यूपी में खेल बिगाड़ेगे भाईजान।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे संसद परिसर में अपने कुछ सांसदों खासतौर से इमरान मसूद से बात कर रहे थे और उनसे कह रहे थे कि उस आदमी को उत्तर प्रदेश में घुसने मत देना। वह घुसेगा तो खुद तो बर्बाद होगा ही हमें भी बर्बाद कर देगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि देखो हैदराबाद की तीन चीजें बहुत मशहूर हैं। एक शेरवानी, दूसरी बिरयानी और तीसरी परेशानी। तो इस परेशानी को उत्तर प्रदेश में मत आने देना। यानी 140 साल पुरानी देश की दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस,जिसके लोकसभा में 99 सदस्य हैं,वह एक व्यक्ति से डरी हुई है जिसका नाम है असदुद्दीन ओवैसी।

उत्तर प्रदेश में ओवैसी का कोई कॉरपोरेटर तक नहीं है। विधायक और सांसद होना तो दूर की बात है। सवाल है कि कांग्रेस क्यों डरी हुई है? कांग्रेस की डर की बात से मुझे एक पुराना किस्सा याद आ गया। प्रयागराज में बहुत बड़े बड़े साहित्यकार हुए। डॉक्टर सुमित्रानंद पंत,हरिवंश राय बच्चन,महादेवी वर्मा आदि। एक बैठक में एक छोटे-मोटे साहित्यकार ने कहा कि हिंदी साहित्य का क्या होगा,मुझे बड़ी चिंता है। लोगों ने पूछा, क्या हो गया भाई? उन्होंने कहा कि पंत जी की तबीयत ठीक नहीं रहती। निराला जी भी बीमार रहते हैं और मैंने सुना है कि महादेवी जी की भी तबीयत खराब है और आजकल तो मेरी भी तबीयत खराब रहती है। अब ये गलतफहमी का शिखर है कि एक पिद्दी अपनी तुलना इतने बड़े साहित्यकारों से कर रहा है। वही हाल कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में है। उसके केवल दो विधायक हैं और वे दोनों भी अपने बूते पर विधायक बने हैं, कांग्रेस पार्टी के बूते पर नहीं। यूपी में कांग्रेस पार्टी का संगठन ही नहीं बचा है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे प्रदेश में छह सीटें मिल गईं। क्यों मिल गई? समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को डर था कि कनार्टक और तेलंगाना की तरह मुसलमान यूपी में भी कांग्रेस के साथ चला गया तो सारा खेल बिगड़ जाएगा। इस कारण उन्होंने कांग्रेस से अलायंस कर लिया। सपा के भरोसे उस कांग्रेस को भी 6 सीटें मिल गईं,जिसका यूपी में कोई आधार नहीं बचा है। फिर भी कांग्रेस पार्टी असदुद्दीन ओवैसी से डरी हुई है। तो सवाल यह है कि क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति सुधर रही हो, इसके संकेत दूर-दूर तक नहीं है। उसे अगर अपनी बची खुची लंगोटी बचानी है तो उसको समाजवादी पार्टी की जरूरत है। अखिलेश यादव को जब तक मुस्लिम वोटों के बंटने का डर सताएगा तब तक कांग्रेस से उनका गठबंधन चलेगा। लेकिन अब दो नए घटनाक्रम हो रहे हैं। पहला यूपी में ओवैसी चुनाव लड़ेंगे। अगर वह मुस्लिम वोट काटते हैं तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ समाजवादी पार्टी का होना है। दूसरी घटना- बहुजन समाज पार्टी की सर्वोच्च नेता मायावती फिर से सक्रिय हो गई हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को दो फायदे हुए थे एक तो एकमुश्त मुस्लिम वोट उन्हें मिला था और कुछ मात्रा में समाजवादी पार्टी को वह जाटव वोट भी मिला था, जो मायावती का हुआ करता था। अब जाटव वोट के अपने घर लौट जाने की संभावना है। मेरा मानना है कि मुस्लिम वोट अभी भी समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा मिलेगा। लेकिन ओवैसी और मायावती ने अगर थोड़ा भी मुसलमान वोट काटा तो सपा-कांग्रेस गठबंधन को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका खतरा ज्यादा है क्योंकि वहां सोशल कॉम्बिनेशन देखें तो दो ही बनते हैं जाट-मुस्लिम या जाटव-मुस्लिम। अखिलेश यादव के पास न तो जाटव हैं और न जाट हैं। मायावती अगर गंभीरता से चुनाव मैदान में होंगी तो जाटव वोट लगभग 100 फीसदी बहुजन समाज पार्टी के साथ जाएगा। मायावती की सक्रियता समाजवादी पार्टी के लिए बड़े खतरे की घंटी है। दूसरी ओर ओवैसी जब अभी से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को डरा रहे हैं तो आप समझिए कि अखिलेश यादव के मन में कितना बड़ा डर होगा। ओवैसी को सीटें मिलें न मिलें लेकिन मुसलमानों का वोट उनको मिलने लगा है। बिहार विधानसभा और महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में तो उनको वोटों के साथ सीटें भी मिली हैं।

उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल सीटों पर अगर थोड़ा वोट भी ओवैसी की पार्टी काटती है तो उसका सीधा नुकसान कांग्रेस और सपा की गठबंधन को होना है और इसके कारण कांग्रेस का जो हौवा समाजवादी पार्टी के मन पर बना हुआ है कि अगर कांग्रेस को साथ नहीं लिया तो मुस्लिम वोट जा सकता है, वह खत्म हो जाएगा। फिर सीन में मुस्लिम वोट के लिहाज से कांग्रेस कहीं नहीं होगी। वैसे तो किसी भी लिहाज से कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुकी है। आप बताइए 2024 में यूपी से लोकसभा की छह सीटें मिलने के बाद कांग्रेस पार्टी ने क्या किया? राहुल-प्रियंका ने उत्तर प्रदेश का कोई दौरा नहीं किया। संगठन को खड़ा करने का कोई प्रयास नहीं किया। हर जिले में आपको कांग्रेस पार्टी का दफ्तर खोजना मुश्किल होगा और दफ्तर है तो वह चलता नहीं है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का कुछ भी दांव पर नहीं लगा है। लेकिन खतरा समाजवादी पार्टी के लिए है। समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक मुस्लिम-यादव में से यादव तो नहीं टूटने वाला है, लेकिन मुसलमान अगर जरा सा छिटके तो समाजवादी पार्टी का किला धड़ाम से गिर जाएगा।

अखिलेश यादव अगर अपने पिता की राजनीति से सीख लेते तो आज उनका जो कद है, उससे ज्यादा बड़ा होता। लेकिन आराम तलबी से अगर सत्ता मिल गई हो तो फिर काम करने का मन नहीं करता। 2012 में बिना कुछ किए उनको मुख्यमंत्री का पद मिल गया और 5 साल उन्होंने शासन कम किया, मौज मस्ती ज्यादा की। उसका नतीजा यह हुआ कि 2012 में 224 सीटों वाली सपा उनके 5 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद 2017 में मात्र 47 सीटों पर आ गई। यही 47 सीट अखिलेश यादव की राजनीतिक उपलब्धि हैं। यह जो 37 सीटें आपको लोकसभा की दिख रही हैं,मेरा मानना है कि यह बाढ़ का पानी है और वह पानी उतर चुका है। 2024 के बाद जिस तरह से बीजेपी ने अपने घर को दुरुस्त करने का काम शुरू किया है। महाराष्ट्र,दिल्ली,हरियाणा,बिहार विधानसभा चुनावों के जो नतीजे आए हैं,वह बताते हैं कि 2024 को बीजेपी ने बहुत पीछे छोड़ दिया है। फिर उत्तर प्रदेश में योगी जी ने जितना काम है,उतने काम के बारे में तो अखिलेश यादव कभी सोच भी नहीं सकते हैं। ऐसे में ओवैसी के आने की आहट उनके लिए कोढ़ में खाज है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)