उसका विरोध नहीं करेंगे। वह इसलिए क्योंकि गाजा में मुसलमान मारे जा रहे हैं और इन देशों में हिंदू मारे जा रहे हैं। इस फर्क को समझिए। उनके लिए इंसान का महत्व मजहब के आधार पर तय होता है।
ओवैसी साहब, आप बताइए कि आपकी पार्टी ने या आप जिन संगठनों से जुड़े हुए हैं उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा के लिए क्या किया? इसका जवाब नहीं मिलेगा। आप दरअसल भारत के लिए बोझ तैयार कर रहे हैं। आप बोझ उठाने वालों में नहीं हैं। इसलिए अपने दिमाग से ये गलतफहमी निकाल दीजिए कि प्रधानमंत्री ने जो कहा और आप जो कह रहे हैं, वह दोनों बातें एक ही हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



