लोकसभा को बनाया बंधक फिर भी सरकार मूकदर्शक।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

संसद में जो कुछ चल रहा है, उससे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि संसद खासतौर से लोकसभा को राहुल गांधी ने बंधक बना लिया है। अब लोकसभा में वही होगा, जो राहुल गांधी चाहेंगे। वह नहीं होगा, जो अधिकांश सांसदों का बहुमत या स्पीकर चाहते हैं।

सदन की कार्यवाही पीठासीन अधिकारी के निर्देशन में चलती है। वही व्यवस्था कायम करते हैं और नियम व परंपरा की बात बताते हैं। लेकिन, राहुल गांधी यह सब मानने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि जब तक उनको उनकी मर्जी के मुताबिक बोलने नहीं दिया जाएगा, वह सदन नहीं चलने देंगे और सदन नहीं चल रहा है। अब कांग्रेस और उसके साथी दलों ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया है। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। सबसे पहले 1954 में पहले लोकसभा अध्यक्ष जीवी मावलंकर के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव आया था, लेकिन वोटिंग की नौबत नहीं आई। दूसरी बार अविश्वास प्रस्ताव तब आया जब डॉक्टर नीलम संजीव रेड्डी लोकसभा अध्यक्ष थे। उन पर आरोप यह था कि वे विपक्ष को बोलने का मौका नहीं देते। इस पर भी वोटिंग की नौबत नहीं आई। तीसरी बार 1987 में स्पीकर बलराम जाखड़, उसके बाद 2001 में स्पीकर जीएमसी बाल योगी, उसके बाद मीरा कुमार के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। आखिरी प्रस्ताव इन्हीं ओम बिरला के खिलाफ कांग्रेस और उसके साथी दलों ने लाने की घोषणा की थी,लेकिन बाद में विचार त्याग दिया क्योंकि उन्हें लगा कि सदन में भाजपा का बहुमत है,ये टिकेगा नहीं। लेकिन,इस बार फिर कांग्रेस ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का जो नोटिस दिया गया है,उसकी सारी परिस्थितियां अलग हैं।

पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल नरवणे की किताब का एक हिस्सा राहुल गांधी लोकसभा में पढ़ना चाहते हैं। सरकार कह रही है वह किताब छपी नहीं है। पब्लिशर भी कह रहा है कि हमने किताब छापी नहीं है। डिफेंस मिनिस्ट्री ने किताब को अभी क्लीयरेंस तक नहीं दिया है। बिना क्लीयरेंस सैन्य अफसरों की किताबों को छापने की अनुमति नहीं मिलती। फिर भी अपनी जिद के चलते राहुल गांधी और कांग्रेस ने लोकसभा को बंधक बना रखा है। इस मामले पर संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजीजू ने मंगलवार को कहा कि संसद गुंडागर्दी की जगह नहीं है। तो सवाल यह है कि अगर कोई गुंडागर्दी कर रहा है तो उसको रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ कि लोकसभा स्पीकर ने खुद फोन करके प्रधानमंत्री से कहा कि आप सदन में मत आइए क्योंकि आपको शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाया जा सकता है। तो सदन में अगर प्रधानमंत्री सुरक्षित नहीं हैं और इस बात से लोकसभा स्पीकर कन्विंस हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि उन्होंने कार्रवाई क्या की? सवाल सरकार पर भी उठता है कि भाई संसद में इस तरह की अराजकता कब तक बर्दाश्त की जाएगी? एक तो समय आना चाहिए जब सरकार तय करे कि अब बस बहुत हो गया। एक व्यक्ति की जिद,एक व्यक्ति की सनक,एक व्यक्ति का अहंकार पूरे सदन पर भारी पड़ रहा है और सरकार असहाय की तरह देख रही है।

सदन में राहुल गांधी का जो व्यवहार है,उन्होंने एक नहीं कई कई बार स्पष्ट कर दिया है कि वे स्पीकर की रूलिंग को नहीं मानते। ऐसे सदस्य के साथ क्या किया जाए? भारत की संसद और पीठासीन अधिकारियों के पास ऐसे सदस्यों से डील करने, उनको रोकने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है। सवाल है कि राहुल गांधी को क्यों नहीं रोका जा रहा है? राहुल गांधी के खिलाफ कोई बड़ी कारवाई छोड़िए आपने उन्हें कोई नोटिस तक दिया? सत्तारूढ़ दल की ओर से क्या किसी ने प्रिविलेज मोशन मूव किया? अब तो यह नियम बन जाएगा,विपक्ष का एक नेता खड़ा होगा और वह सदन नहीं चलने देगा। मेरा मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और केंद्र सरकार दोनों की कमजोरी की वजह से ऐसा हो रहा है। धैर्य अच्छी बात है,लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है। स्पीकर खुद कह रहे हैं कि सदन की कार्यवाही को सुनियोजित ढंग से बाधित किया जा रहा है। तो फिर सवाल उठता है आप क्या कर रहे हैं? सदन सुचारु रूप से चले यह तो आपकी जिम्मेदारी है।

अभी तक राहुल गांधी सदन में जिस तरह की हरकत कर रहे थे, उससे लोगों में उनके प्रति नाराजगी थी। लेकिन, ओम बिरला ने कोई कार्रवाई न करके यह बाजी एक तरह से कांग्रेस के हाथ में दे दी। अब कांग्रेस ने काउंटर अटैक कर दिया है। अगर आप पहले कार्रवाई करते उसके बाद कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देती तो यह होता कि वे खिसियाहट में ऐसा कर रहे हैं। हो इसका उल्टा रहा है कि जिसको ऑफेंसिव होना चाहिए वह डिफेंसिव है और जिसको शर्म आनी चाहिए वह ऑफेंसिव है। तो भारत की संसद में यह खेल कब तक चलता रहेगा और कब तक चलने दिया जाएगा?

हाल ही में संसद में हंगामा करने वाले आठ सांसदों को निलंबित किया गया था। राहुल गांधी को क्यों नहीं किया जा सकता? कहने वाले कह सकते हैं कि फिर विपक्ष और हंगामा करेगा। तो पूरे विपक्ष को भी सस्पेंड करने का उदाहरण मौजूद है। सदन में जो कुछ हो रहा है उससे भारत के संसदीय लोकतंत्र का मजाक बन रहा है। उसकी मर्यादा तार-तार हो रही है। ऐसा विपक्ष, जो कोई नियम, कानून, परंपरा मानने को तैयार नहीं है,भारत के संसदीय इतिहास में कभी नहीं आया। आज प्रतिपक्ष का नेता ऐसा है,जो मानकर चलता है कि यह राजशाही है और मैं इस राजशाही का, इस व्यवस्था का राजा हूं। पूरा तंत्र मेरे हिसाब से चलना चाहिए। संसद तब चलेगी जब मैं कहूंगा कि चले। परंपरा क्या कहती है,इससे हमको कोई मतलब नहीं। उससे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ती है, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन, सरकार को तो पड़ता है। और जब फर्क पड़ता है तो सरकार को बताना चाहिए कि उसे फर्क पड़ रहा है। उसका एक ही तरीका है, कार्रवाई।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)